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अमित शर्मारचनाकार परिचय:-


अमित शर्मा (CA): पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी। वर्तमान में एक जर्मन एमएनसी में कार्यरत। समसामयिक विषयों पर व्यंग लेखन

खाली दिमाग शैतान का घर होता हैं और खाली पेट चूहों का. जब दिमाग और पेट दोनों भर जाते हैं तो शैतान और चूहे, रोहित शर्मा के टैलेंट की तरह अदृश्य हो जाते हैं. लेकिन जब ज़्यादा खाकर दिमाग और पेट दोनों पर चर्बी चढ़ जाये तो इंसान "विजय माल्या" गति को प्राप्त होता हैं. हम सब बचपन से सुनते आए हैं, "भूखे, भजन ना होए गोपाला, भूख ने हैं हमें मार डाला ". भूखे पेट भजन करना हमारे लिए संभव नहीं हैं , हाँ अगर कोई बखेड़ा खड़ा करना हो तो बात अलग हैं। हम धार्मिक प्रवृती के श्रद्धालु लोग हैं इसलिए हमारा दृढ़ विश्वास हैं की भगवान हमारे भजन करने का इंतज़ार ठीक वैसे ही करते हैं जैसे हम भारत वासी अच्छे दिनों और काले धन का , फेसबुक पर 89 लोगो को अपनी प्रोफाइल पिक में टैग करने के बाद "cOoL bOy aNkiT", लाइक का और दलित चिंतक हर घटना के पीछे "ब्राह्मणवादी मानसिकता" को ज़िम्मेदार ठहराने का करते हैं।

"भूखे, भजन ना होए गोपाला......" दरअसल ऐसा कहना हमारी कोई मज़बूरी या कमजोरी नहीं हैं बल्कि ऐसा कहकर तो हम केवल कूटनीतिक तरीके से भगवान को "एक्सक्यूज़ मी" कहकर "भगवन -पूजा" से पहले "पेट- पूजा" करते हैं। वैसे अगर इसे मज़बूरी भी माना जाये तो इसमें कुछ गलत नहीं हैं क्योंकि हम तो मज़बूरी को भी महात्मा गांधी का नाम देते हैं। ब्रेकफास्ट , लंच और डिनर हमारी दिनचर्या के अंग हैं और शरीर के सारे अंग अच्छे से काम करते रहे इसीलिए आजकल हमें टीवी पर बताया जाता हैं , "स्वाद का तड़का , अंग अंग -फड़का" क्योंकि जब खा-पीकर सारे अंग अपने आप ही फड़कने लगे तो पूरा शरीर बिना किसी योग- प्राणायाम और व्यायाम के वैसे ही स्वास्थ्य रहेगा। हम आजकल अपनी प्यास भी तूफानी तरीके से बुझाते हैं क्योंकि ये प्यास हैं "गरीब अन्नदाता" किसान की ज़िन्दगी की "लौ" नहीं की आसानी से बुझ जाये।

हम बचपन से "खाना- खजाना' देखते आ रहे हैं , टीवी पर भी और राजनीती में भी। टीवी पर संजीव कपूर, पाककला से भरपूर, आमचूर से लेकर मोतीचूर तक हमें अलग अलग तरह की डिश बनाना सीखाते थे, तो वहीँ राजनीती में नेता भी वर्षो से जनता की हर तरह की "विश" में अपने "वैचारिक-विष" का तड़का लगाते रहे हैं। "खाना -खज़ाना" ने भ्रष्टाचार और अनैतिकता को बढ़ावा दिया हैं , जहाँ पहले लोग सब्ज़ी के लिए मटर छीलते समय 2 -3 मटर खा लेने पर भी आत्म ग्लानि का अनुभव करते थे वहीँ टीवी पर खाना खज़ाना देखने के बाद व्रत -उपवास के दिन भी भूखे रहने की बजाय साबूदाने की खिचड़ी, दो दर्ज़न केले , 5 -6 एप्पल , 1 किलो अंगूर , 5 -6 संतरे, ड्राई फ्रूट्स और 3 -4 गिलास मिल्क शेक / लस्सी भकोसने की लम्पटता सीख गए हैं ।

