रचनाकाररचनाकार परिचय:-


नाम: नीतू सिंह ‘रेणुका’
जन्मतिथि: 30 जून 1984
प्रकाशित रचनाएं: ‘मेरा गगन’ नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2013), ‘समुद्र की रेत’ कथा संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2016)
ई-मेल: n30061984@gmail.com
ऑल्ट के साथ डीलीट और कंट्रोल दबाकर उसने हैंग हुई फाइल को बंद किया और बैग़ उठाया।
“अरे सौम्या प्रोग्राम एण्ड कर दिया?”
“हाँ और क्या? घर जाने का टाइम हो रहा है और सिस्टम दिमाग खराब कर रहा है। इसे तो मैं अब कल ही देखूँगी। वैसे तुम्हारा क्या प्लान है गौतम?”
“कुछ नहीं। अब विकेंड है तो दोस्तों को परेशान करूँगा। किसी को फिल्म के लिए सताऊँगा तो किसी को संडे की मैरेथान के लिए पकडूँगा। खैर, तुम्हारा क्या प्लान है?”
“मेरी मकान मालकिन बहुत दिनों से कह रही है कि मैं आज कल उससे बाते नहीं करती, उसके पास बैठती नहीं। क्या करूँ? ये ऑडिट वाले तो जान खा जाते हैं। अब अगले हफ्ते चले जाएं तो कुछ सोचती हूँ उसके साथ बैठकर उसकी सिडनी वाली लडकी का एलबम देखूँ।“
“तो ऑडिट के लिए सब कुछ रेडी है?”
“हाँ। रेकार्ड तो सारे रेडी कर लिए हैं मैंने...बस्स”
“बस्स क्या?”
“कुछ नहीं....वो तो बॉस का काम है सो वो जाने”
“क्या? कहीं गिफ्टस के बारे में तो नहीं सोच रही?”
“हाँ बस्स वही बाकी है”
“हाँ इस बार तो तगडा गिफ्ट मिलना चाहिए ऑडिट वालों को। कॉटेन वाले लोन में बहुत घपला किया है बड़े साहब ने। सब के सब शामिल हैं उसमें। खूब खाते हैं और ऐन मौके पर दे-दिलाकर छूट जाते हैं।“
”इस बार नहीं गौतम। इस बार ये लोग नहीं बचेंगे।“
”ये कैसे कह सकती हो?”
”चलो बताती हूँ। मेरी पिछली बार की चाय बाकी है। चलो नीचे, चंदू के यहाँ चाय पिऐंगे और इस का जवाब भी वही दूँगी। आखिर दीवारों के भी कान होते हैं।“
”राइट! चलो मैने भी सिस्टम ऑफ कर दिया है।“
”चलो”
सुनसान गलियारे से होते हुए सौम्या और गौतम लिफ्ट में पहुँचे। गलियारे में दोनों की गूँजती हंसी बता रही थी कि वे आज बहुत लेट हो चुके हैं। बाकी का पूरा ऑफिस कब का घर जा चुका था। विकेंड की छुट्टियों के लोभ ने यों भी वक्त से पहले ऑफिस खाली करा दिया था। परंतु सौम्या की खिलखिलाती हंसी बता रही थी कि उसे देर तक काम करने का कोई क्षोभ नहीं है बल्कि संतोष है कि उसने सोमवार को शुरू होनेवाले ऑडिट की पूरी तैयारी कर ली है।
दोनों ऑफिस के नीचे पहुंचते हैं और सीधे बिल्डिंग से लगे चंदू की चाय की दुकान पर पहुंचते हैं। अपनी रोज की सीटें संभालते हुए गौतम इशारे से दो चाय मंगाता है और सौम्या के चेहरे पर नज़र टिका लेता है। अपनी भौहों को आसमानी उछाल देते हुए कहता है
“तो”
“तो क्या?”
”तो इस बार कैसे नहीं बच सकते ये घूसखोर?”
