दिनेश चन्द्र पुरोहित रचनाकार परिचय:-





लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी हास्य-नाटक  [दिल-ए-तमन्ना] खंड ७ 
का हिंदी अनुवाद
 लेखक और अनुवादक -: दिनेश चन्द्र पुरोहित



[मंच रोशन होता है, अहमदाबाद-मेहसाना लोकल गाड़ी पटरियों के ऊपर तेज़ी से दौड़ती हुई दिखाई देती है ! अब अलामों के चच्चा फुठरमलसा शैतानी कारनामा दिखाकर, वापस अपने केबीन में आ चुके हैं ! अभी भी इनके साथी, गपे हांकते करते जा रहे हैं ! फुठरमलसा उनके नज़दीक आकर कहते हैं, के..]
फुठरमलसा - कहां बैठूं, जनाब ?
दयाल साहब – तेरे जहां बैठने की तमन्ना हो, वहीं जाकर बैठ ! कहीं बैठने की जगह नहीं मिले तूझे, तो जाकर बैठ जा टोयलेट के कम्पाउंड के ऊपर ! वहां तूझे कोई कहने वाला नहीं, अब तू कहीं जाकर बैठ भय्या..बस, मेरा सर मत खा !
[फुठरमलसा की एक है ग़लत आदत, वे मर्ज़ी आये वहीँ थूक दिया करते हैं ! इनकी आदतों की मज़ाक उड़ाते हुए, दयाल साहब ने कह दिया, ‘जा बैठ जा टोयलेट के कम्पाउंड के ऊपर !’ अब इनके बोले गए वाक्य को सुनकर, सभी साथी ज़ोरों से हंसने लगे ! मगर, फुठरमलसा को कहाँ असर होने वाला, भले कोई कुछ भी कहे उन्हें ? वे तो इस मामले को आया-गया मानते हुए, बैठ जाते हैं दयाल साहब के पहलू में ! बैठने के बाद, वे दीनजी भा’सा से कहते हैं..]
फुठरमलसा – दीनजी भा’सा, मैंने खो दिया..जनाब !
दीनजी भा’सा – क्या खो दिया, जनाब ? आपका बैग, या ज़र्दे की पुड़िया ?
सावंतजी – भा’सा बैग तो इनके पास ही है, और टिफन इनके हाथ में..फिर, खोया क्या ? कहीं दिल खोकर आ गए, तो रामा पीर जाने ! यह आप इनसे पूछ लीजिये, जनाब !
फुठरमलसा – [हंसते-हंसते कहते हैं] – इस दिल को कैसे खो दूं, जनाब ? इससे जुड़ी रहती है, मेरी दिल-ए-तमन्ना ! मेरी दिल-ए-तमन्ना बस यही है, के मैं आपकी स्कूल में आकर एक चका-चक भाषण दूं..उपभोक्ता सरंक्षण बैठक में !
फुठरमलसा – कहीं फुठरमलसा, आपने निमंत्रण-पत्र खो दिया क्या ? खो दिया, कोई बात नहीं ! मगर आप हमारे मुअज्ज़म खैरियत से हैं, यही बहुत है जनाब हमारे लिए यही बहुत है ! जनाबे आली, आप हमारी स्कूल में तशरीफ़ लाइयेगा और भाषण देकर हमारी दिल-ए-तमन्ना पूरी कीजिये !
फुठरमलसा – ऐसी बात है, जनाब ! एक दिन की छुट्टी लूंगा, फिर जाऊंगा पुस्तकालय सम्बंधित किताबें देखने के लिए ! पूरा ज्ञान हासिल करूंगा जनाब, आख़िर उपभोक्ता सरंक्षण मंच है क्या ? इसके बाद ही मैं, भाषण देने की दिल-ए-तमन्ना पूरी करूंगा !
दीनजी – अरे फुठरमलसा ! इतने पढ़े-लिखे दानिश इंसान होकर आप ऐसी पागलों जैसी बात कर रहे हो ? जाइएगा आप, कलेक्टर साहब के दफ़्तर ! वहां ऊपर वाली मंजिल पर है, उपभोक्ता सरंक्षण न्यायालय ! वहां आपको चक्राकिंत की हुई सामग्री मिल जायेगी, उसे लाकर आप बैठक में पढ़ लेना !
के.एल.काकू – भा’सा इतनी इनके अक्ल होती तो, शायद ये...--
दयाल साहब – [इनकी बात काटते हुए] – फ्लाइंग में इनकी ड्यूटी लगती, मेरी नहीं !
फुठरमलसा - अरे जनाब, मेरी ड्यूटी नहीं लगी..इसमें ऊपर वाले अधिकारियों से, कहीं चूक हो गयी है ! मैं तो तैयार ही बैठा था, इसलिए मैंने दस रुपये खर्च करके फ्लाइंग अफसरों वाली रबड़ मोहर बनवाकर तैयार रखी !
सावंतजी – अरे साहब, पैसे क्यों खर्चे जनाब ? हेड ओफ़िस वालों का काम, उनसे मांग लेते !
फुठरमलसा - कुछ नहीं, कड़ी खायोड़ा ! ऊपर वाले बेचारे अफ़सर भी इंसान हैं..भूल गए होंगे ! अब भी क्या बिगड़ा है, यह दिल-ए-तमन्ना अब अगले साल पूरी कर लूंगा..उस वक़्त याद रखकर, उनसे मांग लूंगा मोहर !
दयाल साहब – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए] – अच्छी तरह सोच ले, फुठरमल ! अब तेरा बुलावा, नहीं आयेगा ! नहीं होगी पूरी, तेरी दिल-ए-तमन्ना !
फुठरमलसा - क्यों जनाब, क्या मैं इंसान नहीं हूं ? मैं भी एफ़.सी.आई. का अधिकारी हूं, आख़िर !
सावंतजी – देखिये जनाब, मैं कहता हूं आप दयाल साहब की बात मान जाइये ! इसके पीछे, कोई ठोस वजह है ! याद कीजिये पिछली बार आपको बुलाया था निरीक्षण बाबत, मगर...
फुठरमलसा - मुझे याद है, सावंतजी ! आप आगे कहिये, जनाब !
सावंतजी – आप काम करना, क्यों चाहेंगे ? अरे जनाब, आपको मालुम है के काम करने से घुटने घिस जाते हैं..पसीने का एक-एक कतरा, बदन से बाहर निकालता है ! फिर क्या ? आपने लिखकर भेज दिया ‘मुझसे उच्च वरिष्ठ अधिकारी को, आप निरीक्षण का कार्य सौंप दीजिये !
रशीद भाई – फिर, क्या ? आपके ऊपर वाले अधिकारी आपसे ज़्यादा चतुर निकले, आपसे उच्च वरिष्ठ नहीं..तब क्या ? आपके समकक्ष अधिकारी यानि अपने दयाल साहब से यह निरीक्षण कार्य पूरा करवा लिया !
सावंतजी – आप रोज़ यही बात कहते हैं, के ‘मैं दयाल साहब से ज़्यादा समझदार हूं !’ अब आप ज़्यादा समझदार होते, तो आपको बुलाते..इनको क्यों बुलाया फिर ?
दयाल साहब – बकवास बंद कर, सावंत सिंह ! जो हो गया, सो हो गया ! मुझे कहीं जाकर अपनी क़ाबिलियत का प्रमाण-पत्र नहीं दिखलाना है ? किसके पास पड़ी है, अपने काम से फुरसत ? जो दूसरों के काम, जाकर निपटाये !
सावंतजी – जी हां, जनाब आपके पास बहुत काम है ! यही कारण है, आप अपना काम छोड़कर टूर पर जाया नहीं करते...
दयाल साहब – सच्च कहता है, तू ! मैं तो आया टूर, दे दिया करता हूं दूसरों को ! मुझे कोई शौक नहीं है, भय्या ! वह तो..ख़ुद डी.ओ. साहब ने दबाव डाला था ! इसलिए, चला गया था टूर पर ! नहीं तो जनाब, वहां जाने वाला कौन ?
सावंतजी – मगर यहां तो फुठरमलसा ली हुई छुट्टियों को केंसल करवाकर, टूर पर ज़रूर जाते हैं ! इस तरह, इनकी टूर पर जाने की दिल-ए-तमन्ना हमेशा बनी रहती है !
दयाल साहब – यह मामला इनका है, सावंत सिंह ! तूझे याद होगा, गत माह डी.एम. साहब का फ़ोन आया..उन्होंने कहा के खारची डिपो का रेकर्ड जल्द चैक होना चाहिए ! खारची जाने की मेरी तो इच्छा नहीं थी, अब मैं क्या करूँ ?
सावंतजी – फिर क्या, जनाब आप चले गए टूर पर ?
दयाल साहब – पहले सुन, तभी मुझे याद आया के मोनाराम छुट्टी लेकर खारची गया है ! बस, फिर क्या ? मैंने झट उसको फ़ोन किया और कह दिया “भय्या, अब छुट्टी मत ले ! बस समझ ले, तेरी छुट्टी केंसल ! और अब तू जा खारची डिपो में, जाकर रेकर्ड चैक करके अपना टूर बना लेना !”
[अब आसकरणजी तशरीफ़ लाते हैं, केबीन में ! अब इनके कपड़े पूरे सूख चुके हैं, अब वे आकर दयाल साहब के सामने वाली सीट पर बैठ जाते हैं ! इस वक़्त फुठरमलसा, दयाल साहब से कह रहे हैं..]
फुठरमलसा - [दयाल साहब से बात करते हुए] – अगर आपके पास इतने ज़्यादा टूर आते हैं, तब आप मुझे दे दिया करें टूर ! लोगों का काम निकालना, मुझे बहुत अच्छा लगता है ! जनाब मेरी दिल-ए-तमन्ना बनी रहती है, के ‘मैं लोगों का करता रहूँ !’ और इसके साथ-साथ, टूर का फ़ायदा भी लेता रहूं !
आसकरणजी – [ख़ाली सीट पर लेटते हुए कहते हैं] – भाई फुठरमलसा, मैं बहुत थक चुका हूं ! आज तो जनाब, मेरी पूरी कमर की बज गयी है बारह !
सावंतजी – आसकरणजी भा’सा ! आराम कर लीजिये, अभी चंगे होते हैं आप !
आसकरणजी – आराम कर लेंगे, सावंतजी ! मगर अभी इन कानों से मैंने सुना है, फुठरमलसा की दिल-ए-तमन्ना हमेशा यही बनी रहती है वे लोगों का काम करते रहें ! क्योंकि, इनको दूसरों का काम करना बहुत अच्छा लगता है ! इनकी दिल-ए-तमन्ना तो जनाब, तारीफ़-ए-क़ाबिल है !
रशीद भाई – जी हाँ जनाब, वास्तव में फुठरमलसा परोपकारी सेवाभावी इंसान हैं ! इनकी और क्या तारीफ़ करें, जनाब ? इन्होंने प्यास से व्याकुल फौज़ी भाइयों को, पानी लाकर पिलाया है !
[अब ऐसी बातें, फुठरमलसा को कैसे अच्छी लग सकती है ? बस उनके दिल में भय समा गया, कहीं रशीद भाई ‘फौजियों को गर्म और खारा पानी पिलाने का रहस्योदघाटन नहीं कर दे ? रहस्योदघाटन होने के बाद, उनकी इमेज लोगों के सामने क्या रहेगी ? इस आशंका को लिये, फुठरमलसा खंखारा करते हुए उनका ध्यान भंग करने की कोशिश करने लगे ! उधर आसकरणजी भी इस मुद्दे से दूर रहना चाहते हैं, क्योंकि उनको भी डर है ‘कहीं उनकी पतलून गीली क्यों हुई ? इस बात का, यहाँ रहस्योद्घाटन न हो जाये ?’ बस, फिर क्या ? वे भी, मुद्दा बदलने का मानस बना लेते हैं !]
आसकरणजी – [फुठरमलसा के काली सफारी सूट पर निग़ाह डालते हुए] – वाह जी, वाह फुठरमलसा ! क्या जच रहे हो फुठरमलसा, काली सफारी सूट पहनकर ! कैसे होलीवुड के हीरो के माफ़िक जच रहे हो, जनाब ? ऐसे लग रहे हो, कोई रेलवे का..
फुठरमलसा – [चमक कर कहते हैं] – क्यों याद दिला रहे हो, जनाब ? आप नहीं जानते, यह पूरी वर्दी मनहूस है ! इसको पहनने के बाद, मैंने केवल तकलीफ़ें ही देखी है ! अब क्या कहूं आपको, अभी यह मेरा हितेषी रशीद बोलेगा...
रशीद भाई – मैं बेचारा क्या कहूँगा, आपको ? मैं बेचारा ठहरा, भोला जीव..बैठा हूं चुप-चाप !
फुठरमलसा – मगर मुझे मालुम है, आप बोलोगे ज़रूर ! के, इस मनहूस सफारी-सूट के खातर ही पानी बाई नाम की बुढ़िया से मैंने मार खायी ? इस मनहूस सूट की तारीफ़ें करके, अब मुझे बीती हुई घटना को याद मत दिलाओ ! बस अब जब कभी मुझे वक़्त मिलेगा, इसे किसी फ़क़ीर को देकर सवाब ले लूंगा !
आसकरणजी – क्यों पागलों जैसी बातें कर रहे हो, फुठरमलसा ? इस सफारी सूट पर आपने पैसे खर्चे हैं, यह कोई मुफ़्त की चीज़ नहीं है..जिसे आप, किसी फ़क़ीर को दान में दे देंगे ? अरे यार फुठरमलसा, इस सफारी-सूट में जचते हो..अगर हाथ में आप बैग ले लो तो..
फुठरमलसा - [खुश होकर कहते हैं] – तब मैं, टी.टी. बाबू की तरह लगूंगा क्या ? क्या सच्च कह रहे हैं, आप ?--
आसकरणजी – जी हां, टी.टी बाबू क्या ? जनाब, आप चैकिंग मजिस्ट्रेट जैसे ही लगते हैं ! अब आप ऐसा कीजिये, आप अपने साथियों को लेकर मेरा एक काम निपटा दीजिये ! बात यह है, मेरे पावों में बहुत दर्द है ! ऐसा लगता है, शायद चिकुनगुनिया का बुखार वापस आ गया है..बस अब आप, इस डब्बे के अगले सारे डब्बे....
