दिनेश चन्द्र पुरोहित रचनाकार परिचय:-

लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी कहानी “कालज़ा री कोर..!” का हिंदी अनुवाद
लेखक एवं अनुवादक - दिनेश चन्द्र पुरोहित


सेठ सौभाग मलसा का व्यापार, दिन-दूना और रात चौगुना बढ़ता रहा ! ईश्वर ने सभी सुख प्रदान किये उनको, मगर एक कष्ट-दायक पीड़ा से उनका कोमल दिल छलनी हो गया ! कई सालों पहले उनकी पांच बरस की सुपुत्री सौदरा बाई रामदेवरा-मेला में खो गयी थी..जो अब तक उन्हें नहीं मिली ! यह दुःख उनको शूल की तरह, उनके दिल में चुभता जा रहा था ! होली-दीपावली के त्योहार को छोङिये, उनको तो अब राखी के त्योहार भी अच्छा नहीं लगता ! उसका नज़दीक आना, आख़िर सेठजी को अच्छा क्यों लगेगा..? इस त्योहार के नज़दीक आने से, सेठजी की फ़िक्र अलग से बढ़ जानी स्वाभाविक थी ! उनकी चिंता बढ़ने का कारण, ख़ुद उनका लाडका बेटा मनसुखा रहा ! उनको यही फ़िक्र सताने लगी, के राखी के रोज़ जब-कभी भी वह अपनी सूनी कलाई को देखेगा.. बस, दुःख के मारे उसका फूल सा चेहरा मुरझा जाएगा..! फिर, क्या..? अश्कों से गंगा-यमुना बहाता हुआ, मुंह उतारकर किसी कोने में जाकर बैठ जाएगा ! इस दुखद मंज़र को देखने की ताकत, अब सौभाग मलसा में रही नहीं ! इस तरह उनके दिल पर दो-तरफ़ा चोट लग जाना, स्वाभाविक था ! एक तरफ़ बच्ची का ग़म, तो दूसरी तरफ़ इस मनसुखे को संभालना !

बारह बरसों पहले, उसकी कलाई पर सोने की राखी बांधने वाली लाडकी छोटी बहन सौदरा बाई रामदेवरा के मेले में खो गयी थी ! बदकिस्मती से, उसकी खोई हुई बहन अभी तक मिली नहीं ! अब जैसे ही भादो का महिना आया, और सौभाग मलसा की फ़िक्र पहले से ज़्यादा बढ़ने लगी ! उनको आशंका थी, के अभी यह मनसुखा आकर कहेगा “चलिए बापू, रामदेवरा के मेले में ! वहां मेले में, बहन सौदरा को ढूंढ लाते हैं !” फिर, क्या..? वहां जाकर, ठौड़-ठौड़ सौदरा को ढूंढेगा..नहीं मिलने पर, दहाड़े मारकर रोता रहेगा ! फिर यह दारुण मंज़र, सौभाग मलसा कैसे देख पायेंगे..? बस इस बार भी वही हुआ, छोरा मनसुखा ज़िद्द पर उतर गया...बस एक ही बात, चलो रामदेवरा..चलो रामदेवरा ! आख़िर, मज़बूर होकर सौभाग मलसा ने पंडितजी को बुलाकर मुहर्त निकलवा लिया, के “कब किस दिन किस वक़्त, रामदेवरा के लिए घर से निकलना होगा...?” फिर पंडितजी के बताये मुहर्त अनुसार सभी घर से रूख्सत होकर, पोकरण जाने वाली रेलगाड़ी में आकर बैठ गए !

इस वक़्त मनसुखा की उम्र करीब रही होगी, २२ साल की ! जब उसकी बहन खोयी थी, उस दौरान वह रहा होगा करीब..दस बरसों का ! वक़्त के मुताबिक़, इस समय दोनों भाई-बहन जवानी के डगर पर पहुंच गए ! इस समय सौभाग मलसा की ख़ास चिंता इस बात की थी, के “अब इस वक़्त सौदरा, शादी लायक जवान हो गयी होगी ? आज़ का ज़माना, अच्छा रहा नहीं..कल कोई इस नासमझ बच्ची के साथ कोई ग़लत बात हो गयी, तो वे दोनों पति-पत्नि किसी को मुंह दिखलाने के लायक नहीं रहेंगे..क्या पत्ता, ग़मज़दा होकर उन्हें खुदकुसी न करनी पड़ जाय..?”

गाड़ी रवाना होने का वक़्त हो गया, इंजन ज़ोरों से सीटी देने लगा ! थोड़ी देर में ही, गाड़ी रवाना हो गयी ! रफत: रफत: गाड़ी ने अपनी रफ़्तार बना डाली, अब वह तेज़ी से पटरियों पर दौड़ने लगी ! आख़िर यह गाड़ी पोकरण जा पहुंची ! प्लेटफार्म पर उतरते ही, सौभाग मलसा को अपने बाल-मित्र सोना रामसा के दीदार हो गये ! उनको देखते ही सौभाग मलसा दौड़कर जा पहुंचे सोना रामसा के पास ! फिर, क्या..? दोनों मित्र ने एक-दूसरे को अपने बाहुपोश में झकड़ डाला ! गले मिलकर सोना रामसा तो ज़िद्द पर उतर आये, के “आप सबको अब, उनकी हवेली चलना होगा..!” सौभाग मलसा और उनकी पत्नि ने भले चलने की स्वीकृती दे दी हो, मगर यह छोरा मनसुखा अपनी ज़िद्द पर अड़ गया..बेचारे सोना रामसा के मुंह पर ही कहने लगा “जिस काम आये हैं, पहले वही काम करेंगे ! उसी काम को, प्राथमिकता देना वाजिब है !” बेचारे सोना रामसा मनसुखा की बात सुनकर, बेचारे करते क्या..? आख़िर उसे मानाने के लिए, उनको शीरी ज़बान में कहना पड़ा “बेटा मनसुखा, आज़ यहीं हवेली में रुक जाओ ! कल तड़के निकलकर आशापुरा माताजी के दर्शन कर लेंगे, फिर रामदेवरा के लिए निकल पड़ेंगे !” मगर, यह मनसुखा कहां मानने वाला ? उसको तो बाबा रामसा पीर पूरा वसूक था, कि बाबा ज़रुर मिला देगा उसकी बहन सौदरा से ! तब बेचारे सोना रामसा की शीरी जबान में कही बात का कोई असर, मनसुखा पर कौनसा पड़ने वाला..? आख़िर उसकी ज़िद्द के आगे सौभाग मलसा को झुकना पड़ा, और मज़बूर होकर उसे मेले में जाने की इज़ाज़त दे दी ! फिर, क्या..? इजाज़त मिलते ही, मनसुखे ने झट अपने तीनों बुज़ुर्गों को पायलागन किया ! और झट, बाबा का नाम लेकर पद-यात्रा के लिए रूख्सत हो गया ! अब मनसुखा का मन-मयूर नाच उठा, फिर क्या..? उसे तो ऐसा लगने लगा, मानो जन्नत से फरिश्तों ने आकर उसके कंधो पर पर लगा दिए हो..! अब तो मनसुखा तेज़ रफ़्तार से चलता हुआ स्टेशन के बाहर आ गया, वहां किसी फेरी वाले से पद-यात्रा का झंडा खरीदकर पद-यात्रा के लिए निकल पड़ा ! अब उसे रास्ते में जो भी पद-यात्रा का संघ मिलता, बस वो तो झट झंडा उंचा करके ज़ोर से “जय बाबा की” का जयकारा लगाता हुआ आगे चलता रहा !