एक आम आदमी का हाज़मा , उसके बैंक खाते में जमा राशी जितना ही मज़बूत होता हैं लेकिन राजनेता तो जाती , धर्म और भ्रष्टाचार का "राजनैतिक त्रिफला चूर्ण" खाकर अपना हाज़मा इतना मजबूत कर लेते हैं की "कॉमन -वेल्थ" को भी हज़म कर जाते हैं। कुछ नेताओं का हाज़मा तो इतना मजबूत होता हैं की वो , " मैं देश नहीं झूकने दूंगा" की कसमे खाते हुए झगड़ालू पडोसी के बर्थडे पार्टी पर केक तक खाने पहुँच जाते हैं। अगर कभी गलती से कोई कमजोर हाज़मे वाला व्यक्ति सत्ता तक पहुँच जाता हैं तो इस कमजोरी को दूर करने के लिए अपनी कमजोरी को ईमानदारी का मफलर पहना कर इसे "औड" दिनों में दूसरे राज्यों में और 'इवन" दिनों में अपने राज्य में प्रचारित करके खजाने को खाली कर अपने हाज़मा में धीरे धीरे "स्टेमिना" जमा करता हैं।

सरकारी खजाना खाली करके राजनेता, जनता की भलाई और बड़ा पुण्य का कार्य करते हैं क्योंकि वो चाहते हैं की खजाना खाली देख कर लोगो में और ज़्यादा काम करने की इच्छा जागृत हो और वो ज़्यादा से ज़्यादा कमाकर, सरकारों को टैक्स देकर फिर से खजाना भर सके. इस तरह से घोटाले करके सरकारे तो बहुत पहले से ही "स्किल इंडिया" के तहत लोगो की उद्यमशीलता को बढ़ावा दे रही हैं. जब बरसो पहले मनोज कुमार साहब ने गाया था " काले-गोरे का भेद नहीं , हर दिल से हमारा नाता हैं.... " तो काले -गोरे से उनका संदर्भ "धन" से था क्योंकि हमारे नेता काले-गोरे धन में अंतर ना करते हुए,नस्लभेद मिटाने की अपील करते हुए , सामाजिक समरसता और सदभाव का ही सन्देश दे रहे हैं। इतना खाने के बाद भी हमारे नेता कभी "डकार" या "हाजमोला" नहीं लेते हैं, हाँ अगर ज़रूरत महसूस हो तो समर्थकों के साथ "सेल्फी" ज़रूर ले लेते हैं।

त्रिफला चूर्ण खाने से और संसद की कैंटीन में सब्सिडी वाला भोजन करने से नेताओ को "गैस" की प्रॉब्लम कभी नहीं होती हैं और आम जनता को भी ये समस्या ना हो इसीलिए उन्हें अपनी "गैस" सब्सिडी छोड़ने की सलाह दी जाती हैं। बोफोर्स की तोप से लेकर कोयले की खदाने, चीख चीख कर राजनेताओ के मजबूत हाज़मे की गवाही देती रही हैं। हमारे नेता इतने सालो से अपने हाज़मे का लोहा मनवाते रहे हैं और भ्रष्टाचार से लोहा लेते रहे हैं फिर भी यह एक विडंबना ही हैं की हमारे देश में "आयरन" की कमी से हर साल इतनी मौते हो जाती हैं। मजबूत हाज़मे की निशानी होती हैं की खाने के बाद अगर कहीं कोई "गैस" लीक हो तो उसमें आपका नाम ना आये लेकिन अगर "पनामा लीक' हो तो उसमे आपका नाम ज़रूर आये क्योंकि "लीक" से हटकर ही हम कहीं "लीक" हो सकते हैं और "पीक" पर पहुँचने के लिए "लीक" होना ज़रूरी हैं।



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