फुठरमलसा – अगले सभी डब्बों में जाकर, करें क्या ? भांगड़ा डांस करें, क्या ?
आसकरणजी – जनाब बाद में गुलाबो आ जाएगा, और आपको नचवा देगा भांगड़ा ! ! अब आप मेरी बात को, मज़ाक में मत टालो ! अब आप, अच्छी तरह से सुन लें !
फुठरमलसा – कहिये, हुज़ूर !
आसकरणजी - अगले सभी डब्बों में बैठे यात्रियों के टिकट, आपको चैक करने हैं ! और साथ में उनसे, उत्तरी रेलवे टी.टी.ई. युनियन के होने वाले जलसे का चन्दा भी इकठ्ठा करना है ! बस, कलेक्शन तगड़ा आना चाहिए !
दयाल साहब - फुठरमल यार ले ले, इनका बैग ! जचेगा यार, डोफा होगा कोई..वह भी समझ लेगा, के तू मजिस्ट्रेट है चैकिंग पार्टी का ! फिर हो जायेगी पूरी, तेरी दिल-ए-तमन्ना ! समझ गया ?
आसकरणजी – [दीनजी भा’सा से कहते हैं] – दीनजी, आपका बैग बिल्कूल मेरे बैग जैसा ही है ! अब आप अपना बैग ख़ाली करके, इसे फुठरमलसा को दे दीजिये ! फिर मैं इनको दे देता हूं, छेद करने की मशीन ! टी.टी.यूनियन के चंदे की रसीद-बुक और सम्मलेन में बुलाने के निमंत्रण-पत्र, भी मैं इनको दे देता हूं !
दीनजी – [अपना बैग ख़ाली करके, कहते हैं] – क्यों नहीं, जनाब ! मेरे पास है कितना समान, इसके अन्दर ? केवल टिफन, एम.एस.टी., और यह छोटा सा तौलिया..और क्या, कहीं रख दूंगा, जनाब ! [बैग देते हुए] लीजिये जनाब, अब आप जाने और आपका काम जाने !
[आसकरणजी बैग लेकर उसमें छेद करने की मशीन, रसीद बुकें और निमंत्रण-पत्र डाल देते हैं ! फिर बाद में, उस बैग को थमा देते हैं, फुठरमलसा को ! बैग थमाकर, अब वे उनसे कहते हैं..]
आसकरणजी – जनाब, अच्छी तरह से संभाल लेना इस बैग को ! आप नाराज़ मत होना, कारण यह है फुठरमलसा, मेरे बैग में ज़रूरी कागजात रखे हुए हैं..अन्यथा, यह बैग मैं आपको दे देता !
[फिर क्या ? अब फुठरमलसा की गैंग तैयार होने लगी, अपनी जिम्मेवारी संभालने के लिए ! ख़ाकी वर्दी पहने हुए ठोकसिंगजी बन गए हैं, जी.अर.पी. के सिपाई ! मगर कमी रह गयी, एक डंडे की ! फिर क्या ? जनाब ने रास्ते में बैठे बुढ़े ग्रामीण से छीन लेते हैं, डंडा ! बाकी रहे सावंतजी, उन्होंने झट अपने कमीज़ को खासोलकर डाल देते हैं पतलून में ! फिर कमी रह गयी, एक बेल्ट की ! अब झट दीनजी भा’सा से उनका बेल्ट मांगकर, झट अपनी पतलून पर लगा लेते हैं ! इस तरह सावंतजी बन गए, एलकार अड़ीजंट ! इधर दीनजी भा’सा की हालत हो जाती है, खस्ता ! बेचारे भा’सा का की पतलून बार-बार नीचे गिरती जा रही है, जिसे वे हाथ से पकड़कर, उसे नीचे गिरने से बचा रहे हैं ! इधर बाद में जब कभी दीनजी भा’सा को युरीनल जाने के लिए उठना पड़ेगा, तब वे अपनी पतलून को हाथ में थामे, हाथी जैसी चाल से चलने लगेंगे..और राह में बैठे यात्रियों के लिए, उनकी चाल स्वत: परिहास का कारण बन भी जाये..? तो, सावंतजी को इससे क्या लेना-देना ? उनको तो बस धुन लग गयी, चैकिंग पार्टी का रोळ अदा करने की..किसी तरह, यात्रियों के टिकट चैक करके आसकरणजी का काम निपटाना है ! इस तरह फुठरमलसा की दिल-ए-तमन्ना पूरी करने के लिये, उनकी गैंग पूरी तैयारी के साथ यात्रियों के टिकट चैक करने के लिए निकल पड़ती है ! इन लोगों के जाने के बाद, दयाल साहब आराम की सांस लेते हैं ! फिर, काजू साहब से कहते हैं..]
दयाल साहब – अब काजू साहब, इस तरह फुठरमल की दिल-ए-तमन्ना पूरी हो जायेगी !
काजू साहब – अरे यार, दयाल साहब ! ज़रा उन्हें काम करके आने दीजिये, भगवान जाने बटेर मार लाये..या फिर, आसकरणजी के लिए कोई सरकारी तोहफ़ा !
के.एल.काकू – आसकरणजी फ़िक्र मत करना, एम.एस.टी. वाले सेवाभावी होते हैं !
आसकरणजी – यह तो मेरा दिल जानता है, काकू ! कई तो होते हैं, सेवाभावी ! मगर कई उल्लू के पट्ठे हैं, खडूसिये और खोड़ीले-खाम्पे ! भाँति-भाँति के लोग, इस ख़िलक़त के अन्दर भरे पड़े हैं !
के.एल.काकू – यह आपका दिल कह रहा है, कहीं आपको कोई खडूसिया आदमी मिला होगा इस गाड़ी में ?
आसकरणजी – क्या करें, काकू ? यह पूरी ज़िंदगी बीत गयी है, शयनान डब्बों में घूमते हुए ! इन डब्बों में ही इन एम.एस.टी. वालों से मिलना होता है, इनमें कई होते हैं मिलनसार ! और कई ऐसे भले हैं, जो रेलवे के सारे नियमों को ताक में रखते हुए यात्रियों को देते हैं तकलीफ़ !
के.एल.काकू – आगे कहिये, जनाब ! फिर क्या ?
आसकरणजी – हम टी.टी. लोग भी कहाँ है, दूध से धुले हुए ? एक या दो आदमी हम में भी ऐसे भाई मिल जायेंगे, जो डब्बे में ऐसा आंतक फैलाते है..जिसके आगे..
के.एल.काकू – [बात पूरी करते हुए] – जिनके आगे डाकू मलकान सिंग भी पानी भरते हैं ! आबू-रोड से आने वाले ऐसे ही टी.टी. होते हैं, उनको हम सब जानते हैं ! बस, ऐसे टी.टी.यों के डब्बे के नज़दीक हम लोग भटका नहीं करते !
काजू साहब – ऐसे टी.टी. बैठते हैं, चेन्नई से आने वाली गाड़ी में ! तब तो बस..क्या कहूं, आपको ? ये आबू-रोड के निकलते ही, चले जाते हैं वातानुकूलित कोच में ! फिर वे बाहर आने का नाम ही नहीं लेते हैं, जनाब ! जब तक, जोधपुर स्टेशन नहीं आ जाता !
दयाल साहब – [थोड़ा विश्राम करने के बाद कहते हैं] – मैं यों कह रहा था, इनके वातुनाकूलित में जाने के बाद, न जाने कहाँ से इन शयनान डब्बों में मंगते-फ़क़ीर चले आते हैं..
काजू साहब – अरे जनाब, इन्हें छोड़िये आप, ये सपेरे और मदारी भी चले आते हैं सांपों औए बंदरो को लेकर ! फिर आकर, इन डब्बों की गद्देदार सीटों पर आराम से बैठ जाते हैं ! इनको कोई कहने वाला नहीं !
आसकरणजी – जनाब, और कुछ कहना है, आपको ?
दयाल साहब – हुज़ूर, हम तो रोज़ के ग्राहक ठहरे इस रेलवे के ! फिर, यह पक्ष- पात क्यों ?
आसकरणजी – क्या करें, जनाब ? यह जनता है, जनाब ! इनके लिए अपने रेलवे मिनिस्टर लालू भाई का दिल दरियाव है ! अरे जनाब, आप जानते नहीं, यह इनका वोट-बैंक है ! एक मुश्त में वोट मिलते हैं इनके ! एक बात कह दूं आपको, सभी एम.एस.टी. वाले..
दयाल साहब – [बीच में बोलकर, बात काटते हैं] – क्या कहना चाहते हो, हुज़ूर ?
के.एल.काकू – जनाब, पहले मुझे बोलने दीजिये ! मेरी बात कहने से रह गयी, के जगह-जगह पाख़ाने के आस-पास गू-मूत करके ये मंगते-फकीर गन्दगी फैला देते हैं ! इसी तरह आप इन एम.एस.टी. वालों और इन मंगते-फकीरों को एक मानकर, सभी को एक ही डंडे से हांकना अच्छा नहीं है जनाब !
कालू साहब – अजीब आदमी हो, यार काकू ! हमें क्या आपने, जानवर समझ रखा है ? कैसे कह दी आपने, एक ही डंडे से हांकने की बात ?
के.एल.काकू – अरे जनाब, अभी आप बीच में बोलकर बात का मुद्दा बदलने की कोशिश न करें ! जानवर होने की बात को लेकर, बाद में झौड़ करते रहना ! खूब बोलना, बाद में ! अभी बात उन बेटिकट इन मंगते-फकीरों की बात चल रही है, जिन्होंने डब्बे में अव्यवस्था फैला रखी है !
काजू साहब – अब हम कैसे बोल सकते हैं, काकू ? आपने हमको बना दिया है, जानवर ! अब जानवर बेचारे, क्या बोल सकते हैं ?
के.एल.काकू – जनाब मैं जानता हूं, आप बोलोगे नहीं मगर अपने सींगों से वार ज़रूर करते रहोगे...मगर अभी सींग इस्तेमाल करना मत, इस नेक काम के लिए आपको बाद में मौक़ा मिल जाएगा ! [आसकरणजी की तरफ़ देखते हुए] इन मंगते-फकीरों को, कहाँ है तहज़ीब ? अंट-शंट खाकर, पूरे डब्बे में बदबू फैला देते हैं !
आसकरणजी – आगे कहिये, काकू !
के.एल.काकू – [आसकरणजी की तरफ़ देखते हुए] – फिर आप कहेंगे, भय्या इनको हम रोक नहीं सकते ! तब हम लोग, एक ही बात कहेंगे के ‘इनको रोक नहीं सकते आप, तब एम.एस.टी. वालों को शयनान डब्बे में बैठने से क्यों रोकते हो ? ये मंगते-फ़क़ीर ठहरे फोकटिये, मगर हम महीने भर के टिकट के पैसे जमा करके यात्रा करते हैं !
काजू साहब – [आसकरणजी की तरफ़ देखते हुए कहते हैं] – जनाब छोड़िये, अभी आप यह बतायें के यह खडूसिया कौन है आपकी नज़रों में ? बाकी से, हमें क्या लेना-देना ? मुझे कुछ समझ में नहीं आया, आप किस आदमी को खडूसिया कहते जा रहे हैं ?
आसकरणजी – काजू साहब, हमारी मारवाड़ी भाषा में उस आदमी को खडूसिया कहते हैं जिसके होता है तीतर का बाल, यानि वह चुप-चाप बैठ नहीं सकता ! लीजिए, आप लोगों को पूरी बात ही बता देता हूं ! सुनो, एक बार मैंने क्या देखा ..?
के.एल.काकू – क्या देखा, जनाब ?
आसकरणजी – यह देखा, जनाब ! शयनान डब्बे के अन्दर, एक यात्री खड़ा था ! और पांच-छ: एम.एस.टी. वाले बेंचो पर बैठकर, वे आराम से ताश खेल रहे थे ! तभी मैं लोकल डब्बे से निकलकर, इस शयनान डब्बे में चला आया ! उस आदमी से, मैंने पूछा ‘टिकट’ ? उस भले आदमी ने दिखाया टिकट, रिजर्वेशन का !
के.एल.काकू – फिर, आपने कुछ कहा होगा उसे ?
आसकरणजी – जब मैंने कहा, ‘भाई तू खड़ा रहकर, ताश का खेल क्यों देख रहा है..? भाई, बैठ जा ! तब वह बोला ‘मैं ताश का खेल नहीं देख रहा हूं, इन लोगों ने मुझको खड़ा करके, खुद बैठ गए ताश खेलने ! अब कहिये, मैं कहाँ बैठूं ?’ फिर, मुझे उन साहब बहादुरों को समझाना पड़ा....
काजू साहब – क्या समझाया, जनाब ?
आसकरणजी – मैंने कहा ‘ओ एम.एस.टी. वालों, आपको बैठने की सीट मिल गयी..फिर ताश खेलने के लिए और जगह रोककर, आप लोगों के ऊपर क्यों चढ़ते जा रहे हो ?’
दयाल साहब – फिर, क्या हुआ ? आगे कहिये, जनाब !
आसकरणजी - तब उनमे से एक आदमी जो खडूसिया था, वह बोल उठा ‘फिर हम, कहाँ बैठकर खेले ताश ?’ तब उसकी बात सुनकर, मुझे आ गया गुस्सा ! गुस्से में, उसको कह दिया मैंने ‘बैठो मेरे कंधे के ऊपर, तुम्हें ससुराल ले जाकर बैठा दूं..वहां आराम से बैठकर खेल लेना ताश !’
दयाल साहब – आगे क्या हुआ, जनाब ? शायद कहीं आप उस खडूसिये को, हवालात में बैठाकर आ गए क्या ?
आसकरणजी – ऐसा नहीं हुआ, दयाल साहब ! मुझे दया आ गयी, उस पर ! मगर वह खडूसिया था, बड़ा शैतान ! मेरी मज़ाक उड़ाता हुआ, कहने लगा..
के.एल.काकू – आपकी मज़ाक ? इतने सीधे, सुशील व ज्ञानवान टी.टी बाबूजी की ?
आसकरणजी – आज़कल कहाँ रही मर्यादा, अब कहाँ रहे छोटे-बड़े के मान-सम्मान के क़ायदे ? वह नालायक यों बोला, के ‘साहब ससुराल जमाता जाता है, तब उसके साथ उसका साथी भी साथ चलता है ! आपसे अच्छा दूसरा साथी, मुझे मिलेगा कहाँ ? इसलिए जनाब, आपको साथ चलना होगा ! तब मैं आराम से चलूँगा, जनाब !’