अब साथ करने के लिए, वह रास्ते में चल रहे एक संघ के साथ मिल गया, उसके बाद तो वह बढ़ चढ़कर आते जाते लोगों को “जय बाबा की” कहता गया ! पोकरण की बस्ती से बाहर आते ही, उस छोरे को एक बगीचा दिखायी दिया ! इसके अन्दर एक टेंट लगा हुआ दिखायी दिया, वहां सड़क पर कई सेवाभावी गांव वाले रामदेवरा जा रहे पद-यात्रियों को रोक कर उनको आदर के साथ बगीचे में ले जाकर चाय-नाश्ता व भोजन करवा रहे थे ! अगर ये यात्री उनकी सेवा अंगीकार नहीं करते, तो ये सेवाभावी ग्रामीण उनके पावों में गिर जाते और किसी तरह उन्हें रजामंद करके बगीचे में ले आते, और सेवा क़ुबूल करवा लेते ! इस तरह अब यह मनसुखा भी अपने सह-यात्रियों के साथ बगीचे में चला आया ! दूसरे सारे यात्री तो पद-सेवा करवाकर, खाना खाने टेंट में चले गए ! मगर इस मनसुखे को भूख लगने का सवाल खड़ा नहीं होता, क्योंकि वह तो सबाह-सबाह पेट-भरकर देसी घी में तले परामठे खाकर घर से चला था ! इसलिए वह तो बगीचे में खड़ा रहकर, हाथ-पावों को दुरस्त करने के व्यायाम करने लगा ! टेंट से कोई दस क़दम दूर, करीब १६-१७ साल की लड़कियां यात्रियों की पद-सेवा का रही थी ! पानी भरी हुई बाल्टियां व लोटे उनके पहलू में रखे थे, और प्राथमिक उपचार का बोक्स भी उनके पास रखा था ! बाल्टी जिस छोरी के पास रखी थी, वह पहले पांवों को धोती थी..अगर पांवों में ज़ख्म होते तो, वह पावों को लाल दवा मिले पानी से पहले धोने का काम करती, और उसके बाद उसे प्राथमिक उपचार का बोक्स रखने वाली लड़की के पास पट्टी-बंधन हेतु भेजा करती ! वह लड़की उनके पांवो के ज़ख्मों पर घाव भरने की ट्यूब लगाकर पट्टी बांध देती थी, और साथ में एंटीबायोटिक और दर्द-नाशक गोलियां देकर उन्हें भोजन करने के वास्ते टेंट में भेज देती ! ये बेचारे भगत रामसा पीर की भगति के बल से कई किलोमीटर पद-यात्रा करते हुए अब वे यहां तक आ पहुंचे, पैदल चलते हुए इनके पांवों की दुर्दशा हो गयी ! दोनों पावों के तालू छाले और जख्मों से भर चुके थे, जिनमें से खून और मवाद निकलता जा रहा था ! ऐसे लोगों को, प्राथमिक उपचार से बहुत राहत का अहसास होने लगा ! फिर, क्या ? इन लोगों की दुआएं, इन सेवाभावी बच्चियों को मिलती जा रही थी ! अचानक पांव धोने वाली लड़की की काक निगाह में, यह कसरत करता हुआ मनसुखा आ गया ! उसको देखते ही वह सोचने लगी, “यह यात्री बिना पांव धुलाये, अन्दर दाख़िल कैसे हो गया..?” दिल में ऐसे विचार आते ही, वह झट जा पहूंची उस मनसुखे के पास ! और जाकर कहने लगी, के “माफ़ कीजिये, भाई साहब ! आप बिना पांव धुलाये, अन्दर कैसे दाख़िल हो गए..? चलिए आप, आपकी पद-सेवा कर लूं ! फिर, आपको जीमने के लिए पंडाल में बैठाकर आ जाऊं !” लड़की की बात सुनकर, मनसुखा उसका मुंह देखने लग गया ! इस तरह अपनी ओर उसे ताकते देखकर, वह लड़की तपाक से बोली “भाई साहब, इस तरह मेरा मुंह काहे ताक रहे हो..? उठिए, और चलिए मेरे साथ..आपकी पद-सेवा कर लूं, फिर आपको जीमने के लिए बैठाकर आ जाऊं..!” लड़की की बात सुनकर, मनसुखा झट उसके साथ रवाना हुआ ! और बाल्टी में लोटा डालकर अपने पांव वह ख़ुद ही धोने लगा, उसको ऐसा करते देखकर वह उसे रोकती हुई कहने लगी “अरे..रे..भाई साहब, यह जुल्म काहे ढाह रहे हो हम पर..? यह पद-सेवा तो हमारे गांव की ओर से होनी चाहिए..!” कहते-कहते उस लड़की की निग़ाह, पांव धोते हुए मनसुखे की पिंडली पर जा गिरी ! उस पिंडली पर नाग का गोदना गुदा हुआ देखकर, वह विस्मित हो उठी ! उसके दिल में, बस एक ही विचार उठने लगा के “ऐसा ही गोदना उसकी ख़ुद की पिंडली पर गुदवाया हुआ है..ऐसा क्यों..? क्या यह गोदना, कोई ख़ानदानी निशानी तो नहीं है ? और कहीं इस छोरे के ख़ानदान के साथ, मेरा कोई सम्बन्ध तो नहीं है ?” इतने में उसके कानों में मनसुखे की आवाज़ सुनायी दी, जिससे उसके दिमाग़ में चल रही विचार श्रंखला टूट गयी ! वह छोरा मनसुखा कह रहा था, के “बहन, तू क्या सोचती जा रही है..? मेरा संघ तो रूख्सत होने के लिए तैयार हो चुका है, अब मैं भी निकलता हूं ! और जाते-जाते तूझे और तेरी सभी बहनों को, दुआएं देता हुआ जाता हूं ! आख़िर तुम सब ने मिलकर, हमारे संघ की बहुत खिदमत की है !” तभी तेज़ हवा के झोंके ने आकर, कंधे पर रखे अंग-वस्त्र को नीचे ज़मीन पर गिरा डाला ! उस अंग-वस्त्र को वापस खंधे पर रखता हुआ, छोरा मनसुखा कहने लगा “बहन तू क्यों नहीं चलती है रामदेवरा, तूझे पत्ता नहीं आज़ बाबा के मंदिर के ऊपर ध्वज़ा फरुखेगी..! तब उस दौरान कैसा मंज़र होगा, उसकी तू कल्पना नहीं कर सकती !” वह लड़की कुछ नहीं बोली, बस केवल उसके भोले मुंह को..शैतानी मुस्कराहट के साथ निहारती रही ! मनसुखा सोचने लगा, के “कहीं, उसने कुछ ग़लत तो नहीं बक दिया..?” बस फिर उसके चहरे के भाव को भाम्पता हुआ, कहने लगा “बाईसा, मैं तो पूरे दिन पैदल चलता हुआ दूसरे दिन पहुंच जाऊंगा रामदेवरा !” इतनी बात सुनते ही, वह लड़की खिलखिलाकर हंस पड़ी और कहने लगी के “भाई साहब आप तो हट्टे-कट्टे मर्द लगते हो, और आप ऐसी काली बातें करते जा रहे हो..? अजी भाई साहब, लोग तो एक घंटे में ही पैदल चलते हुए पहुंच जाते है रामदेवरा ! और मेरी जैसी लड़कियां तो आराम से, इधर-उधर घूमती हुई डेड घंटे में पहुंच जाती है रामदेवरा ! अज़ी भाईसाब आप जानते नहीं, जाते-जाते हम कई स्थानों पर विश्राम भी कर लेती हैं !” इस बेचारे मनसुखा को क्या मालुम, पोकरण और रामदेवरा के बीच की दूरी कितनी है..? उसने कब की, रामदेवरा जाने की पद-यात्रा..? ये ज़नाब तो, ऐसे शहजादे ठहरे ! जो अपने इन कोमल पांवों को कभी, ऐसे ही बिना चप्पल य जूत्ते पहने ज़मीन पर रखते नहीं...अगर नंगे पांव थोडा चल भी ले, तो झट इनके पांव छालों के ज़ख्मों से छलनी हो जाते हैं ! ये ठहरे, ऐसे साहब बहादुर ! फिर, दूरी का हिसाब-किताब कैसे रख पाते..? अब तो मनसुखा ख़ुद समझ गया, के “उसने ग़लत जगह खड़े होकर, डींग हांक दी है..बस, फिर क्या ? बेबसी से, बेचारे ने चुप्पी साध ली ! उसे चुप-चाप खड़े देखकर, वह लड़की कहने लगी “भाई साहब आप पहुंचिये, रामदेवरा ! मैं यहां के सारे काम निपटाकर, सीधी वहीँ आ रही हूं ! आपको मेरी फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं, यह बात आपको ज़रूर बताऊंगी के आपसे मेरी मुलाक़ात रामदेवरा के सेवा कैम्प में हो जायेगी ! मैं हर बाबा की दूज को रामदेवरा में, बाबा के दर्शन करने व सेवा देने जाया करती हूं !” इतना सुनकर मनसुखा की जुबां पर लगा ताला खुल गया, वह कहने लगा बहन तू किस कैम्प में मिलेगी, कोई तो निशानी होगी उस कैम्प को पहचानने की ? वहां तो कई समियाने [पंडाल] लगे हैं..मैं कैसे उस सेवा कैम्प को पहचान पाऊंगा, जिसमे तुम सेवा दे रही होगी..?”