दीनजी – बाद में क्या हुआ, जनाब ? शायद केबीन में बैठे सारे यात्रियों ने, हंसी के ठहाके लगाकर पूरे डब्बे को गूंज़ा दिया होगा ? जनाब बताइये, मुझे ! मैंने सही कहा, या ग़लत ?
आसकरणजी – जी हां, आख़िर यही हुआ ! यात्रियों के हंसी सुनकर, प्लेटफोर्म पर उतरे उसके साथी गर्म-गर्म मिर्ची बड़े लिए डब्बे के अन्दर दाख़िल हुए ! अन्दर आकर, उससे कहने लगे ‘भाई तू अकेला कहाँ जा रहा है, हम सब तेरे साथ चलेंगे !’
दयाल साहब – फिर क्या बोला, खडूसिया ?
आसकरणजी – यह खडूसिया, भले क्या कहता ? मगर, मैं बीच में बोला ‘इस भाई को ससुराल ले जा रहा हूं, क्या आप लोगों को चलना है ? कहिये, आपको साथ ले चलूँ ?’ तब सभी हंसने लगे, और कहने लगे ‘भा’सा आपके हुक्म की तामिल ज़रूर होगी, मगर पहले..’
काजू साहब – मगर, क्या ? इस बातों की गाड़ी को मत रोकिये, भा’सा !
आसकरणजी – उन्होंने कहा, के ‘ख़ाली पेट कैसे चला जाय, भा’सा ? कुछ पेट में डालकर चलते हैं ! भा’सा, अब आप अपना हाथ आगे बढ़ाइए और अरोगिये नमकीन !’
काजू साहब – क्या बोला, जनाब ?
आसकरणजी – और उन्होंने आगे कहा, के ‘ये खाने-पीने के काम, साथ में चलते रहेंगे..आप बैठिये हमारे पहलू में, और कीजिये फीस ! वैसे एक खिलाड़ी, कम पड़ता ही था !’
के.एल.काकू – अरे जनाब, ये तो अलामों के काका निकले माता के दीने !
आसकरणजी – फिर उस खड़े यात्री को हुक्म दे डाला, के ‘चौधरीजी, खड़े-खड़े क्या तमाशा देख रहे हो ? नीचे उतरिये प्लेटफोर्म पर, और ठंडा पानी भरकर लाइए..साहब के लिए !’ इतना कहकर, उस बेचारे चौधरी को थमा दिया ख़ाली लोटा !
के.एल.काकू – ये लोग चतुर खिलाड़ी लगते हैं, मेरा सौ फ़ीसदी अनुमान है “यह ज़रूर गोपसा की टीम होगी !” आगे क्या हुआ, भा’सा ?
आसकरणजी – ऐसे आदमियों से पाला पड़ जाय काकूजी, तो आगे क्या बोल सकते हैं ? बस, फिर क्या ? मैंने उठाया एक मिर्ची-बड़ा, फिर उनसे कहा ‘आप सभी सरदार यहाँ बैठकर ताश खेलिए, मैं आपके पास बैठ नहीं सकता..बहुत काम है ! बस आपको एक काम करना है, कोई बेटिकट यात्री आपको दिख जाये, तो इशारा करके मुझे बुला देना आप !’
काजू साहब – भा’सा, खैर आपने छोड़ दिया होगा ऐसे लोगों को ?
आसकरणजी – मैंने आगे कहा, ‘फिर आप लोगों के स्थान पर, उस बेटिकट यात्री को ससुराल ले जाकर बैठा दूंगा !’ फिर ‘जय श्याम री सा’ कहकर, मैं वहां से चला गया !
[लम्बी सांस लेकर, आसकरणजी अब आगे कहते हैं]
आसकरणजी – [लम्बी सांस लेकर, आगे कहते हैं] - समझ गए, काजू साहब ? इतनी बकवास करनी पड़ती है, फिर रात को भागवान के सामने क्या बोलूँ ? बोलने की सारी ताकत, ऐसे लोगों से बकवास करते-करते ख़त्म हो जाती है !
दीनजी – जी हाँ, सारी खायी हुई बिदामें एक ही झटके से निकल जाती है ! फिर बदन में जनाब, रहती कहाँ है ताकत ?
[इंजन सीटी देता है, गाड़ी की रफ़्तार कम हो जाती है ! फिर रोहट स्टेशन पर आकर, गाड़ी रुक जाती है ! मंच के ऊपर, अँधेरा छा जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच पर वापस रौशनी फ़ैल जाती है ! अब गुलाबो अपनी हिंज़ड़ो की टीम के साथ, डब्बे में दाख़िल होता है ! कई केबिनों में घुमते-घुमते आख़िर, गुलाबो और चम्पाकली को चार-पांच केबीन लगातार ख़ाली दिखायी देते हैं ! फिर दोनों वे, एक केबीन में जाकर बैठ जाते हैं ! वहां बेंच पर बैठकर अपनी थकावट दूर करते हैं, फिर वे दोनों अपने-अपने बैग खोलते हैं ! बैग से ५-५, १०-१०, ५०-५० और १००-१०० रुपयों की थाप्पियाँ लगाकर, नोट गिनने का काम शुरू करते हैं ! गिनते वक़्त उन्हें कहीं ५०० या १००० के नोट दिख जायें, तो वे उन्हें अँगुलियों में पहनी हुई अंगूठियों के नीचे दबाकर रख देते हैं ! अब इन ख़ाली केबिनों में, फुठरमलसा की चैकिंग पार्टी दाख़िल होती दिखायी देती है ! चैकिंग पार्टी के सभी सदस्य अपनी पोजीशन लेते हैं, फिर सावंतजी दो क़दम आगे बढ़ाकर रौबीली कड़कदार आवाज़ में ज़ोर की गरज़ना करते हैं..”टिकट” और दूसरी तरफ़ ठोकसिंगजी, डंडे को ज़मीन पर बजाते जाते हैं ! और साथ-साथ में, वे कड़कदार आवाज़ में बोलते जाते हैं “टिकट !”]
सावंतजी – [ज़ोर से कहते हैं] – “टिकट !”
ठोकसिंगजी – [डंडा ज़मीन पर बजाते हुए] - टिकट ! कोई बेटिकट यात्री, भागने की कोशिश नहीं करेगा ! बिना टिकट, रेलगाड़ी में यात्रा करना अपराध है ! बेटिकट यात्रियों के पकड़े जाने पर, उन्हें छ: महिने जेल की सज़ा हो सकती है !
[अब सावंतजी के नथुनों में टेलकम पाउडर और खुशबूदार क्रीम की गंध आती है, उनको भ्रम हो जाता है, के ‘केबीन में औरतें बैठी होगी ?’ अब वे पछताते जाते हैं, उन्होंने क्यों औरतों के सामने रौब मारा ? अब वे आगे बढ़कर, फुठरमलसा से शिफ़ाअत [सिफ़ारिश] लगा बैठते हैं..]
सावंतजी – साहब, आगे मत जाइये ! औरतें बैठी है, इनको क्या चैक करना ?
फुठरमलसा – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए] – अरे सावंतजी, कड़ी खायोड़ा ! औरतें लक्ष्मी का रूप होती है, अब आप यह सोचिये ‘किस्मत के पट खुल गए हैं !’ इसलिए अब आगे के सारे केबीन, देखने ज़रूरी हो गये हैं ! [इधर-उधर निगाहें फेंकते हुए कहते हैं] अरे भाई सावंतजी, यह रशीद भाई कहाँ चला गया है कड़ी खायोड़ा ?
[अब फुठरमलसा को, रशीद भाई कैसे नज़र आते ? जनाबेआली रशीद भाई ठहरे, सेवाभावी ! रास्ते में उनको दिखाई दे गयी, ख़ाली विसलरी बोतलें ! बस उन्होंने उन बोतलों को, इकट्ठी करनी चालू कर दी है ! और जनाब भूल गये हैं, इस वक़्त वे चैकिंग पार्टी के सदस्य का रोल अदा कर रहे हैं ! जैसे ही उनकी खोज़ी निगाहें रशीद भाई पर गिरती है, वे कड़कती आवाज़ में उनसे कहते हैं..]
फुठरमलसा – [कड़कती हुई आवाज़ में, ज़ोर से कहते हैं] – मिस्टर रशीद, यह क्या ? इस वक़्त तुम चैकिंग पार्टी के मेंबर हो ! भूल जाइये, दूसरे काम !
[फुठरमलसा की यह कड़कती हुई आवाज़, जैसे ही रशीद भाई के कानों में पहुँचती है..और वे संभल जाते हैं, झट बोतलें फेंक देते हैं ! फिर टोपी सीधी करके दो मिनट में बन जाते हैं, वापस जवान ! और जाकर झट खड़े हो जाते है, गुलाबा के करीब ! फिर उन दोनों किन्नरों को फटकार पिलाते हुए, कहते हैं ज़ोर से..]
रशीद भाई – [फटकारते हुए कहते हैं] – ये क्या..? ओबास ! गाड़ी में जुंआ..? वो भी, औरतें होकर ?
[गुलाबा बैग में रुपये डालने का प्रयत्न करता है, मगर समीप खड़े रशीद भाई उसको ऐसा करने से रोकते हैं ! झट उसका हाथ पकड़कर, वे फुठरमलसा को ज़ोर से आवाज़ देते हैं !]
रशीद भाई – [गुलाबा का हाथ पकड़कर, कहते हैं] – इन पैसों के, हाथ नहीं लगाना ! [फुठरमलसा को आवाज़ देते हैं] अरे हुज़ूर, देखिये ! गाड़ी में एक और जुर्म, जुंआ खेलने का हो रहा है !
[गुलाबा को देखते ही फुठरमलसा उसे पहचान जाते हैं, मगर बेचारा गुलाबा उन्हें काली सफ़ारी सूट में पाकर उन्हें पहचान नहीं पाता..वह तो उन्हें चैकिंग पार्टी का मजिस्ट्रेट समझ लेता है ! मगर फुठरमलसा जान जाते हैं, के यह व्यक्ति-विशेष वही है जिसने आसकरणजी के सामने उनकी बखिया उधेड़ डाली थी ! अब उनको बीती हुई पूरी घटना एक-एक पल की याद आ जाती है, किस तरह उसने आसकरणजी और सवाईसिंगसा के सामने उनको किस तरह बेइज्ज़त किया था ? अब उन्होंने सोच लिया, के ‘समझदार व्यक्ति वह होता है, जो मौक़े का फ़ायदा उठाता है !’ फिर, क्या ? जनाबे आली फुठरमलसा झट तैयार हो जाते हैं, गुलाबा से बदला लेने के लिए !]
फुठरमलसा - [रौबदार आवाज़ में] – टिकट..?
[गुलाबा और चम्पाकली ने, कब गाड़ी में उन्होंने टिकट लिया ? यात्रियों से पैसे माँगने का काम करने वाले, ये दोनों तो बेटिकट यात्री निकले ! किस टी.टी.ई. की अम्मा ने अजमा खाया है, जो इनसे टिकट मांगने की हिम्मत करे ? मगर ये जनाब इस वक़्त, रोळ अदा कर रहें हैं..टी.टी. यों के बाप, यानि चैकिंग मजिस्ट्रेट का ! अभी इनके पहनी हुई है, काली सफारी और हाथ में इनके काला बैग ! और इधर सावंतजी के हाथ में है, उत्तर रेलवे की चालान बुक ! फिर, क्या ? चैकिंग-पार्टी होने में, शक करने की कोई गुंजाइश भी नहीं रहती है ! यहाँ तो वास्तव में फुठरमलसा को इस काली सफारी में देखकर, कोई अनजान व्यक्ति यही कहेगा..जनाब, चैकिंग मजिस्ट्रेट हैं ! अब यही असर, गुलाबो और चम्पाकली पर हो जाता है ! इन्होने जब से सावंतजी के हाथ में उत्तर रेलवे की चालान बुकें देख ली, तब से इन दोनों के होश उड़ जाते हैं ! अब इन लोगों के लिए, केवल एक ही चारा रहता है..वह है, भाई-वीरा कहकर इनके चंगुल से बाहर निकलने का...और, अपना काम निकालना !]
गुलाबो – [हाथ जोड़कर कहता है] – आज माफ़ कर दीजिये, हमें ! आगे से हम, टिकट लेकर ही गाड़ी में बैठेंगी ! [फुठरमलसा के पांवों को छूता हुआ कहता है] कभी ऐसी ग़लती नहीं होगी, साहब !
फुठरमलसा – [गुलाबा को दूर हटाते हुए, कहते हैं] – टिकट नहीं है, तो भर लीजिये जुर्माना ! जुर्माना नहीं दोगी तो, चलना होगा हवालात में की हवा खाने ! [सावंतजी को कहते हुए] इन दोनों के ऊपर चार्ज लगाना बाबू साहब, एक तो बेटिकट रेलगाड़ी में यात्रा करने का और दूसरा सार्वजिक स्थान पर बैठकर जुंआ खेलने का !
[गुलाबा सहम जाता है, झट फुठरमलसा के पांव पकड़ लेता है ! इधर चम्पाकली ठहरा नया हिंज़ड़ा, जो अभी हाल में ही इस हिंज़ड़ो की टीम में सम्मिलित हुआ है ! अभी कुछ दिन पहले ही, उसकी ट्रेनिंग ख़त्म हुई है ! वह सोचता है, यदि उसने हिंज़ड़े की अदा दिखलानी शुरू की तो..इस रौबदार अफ़सर के छक्के छूट सकते हैं ! फिर क्या..? चम्पाकली उठकर आता है, ठोकसिंगजी के निकट ! फिर, उनके रुखसारों को सहलाता हुआ कहने लगा..]
चम्पाकली – [ठोकसिंगजी के गालों को सहलाता हुआ कहता है] – साहब को समझा रे, छेला ! हम से पैसे लेकर, क्या करेगा..? हम तो वो हैं, यानि [ताली बजाता है] छक्के ! समझ गया, रे ? आ जा..[अपना घाघरा ऊपर लेता हुआ कहता है] आ जा, आ जा, तूझे घाघरे के नीचे बैठा दूं ? तूझे गर्म कर दूंगा रे, हाय...हायऽऽ..आ जा, आ जा रे छेला..