सुनते ही लड़की मुस्करा उठी, मगर इस बार उसकी खिल्ली न उड़ाकर साफ़-साफ़ जवाब दे बैठी “आप किसी गांव वाले से पूछ लेना, भाई साहब के सोना रामसा ने कहां सेवा कैम्प लगाया है..? वह ख़ुद गांव वाला उस कैम्प में आपको छोड़ आयेगा, जिस सेवा कैम्प मैं सेवा दे रही हूं..! सभी गांव वाले मुझे जानते है, मेरे बाबोसा सोना रामसा हर साल बाबा के मेले में सेवा कैम्प लगाते हैं ! इस बार बाबोसा ने असमानी रंग का बड़ा पंडाल, मोटे बरगद के पास लगाया है ! आज़ तो यात्रियों के लिए, हमारे इस पंडाल में छप्पन भोग तैयार किये हैं ! रूख्सत होने की वेला आपसे एक बात ज़रूर कहना चाहती हूं, मेहरबानी करके आप नाराज़ मत होना के आप...”

बेचारा मनसुखा, उस मुंहफट लड़की के सामने क्या बोलता..? वह लड़की तो ऐसी ठहरी, जिसके सामने झूठ भी बोलना निरर्थक है ! इतना सोचकर, मनसुखा कहने लगा “बहन, तुम निसंकोच होकर कह..! जब तुमने इतना कह दिया, तो फिर कोई बात बाकी क्यों रखती है..? जो कहना है तूझे, झट कह दे..मुझे देरी हो रही है !” लड़की मुस्कराती हुई कह बैठी “यह कह रही हूं, भाई साहब ! आप किसी निग़ाह से, पद-यात्री नहीं लगते ! आपके पांवों को देखा जाय, तो ऐसा लगता है के....ये आपके पांव पद-यात्री के न होकर, किसी राजकुमार के पांव हो..! ऐसे कोमल पांवों को धूल में रखते ही, छाले पड़ जाया करते हैं ! फिर भाई साहब ऐसे पांव रखने वाले आप, कैसे पद-यात्रा कर पायेंगे..?” इतना कहकर, अपने लबों पर हाथ रखती हुई हंसने लगी ! उसका इस तरह हंसना, इस मनसुखा को काहे पसंद आता..? वह अपनी खिल्ली उड़ते देखकर नाराज़ हो उठा, और नाराज़गी से कह बैठा “अभी तक तेरी ज्ञान-वर्द्धक बातें सुनी बहन, मगर तेरी कोई बात मानने के पीछे कोई सबूत नहीं ! क्या करूं, तू तो हो लड़की की जात..? अगर तू लड़का होती तो, तूझे ज़बरदस्ती साथ ले जाता पद-यात्रा में...और कहता दिखा तेरी पद-यात्रा, और देख मेरी पद-यात्रा ! कौन पहले पैदल-पैदल पहुंचता है, रामदेवरा..?

इतनी बात सुनते ही, वह लड़की तो शेरनी की तरह प्रहार करती हुई कहने लगी “क्या कहा, भाई साहब आपने...? लड़का होती तो..? आपको किस बात का घमंड है, लड़का होने का..? लड़का होकर कौनसा तीर मार लिया, आपने..? अरे जनाब, यहां पोकरण-फलोदी की लड़कियों को आपने कभी देखा नहीं होगा, यहां की लड़कियां घर का काम-काज व पढ़ाई-कढ़ाई के सारे काम करती हुई खेतों के काम भी संभाल लिया करती है ! यह समझने की ग़लती आप करना मत, के मैं गांव की अनपढ़ लड़की हूं ! आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, के मैं दिखने में सीधी-सादी छोरी हूं...और मैंने हाई स्कूल पास की है, मेरिट में आकर ! यहां की लड़कियां सेकेंडरी बोर्ड के इम्तिहान में अक़सर मेरिट में आती है ! और क्या सुनना चाहते हैं, आप ? अब जनाब, इस क्षेत्र की लड़कियों को देखकर यह मत कहना, के वे लड़कों से कमतर है !” इसके आगे, वह मनसुखा क्या सुनना चाहेगा..? उसने तो झट जूत्ते पहनकर, ज़ोर से “जय बाबा की” बोलता हुआ ज़ोरों का जयकारा लगाया, और जाकर मिल गया अपने संघ में ! अब तो चारो तरफ़ यात्री-गणों ने अपने-अपने झंडों को ऊंचा करके जैकारा लगाया, और आकाश गूंज़ा दिया ! सभी ज़ोर-ज़ोर से गगन-वेदी “जय बाबा की” व “बाबा भली करे” के जयकारे लगाते हुए, रुख्सत होने लगे..!