[चम्पाकली हिंज़ड़ा, आगे क्या बोल पाता..? धब्बीड़ करता ठोकसिंगजी का एक झन्नाटेदार थप्पड़, चम्पाकली के रुखसारों पर लगता है ! इस दिन में उसे दिखने लग जाते हैं, आसमान के तारे ! चम्पाकली थप्पड़ खाकर, धड़ाम से आकर नीचे गिरता है ! ठोकसिंगजी का जैसा नाम है, वैसे ही उनमें ठोकने के गुण भरे पड़े हैं ! इस कारण ख़ुदा के फ़ज़लो करम से, इनमें भरे “ठोकने के” गुण के कारण लोग-बाग़ इनसे चार क़दम दूर ही रहते हैं ! थप्पड़ लगाने के बाद, उन्होंने फर्श पर बजा डाला अपना गंगाराम ! फिर डाकू सरदार मलखान सिंग की तरह, गरज़कर कहने लगे..]
ठोकसिंगजी – अब और खायेगा, मार ? पीटूंगा, साले को ! समझ क्या रखा है, चवन्नी क्लास ? साला आया, वर्दी पर हाथ लगाने वाला ? फटाक से जुर्माना दे दो, हिंज़ड़ो ! नहीं तो तुम-दोनों को बैठाकर आता हूं, जेल में !
[चम्पाकली का इस तरह रुखसारों पर हाथ लगाना, अब ठोकसिंगजी के लिए फ़िक्र करने का कारण बन गया ! उनको चिंता सताने लगी, “इस हिंज़ड़े में कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी..जो उनके गालों पर हाथ लगा गया..? कहीं उनके व्यक्तित्व में, कोई कमी तो नहीं आ गयी ? जहां इनकी खुद की घर वाली उनका मूड देखकर इनके पास आती है, और उनके बच्चे मुंह झुकाए उनके सामने खड़े रहते हैं..बस, मात्र उनकी आंख के इशारे से ही समझ जाते हैं के “उनके अब्बाजान, उनसे क्या चाहते हैं ?” इनके इशारे को समझकर, बिना बोले ही उस काम को अंजाम तक पहुंचा देते हैं ! वहां आज यह हिंज़ड़ा, कैसे इनके रुखसारों को कैसे छू गया ?” उधर गुलाबा ठोकसिंगजी का यह रूप देखकर, सहम गया ! अब वह भयग्रस्त होकर, माफ़ी मांगता हुआ ठोकसिंगजी से कहने लगा !]
गुलाबो – [हाथ जोड़कर कहता है] – छोटे साहब, माफ़ कीजिये ! अभी हाल में ही, यह चम्पाकली हिंजड़ा बना है ! अभी-तक, यह साहब लोगों के पल्ले पड़ा नहीं ! और यह नहीं जानता, सरकारी क़ायदे ! [दोनों हाथों की अंगूठियों में दबाये नोटों को, उन्हें देने के लिए निकालता है] लीजिये जनाब, आपका टेक्स !
[पांच सौ व हज़ार के कई नोटों को देखकर, रशीद भाई हो गए खुश ! और सोचने लगे “चलो अच्छा हुआ, चंदे का टारगेट जल्द पूरा हो रहा है !” फिर क्या ? झट आगे बढ़कर, गुलाबा से सारे नोट ले लेते हैं ! इसके बाद, लम्बी-लम्बी सांसे लेते हैं ! सामान्य होने के बाद, वे चम्पाकली से कहते हैं..]
रशीद भाई – तू कहाँ जा रही है, चम्पाकली ? तूझे भी भरने है, टेक्स के पैसे !
[चम्पाकली डरता हुआ, झट गिने जा रहे सारे रुपये उठाकर रशीद भाई को थमा देता है ! फिर क्या ? गुलाबा और चम्पाकली से लिए गए सारे रुपये, सावंतजी को थमा देते हैं ! तभी उन्हें, चम्पाकली की अंगूठियों के नीचे दबे हुए नोट दिखायी दे गए ! बस, फिर क्या ? झट इन नोटों को झाम्पने के उद्देश्य से, उसे कह देते हैं]
रशीद भाई – अरी चम्पाकली, इन नोटों का क्या तू अचार डालेगी क्या ? अंगूठियों से, निकाल इन बड़े नोटों को !
[बेचारा भयग्रस्त चम्पाकली झट अंगूठियों के नीचे दबे नोटों को निकालकर, रशीद भाई को थमा देता है ! अब रशीद भाई, झट उन सारे रुपयों को सावंतजी को थमा देते हैं ! फिर वे, आराम की सांस लेते हैं ! रुपये गिनने के बाद, सावंतजी उन रुपयों को रोकड़ वाले बैग में डाल देते हैं ! सांसे सामान्य होने के बाद, रशीद भाई उन दोनों हिंज़ड़ो को देते हैं धन्यवाद !]
रशीद भाई – किन्नर भाईयों, दुखी न होना ! रोज़ आप लोग करते हो, यात्रियों से कलेक्शन ! और आज़ हमने कर लिया, आपसे कलेक्शन ! आप लोग रोज़ कमाते हो भाई, अब आप ऐसा सोच लीजिये एक दिन आपने नहीं कमाया हमने कमा लिया ! ठीक है, किन्नर भाईयों ? शुक्रिया !
फुठरमलसा – [किन्नरों से कहते हैं] – किन्नर भाईयों, हम ठहरे ईमानदार ! दिल दुखाना मत, यह समझ लेना..के, आपने किसी चेरिटी में दान दिया है ! [रशीद भाई से कहते हैं] रशीद भाईजान ज़रा बाबू साहब से कटी रशीदें और कूं-कूं पत्री लेकर, इन दोनों किन्नर भाईयों को दे दीजिये !
[फुठरमलसा अब खुश हैं, आज उन्होंने इस गुलाबे से आख़िर बदला ले ही लिया ! अब वे होठों में मुस्कराते हुए, फुठरमलसा उन दोनों किन्नरों को हाथ जोड़कर कहते हैं..]
फुठरमलसा - [हाथ जोड़कर कहते हैं] – किन्नर भाई, आपका बहुत सहयोग मिला ! आपका दिया गया चन्दा, टी.टी.ई. युनियन वालों के सम्मलेन में खर्च होगा ! अब आप इस सम्मलेन में भाग लेकर, इस सम्मलेन को सफल बनाये !
सावंतजी - कहीं हमसे कोई भूल-चूक हो गयी हो तो, आप हमें माफ़ कीजियेगा ! अच्छा, अब आप हमें आप रूख्सत दीजिएगा !
[सावंतजी कूं-कूं पत्री के साथ बची हुई रेज़गी और चंदे की रसीद, गुलाबा को थमा देते हैं ! फिर, उन लोगों से कहते हैं..]
सावंतजी – [कूं-कूं पत्री, चंदे की रसीद और बची हुई रेज़गी देते हुए] – लीजिये किन्नर भाइयों, कूं-कूं पत्री, चंदे की रसीद और बची हुई रेज़गी ! यह खुले पैसे, आपके काम आयेंगे ! सम्मलेन में आप, ज़रूर पधारना ! जय बाबा की !
[कई हफ़्तों की कमाई लूट ली गयी, इन किन्नरों की आँखों से आंसू गिरते जा रहे हैं..उन नम आँखों से वे, फुठरमलसा की चैकिंग पार्टी को जाते हुए देखते रहे ! फिर वे एक-दूसरे को, दिलासा देते हुए कहने लगे..]
गुलाबो – शेर को सवा-शेर, आख़िर मिल ही गया ! अरे ए चम्पाकली इन माता के दीनों ने, अपनी कई हफ़्तों की कमाई लूट डाली ! [गीत गाता है] हमें तो लूट लिया, इस काले-काले टी.टी. ने...
चम्पाकली – [रोता हुआ गाता है] – उन गोरे-गोरे गालों वाले ने...
[दुःख से व्यथित दोनों हिंज़ड़े अपना माइंड डाइवर्ट करने के लिए, वे दोनों दूसरा गीत गाते हुए नाचने लगे..]
गुलाबो – [गीत गाता हुआ नाचता जाता है] – अलका-मलका छोड़ कीड़ी तू नाचे क्यों नहीं ए, कीड़ी तू नाचे क्यों नहीं ए, तू नाचे क्यों नहीं ए..
चम्पाकली – [नाचता-नाचता गाता जा रहा है] – तीतर चुग जाय तेरे धान को, तू क्या करेगी ए, तू क्या करेगी ए...
गुलाबो – [गाता हुआ नाचता जाता है] – एकठ करता टूटी कमर, पण खायो एक नहीं दाणों ! अब तू नाचे क्यों नहीं ए, तू नाचे क्यों नहीं ए..
चम्पाकली – [घूमर लेकर गाते हुए] – आया तीतर ले गया, बचा एक नहीं दाणा, तू नाचे क्यों नहीं ए, तू नाचे क्यों नहीं ए..
गुलाबो – [चम्पाकली का हाथ पकड़ता है, फिर दोनों नाचते हैं] – अलका-मलका छोड़ कीड़ी तू नाचे क्यों नहीं ए, तू नाचे क्यों नहीं ए, तू नाचे क्यों नहीं ए..
[पटरियों के ऊपर दौड़ रही गाड़ी का इंजन अब ज़ोर से सीटी देता जा रहा है, उसकी आवाज़ के आगे अब यह गीत सुनाई नहीं दे रहा है ! मंच के ऊपर अन्धकार छा जाता है, थोड़ी देर बाद मंच के ऊपर रौशनी फैलती है ! अब केबीन के अन्दर बैठे दयाल साहब, काजू साहब और के.एल.काकू तो गपें हांकते जा रहे हैं ! मगर दीनजी भा’सा, चुप-चाप बैठे उपन्यास पढ़ रहे हैं ! मगर, आसकरणजी सीट पर आराम से लेटे हुए हैं !]
दयाल साहब – काजू साहब, आप बहुत भोले हैं ! न जाने आप, किन लोगों की कही बात पर भरोसा कर लेते हैं ? जनाब, यह अच्छा नहीं है !
काजू साहब – दयाल साहब यह मान लेते हैं, आप मेरी जगह पर होते तो आप क्या करते ? जनाब आपको भी करना पड़ता, उन पर भरोसा ! वैसे मैंने, ऐसा किया भी क्या..? मोना राम के पास आया सन्देश, के ‘अजमेर से डी.एम. साहब आ रहे हैं पाली !’ बस, मैंने आपको यह इतला दे दी ! और किया क्या, मैंने ?
दयाल साहब – मगर आये तो नहीं, आपके कारण मुझे सुबह चार बजे उठना पड़ा ! अरे काजू साहब, आप क्या जानते हो ? तड़के उठने में, कितनी तक़लीफ़ होती है ? फिर..
काजू साहब – फिर, क्या ? ठोकसिंग, सावंतासिंग और रशीद इन तीनों को इतला करनी, भूल गए क्या ?
दयाल साहब – इतला की, कैसे नहीं ? सबको फ़ोन किया, मगर मेरे अलावा आया कौन ? आपको देखना यही होगा, यह सावंतासिंग तो चला गया छुट्टी पर..और यह रशीद और ठोकसिंग, हमेशा की तरह आये लेट ! अब बोलिये, आप क्या कहेंगे ?
आसकरणजी – [लेटे हुए कहते हैं] – दयाल साहब, छोडो यार ! ये विश्वास और अविश्वास की बातें ! लोगों के अन्दर उनकी खुद की सोच होनी चाहिए, ना तो इस मास्टर मधुसूदन की तरह खाओगे धोखा ! यह डेड होशियार, बहुत होशियारी दिखाता था ! गाड़ी में बैठने के पहले, दस बार लोगों से पूछकर कर लेता तसल्ली !
काजू साहब – किस बात की तसल्ली, जनाब ?
आसकरणजी – इस बात की तसल्ली करता है, जनाब..के, गाड़ी कहाँ जा रही है ? उदघोषक के दस बार उदघोषणा करने के बाद, जनाबे आली बैठते हैं गाड़ी में ! फिर भी पूरा भरोसा उनको होता नहीं, दरवाज़े के पास हेंडल पकड़कर खड़े रहेंगे जनाब ! यह सोचकर, अगर गाड़ी नहीं चली तो वे झट उतर जायेंगे !
दीनजी – [किताब को रखते हुए कहते हैं] – ऐसे मत कहिये, जनाब ! मास्टर साहब बहुत होशियार है, मुझे नहीं लगता उन्होंने कभी धोखा खाया हो ? ऐसी कोई बात हुई होती, तो मुझे अवश्य मालुम रहती ! मास्टर साहब की एक-एक समझदारी की बात, मिसाल के तौर पर पाली उपखंड के अध्यापक दिया करते हैं !
आसकरणजी – लीजिये, पूरा किस्सा विस्तार से सुना देता हूं आपको ! सुनने के बाद, आप खुद निर्णय ले लेना के मास्टर साहब कितने होशियार हैं, अर कितने समझदार ? बात उन दिनों की है, जब काज़री में काम करने वाला मुरली धर इनके साथ गाड़ी में रोज़ का आना-जाना करता था !
दीनजी – [हूंकारा भरते हुए] – जी हुज़ूर, आगे क्या हुआ जनाब ?
आसकरणजी – यह आदमी अपने पास रखता था, एक चांदी की डिबिया ! उसमें होती थी, मीठे पान की मसाले वाली गिलोरियां, जिस पर लगा होता चांदी का बर्क !
दयाल साहब – वाह जनाब, मजा आ गया मास्टर साहब को ! उनको ज़रूर मिली होगी, पान की गिलोरी !
आसकरणजी – आप सुनिए, जनाब ! एक पान की गिलोरी वह खुद खाता, और दूसरी गिलोरी देता मास्टर साहब को ! इस तरह मास्टर साहब, रोज़ मुफ़्त का पान खाकर खुश..! अरे भाई, कौन छोड़ता है मुफ़्त के पान ? फिर वह कहता..
काजू साहब – मुफ़्त के पान मिलते हैं जहां, वहां बैठकर मास्टर साहब को बकवास सुननी पड़ती होगी ! आख़िर, यह मुरली धर उनको पान जो खिला रहा है ?