रास्ते में इन लोगों को, सड़क के किनारे दो पंडाल दिखायी दिये ! एक पंडाल में चाय-काफ़ी व बीड़ी-सिगरेट की व्यवस्था रखी गयी थी, जहां बैंचो पर बैठे ग्रामीण और पद-यात्री सुड़क-सुड़क की आवाज़ निकालते हुए अदरक मिलायी हुई चाय पीते जा रहे थे ! और दूसरे पंडाल में बाबा रामसा पीर की पूजा-आरती बाबत, उनकी तस्वीर व धुप-अगरबत्ती वगैरा सामग्री एक मेज़ पर रखी थी ! वहां बिछायी गयी जाज़म पर, गेरुआ-वस्त्र पहना एक भगत रावण-हत्था बजाता हुआ ज़ोर-ज़ोर से रामसा पीर के भजन गा रहा था ! उसके पास करताल बजाती हुई एक ग्रामीण महिला, घूंघट निकाले बराबर अपनी घांटकी हिलाती जा रही थी ! उसके पास दूसरे कई रामसा पीर के भगत बैठे, भजन गाने में उसका साथ दे रहे थे ! सड़क के किनारे एक चबूतरा था, जिस पर लगा एक पीपल का पेड़ चबूतरे पर विश्राम करने वाले यात्री को छाया प्रदान कर रहा था ! इसी पीपल के पास आकर, यात्रियों को ले जाने वाले वाहन रुक जाया करते ! अब संघ के यात्री पंडाल में जाकर विश्राम करते हुए चाय पीने लगे, मगर मनसुखा ने अपने क़दम उस पीपल के चबूतरे की तरफ़ बढ़ा दिए ! मनसुखा बेचारा इतना थक चुका था, उसके पांव हरिकीर्तन करने लगे ! अब तो उसकी एक ही मंशा रही, के कोई जीप या टेम्पो आ जाय तो वह उसमें बैठकर चला जाय रामदेवरा ! मगर, उसको क्या मालुम..इन ढीट सेवाभावी छोरों की निग़ाह उस पर गिर चुकी है..? पंडाल के बाहर खड़े इन चारों सेवाभावी लड़कों ने आकर, बेचारे मनसुखा का मार्ग रोक लिया..और कहने लगे “भाईसाहब, ज़रा पंडाल में चलिये..वहां बैठकर चाय-वाय लीजिये, बहुत अच्छी अदरक वाली चाय बनी है !” उनके चेहरों की भाव-भंगिमा को पढ़ता हुआ, छोरे मनसुखे ने ताड़ लिया के “अगर मैं इनके साथ नहीं गया, तो ये शैतान लडके मुझे उठाकर ले जायेंगे पांडाल में..मुझे इस पीपल तले, बैठने देंगे नहीं..! इन लड़कों को देखकर ऐसा लगता था, के “वे लोग पूरी तैयारी करके ही आये हो..?” उस मनसुखे को कहां थी तलब, चाय की ? उसकी पिंडलियों और एडियों में होता जा रहा था असहनीय दर्द ! कभी वह अपनी पिंडलियों को दबाता, तो उधर एडियों का दर्द बढ़ जाता ! एडियों को दबाने लगता तो पिंडलियों का दर्द बढ़ जाता, बेचारा परेशान हो गया, के एडियों को दबायें या पिंडलियों को..? इधर आ गए, ये बेरहम चार सेवा भावी छोरे..वे उसको जीप या टेम्पो में बैठने देंगे नहीं..! अब वह, इनसे बचने का क्या उपाय करे..?” वह सोचता जा रहा था, तभी एक लडके ने आकर उसके पांव दबाने चालू किये ! और दूसरे ने उसका हाथ पकड़ लिया, और उसे खींचकर ले जाने लगा ! तीसरा लड़का कौनसा कमज़ोर ठहरा..? वह शैतान तो उसको पहलवान की तरह उठाकर, ले गया पंडाल में और बैठा दिया उसे बैंच पर ! चौथा लड़का तो इन सबका बाप निकला, उसने तो रुकी हुई जीप को रवाना अलग से कर दिया..कहीं मनसुखा इस जीप में बैठकर, चला ना जाय...? अपने काम को पूरा अंजाम देकर, ये चारो लड़के वापस पीपल के पास जाकर खड़े हो गए !

जब यह रुकी हुई जीप रवाना हुई, तब उसके शिख़स्ता दिल पर क्या बीती होगी..? वो तो मनसुखा जाने, या बाबा रामसा पीर ! आख़िर, बेचारा करता क्या..? चाय भरा सिकोरा उठाकर, सुड़क-सुड़क की आवाज़ मुंह से निकालता हुआ चाय पीने लगा ! चाय पीते वक़्त वह वहां के नज़ारे, वक़्त बिताने की गरज से देखने लगा ! उसने बैंच पर बैठे डोकरे को, अपनी भींगी हुई धवल मूंछों को साफ़ करते हुए देखा ! मूंछे साफ़ करता हुआ, वह डोकरा कह रहा था “सोना रामसा को मालिक ने जितने पैसे दिए हैं, उससे ज़्यादा उनके दिल को ज़्यादा विशाल बनाया है !” इतना सुनते ही, चाय उबाल रहा डोकरा बोल उठा के “अरे जनाब, उनकी नेक-दख्तर सौदरा बाई तो हीरा है ! ईश्वर ने उनको ऐसी बेटी दी है, जो ईश्वरीय कामों में सोना रामसा से चार कदम आगे चलती है ! अजी क्या कहें, आपको..? यात्रियों की सेवा करने का काम तो, उसने अपना धर्म बना लिया है..ऐसा कौन है, जो इन यात्रियों के ज़ख़्मी पांवों की ख़िदमत करता हो..?” इतने में आंगन पर बैठा डोकरा, बीड़ी से धुवें के बादल बनाता हुआ बोल उठा, के “पहले मेरी बात सुनोजी, आप लोगों की अक्कल घास चरने गयी है ? आप तो यह भी नहीं जानते, के यह छोरी सोदरा बाई इनकी ख़ुद की सगी बेटी नहीं है..आपको कुछ ज्ञान नहीं, इस छोरी के बारे में..? कई सालों पहले रामदेवरा के मेले में, यह अपने मां-बाप से बिछुड़ गयी थी..