आसकरणजी – जनाब, सही कहा आपने ! अब सुनिए, उस दौरान मुरली धर इनसे कहता था “ग़लत आदत हो गयी है, पान खाने की ! यह अच्छा हुआ, के ‘घंटा-घर के पास मेरे मामाजी की पान की दुकान है !’
दीनजी – अरे भा’सा, इस मुरली धर ने सही कहा है जनाब ! इसके मामा की दुकान, घंटा-घर बाज़ार में ही है ! मैं भी देख चुका हूं, इस दुकान को ! अब आगे कहिये, जनाब !
[अब आसकरणजी किस्सा बखान करने के मूड में आ जाते हैं ! उठकर, अब वे आराम से बैठ जाते हैं ! फिर आगे का किस्सा, बयान करते हैं !]
आसकरणजी – [बैठते हुए कहते हैं] – जहां मामाजी खिला रहे हो, मुफ़्त का पान ! फिर भाणजा, खाने में पीछे क्यों रहे ? बस, मामाजी भेज देते हैं पान की गिलोरियां चांदी की डिबिया भरकर ! और लगता नहीं, एक पैसा ! इस तरह रोज़ मुफ़्त के पान खाकर मास्टर साहब को लग गया, ग़लत नशा रोज़ पान खाने का !
दयाल साहब – अरे भा’सा, ऐसा भी होता होगा..कभी मुरली धर नहीं आया हो..? फिर..--
आसकरणजी – जब कभी यह मुरली धर नहीं आता तब उस दिन पाली स्टेशन के बाहर पनवाड़ी की दुकान पर, मास्टर साहब को मज़बूरन जाना पड़ता..पान खाने के लिये ! अगर मास्टर साहब पान नहीं खाये, तब यह जीभ उनके काबू में रहती नहीं ! और, मचाने लगती है आंतक ! के, ला पान..ला, पान !
दीनजी – सच्च कहा, आपने ! कई दिनों तक नशेड़ी, लोगों को मुफ़्त में नशा करवाता है ! बाद में उन लोगों को नशा करने की आदत बन जाया करती है, तब वह नशेड़ी उनका दामन छोड़ देता है ! फिर इन लोगों को जेब से पैसे खर्च करके ही, नशा करना होता है !
दयाल साहब – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए] – आसकरणजी, कहीं आप खाकर तो नहीं आ गए मुफ़्त के पान ?
आसकरणजी – [झेंप मिटाते हुए कहते हैं] – यह मुरली धर, मुझे क्या पान खिलायेगा ? मैं खाता हूं, मीठा पत्ता चेतना तम्बाकू लगा हुआ ! इतना महंगा पान खिलाने की, उसमें कहाँ हिम्मत ? अरे दयाल साहब, क्या यार बीच में बोलकर लय तोड़ देते हो ?
काजू साहब – अब भी क्या बिगड़ा है, भा’सा ? हो जाइये, वापस चालू ! वापस बना लो लय, और क्या ?
आसकरणजी - अब आगे क्या होता है, जनाब ? इस तरह मुरली धर रोज़ पाली सर्राफा बाज़ार से कई मिठाइयों से भरे डब्बे लाया करता, और मिठाई का एक-एक टुकड़ा मास्टर साहब को ज़रूर चखाया करता ! मास्टर साहब ठहरे, चांदपोल के पंडितजी महाराज !
दीनजी – क्या कहें, भा’सा आपको ! चांदपोल और ब्रहमपुरी भरी पडी है, इन श्रीमाली जाति के पंडितों से ! फिर मास्टर साहब की दिल-ए-तमन्ना बनी रहती है, उनका मुंह मीठा होता रहे मुफ़्त की मिठाइयों से ! अब आगे कहिये, भा’सा !
आसकरणजी – एक दिन, मास्टर साहब मुरली धर से कहने लगे ‘यों कैसे रोज़, मिठाइयों के ऊपर पैसे खर्च करते जा रहे हो ?’ सुनकर मुरली धर ज़ोर से हंसने लगा ! फिर हंसी थमने पर, वह कहने लगा ‘मास्टर साहब मैं इस तरह रोज़ मिठाइयों के ऊपर पैसे खर्च करूँगा, तब अपने बाल-बच्चे कैसे पालूंगा ?’
काजू साहब – मुझे तो भा’सा, दाल में कुछ काला लगता है ! बात कुछ और होनी चाहिए, जनाब !
आसकरणजी – बीच में मत बोलिए, काजू साहब ! अब सुनो, आगे ! उसने कहा ‘पाली के सर्राफा बाज़ार में प्याऊ से सटी हुई, मेरे ससुरजी की मिठाई की दुकान है ! मैं जब भी उनसे मिलने, उनकी दुकान पर जाता हूं..
काजू साहब – खूब सारी मिठाई ठोककर, आ जाते होंगे ?
आसकरणजी – नहीं, जनाब ! तब वे कई मिठाइयों के डब्बे मुझे थमा देते हैं, और अगर मैं उनकी दुकान पर नहीं जा पाता तब वे स्टेशन पर मिठाइयों के डब्बे मेरे पास पहुंचा देते हैं !’ फिर, उसने आगे कहा...
[इतना कहकर, आसकरणजी अंगड़ाई लेकर थोडा विश्राम करने लगे ! मगर किस्से को बीच में छोड़ देना, दयाल साहब को अच्छा नहीं लगा..क्योंकि, उनके दिल में मची हुई है उतावली ! फिर, क्या ? जनाब कहने लगे..]
दयाल साहब – क्या हुआ, भा’सा ? गाड़ी कैसे रोक दी, जनाब ?
आसकरणजी – मेरा काम नहीं है, चलती गाड़ी रोकने का ! यह काम है, अपने गार्ड साहब गोपाल दासजी सा का ! मैं तो ख़ाली एक ही गाड़ी रोक सकता हूं, वह है बातों की गाड़ी..उसे भी रोक सकता हूं, केवल आप जैसे सज्जनों की मेहरबानी से ! अब आगे सुनिए, जनाब ! मास्टर साहब का भोलापन देखकर, वह बोला...
काजू साहब – क्या बोला, जनाब ?
आसकरणजी – वह बोला ‘आपको जब-कभी मिठाइयां ख़रीदनी हो, बस आप उस दुकान पर चले जाना और मेरे ससुरजी से कहना..के, आप मेरे मित्र हैं !
दीनजी – छूट पर किलो कितनी, जनाब ? ज़रा, छूट के बारे में बताइये !
आसकरणजी – उसने कहा ‘मेरे ससुरजी, पर किलो १०-१५ रुपये कम लगा देंगे !’ इस तरह मास्टर साहब रोज़ मुफ़्त के पान और मिठाइयां खाते-खाते बन गए “खावण-खंडे !” लोग कहते हैं, ‘जोधपुर के खंडे प्रसिद्ध है, या फिर प्रसिद्ध है खावण-खंडे !’ फिर एक दिन ऐसा आया, के...
कालू साहब – आगे क्या हुआ, कहीं उसकी दी हुई मिठाई आपने ठोक ली क्या ? क्या आप भी बन गये, खावण-खंडे !
आसकरणजी – [हाथ से अपनी तोंद सहलाते हुए कहते हैं] – वाह, काजूसहब ! आप भी अच्छे भोले रहे, इस बावन इंच के घेरे में एक-दो मिठाई के टुकड़े कहाँ टिकेंगे जनाब ? इस तोंद को भरने की, इस मुरली धर की कहाँ है औकात ? आप क्या जानते हो, हम ब्राहमणों के रीति-रिवाज़ ?
दयाल साहब – हुज़ूर, बोल दीजिये आपके रीति-रिवाज़ ! आख़िर है, क्या ?
आसकरणजी – यहाँ तो भागवान एक दिन छोड़ हर दूसरे दिन बनाती है, देशी घी में तैयार की गयी मिठाइयां ! क्या कहना है, उनका ? कभी बनाती है काजू की कतालियाँ, तो कभी बना देती है दाल का हलुआ..अरे जनाब, इस तरह-तरह की मिठाइयां, छप्पन-भोग तैयार करके गोपाल की सेवा में चढ़ाती रहती है !
दीनजी – सच्च कहा है, भा’सा ने ! इतने भोग चढ़ाने के बाद, होते हैं राज-भोग के दर्शन !
काजू साहब – हमें राज-भोग के दर्शन कहाँ करने है, जनाब ! हमारा नाम काजू अवश्य है, बस आप इतनी मेहरबानी रखावें..आप हमें पीसकर, काजू की कतली मत बना देना !
आसकरणजी – [हंसते हुए कहते हैं] – वाह काजू साहब, आप मज़ाक खूब कर लेते हैं ! जनाब इस बार बीच में बोलकर, आपने फिर तोड़ डाली मेरी लय ? मैं क्या कह रहा था, काजू साहब ?
काजू साहब – हुज़ूर आप कह रहे थे, के मुरली धर का आगे क्या हुआ ? बस, आप वापस चालू हो जाइये ! इस बार माफ़ कीजिये, हुज़ूर, अब आगे से मैं चुप ही रहूँगा !
आसकरणजी – अब मुरली धर की बदली हो जाती है, जोधपुर ! उसके जाने के बाद, मास्टर साहब हो गए परेशान ! अब न तो है मिठाई, और ना है पान ? अब क्या करे, बेचारे ? इधर लग गया, पितृ-पक्ष ! मास्टर साहब को इस श्राद्ध-पक्ष में दिवंगत दादाजी का पहला श्राद्ध का तर्पण करना है, और एक ब्राह्मण को खाना भी खिलाना है...!
दीनजी – अब अपने दिल में, सोचने लगे होंगे..? शायद कुछ तो सोचा होगा, जनाब ?
आसकरणजी – उन्होंने सोचा, इस मुरली धर के ससुरजी पैसे कम लगा देंगे ! बस उनकी दुकान से ले आते हैं, पंच-मेवा की मिठाई ! ब्राहमण को भी खाना खिला देंगे, और अपुन भी मिठाई खाकर अपनी इच्छा पूरी कर लेंगे ! फिर, क्या ? वे झट जा पहुंचे, वहां ! और जाकर तुलवा दी, पांच किलो पंच-मेवा की मिठाई !
दयाल साहब – रुपये कम करने का सवाल ही नहीं होता, आख़िर दुकानदार रुपये कमाने बैठा है..गमाने के लिये नहीं !
आसकरणजी – जी हां, सही कहा आपने ! अब मिठाई तुलवाने के बाद, मास्टर साहब बोले ‘खम्मा घणी, सेठ साहब ! मैं आपके जमाता का मित्र हूं, समधीसा ! उन्होंने मुझे कहा, आप १०-१५ रुपये पर किलो पर छूट दे देंगे !’ मास्टर साहब की बत सुनकर, सेठ साहब हंसने लगे !
दीनजी – आगे कहिये, भा’सा !
आसकरणजी – फिर, सेठजी ऊंची आवाज़ में बोले ‘मास्टर साहब, कहीं आप भंग पीकर आ गये क्या ?’ फिर उन्होंने अपने पहलू में बैठी दो साल की लड़की के सर पर, हाथ रखकर कहा..
काजू साहब – आगे क्या कहा, जनाब ?
आसकरणजी - ‘यह दो साल की लड़की मेरी इकलौती छोरी है, इसका विवाह तब होगा जब यह बीस साल की होगी ! अब समझ गए, मास्टर साहब ? अब मिठाई लेनी हो तो, निकालिए जेब से पूरे एक हज़ार रुपये ! नहीं तो, यह पड़ा रास्ता..’
दीनजी – फिर, क्या हुआ जनाब ? अगर उनके जेब में, एक हज़ार रुपये न हुए तो...?
आसकरणजी – मास्टर साहब ऐसे फंस गये जनाब, बस ऐसा लगा उनकी छाती के ऊपर आसमान आकर गिर गया हो ? यह तो जनाब, उनकी किस्मत ठीक थी ! उनकी जेब में बच्चों की परीक्षा शुल्क राशि रखी थी, कुल रोकड़ा एक हज़ार रुपये !
दीनजी – मिठाई के रुपये चुकाकर, मास्टर साहब ने इस मुसीबत से छुटकारा पाया होगा ? बस फिर उस दिन से उन्होंने कसम ले ली होगी, भविष्य में मिठाई नहीं खाने की ! उस दिन से बेचारे मास्टर साहब, मिठाई के नाम से डरने लगे होंगे ? यहाँ तक कि, उन्होंने विवाह-शादी में जाकर लज़ीज़ भोजन करना भी छोड़ दिया होगा ?
आसकरणजी – जी हां, बिल्कूल सही फरमाया आपने ! वे लोगों से प्राय: कहने लगे, ‘मुझे है, मधुमेह रोग..अब मैं, मिठाई कैसे खा सकता हूं ? जनाब मैं तो केवल इन मिठाइयों को देखकर ही, अपने दिल की प्यास बुझा लेता हूं !’
दीनजी – भा’सा, मैं आपसे केवल यही कहूँगा ! जनाब, आप लोगों को मिठाइयां खिलाते रहो ! इन मिठाइयों को देख-देखकर ही, आप ऊब जायेंगे..खाने की इच्छा स्वत: ख़त्म हो जायेगी !
[मंच पर अन्धेरा छा जाता है, थोड़ी देर बाद मंच पर रौशनी फ़ैल जाती है ! अब लूणी स्टेशन का मंज़र सामने आता है, लूणी प्लेटफोर्म पर सौभागमलसा पुलिस वालों से मार खाने के बाद, ज़मीन पर गिरते हैं ! यही सही वक़्त होता है, जब इन देशी दोनों की अक्ल काम करने लगती है ! इन देशी दोनों के पास इस तरह की विपत्ति पड़ने पर, पुलिस से बचने के कई अजमाए तरीके उनके जेब में रहते हैं ! बस, फिर क्या ? सौभागमलसा झट जेब में हाथ डालकर निकालते हैं, लाल मिर्ची पाउडर से भरा पैकेट ! उस पैकेट खोलकर, पाउडर को फेंकते हैं उन पुलिस वालों की आँखों में ! बेचारे पुलिस वाले अपनी आँखें मसलने लगते हैं, तब-तक सौभागमलसा उनके चंगुल से निकलकर भाग खड़े होते हैं ! फिर, क्या ? धर-कूंचो धर-मचलो, भागते हुए रेलवे क्रोसिंग फाटक तक पहुँच जाते हैं ! माल गाड़ी आने वाली है, इस करण फाटक बंद है ! फाटक बंद होने से, सड़क पर कई गाड़ियां खड़ी है ! तभी दूर से, माल गाड़ी आती हुई दिखायी देती है ! इस माल गाड़ी को आते देखकर, ट्रक ड्राइवर सरदार निहाल सिंह गीत “उड़ी उड़ी रे पतंग मेरी उड़ी रे..” गाते हुए झट ट्रक का फाटक खोलते हैं ! फिर झट पायदान पर पांव जमाकर वे, ट्रक पर चढ़ जाते हैं, मगर जैसे ही वे अपने ड्राइविंग सीट पर बैठते हैं..तभी उनकी कमर पर दबाव महशूस होता है, फिर सौभागमलसा की कड़कदार आवाज़ सुनायी देती है !]