जो रोती-बिलखती हुई, सोना रामसा को मिली थी ! उन्होंने बहुत प्रयास किया, इस छोरी के मां-बाप को ढूंढने का ! मगर, कुछ काम नहीं आया ! कहीं भी, उसके मां-बाप मिले नहीं ! आख़िर उन्होंने इस बच्ची को अपने घर ले आये, और अपनी धर्म-पत्नि को संभला दी उस बच्ची को ! उनकी पत्नि उस छोरी को पाकर बहुत खुश हुई, उन्होंने बाबा रामसा पीर को दंडोत करके कहा “बाबजी, आपने कन्या रत्न मुझे देकर मेरी सूनी गोद भर दी !” इसके बाद छोरी के भाग्य से सोना रामसा का व्यापार दिन-दूना और रात चौगुना बढ़ने लगा ! फिर तो सोना रामसा अपनी मन्नत पूरी करते हुए, हर साल बाबा के मेले में में ठौड़-ठौड़ यात्रियों के लिए सेवा कैम्प लगाते आ रहे हैं !” इतना कहकर डोकरा चुप हो गया, और मनसुखे के दिमाग़ में सवाल छोड़ गया..कहीं यह सोना रामसा की छोरी, उसकी खोयी हुई बहन सौदरा तो नहीं है..? बस, फिर क्या ? उसके दिमाग़ में यह विचार कोंधने लगा, क्यों नहीं इस डोकरे पूछ-ताछ करके बैन सौदरा की विगत वार जानकारी हासिल कर ली जाय के “यह सौदरा वही है जिसको कई सालों पहले, इस मेले में खो दिया था हमने...?” मगर तभी एक जीप आकर पीपली के पास आकर रुकी, बस फिर क्या, कहीं यह जीप भी चली गयी तो फिर उसे यहां बैठकर व्यर्थ टैम पास करना होगा..? इतना सोचकर, अंतिम चाय का घूंट पीकर वह मनसुखा तो तेज़ी से दौड़ा, और जीप में जा चढ़ा ! थोड़ी देर में वह जीप रवाना हो गयी, रास्ते में एक चोराया आया ! जहां कई सब्जी की दुकाने लगी थी, और वहां कई चाय की थड़ी वाले ग्राहकों को बुला-बुलाकर चाय पिला रहे थे ! एक थड़ी वाला नीम तले खड़ा था, और वहीँ दरी बिछाकर कई ग्रामीण ताश के पत्ते खेल रहे थे ! जीप को चलाने वाला ड्राइवर, जीप को नीम के पास रोक कर उतर गया ! और उस थड़ी वाले को चाय लाने का हुक्म देकर, ख़ुद बैठ गया इन ग्रामीणों के बीच..वहां बैठकर, ताश के पत्ते खेलने लगा ! उसे ताश के पत्ते खेलते देखकर, कुछ सवारियां उतरकर सब्जी की दुकानों के पास चली गयी, वहां जाकर वे मोल-भाव करती हुई सब्जी खरीदने लगी ! काफी देर तक जीप वाला आता दिखायी दिया नहीं, तब मनसुखा उतावली करता हुआ जीप में बैठी दूसरी सवारियों से पूछ बैठा के “जीप कब रवाना होगी ?” जीप में बैठी सवारियां उससे कहने लगी, के “ऐसा लगता है, आप इस सिरे मलसा की जीप में पहले बार बैठे हैं ! आपको सिरे मलसा की आदत मालुम नहीं, ठंडा पौर जब खेतों से खेतीहर-मज़दूर काम से लौटेंगे..तब सिरे मलसा उनको गाड़ी में बैठाकर, इसे रवाना करेंगे ! आप ठंडा पौर होने का इंतज़ार कर लीजिये, तब तक कई और सवारियां गाड़ी में आकर बैठ जायेगी ! क्या करें, बेचारे सिरे मलसा की ठहरी मज़बूरी..? आख़िर, गाड़ी में डालने का तेल बहुत महंगा जो हो गया है !” आख़िर मन मारकर, मनसुखा चुप-चाप बैठ गया ! ठंडा पौर होते ही कई जवान ग्रामीण बालाएं, खिलखिलाकर हंसती हुई आकर जीप में बैठ गयी ! हंसिया और पशुओं के चारे की गठरी सीट के नीचे रखकर, वे आपस में गुफ़्तगू करने लगी ! इनमें से कुछ छोरियां, छुप-छुपकर मनसुखा का उतरा हुआ चेहरा देखती हुई....अपने लबों पर हाथ रखकर, हंसती जा रही थी ! शहर और गांव के फैशन अलग-अलग ज़रूर हैं, मगर अपने-अपने स्तर पर अपना महत्त्व अलग-अलग रखते हैं ! इन ग्राम बालाओं ने रंगीन चटकीले वस्त्र पहन रखे थे, इनके पहने हुए घाघरे और ओढ़नियों पर झिलमिलाते चमकीले तारे-सितारे बहुत ख़ूबसूरत लग रहे थे ! इधर इन ग्रामीण बालाओं की गुफ़्तगू बंद होने का नाम नहीं, और उधर सिरे मलसा मज़दूरों को लेकर वापस आ गए ! इन मज़दूरों को जीप में बैठने की सीटें नहीं मिली, तब कई मज़दूर फाटक को पकड़कर खड़े खड़े हो गए, और कुछ ने बैठे यात्रियों का सामान इधर-उधर रखकर उनके पांवों के पास ठौड़ बनाकर वहीँ बैठ गए ! इस तरह जीप में रत्ती-भर बैठने की ठौड़ बची नहीं, अब मनसुखा को सवारियों की कही बातपर भरोसा होने लगा के “पूरी जीप भर जाने के बाद ही, सिरे मलसा जीप को रवाना करते हैं !” मज़दूरों के बैठ जाने के बाद, सिरे मलसा ने जीप चालू की..कुछ ही मिनटों में वह गाड़ी हवा से बातें करने लगी ! गाड़ी ठसा-ठस भरे जाने पर, मनसुखे की टांगे अकड़ गयी ! अब उसे लगा के उस छोरी के सामने डींग हांक कर उसने ग़लत काम किया है ! अब उसे भय सताने लगा, के “कहीं रामदेवरा के बस-स्टेण्ड पर, जीप से उतरते हुए उस छोरी ने देख लिया..तो वह उससे आंखें मिलाकर, बात नहीं कर पायेगा..!” मगर, वह मनसुखा अपनी ग़लती मानने वाला कहां..? वह तो अपनी बहादुरी दिखाता हुआ, सिरे मलसा से कहने लगा “सिरे मलसा, आपने गाड़ी को ठसा-ठस भर दी है, इस कारण मेरे पांव अकड़ गए हैं...अब आप यह करना, के रामदेवरा आने के एक किलोमीटर पहले मुझे नीचे उतार देना...ताकि थोडा पैदल चलूंगा, तो शायद इन पांवों की अकड़न ख़त्म हो जाय..?”

सुर्यदेव बादलों की ओट में खो गये, ज़मीन पर छाया फ़ैल गयी ! रामदेवरा से एक किलोमीटर दूर, उसके कहे अनुसार सिरे मलसा ने मनसुखा को नीचे उतार दिया ! अब वह उंचा झंडा किया हुआ, बाबा रामसा पीर के जयकारा लगाता हुआ पैदल-पैदल चलने लगा ! पैदल चलते हुए, अब संध्याकाल हो गया ! अब तो जगह-जगह, उसे कई पंडाल दिखायी दिए ! उन पंडालों में से झिल-मिल करती रोशनी, बाहर निकलती हुई दिखायी देने लगी ! चलते-चलते उसे एक विशाल बरगद दिखायी दिया, जिसके पास ही एक आसमानी रंग का पंडाल लगा था ! बरगद और उस पंडाल को देखते ही उसको उस लड़की की बतायी हुई “पंडाल की निशानी” वाली बात याद आ गयी ! उस लड़की ने यही कहा था, के “इस बार बाबोसा ने असमानी रंग का बड़ा पंडाल, मोटे बरगद के पास लगाया है ! आज़ तो यात्रियों के लिए, हमारे इस पंडाल में छप्पन भोग तैयार किये हैं !”



ये सभी बातें याद आते ही, उस मनसुखे ने अपने क़दम उस असमानी पंडाल की तरफ़ बढ़ा दिए ! उस पंडाल के बाहर ही, वह लड़की अपनी सहेलियों के साथ खड़ी बातें करती जा रही थी ! जैसे ही उसने मनसुखे को इस बुरी हालत में आते देखा, और वो उसकी तरफ़ अंगुली से इशारा करती हुई ज़ोरों के ठहाके लगा बैठी ! उधर उसकी सहेलियों ने उस पर निग़ाह डाली, उन्होंने देखा के “यह छोरा तो वाही है, जो सिरे मलसा की जीप में बैठा था ! उसको यही आना था, तो जीप से उतरा ही क्यों..? अब यह कैसे चल रहा है, बेवकूफ..? उसके पांव तो ऐसे लड़खड़ाते जा रहे हैं मानो, वह डटकर पीकर आया हो...दारु, दाखों का !” उसकी यह हालत देखकर, उसकी सहेलियों ने उस छोरी के कान में फुसफुसाकर कोई बात कही ! कहने के बाद, वे सभी ठहाके लगाकर हंसने लगी ! उसके नज़दीक आते ही, वह लड़की ताने मारती हुई सुनाने लगी “भाईसाहब पधार गए आख़िर, पोखरण के धोरे देखकर..? अजी जनाब, आपके वस्त्रों में कहीं भी इन धोरों की खाक़ नज़र नहीं आती..? वाह, जी..क्या हाल किया है आपने, इस अपने कोमल बदन का..?” मनसुखा शर्मसार होता हुआ, कहने लगा “बहन तूझे कुछ भी पत्ता नहीं, मैं कई किलोमीटर पैदल चलकर यहां पहुंचा हूं ! ध्यान से देख ज़रा, क्या हालत हो गयी इन पांवों की पैदल चलकर..? मेरे ये थके पांव, कैसे लड़खड़ाते जा रहे हैं...” इतना सुनते ही, वह लड़की हंस पड़ी ! और उसकी बात काटती हुई उसके बोले जुमले को पूरा कर डाला, वह कहने लगी “जैसे कोई दारुखोरा मद-मस्त हाथी की तरह झूमता हुआ आ रहा हो..?” मनसुखा भौंवे चढ़ाता हुआ, कह बैठा “राम राम, दारु का नाम लेने से पाप लगता है, ऐसे पावन तीर्थ स्थल पर आकर आप ऐसे गंदे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल कर रही हो..? अरे रामराम, पाप लगता है !” वह लड़की, कब उसे छोड़ने वाली..? वह तो ००-७ जेम्स बांड की तरह सबूतों के साथ, तपाक से बोल उठी “अरे जनाब, इस तीर्थ स्थान पर झूठ बोलने से भी पाप लगता है ! अरे राम राम, आप सिरे मलसा की जीप में बैठकर आये, और सफ़ा-सफ़ झूठ बोलते हुए अपने पाप को बढाते ही जा रहे हैं..के, आप कई किलोमीटर पैदल चलकर आये हैं..?” इतना कहकर वह लड़की ज़ोरों के ठहाके लगा बैठी, और पास खड़ी उसकी सहेलियों ने भी ठहाके लगाकर उसका साथ दिया ! अब छोरे की निग़ाह उन सहेलियों पर जा गिरी, ये सारी सहेलियां ऐसी लगती थी..मानो इन सबको, मनसुखे ने कहीं देखा हो..? दिमाग़ पर ज़ोर देने पर, उसे सब याद आ गया..और वह उन सबको पहचान गया, के “अरे रामा पीर, ये तो वो ही चुलबली ग्रामीण बालाएं निकली..जो उसके साथ जीप में बैठी रामदेवरा आ रही थी !” अब उसको सारा माज़रा समझ में आ गया, ये वही कर्मठ छोरियां है, जिनके बारे में इस लड़की ने बताया था के “यहां पोकरण-फलोदी की लड़कियों को आपने कभी देखा नहीं होगा, यहां की लड़कियां घर का काम-काज व पढ़ाई-कढ़ाई के सारे काम करती हुई खेतों के काम भी संभाल लिया करती है !” अब उसके दिमाग़ में कम्प्युटर की तरह सारी बातें फिट हो गयी, के “ये लड़कियां उन शहरों में रहने वाली लड़कियों की तरह नहीं हैं, जो अपने रुखसारों पर लाली लगाकर होंठों को लिपस्टिक से लाल-पीला पोत दिया करती है और कोकरोच देखते ही डर के मारे चिल्ला बैठती है ! मगर खेतों में इन ग्रामीण बहादुर लड़कियों के सामने कोई तेंदुआ या छाली-न्हारिया जैसा जंगली जानवर भी आ जाय, तो ये लड़कियां डरती नहीं और अपने पास रखे....घास काटने के हंसिये को लेकर, उन पर जूंझ पड़ती है ! आख़िर ऐसे जंगली जानवरों का सहांर कर, ये लड़कियां अख़बार की सुर्खियां बन जाती है !”

आख़िर हारकर मनसुखा दुखी दिल से कह बैठा “बाई तू जो कहती है, वो सच्च है ! तू जीत गयी, और मैं हार हार गया ! मुझे पत्ता नहीं, आख़िर तू कैसे मालुम कर लेती..सब कुछ ? लगता है, तू या तो देवी का अवतार है, या फिर है तू ००७ – जेम्स बांड की चेली !” उसके मुंह से ऐसी बात सुनकर, वह लड़की मुस्कराने लगी ! जिससे उस लड़की के रुखसारों का रंग लाल सुर्ख हो गया, मानो वे रुखसार ना होकर कश्मीरी सेब हो !

उस लड़की को इस तरह मुस्कराते देखकर मनसुखा ने सोच लिया, के “इस लड़की का अब मूड ठीक है..अब इससे जो भी बात पूछ लें तो, वह अवश्य उसका ज़वाब देगी !” इतना सोचकर, मनसुखा ने कह दिया “बाई अब तो बता दे, तेरा नाम क्या है..? तू आख़िर है, किसकी बेटी..?” मनसुखा का यह सवाल सुनते ही, वो लड़की लबों पर मुस्कान लाकर कहने लगी “भाईसाहब, लड़कियों का नाम काहे पूछते हो..? नाम में क्या रखा है..? लड़कियों के काम पूछा कीजिये, के “वे लड़कों के मुकाबले में, क्या-क्या काम कर सकती है...? अब आप ऐसा कीजिये, अपने हाथ-मुंह धोकर अन्दर पंडाल में आ जाइये ! मसाले वाली चाय तैयार है, आप पीकर अपनी थकावट दूर कीजिये ! आख़िर भाईसाहब, आपने पैदल चलते हुए लम्बी दूरी तय की है ! नाम तो, आप बाद में पूछते रहना ! चलिए आपको मैं, पानी से भरी बाल्टी और लोटा थमा देती हूं ! आप नाली के पास बैठकर, अपने हाथ-पांव धो लीजिये !” इतना कहकर उस लड़की ने, पानी से भरी हुई बाल्टी व लोटा लाकर उसे थमा दिया ! लोटा और बाल्टी लेकर मनसुखा जाकर नाली के पास गया, वहां बैठकर, हाथ-मुंह धोने बैठ गया ! इतने में उसकी एक सहेली, उतावली करती हई उसे कहने लगी “सौदरा बैन, अन्दर चाय का पानी उबल रहा है ! जल्दी अन्दर चलकर चाय को संभालो, नहीं तो यह चाय कड़वी बन जायेगी ! इधर आसियत का अंधेरा बढ़ता जा रहा है, वैसे बहुत देरी हो गयी है ! बस ऐसा करो, यहां का काम मगजी बा को दे दो ! फिर, जल्दी घर चलो !” इस सहेली के मुख़ से कही बात, को सुनकर, मनसुखा के दिमाग़ में हलचल पैदा हो गयी ! उसको लगा, आख़िर उसकी इल्तज़ा रामा पीर ने सुन ली ! उसके दिल में ख़ुशी छा गयी, ऐसा लगा के “रामा पीर ने उसकी दिल-ए-तमन्ना को यहीं पूरी कर दी !” उसका मन-मयूर ख़ुशी से नाच उठा, उसे ऐसा लगा “मानो सावन की बरसात रिमझिम बरस रही है, और उसकी दो बूंद...प्यासी सीपी के खुले मुंह में जाकर, मोती बन गयी हो..?” फिर, क्या ? उसके दिल में मौज़ूद आशा की ज्योति, एक-दम तेज़ होकर ख़ुशी का प्रकाश फैला दिया ! जैसे ही उसने उस लड़की को कहने के लिए मुख खोलना चाहा, मगर उसे सामने ना तो वह लड़की दिखी और ना उसकी सहेलियां ! वे तो सारी लड़कियां, पंडाल में चली गयी थी..फिर उनके दिखने का सवाल कहां...? फिर क्या...? मनसुखा उस लड़की को आवाज़ देता हुआ, पंडाल में दाख़िल हो गया ! अब पंडाल के अन्दर चारों तरफ़ मनसुखा की एक ही आवाज़, ज़ोरों से गूंज़ने लगी “सौदरा बहन..सौदरा बहन !”

आशापुरा माताजी के दर्शन करने के बाद, सेठ सौभाग मलसा माताजी से अर्ज़ करने लगे के “ओ माताजी, मेरी पुकार सुनो ! मेरी खोयी हुई बच्ची सौदरा, आज़ मिल जाये .! अगर वो छोरी मिल गयी तो, आपके मंदिर में आकर सवा-मणी करूंगा और आपके निज मंदिर में छत्र चढाऊंगा !” इस तरह माताजी से कौल करने के बाद, वे सोना रामसा से कहने लगे “अब हवेली चलिए, कल ज़रूर तड़के रामदेवरा जाने के लिए निकल पड़ेंगे ! ईश्वर करे, माताजी और बाबा रामसा पीर की अनुकम्पा से बच्ची मिल जाये !”