सौभागमलसा – तेरी पतंग बाद में उड़ेगी, पहले चलेगी तेरी ट्रक ! अभी जो सवारी गाड़ी निकली है, उसका पीछा कर ! और फटा-फट, उस गाड़ी को पकड़ा दे मुझे ! न तो फिर मेरे इस तमंचे से, तेरे प्राण यह गये..यह गये ! समझ गया, या नहीं ?
[सौभागमलसा के तमंचे की नाल का दबाव, सरदारजी की कमर पर बढ़ने लगा ! निहाल सिंह डरते हुए, ट्रक को चालू करते है ! फिर गेयर बदलकर उसकी रफ़्तार बढ़ा देते है, अब वह ट्रक हवा से बातें करने लगती है ! थोड़ी देर में ही रोहट रेलवे स्टेशन आ जाता है, स्टेशन के बाहर ट्रक को रोककर सरदारजी कहते हैं..]
निहाल सिंह – [गाड़ी को रोककर कहते हैं] – सत श्री अकाल, सेठ आ गया तेरा रोहट रेलवे स्टेशन ! [फाटक खोलकर कहते हैं] फटा-फट, पकड़ ले तेरी गाड़ी ! अब जाकर देख ले प्लेटफोर्म पर, तेरी गाड़ी आ रही होगी ! वाहे गुरु, फ़तेह !
सौभागमलसा - [सरदारजी की कमर से, तमंचे की नाल हटाते हुए] – युग-युग जीयो, सरदारजी ! तूने मेरा काम निकाला है, तुम पर जब भी विपत्ति पड़े तब मुझे याद करना ! [जेब से देसी दारू की बोतल और अपना विजिटिंग कार्ड, निकालकर उसे थमाते हैं] अब यह सम्भाल मेरा विजिटिंग कार्ड, और यह ले दारु की बोतल..पीकर मस्त हो जाना ! अब मैं चलता हूं, जय बाबा की !
[अब सौभागमलसा ट्रक से उतरकर, प्लेटफोर्म की तरफ़ जाने के लिए अपने क़दम बढ़ाते हैं ! इधर दारु की बोतल देखकर, सरदार निहाल सिंह ख़ुशी से झूम उठते हैं ! कारण यह रहा, रास्ते में हर आने वाली चौकी पर पुलिस वालों को पैसे खिलाते-खिलाते उनकी जेब ख़ाली हो गयी थी ! फिर बिना पैसे, वे कहां से दारु की बोतल ख़रीदकर लाते ? और कैसे, अपना नशा पूरा करते ? मगर अब सरदारजी का भाग्य बदला, और दारु की बोतल के दीदार हो गए हैं सरदारजी को ! बस, फिर क्या ? वे ख़ुशी से, झूम उठते हैं ! अब बोतल थामे, करते हैं भांगड़ा डांस ! उधर दूसरी तरफ़ चलते-चलते सौभागमलसा सोचते जा रहे हैं, के ‘पहला काम उस फुठरमल को पकड़कर इतना पीटूंगा, के उसको उसकी नानी याद आ जाय ! इसके बाद, उसको दिखाऊंगा मोबाइल पर तैयार की गयी विडियो फिल्म ! जिसमें वह जुलिट से, अपने पांवों पर मूव ट्यूब मसलता जा रहा है ! और साथ में उससे, प्रीत-भरी बातें भी करता जा रहा है ! फिर उसे धमकी देता हुआ यह कहूँगा, के ‘देख नालायक, तू इस विडियो फिल्म में कैसे परायी नारी के साथ इश्क लड़ाता जा रहा है ? अब मैं इस विडिओ फिल्म की कई कोपियां तैयार करूंगा, एक कोपी भेजूंगा तेरी बेर लाडी बाई के पास, दूसरी कोपी भेजूंगा तेरे हेड ऑफ़िस ! फिर लाडी बाई और तेरे बड़े अफ़सर, क्या गत बनाएंगे तेरी इस फिल्म को देखकर ? अब या तो तू मेरा नीला बैग लाकर दे दे, नहीं तो ये तेरी सारी रोमांस भरी बातें सबके सामने चौड़ी कर दूंगा..तब कहीं जाकर, मेरी दिल-ए-तमन्ना पूरी होगी !’ इस तरह बड़बड़ाते हुए चितबंगे की तरह चलते जा रहे हैं, और भूल जाते है वे किससे टकरा रहे हैं या वे किसको कुचल रहे हैं ? तभी उन्हें कुत्ते के किलियाने की आवाज़ उनके कानों को सुनायी देती है, और विचारों की कड़ी टूट जाती हैं ! वे देखते हैं, उनके पांव के नीचे एक काबरिया कुत्ता आ चुका है ! वह किलियाता हुआ उनकी पिंडली पकड़ लेता है, और ज़ोर से काट जाता है ! काटकर सीधा बन्नाट करता हुआ भागता है, और आगे चल रहे कुली नंबर एक की दोनों टांगों के बीच से निकल जाता है ! अचानक इस तरह इस कुत्ते की हरक़त से वह कुली नंबर एक घबरा जाता है, और वह अपना संतुलन खो देता है ! सर पर रखा बोक्स गिर पड़ता है, जो सीधा आकर गिरता है पीछे से आ रहे सौभागमलसा के ऊपर ! सर पर इतना भारी बोझा पड़ते ही बेचारे सौभागमलसा गिरते हैं, भौम पर ! दर्द के मारे, चिल्लाते हुए कहते हैं...]
सौभागमलसा – [ज़ोर से कराहते हुए, कहते हैं] – मार दिया रे, मेरे बाप ! अरे मेरी कमर टूट गयी रे, मुझे कोई उठावो रे...!
कुली नंबर एक – [पीछे मुड़कर, गोविंदा स्टाइल से कहता है] – अरे ओय मानव, तू तो धरती का बोझ है रे ! हम जैसे कुली तुम जैसों का बोझ लादे चलते हैं ! बोल, उठा दूं तूझे इस ख़िलकत से ? धरती का बोझ, हल्का हो जायेगा !
[इसका व्यंग-भरा जुमला सुनते ही, उसके पहलू में चल रहा यात्री हंसता हुआ कह देता है..]
यात्री – [हंसते हुए कहता है] - उठा दे यार, उठा दे इस धरती के बोझ को ! इस ख़िलक़त से ही उठा दे, इसे ! इसके साथ तू भी चला जा, ऊपर वाले भगवान के पास ! वहां जाकर, तू अपनी मज़दूरी ले लेना !
[उसका जुमला सुनकर, आस-पास खड़े यात्री ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे ! उनकी हंसी सुनकर, कुली नंबर एक आब-आब होकर, सौभागमलसा को उठाता है ! सौभागमलसा उठकर, चल देते हैं प्लेटफोर्म की ओर ! जहां उनकी दिल-ए-तमन्ना, पूरी होनी वाली है ! ना तो वे उस कुली नंबर एक को धन्यवाद कहते हैं, और ना उन हंसने वाले यात्रियों पर वे गुस्सा करते हैं ! उधर वह कुली नंबर एक, नीचे पड़े बोक्स को उठाता है..फिर बोक्स उठाये चल देता है, प्लेटफोर्म की तरफ़ ! मंच पर अँधेरा छा जाता है, थोड़ी देर बाद मंच पर वापस रौशनी फ़ैल जाती है ! अब, गाड़ी का मंज़र दिखायी देता है ! काम पूरा होने के बाद, अब फुठरमलसा की गैंग वापस अपने केबीन की तरफ़ लौटती दिखायी देती है ! उन्हें आते देखकर, आसकरणजी अच्छी तरह से बैठ जाते हैं ! उनके आते ही, उन्हें ख़ाली सीटों पर बैठाते हैं ! फुठरमलसा की गैंग बैठ जाती है, ख़ाली सीटों पर ! अब सावंतजी, रोकड़ का बैग आसकरणजी ओ सम्भला देते हैं ! फिर समझा देते हैं, उन्हें पूरा हिसाब !
फुठरमलसा – [हाथ ऊंचा करके, आलस मरोड़कर कहते हैं] – आसकरणजीसा, अब आप आराम कर चुके हैं ना ? इन टी.टी.यों के जलसे का चन्दा इकठ्ठा करता-करता मेरे बाबा रामा पीर, मेरे दोनों पांव अकड़ चुके हैं ! असहनीय दर्द, हो रहा है ! लीजिये आप दूर हटिये, अब मैं आराम से लेट जाता हूं !
[आसकरणजी कलेक्शन से प्राप्त रुपये और दूसरे सामान संभालकर, रख देते हैं अपने बैग में ! अब उस ख़ाली बैग को वे दीनजी को थमा देते हैं ! फिर अपनी सीट से उठ जाते हैं, उनके उठते ही फुठरमलसा झट लेट जाते हैं वहां ! अब आसकरणजी ख़ाली सीट पर बैठते हुए, कहते हैं..]
आसकरणजी – [सीट पर बैठते हुए कहते हैं] – जीते रहो, फुठरमलसा ! युग-युग जीयो, फुठरमलसा आप और आपकी गैंग ! कितना अच्छा कलेक्शन लाये हो, यार..दिल खुश कर दिया आपने !
काजू साहब – अब जनाब, आपका काम बन गया ना..आसकरण जी ?
आसकरणजी – जी हाँ ! [फुठरमलसा की तरफ़ देखते हुए कहते हैं] जलसे का ख़ास काम आपने पूरा करके, बहुत सहयोग दिया है आपने ! अब मैं आपकी क्या ख़िदमत करूँ, जनाब ? मिठाई-विठाई मंगवाकर आप लोगों को खिला दूं, तो मेरी दिल-ए-तमन्ना पूरी हो जायेगी !
फुठरमलसा – क्यों मंगवाते हो, यार ? अभी हमारे साथियों में से कोई कहेगा के..[दीनजी की तरफ़ देखते हैं] मुझे है, मधुमेह की बीमारी..कैसे खाऊं ? [सावंतजी की तरफ़ देखते हैं] फिर कोई बोलेगा, मेरे मुंह में दांत ही नहीं..कैसे खाऊं ? [रशीद भाई को देखते हुए] फिर हमारे सेवाभावी बोलेंगे, बाबा का हुक्म हो गया..मैं जा रहा हूं, पाख़ाने...
सावंतजी – फिर मंगवा दीजिये, फुठरमलसा की मनपसंद “एम.एस.टी. कट चाय !
दयाल साहब – वो भी पियेंगे, जनाब ! पाली स्टेशन पर, भाऊ की दुकान पर !
रशीद भाई – चाय पाइए बासी या ठंडी, पहले इनसे पूछ लेना [फुठरमलसा की तरफ़ देखते हुए, कहते हैं] के, पीने के बाद जनाब क्या कहेंगे ? पहले आपको कह दूं, आपको अपनी दिल-ए-तमन्ना पूरी करने के लिए आपको इस तरह के ताने [ओलमे] सुनने ही होंगे, जनाबे आली फुठरमलसा से ! के...
सावंतजी – [जुमला पूरा करते हुए कहते हैं] – के, ऐसी क्या बासी चाय पायी रे कड़ी खायोड़ा ? ऐसी चाय पानी थी तो पिला देते, लूणी स्टेशन पर..तो, रामा पीर आपका भला करता !
आसकरणजी – [हंसते हुए कहते हैं] – चाय..चाय, क्यों बोलते जा रहे हो ? फुठरमलसा कहे तो इनको चाय से स्नान करवा देता हूं, ये कहे जिस स्टेशन पर !
[गाड़ी तेज़ गति से चलती हुई दिखायी दे रही है, अचानक रशीद भाई को याद आ जाता है, रोहट स्टेशन निकल गया है..अत: अब उन्हें हो गया है, बाबा का हुक्म ! अब उठना तो है ही, अब आने वाला है पीर दुल्हे शाह हाल्ट ! बस जनाब के क़दम बढ़ जाते हैं, पाख़ाने की तरफ़ ! उनको जाते देखकर, दीनजी उन्हें रोकते हुए कहते हैं..]
दीनजी – जनाब, कहाँ तशरीफ़ ले जा रहे हैं ? कहीं बाबा का हुक्म तो नहीं हो गया, जनाब ?
रशीद भाई – [रूककर, बैग से साबुन की बट्टी बाहर निकालते हुए कहते हैं] – जनाब ने सही फरमाया, अब चलते हैं पाख़ाना ! हजूरे आलिया का हुक्म हो तो, हुज़ूर आपको भी ले जाकर बैठा दूं पाख़ाने में...बैठे-बैठे, पाख़ाने की सुगंध लेते रहना !
ठोकसिंगजी – हम तो ठहरे, बाबा के मुरीद ! बाबा जो हुक्म करता है, हमें तो तामिल करना है जनाब ! समझ गए, रशीद भाई ? बाबा चाहेगा, तब दीनजी भा’सा भी आपके साथ पाख़ाने की सुगंध लेने चल पड़ेंगे !
[अब दीनजी भा’सा, क्या जवाब देते..? उनको तो शर्म आ रही है, जवाब देने में ! और साथ में डर भी था, कहीं रशीद भाई अपनी हाज़िर-ज़वाबी से और कोई डायलोग बोलकर उनके लबों पर ताला न जड़ दे ? तभी फुठरमलसा को याद आता है, वे अभी-तक लघु-शंका से निपटे नहीं है ! याद आते ही, लघु-शंका नाक़ाबिले बर्दाश्त हो जाती है ! वे झट उठ जाते हैं, फिर दोनों पाख़ाने की ओर अपने क़दम बढ़ा देते हैं ! अब रशीद भाई इस पाख़ाने में घुसते हैं, तब फुठरमलसा झट दाख़िल होना चाहते हैं दूसरे पाख़ाने के अन्दर ! मगर, करते क्या, बेचारे फुठरमलसा ? उनका रास्ता रोककर, सौभागमलसा सामने खड़े हो जाते हैं ! अब वे उन्हें धमकाते हुए कहते हैं..]