थोड़ी देर बाद, सभी जीप में बैठकर सोना रामसा की हवेली जा पहुंचे ! वहां रसोईदार ने उनके आने के पहले ही, छप्पन-भोग तैयार करके रख दिए ! सभी होल में जा पहुंचे, वहां चौकियां और बैठने के आसन बिछा दिए थे, रसोईदार ने ! होल में आकर, सोना रामसा की पत्नि ने पंखे का खटका ओन कर दिया ! अब खुली खिड़कियों में लगे खस के टाटों से ठंडी-ठंडी हवा आने लगी ! खिड़कियों की तरफ़ देखती हुई, सोना रामसा की पत्नि ने ट्यूब लाइट का खटका ओन किया ! ट्यूब लाइट जलाकर, वह कहने लगी “आये तब तक आसियत का अंधेरा हो गया है, अब तो बाई सौदरा के आने का वक़्त हो गया !” अपनी पत्नि की बात सुनकर, सोना रामसा कहने लगे “भागवान तब ऐसा करो, सौदरा का इंतज़ार कर ही लें ! उसके आने के बाद, खाना सभी साथ में ही खा लेंगे !” इसके बाद सौभाग मलसा की तरफ़ मुंह करके, उनसे सवाल कर बैठे, के “सौभाग मलसा तब ठीक है, बच्चों के आने के बाद ही खाना अरोग लेंगे..आपको, कोई एतराज़ तो नहीं..?” सौभाग मलसा, कैसे जावाब देते..? वे और उनकी पत्नि तो, दीवार पर लगी तस्वीरों को तन्मय होकर देखती जा रही थी ! उन्हें कहां भान, उनका मेज़बान उनसे क्या सवाल कर रहा है..? अचानक इन पति-पत्नि की निग़ाहें दीवार पर लगी, अचानक उनकी निग़ाह एक पांच साल की बच्ची की तस्वीर पर जा गिरी..उस तस्वीर को देखते ही ये दोनों ऐसे चमके, मानो विद्युत प्रवाहित तार को उन्होंने छू लिया हो..? इन दोनों को इस तरह उस तस्वीर को तन्मयता से देखते पाकर कहने लगे “क्या देखना, इस तस्वीर को..? यह तस्वीर तो मेरी लड़की बेटी सौदरा की है, जब यह छोरी पांच साल की थी..तब पुलिस में देने के लिए, यह फोटो खिंचवाया गया था !” यह सुनते ही, सौभाग मलसा झट घबराकर कह बैठे “अरे राम राम, आपने यह क्या बात कह दी..? पुलिस में..ऐसा कोई हादसा तो नहीं..?” इस तरह उन्हें घबराते देखकर, सोना राम मुस्कराते हुए कहने लगे “किस बात की फ़िक्र कर रहें हैं, जनाब..? घबराने की कोई ज़रूरत नहीं, इस छोरी के असली मां-बाप का पत्ता लगवाने बाबत यह फ़ोटो पुलिस को दिया था !”

अब सौभाग मलसा और उनकी पत्नि को पूरा भरोसा होने लगा, यह तो वही लड़की होनी चाहिए..जिसको हमने कई साल पहले, बाबा रामसा पीर के मेले में खो दी थी !” अपनी शंका को दूर करते हुए सौभाग मलसा, सोना रामसा से कहने लगे “इसका क्या मतलब, क्या यह छोरी आपकी ख़ुद की बेटी नहीं है..?” सुनकर, सोना रामसा बोल उठे “हांसा, यह सौदरा हमारी ख़ुद की जाई औलाद नहीं होते हुए भी, यह हमारे काळज़े की कोर है ! कई सालों पहले यह छोरी, रामसा पीर के मेले में मुझे रोती-बिलखती हुई मिली थी ! उस वक़्त मैंने इसके मां-बाप का पत्ता लगाने की बहुत कोशिश की, मगर कोई पत्ता नहीं लगा ! तब हमने यह सोच लिया, के बाबा रामसा पीर ने हमें यह औलाद देकर संतान का सुख दिया है !” इतना कहकर, सोना रामसा चुप हो गये ! उनको चुप पाकर, सौभाग मलसा ने झट अपने बेग से पांच साल की छोरी का फोटो निकाला और उसे सोना रामसा और उनकी पत्नि के सामने रख दिया ! अब सोना रामसा और उनकी पत्नि उस फ़ोटो को खोजी निगाहों से देखने लगे, उन दोनों को दोनों फ़ोटो में रत्ती-भर अंतर नज़र नहीं आया ! अब इन दोनों को यह चिंता सताने लगी, क कहीं ये दोनों सौदरा के असली मां-बाप हो गए तो ये दोनों हमारी लाडेसर को अपने साथ ज़रूर ले जायेंगे ! तब वे इसके बिना, कैसे रह पायेंगे..? आगे आने वाले बिछोव का मंज़र. अब उनकी आंखों के आगे छाने लगा..बरबस दुःख के मारे उनकी आंखों से अश्रु-धारा निकल उठी !

“क्या अब इस सौदरा को उसके असली मां-बाप को सौंपने का वक़्त आ गया..?” यह सवाल उनके दिमाग़ में बार-बार कौंधने लगा, बरबस उनको ऐसा लगने लगा के “यहां कहीं धरती-कंप हो रहो है, और वे दोनों सीता माई की तरह उसमें समाते जा रहे हो..?

उन दोनों का दिमाग़ यका-यक, काम करना बंद कर दिया..बच्ची के मोह में फंसते जा रहे थे ! जिस बच्ची को इतने साल काळज़े की कोर की तरह, पाल-पोसकर इतना बड़ा किया, और वही बच्ची उनको छोड़ कर चली गयी तो..? कैसे ज़ी पायेंगे, उसके बिना..? जिस बच्ची को उठते-बैठते हर वक्त अपनी निगाहों के तले देखते आये, अब वही बच्ची उनकी आंखों से दूर चली जायेगी..? यह कल्पना भी, उनके लिए जान-लेवा हो सकती है ! तभी सोना रामसा को छोरी के गोदने वाली निशानी की बात याद आ गयी, फिर क्या..? हारे हुए खिलाड़ी की तरह, गोदना रूपी तुरुप के पत्ते को फेंकते हुए कहने लगे “सौभा मलसा, क्या आपकी छोरी की दायीं पिडली के ऊपर कोई नाग की तस्वीर का गोदना गुदवाया हुआ था..?” यह सवाल सुनकर सौभाग मलसा और उनकी पत्नि को अनजानी ख़ुशी के दीदार हो गए, बस फिर क्या ? सौभाग मलसा तपाक से बोल उठे “जी हां, यह नाग का गोदना तो हमारे ख़ानदान की निशानी है ! अरे जनाब, ऐसा गोदना आपकी बच्ची के दायें पांव की पिंडली के ऊपर है...क्या ?” अब सोना रामसा को ऐसा लगा, मानो उनका फेंका हुआ हुक्म का इक्का छोटी सी चिड़ियां की दुग्गी से मात खाकर शर बनकर चला गया ! अब बेचारे सोना रामसा, बुझे दिल से इतना ही कह पाए “ज़ी हां, आपने सही कहा ! हमारी लाडेसर सौदरा की दायीं पिंडली के ऊपर, आपने बताया जैसा ही एक नाग गोदना है !”

सुनते ही, सौभाग मलसा व उनकी पत्नि की ख़ुशी का कोई पार नहीं रहा ! वे तो इतने सालों से इस खुशी का इंतज़ार चात्तक परिंदा की तरह कर रहे थे, बरबस उन दोनों को तो ऐसी ख़ुशी मिल गयी..जिसको झेलने की ताकत उनके जिस्म में नहीं थी ! बस वे तो रामसा पीर व आशापुरा माताजी का चमत्कार समझने लगे, उनकी यहां तक की गयी यात्रा सफल हुई ! अपार ख़ुशी ने उनके दिमाग़ को चक्कर-घन्नी की तरह घुमा डाला, उनको कुछ समझ में नहीं आया अब वे सोना रामसा को कैसे और क्या कहें....?