सौभागमलसा – मुझे बहुत मिठाई खिला दी रे तूने, इस लूणी स्टेशन के ऊपर ! अब मेरी इच्छा है, के पावणा तूझे भी प्रसाद दे दूं ?
[इतना कहकर सौभागमलसा ने फुठरमलसा का गिरेबान पकड़कर, उन्हें पीटना चाहा मगर.. फुठरमलसा थे पूरे सावचेत, क्योंकि वे ठहरे गोपालिये के भाई ! ऐसी कुश्तियों के दाव-पेच, तो वे बचपन में खेलते-कूदते अपने दोस्तों पर अजमा चुके थे ! बस, फिर क्या ? भईजी ने मारी एक लात, सौभागमलसा की रानों पर ! दर्द के मारे सौभागमलसा कराहते हुए आकर सीधे गिरते हैं, धरती पर ! उनके नीचे गिरते ही, फुठरमलसा ने मारी दूसरी लात उनकी पिछली दुकान पर ! फिर क्या ? उनके उठते वक़्त फुठरमलसा ने एक बार और लात मारी, बेचारे सौभागमलसा लात खाकर गिरते हैं चम्पाकली के ऊपर ! बेचारा चम्पाकली सामने से आ रहा था, गुलाबा का हाथ पकड़े हुए ! इन दोनों हिंज़ड़ो को, क्या पता ? अभी सवा मन का बोझा आकर गिर जायेगा, उनके कोमल बदन के ऊपर ! यह बोझ तो इतना भारी है, जिसको संभालने की ताकत इन दोनों हिंज़ड़ो में कहाँ..? बेचारे धड़ाम से आकर गिरते हैं, पीछे से आ रही बुढ़िया पानी बाई के ऊपर ! इन दोनों हिंज़ड़ो के नीचे दबी पानी बाई चमकी ज़ोर से, तभी उसे दिख जाते हैं भूतों के बाप फुठरमलसा ! उनको देखते ही बुढ़िया का सर भन्नाने लगा, अब उसको पूरी तरह से भरोसा हो जाता है, इस इंसान के बदन पर भूतों ने अपना कब्ज़ा जमा रखा है ! इस कारण ये भूत-प्रेत इस आदमी को बाध्य करते हैं, के वह गाड़ी में शैतानी हरक़त करता रहे ! फिर, क्या ? इन हिंज़ड़ो को एक तरफ़ धकेलकर वह उठती है, और डरकर गाँठ लेकर भाग जाती है दूसरे केबीन में ! रास्ते में ज़ोर-ज़ोर से, लोगों को सुनाती जाती है..]
पानी बाई – [ज़ोर से चिल्लाती हुई जाती है] – अरे मेरे बाबजी, जहां फुठरमलसा मौजूद रहते हैं..वहां नाचे, भूत-प्रेत ! ओ मेरे खेतालाजी, अब यह बुढ़िया कभी यहाँ नहीं बैठेगी !
[इस बुढ़िया को इस तरह भागते देखकर, डब्बे में बैठे यात्रियों के मध्य हलबली मच जाती है ! अब वे हर दूसरे यात्री को भूत होने का समाचार कहते हुए, अफ़वाह फैलाते जा रहे हैं ! कोई कहता है, डब्बे में भूत है..तो कोई कहता है, आसेब आ गया है वापस ! उधर आसेब के आने के समाचार सुनते ही, चाचा कमालुदीन अपनी बीबी को आवाज़ लगाकर ज़ोर से कहते हैं..]
चाचा कमालुदीन – अरी ओ मेरी नूरमहल ! कित्ती पांण समझाया तूझे, के इमामजामीन पहन ले इमाम जामीन पहन ले ! मगर तू तो मेरी बात को काना कोनी ढालती ? अब मर अपने लक्खण से, डब्बे में घुस गया है आसेब !
हमीदा बी – [फुठरमलसा की तरफ़, अंगुली का इशारा करती हुई कहती है] – देख नी रिया है, कै आँखें फूटोड़ी है तुम्हारी ? यह तो वो ही आदमी है, जिसने कमरू दुल्हन की ओढ़नी नापाक की थी ! मरता नहीं, नासपीटा ! मैं सच्च कहती हूं, इस नासपीटे को लग गया, आसेब !
[हमीदा बी अपने दोनों हाथ ऊपर ले जाती हुई, बाबा पीर दुल्लेशाह से प्रार्थना करती है..]
हमीदा बी – [हाथ ऊपर ले जाती हुई कहती है] – बाबा पीर दुल्लेशाह ! बचा दे इस बार, अगले जुम्मेरात आकर आपकी मज़ार पर शिरनी ज़रूर चढाऊंगी ! इस बार मेरी ख़ता को माफ़ कर दे, बाबा ! [फुठरमलसा की तरफ़ अंगुली का इशारा करती हुई] बाबा अभी इस आसेबज़द को बांधकर भेजती हूं, आपके दरबार में !
चाचा कमालुदीन – अरी ओ बेग़म, पीर दुल्लेशाह हाल्ट आने वाला है ! अब कैसे ले जाओगी, इसे बांधकर ? कौन बांधेगा, इसे ?
हमीदा बी – नूरिये के अब्बा, स्टेशन पर उतरकर सीधे पीर बाबा की मज़ार पर चलेंगे ! बाबा का परचा है..वहां ले चलेंगे, इस मरदूद को ! अब नूरिया कमबख्त, कहाँ चला गया ? अब इस मरदूद को बांधेगा, कौन ?
[अब हमीदा बी इधर-उधर अपनी निग़ाहे डालती है, शायद कहीं वो नूरिया दिखायी दे जाय ? वो दिखायी देता, कैसे ? वो तो बेंच पर बैठा-बैठा झपकी ले रहा है, और उसके निकट खड़ा है, किन्नर चम्पाकली ! जो गाड़ी में सफ़र करने वालों से, पैसे मांग रहा है ! हमीदा बी को इस तरह इधर-उधर आँखें फाड़ते देखकर, चाचा कमालुदीन कहते हैं..]
चाचा कमालुदीन – अरी ओ बेग़म, काहे आँखे फाड़-फाड़कर इधर-उधर देख रही हो ? [अंगुली से इशारा करते हुए] तुम्हारा नूरिया तो उस बेंच पर, बैठा-बैठा झेरा खा रिया है ! दीखता नहीं क्या, तुमको ?
हमीदा बी – [नूरिये को ज़ोर से आवाज़ देते हुए] – अरे ओ नूरिया, क्या पड़िया-पड़िया ऊंघ ले रिया है ? ज़रा ऊठ, पकड़ इस नासपीटे को..[फुठरमलसा की तरफ़ अंगुली का इशारा करती हुई, आगे कहती है] बांधकर लेजा दे, बाबा की मज़ार पे ! कमबख्त का, आसेब उतर जायेगा ! पीपे पे बाँध के जो रस्सी लाया था तू, उसी से बांध दे इसे !
[नूरिया अपनी अम्माजान की लताड़ पाकर, आँखें मसलता हुआ उठता है ! उसकी आँखों से नींद जाने का, कोई सवाल नहीं ! बेचारा, बार-बार झपकी खाता जा रहा है ! अम्मी का हुक्म पाकर चितबंगे की तरह रस्सी ढूँढ़ने के लिए इधर-उधर हाथ मारता है, मगर पलकें भारी होने के कारण, वो देख नहीं पाता..के, उसका हाथ कहाँ जा रहा है ? उसके पास खड़ा है, चम्पाकली..जो इस वक़्त गाड़ी में बैठे यात्रियों से, पैसे मांग रहा है ! उसके घाघरे का नाड़ा बहार निकला हुआ है, इससे बेख़बर होकर वह पैसे मांगता जा रहा है ! नूरिये का हाथ पीपे पर पड़ना चाहिये था, मगर ख़ुदा की पनाह नूरिया का हाथ उस लटकते घाघरे के नाड़े को छू जाता है, बस उसे वह रस्सी समझकर वह उसे खींचकर लेने की कोशिश करता है ! घाघरा खुलने को हुआ, बस बेचारे चम्पाकली की शामत आ जाती है ! झट हाथ में रखे रुपये-पैसे फेंककर, चम्पाकली दोनों हाथों से अपना घाघरा थाम लेता है ! इस तरह बेचारा हिंज़ड़ा नंगे होने से बच जाता है, अब वह नाड़े को अच्छी तरह से बांधकर घाघरे को नीचे गिरने से बचा लेता है ! फिर गुस्से में उस नूरिये की पिछली दुकान पर, जमा देता है एक ज़ोर की लात ! लात खाते ही नूरिये की नींद खुल जाती है, और वह दर्द से कराह उठता है ! देर रात तक, कल नूरिये ने टी.वी. में देखी थी भूतों की फिल्म ! अब अचानक पड़ी लात को समझ बैठा, के कालिये भूत ने मारी होगी लात ! बस अब वह डरकर, ज़ोर से “आसेब, आसेब आ गया” चिल्लाने लगता है ! उसे भयभीत देखकर, खुद हमीदा बी भी सहम जाती है ! उसका बदन कांपने लगता है, अब वह अलग से चिल्लाती हुई ज़ोर से कहती है..]
हमीदा बी – [डर से चिल्लाती हुई, कहती है] – आसेब...आसेब, डब्बे में आसेब आ गया ! अब इस इस मूंछों वाले आदमी से आसेब निकलकर, घुस गया है हिंज़ड़े में ! ख़ुदा रहम, ख़ुदा रहम अब बचा रे पीर बाबा दुल्लेशाह !
[पास बैठे चौधरीजी को आती नहीं यह उर्दू भाषा, फिर बेचारे क्या समझे..किसे कहते हैं “आसेब” ? आख़िर बोले बिना, उनसे रहा नहीं जाता ! पूछ बैठे, चाची हमीदा बी से..]
पास बैठे चौधरीजी – क्या घुस गया, चाची ?
[उधर उनकी घरवाली चौधरण लोक-लाज बताती हुई, घूंघट ऊंचा करके कहने लगी..]
चौधरण – अरे, ओ गीगले के बापू ! चुप-चाप बैठे रहिये, आपको क्या ? जिसके अन्दर घुसा, उसे होगी तक़लीफ़ ! आपको, क्या लेना-देना ? अब बोलो मत, कहीं वह आपके अन्दर न घुस जाये..फिर उसे निकालना मुश्किल हो जायेगा !
[डब्बे के सभी केबिनों में मच जाती है, धमा-चौकड़ी ! कोई कहता भूत, तो कोई कहता प्रेत..कहीं से किसी यात्री की आवाज़ आती है, यह तो है, आसेब ! कोई यात्री कहता जा रहा है, के ‘यह तो खबीस है !’ इधर चाचा कमालुदीन के परिवार की, हालत पतली होती जा रही है...उनका परिवार, पीर दुल्लेशाह का वज़ीफ़ा पढ़ने लगा ! इस तरह इस खिलके के कारण फुठरमलसा को काफी वक़्त मिल जाता है, बचने के लिए ! वे झट दौड़कर, सीधे घुस जाते हैं पाख़ाने के अन्दर ! रास्ते के बीच पड़े सौभागमलसा लम्बी सांस लेते हैं, अब उनके बदन का दर्द कुछ कम हो गया है ! चेतन होने के बाद, वे आँखें खोलकर सामने देखते हैं..उनको दिखायी देता है, एक फ़क़ीर ! जो भगवा कपड़े पहना बैठा है, वो भी उनके घुटने से अपना घुटना अड़ाकर ! यह इंसान, कोई सीधा लग नहीं रहा है ! क्योंकि इसने सौभागमलसा से बिना इज़ाज़त लिए, उनकी थैली से दारू की बोतल निकालकर पीनी चालू कर दी है ! अब वे उस फ़क़ीर को आंखे फाड़कर देखते हैं, और सोचते जा रहे हैं के “मैं इस इलाके बड़ा डोन हूं, जो गांजे तस्करी करने वाले तस्करों का सरदार है ! अब यहाँ इस कालाबेलिये की इतनी कैसे हिम्मत हो गयी, जो मेरी बिना इज़ाज़त मेरी थैली से दारु की बोतल निकालकर पीता जा रहा है ? ग्रामीण इलाके की सारी औरतें मेरा नाम लेकर अपने बच्चों को डराकर कहती है ‘मेरे लाडके बेटे सो जा, नहीं तो आ जायेगा सरदार सौभागमल !’ अब यह मेरा बाप करमठोक, आया कहाँ से ?” इतना सोचकर, सौभागमलसा उस फ़क़ीर से कहते हैं..]
सौभागमलसा – [आँखें तरेरकर कहते हैं] – तू कौन है, मेरे बाप ?
फ़क़ीर – [आँखें टमकाता हुआ कहता है] – आँखें मत फाड़ रे, झाहू चूहे ! कल धुंदाड़ा गाँव में, तू चुराता था गाय-भैंस ! अब तू मुझे दिखा रहा है, अपनी आँखें ? कमबख्त तेरी ये आँखें निकालकर गोटी खेल सकता हूं, तू जानता नहीं मुझे..मैं कौन हूं ?
सौभागमलसा – कहो मेरे बाप, आप हो कौन ?
फ़क़ीर बाबा – मैं हूं, चपकू गैंग का सरदार ‘फ़क़ीर बाबा !’ सो रही ठकुराइनों की चोटियां काट लाता हूं, उनकी आँखों का काज़ल चुराने वाला मैं ही हूं..मैं हूं अलामों का बाप, ‘फ़क़ीर बाबा !’ अरे रे, काले चूहे ! तू मुझे बिल्ली समझकर, नाच चूहे की तरह ! जानता नहीं, तेरे जैसे कई डॉन मेरी जूत्तियाँ उठाते हैं !
[चपकू गैंग का नाम सुनकर, सौभागमलसा घबरा जाते हैं ! इस गैंग के ख़तरनाक कारनामें, देसी डॉन-जगत में कुख्यात है ! जैसे दाऊद इब्राहीम की डी कंपनी मोहम्मद अली मार्ग वाले इलाक़े में अपना असर रखती है ! उस क्षेत्र के जवान लोंडे इस कंपनी में भर्ती होने की दिल-ए-तमन्ना रखते हैं, वैसे ही इस ग्रामीण इलाक़े के जवान लौंडे इस चपकू गैंग में काम करने की दिल-ए-तमन्ना रखते हैं ! इस गैंग में काम करने के चांस किसी तरह मिल जाये, इसके लिए वे तरसते हैं ! ख़ास तौर से यह चपकू गैंग, रेलवे प्लेटफोर्म और रेलगाड़ियों में यात्रियों के माल पार करने का काम किया करती है ! इनकी गैंग के मेम्बरों को कई तरह की भाषा आती है, और वे कई इल्म की जानकारी रखते हैं ! कई तरह के नशों व जहर की तो, ये लोग विशेष जानकारी रखते हैं ! यात्रियों को सम्मोहित करने में, इनको महारत हासिल है ! इस गैंग ने, पूरे रेलवे महकमें का सुख और चैन छीन लिया है ! गैंग की पूरी जानकारी दिमाग़ में आते ही, सौभागमलसा झट उठकर फ़क़ीर बाबा के चरण छूते हैं और उनसे निवेदन करते हैं..]
सोभागमलसा – [चरण छूकर कहते हैं] – हुकम अन्नदाता ! मुझे माफ़ कीजिये, ग़लती हो गयी मुझसे ! मैं आपको पहचान नहीं पाया, आप मेरे ऊपर मेहरबानी रखें ! बाबजी मैं आपका सेवक, पहले से दुखी हूं ! हुक्म दीजिये, मैं आपकी ख़िदमत कर सकूं ?
फ़क़ीर बाबा – सुन ले, अच्छी तरह से ! मैं जैसा कहता हूं, वैसा ही तू कर ! नहीं तो, तेरी मौत यह आयी ! मैं जानता हू, तू क्यों परेशान है ? सावधानी नहीं रखी तूने, अब इसी कारण तू अभी फुठरिये जैसे तुच्छ प्राणी से तला जा रहा है ! तेरा नीला बैग, वह ला नहीं रहा है तेरे पास ! और तू, उसका बाल बांका नहीं कर पा रहा है !
सौभागमलसा – हुकूम, सत्य वचन !
फ़क़ीर बाबा – बैग में रखे हैं, तेरे तस्करी धंधे के हिसाबी-काग़ज़ात ! अब तूझे यह डर है, कहीं ये काग़ज़ात पुलिस के हाथ न लग जाये ! अगर लग गये, तो तूझे यह पुलिस गंगाजी में डाल देगी !
सौभागमालसा – सत्य वचन, अन्नदाता ! अब आप ही मझे बचा सकते हैं, मेरे आका, मैं आपकी पनाह में हूं ! मेरी इज़्ज़त बचाना, अब आपके हाथ में है ! मुझे किसी तरह आप बचा लीजिये, बाबजी !
फ़क़ीर बाबा – मगर सोभाग्या , तू जानता नहीं ? इस दुनिया में, बिना लिये-दिये कोई काम बनता नहीं ! इस हाथ ले, और इस हाथ दे ! मगर, तू अभी फ़िक्र कर मत !
सौभागमलसा – जी हाँ !
फ़क़ीर बाबा – यह देख, तेरी जीव की देण है यह फुठरमल ! उस कुचामादी ठीईकरे से मैं खुद निपट लूँगा, उसके बाद मैं जो काम तूझे सुपर्द करूंगा उस काम को तूझे..
सौभागमलसा – [अपने दोनों कान पकड़कर, कहते हैं] – बराबर सावधानी रखता हुआ, आपके काम को अंजाम दूंगा ! आगे से कोई ग़लती नहीं होगी, बस बाबजी आपका अपना हाथ मेरे सर पर रख दीजिये ! आप इस आदमी से, मेरा पीछा छुड़ा दीजिये !
फ़क़ीर बाबा – देख रे, चूहे ! यह फुठरमल बार-बार यूरीनल में जाता है, और वहां अन्दर जाकर दीवार पर लिखे मादक डायलोग पढ़कर आनंद लेता है ! ऐसा लगता है, यह इंसान बड़ा रसिक है ! अब तू ऐसे कर, के..[हाथ की अंगुलियाँ हिला-हिलाकर गूंगे-बहरों की सांकेतिक भाषा में समझाने की कोशिश करते हैं]
सोभागमलसा – बाबजीसा, इस तरह अंगुलियां हिलाने से, मेरे भोगने में कुछ पल्ले नहीं पड़ता ! अब क्या करूँ, मालिक ? आप अच्छी तरह से समझा दीजिये, मुझे !
फ़क़ीर बाबा – देख तेरे गैंग की कमलकी सांसण के मोबाइल नंबर, इसके हाथ लग गये हैं ! अब तू इस फुठरिये के पास जा मत, बस अब तू यों कर !
सौभागमलसा – जो हुकूम !
फ़क़ीर बाबा - तू ध्यान रख, अभी यह फुठरिया किसी का मोबाइल मांगकर लेगा ! फिर करेगा यह, उस कमलकी को फ़ोन ! अब तू उस कमलकी को फ़ोन करके कह दे, के ‘उसका फोन आने पर वह उससे मीठी-मीठी बातें करें और उसको नाणा-बेडा के मेले में बुला ले !’
सौभागमलसा – मेले में क्यों, बाबजी ? वहां बैठाकर उससे, हरी-कीर्तन करवाना है क्या ?
फ़क़ीर बाबा – बीच में मत बोला कर, चूहे ! पहले, मेरी बात सुना कर ! अब सुन, वहां गौतम मुनि का मंदिर है, वहां हमेशा की तरह मेला भरा जाने वाला है ! उसको उस मेले में बुला ले, फिर मैं उसको वहां देख लूँगा !
सौभागमलसा – जी हुज़ूर, आगे कहिये !
फ़क़ीर बाबा - तू देखते रहना, मैं उसकी क्या गत बनाता हूं ? उसकी सात पुश्तें याद रखेगी, मुझे ! [दारू की बोतल थमाते हुए] अब तू बची हुई मेरी प्रसादी ले ले, और इसे पीकर मस्त हो जा !
[इतना कहकर, फ़क़ीर बाबा सौभागमलसा के सर पर हाथ रखते हुए कहता है]
फ़क़ीर बाबा – [सौभागमलसा के सर पर, हाथ रखता हुआ कहता है] – आज से मेरी कृपा, तेरे ऊपर बराबर रहेगी ! [ज़ोर से गुंजारा करता हुआ] अलख निरंजन, अलख निरंजन !
[चिमटा हिलाता हुआ आगे चला जाता है, पीछे से “अलख निरंजन, अलख निरंजन” की गूंज़ सुनायी देती है ! फ़क़ीर बाबा के जाने के बाद, अब सौभागमलसा बेफिक्र होकर फ़क़ीर बाबा की लौटाई गयी दारु की बोतल से दारु पीनी शुरू करते हैं ! अब बड़े डॉन का आशीर्वाद मिल जाने से, वे बहुत खुश है ! अब बैठे-बैठे सोचते जा रहे हैं...]
सौभागमलसा – [होंठों में ही] – बस, अब इस कमलकी को फ़ोन करके, इस फुठरिये को बुला लेता हूं भूतिया नाडी ! इस भूतिया नाडी से दो फलांग आगे है बाबजी का झूपा ! बस वहीँ बैठा हूं मैं, वहां यह कमलकी उस फुठरिये को लेकर आ जायेगी मेरे पास !
[इन डोनों को, क्या पत्ता ? इन दोनों का वार्तालाप, गुलाबा चुप-चाप सुन चुका है ! और साथ में वह, मोबाइल से इनकी गतिविधियों का विडिओ-क्लेप भी तैयार कर चुका है ! फ़क़ीर बाबा के रूख्सत होने के बाद, गुलाबा छुपे स्थान से निकलकर बाहर आता है ! बाहर आकर वह सौभागमलसा के पास आता है ! फिर वह झुककर, सौभागमलसा से मुजरा [झुककर सलाम] करता है ! फिर ताली बजाता हुआ, कहता है..]
गुलाबा – [झुककर, सलाम करता है] – मुजरोसा, खम्मा घणी अन्नदाता ! आज तो सेठ साहब, बहुत मुस्करा रहे हैं ! [ताली बजाकर आगे कहता है] अब कुछ ख़र्चा-पानी हो जाना चाहिए, मालिक ! मालकां का भण्डार, भरा रहे !
[आज सौभागमलसा का दिल खुश है, क्योंकि आज इनकी मुलाक़ात हो गयी है, बड़े डॉन से ! इस कारण आज इनकी कली-कली खिल गयी है ! फिर क्या ? अब सौभागमलसा खुश होकर, जेब से कई सौ के कड़का-कड़क नोट निकालते हैं ! और उन नोटों को अपने ऊपर वारकर, थमा देते हैं गुलाबा को ! और साथ में, उससे कहते हैं..]
सौभागमलसा – [नोट देते हुए, कहते हैं] – आज तबीयत खुश कर दे, गुलाबा ! लगा ठुमका, और फिर सुना मुझे ठुमरी !
[गुलाबा ब्लाउज में नोट खसोलकर, गीत गाता हुआ घूमर लेकर नाचता जाता है !]
गुलाबा – [गीत गाता हुआ, नाचता जाता है] – थारे कन्नै अक आलौ गाबौ, नै म्हारै कन्नै है अेक नागी देह ! दे सकोला कांई थे दो बेंत गाबौ ? थारै कन्नै अेक रुळी ज़िंदगी ! दे सकोला कांई थे, रैवण नै म्हने दो गज़ ज़मीन ?
[गाड़ी का इंजन सीटी देता है, अब गाड़ी ने अपनी रफ़्तार बना ली है..वह तेज़ गति से, पटरियों पर दौड़ रही है ! इस गाड़ी की खरड़-खरड़ आवाज़ के आगे, गीत सुनायी देना बंद हो गया है ! इधर सौभागमलसा के मोबाइल पर घंटी आती है, मोबाइल को कानों के पास ले जाकर वे बात करते हैं..]
सौभागमलसा – [फोन पर] – कौन है ?
मोबाइल से आवाज़ आती है – जनाब, मैं कमलकी हूं ! हुज़ूर, कैसे याद किया आपने ?
सौभागमलसा – [मोबाइल पर] – तू धीरज रख़, आ रहा हूं मैं..! वहीँ बैठी रहना तू, कहीं चली मत जाना !
[मोबाइल बंद कर, सौभागमलसा उसे जेब में रखते हैं ! फिर वे रूख्सत होते दिखायी देते हैं ! उनको रूख्सत होते देखकर, गुलाबो पीछे से कहता है !]
गुलाबो – वाह रे, सेठ ! तेरी दिल-ए-तमन्ना पूरी हुई, अब मेरी दिल-ए-तमन्ना पूरी होगी !
[गाड़ी की गति धीमी हो जाती है, पीर दुल्लेशाह हाल्ट आ गया है ! गाड़ी प्लेटफोर्म पर आकर रुकती है ! थोड़ी देर में मंच पर अन्धेरा छा जाता है !]





लेखक का परिचय
लेखक का नाम दिनेश चन्द्र पुरोहित
जन्म की तारीख ११ अक्टूम्बर १९५४
जन्म स्थान पाली मारवाड़ +
Educational qualification of writer -: B.Sc, L.L.B, Diploma course in Criminology, & P.G. Diploma course in Journalism.
राजस्थांनी भाषा में लिखी किताबें – [१] कठै जावै रै, कडी खायोड़ा [२] गाडी रा मुसाफ़िर [ये दोनों किताबें, रेल गाडी से “जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन” के बीच रोज़ आना-जाना करने वाले एम्.एस.टी. होल्डर्स की हास्य-गतिविधियों पर लिखी गयी है!] [३] याद तुम्हारी हो.. [मानवीय सम्वेदना पर लिखी गयी कहानियां].
हिंदी भाषा में लिखी किताब – डोलर हिंडौ [व्यंगात्मक नयी शैली “संसमरण स्टाइल” लिखे गए वाकये! राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा विभाग का उदय, और उत्पन्न हुई हास्य-व्यंग की हलचलों का वर्णन]
उर्दु भाषा में लिखी किताबें – [१] हास्य-नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” – मज़दूर बस्ती में आयी हुई लड़कियों की सैकेंडरी स्कूल में, संस्था प्रधान के परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हास्य-गतिविधियां इस पुस्तक में दर्शायी गयी है! [२] कहानियां “बिल्ली के गले में घंटी.
शौक – व्यंग-चित्र बनाना!
निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].
ई मेल - dineshchandrapurohit2@gmail.com


 










1 comments:

  1. साहित्य शिल्पी के पाठकों !
    अभी आपने खंड ७ "दिल-ए-तमन्ना पढ़ा होगा, आपको यह खंड कैसा लगा ? आप अपने विचार प्रस्तुत करें, कोई खामियां रह गयी हो तो उन्हें भी उजागर करें ! हास्य नाटक "कहाँ जा रिया है, कढ़ी खायोड़ा" का एक भाग पूरा आपने पढ़ लिया है ! अब इसके बाद आप इसका "भाग दो" पढेंगे, जिसके आठ खंड है ! खंड ८ "क्यों देता है, गोली ?" अब आपके सामने आ रहा है ! हिंदी और मारवाड़ी भाषा में कई मुहावरे हैं, जिनका प्रयोग हिंदी और मारवाड़ी के वाक्यों में होता है ! इनके प्रयोग वाक्यों में होने से, वाक्य मनोरंजक बन जाते हैं ! इस खंड में भी "गोली देना" एक मनोरंजक मुहावरे का उपयोग किया गया है ! मारवाड़ी में इसका अर्थ है, "टरका देना" "अपना काम निकालकर अगले को अंगूठा दिखा देना" आदि इसके और भी अर्थ हो सकते हैं, आप इस खंड को पढ़कर आप क्या अर्थ निकालेंगे..कृपया, मुझे ज़रूर बताएं ! "जय श्याम री सा !"
    आपके ख़त की इंतज़ार में
    दिनेश चन्द्र पुरोहित [लेखक और अनुवादक]
    dineshchandrapurohit2@gmail.com

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