तभी पोल के किवाड़ खुलने की आवाज़ हुई, और उसके साथ ही सौदरा व मनसुखा का हवेली में आना हुआ ! अब हवेली में चारो-तरफ़ ख़ुशी की किलकारियां गूंज़ने लगी, थोड़ी देर में ही वे दोनों भाई-बहन होल में आ गए ! होल में दाख़िल होते ही, मनसुखा ख़ुशी से चिल्लाता हुआ कहने लगा “बापूसा, बहन सौदरा आख़िर रामसा पीर के मेले में मिल ही मिली !” इधर इतने बरसों बाद अपने असली मां-बाप को सामने पाकर, सौदरा ऐसी ख़ुश हुई “मानो उसे दुनिया का, सारा खज़ाना मिल गया हो..?” बस, फिर क्या..? वह दौड़कर उनके पास चली गयी, और उनके पावों में गिरकर रुंधते गले से उलाहने देती हुई कह बैठी “बापूसा बाई ! आप कैसे भूल गए, मुझे..? आपने कभी यह मालुम करने की कोशिश की नहीं, के कोई आपकी बच्ची भी इस खिलक़त में है, वो ज़िंदा है या मर गयी..? इतने सालों तक, आप मुझे खोज नहीं सके..?” इस तरह नाना सवाल करती हुई, मां-बाप के प्रति उमड़ रही प्रेम की सरिता के प्रवाह को वह रोक न पायी ! बरबस इन आंसूओं से, उसके मां-बाप के चरण धुलने लगे ! अश्रु रूपी एक-एक मोती को गिरते देख, उसके मां-बाप से रहा नहीं गया...झट उठकर बच्ची के सर पर हाथ रख दिया ! फिर उसे दिलासा देते हुए, उसके रुखसारों पर छाये आंसूओं को साफ़ कर डाला ! इसके बाद वे बताने लगे, के “उसे खोजने के लिए, उन लोगों ने क्या-क्या प्रयास किये ?”

फिर उस सौदरा को गले लगाकर कहने लगे, के “बेटी सौदरा, अब ऐसी बिछोव वाली घटना हमारे जीवन में ना होगी ! हम सभी एक ही छत तले साथ-साथ रहेंगे, कल बाबा रामसा पीर और आशापुरा माताजी के दर्शन करके जोधपुर निकल पड़ेंगे ! अब तू बस, चलने की तैयारी कर !”

सौभाग मलसा की बात सुनकर, और सोना रामसा व उनकी पत्नि को कैसा लगा होगा..? सौभाग मलसा अपने पूरे परिवार के साथ, ख़ुशी में झूमने लगे ! यह मंज़र अपनी आंखों से देखकर, बेचारे दोनों पति-पत्नि फ़िक्रमंद हो गए ! उनको खाली एक फ़िक्र लगी रही, के “सौदरा के बिना दोनों पति-पत्नि कैसे ज़िंदा रहेंगे..?” वो रामा पीर ही जाने, मगर इन दोनों के दिल हालत क्या हो रही होगी..? यह चिंता यहां किसी को नहीं, और उनके बिछोव से लगने वाले दिल-ए-ज़ख्म पर महरम लगाने वाला अब यहां कौन होगा..? यहां तो होने वाले बिछोव का दर्द, केवल इन दोनों को ही झेलना होगा, अब यह दिल झेल पायेगा या नहीं..? इन सब के जाने के बाद बच्ची को पालने वाले इन दोनों माता-पिता को, संभालने वाला अब कौन यहां मौज़ूद होगा..? वह सौदरा जो उनकी कालज़े की कोर है, वो तो अपने बिछुड़े परिवार के साथ खुशियों में झूमती जा रही थी ! उसे कंहा फ़िक्र, इन पालने-पोसने वाले मां-बाप की..जो इतने साल उसे अपन दिल का टुकड़ा समझते आ रहे हैं, और अब उसके जाने के बाद उनकी क्या दशा होगी..? उसने तनिक नही नहीं सोचा, इस बारे में ? वह तो उस कोयल के बच्चे की तरह व्यवहार कर रह थी, जो अंडे की अवस्था में कौए के घोंसले में मादा कोयल द्वारा रख दिया गया था ! उस अंडे से बच्चे के बाहर आने, व उसके पर निकलने तक कौए की जोड़ी का जो भी योगदान रहा..वो सारा योगदान भूलकर, कोयल का बच्चा उड़कर चला गया अपने असली कोयल परिवार के साथ..? जिसने न तो उसको पाला, न उसका बचाव उल्लू वगैरा उसके शत्रुओं से किया होगा..? मगर उसके पर निकलते ही, वो कोयल का जोड़ा झट आ गया बच्चे पर मां-बाप का हक जतलाने..? बस यही हाल रहा, सोना रामसा और उनकी पत्नि का ! उन बेचारों का तो रो-रो-कर बुरा हाल हो रहा था, उनकी आंखों के सामने श्रीमद भागवत में लिखा वो मंज़र सामने आ गया..जब अक्रूरजी के साथ श्रीकृष्ण व बलराम अपने असली मां-बाप के पास उनके मथुरा शहर जा रहे थे, और नन्द बाबा और यशोदा तड़फते दिल से उनको विदा दे रहे थे ! सौभाग मलसा के पूरे परिवार को ख़ुशी में झूमते हुए पाकर, बेचारे दोनों पति-पत्नि फ़िक्र में डूब गए ! उनका शिखिस्ता दिल निराशा में डूबता जा रहा था, बस उनका यह व्यथित दिल यही कह रहा था के “अब उन्हें कभी, बाई सौदरा के दीदार होंगे या नहीं..?” वे भी नन्द-यशोदा की तरह, अपने सूनी लाल-सुर्ख आंखों से इस सौदरा को जाते हुए देख पायेंगे..? आंसूओं से नाम उनकी आंखें कह रही थी “अब अपने इस काळज़े की कोर से दूर रहकर, ज़िंदा रह पायेंगे या नहीं...?”

 


 इस  मारवाड़ी कहानी को उसी भाषा मे पने के लिए यहाँ चटखा लगाए






3 comments:

  1. लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित जी, आपका लेख अच्छा लगा.

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  2. दिनेशचन्द्र पुरोहित जी, “कालज़ा री कोर..!” इस मारवाड़ी कहानी का काफी अच्छा हिंदी अनुवाद लिखा इस लेख में

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपको बहुत धन्यवाद! मुझे ख़ुशी हुई, आपको कहानी "काळज़ा री कोर" का हिंदी अनुवाद पसंद आया ! आशा है, आप आगे भी मेरी रचनाएं पढ़कर उत्साह बढाते रहेंगे ! कृपया आप मारवाड़ी हास्य नाटक "कठै जावै रै, कडी खायोड़ा" का हिंदी अनुवाद "कहाँ जा रिया है, कड़ी खायोड़ा" ज़रूर पढ़े ! मैं खंड १ से ७ का हिंदी अनुवाद प्रेषित कर चुका हूं ! खंड १ से ५ तक प्रकाशित हो गए हैं ! खंड ६ व ७ शीघ्र प्रकाशित हो रहे हैं ! आप इन्हें पढ़कर, अपने विचार ज़रूर प्रस्तुत करें !
      आपके पत्र की प्रतीक्षा में
      दिनेश चन्द्र पुरोहित dineshchandrapurohit2@gmail.com

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