”हां, वो....अच्छा। दरअसल, इस बार मैंने एकाउंट की सारी फाइलें देखीं है। सारे लोन की फाइल अच्छे से तैयार की गईं है। कोई अंधा भी इन्हें देखकर बता देगा कि सारे लोन नियमों को ताक पर रखकर दिए गए हैं।“
”वो तो पिछली बार भी दिए गए थे। इसमें नया क्या है?” गौतम ने चाय के अदने से ग्लास को गोल-गोल घूमाते हुए पूछा।
”हाँ...मगर इस बार ये नहीं बच पाऐंगें?”
ग्लास को घूरना छोड़कर गौतम ने सौम्या की आँखों में आँखें डालकर पूछा “और वो कैसे?”
सौम्या ने उसी आत्मविश्वास से जवाब दिया “वो ऐसे गौतम कि पिछ्ली बार इंस्पेकटर्स को घूस देकर पटा लिया गया था और.....”
गौतम ने बीच में बात काटते हुए कहा “और इस बार भी पटा लेंगे। इसमें क्या है?”
”नहीं...इस बार नहीं। इस बार टीम में पी वाई आयंगर आ रहें है। उन्होंने बड़े-बड़ों की छुट्टी कर दी है....”
”ओहो....”
”.....और अपने कड़क उसूलों के लिए जाने जाते हैं। उस दिन मैं जब बड़े साहब के केबिन में एकाउंटस का रजिस्टर लेकर गई थी तब वे इसी पर गुप्ता सर से चर्चा कर रहे थे। सच पूछो तो बड़े साहब के छक्के छूटे हुए हैं। उनको मैंने इतना परेशान कभी नहीं देखा। सब कमीनों ने बहुत रुपया खाया है। संस्था को खूब लूटा है और देश को भी। गौतम......अगर ऐसे लोगों को सज़ा नहीं मिली तो देश बर्बाद हो जाएगा। पिछली बार मैं कुछ नहीं कर पाई थी मगर मेरा सीना छलनी होकर रह गया था। पिछली बार..... जानते हो गौतम.... इन लोगों ने ऑडिट में न पकड़े जाने पर एक पार्टी रखी थी....बड़े साहब के यहाँ।“
”हूँ....अच्छा तो वो पार्टी इस खुशी में रखी गई थी?”
”हाँ तो और तुम क्या समझे थे कि अपना बॉस बडा दिलदार है जो मुफ्त में पार्टी दे रहा था”
”हम्म”
“जानते हो गौतम....ऑडिट के दूसरे दिन इन लोगों के ठहाके मुझे एटम बॉम्ब से कम नहीं लग रहे थे..... उनकी हंसी जल्लादों सी लगती थी।“
”लेकिन सौम्या.... तुम इन जल्लादों को नहीं जानती। ये कोई न कोई उपाय ढूँढ लेंगे।“
”अगर ऐसा होता गौतम तो ये यूँ पसीने नहीं छोड़ रहे होते। सबके बारह बजे हुए हैं। शिव बाबू को देखा। कैसे चेहरे पर हवाईयाँ उड रही हैं।“
”अच्छा! तभी सोचूँ.... ये हमेशा दाँत निपोरने वाला दो दिन से मुँह लटकाकर क्यों घूम रहा है। मैने कल प्रिया पर एक जोक मारा, सभी हंसे, बस वही खोया हुआ था, न जाने कहां। अब समझ में आ रहा है कि माजरा.......”
सौम्या बीच में ही चीख पड़ी “गौतम!!!”
गौतम ने झटके से सौम्या को देखा। वह गौतम के पीछे कुछ देख रही थी और देखते-देखते खड़ी हो गई। गौतम ने पीछे मुड़कर देखा। कुछ न पाकर बोला
”क्या?”
”वो देखो” सौम्या ने ऊंगली उठाई।
गौतम ने देखा कि ऑफिस की बिल्डिंग की एक खिड़की से धुँआ निकल रहा था।
”ओ माई गॉड। यह तो अपना फ्लोर है। वहाँ आग लग गई है।“
सौम्या ने एकदम गंभीर हो कर कहा “वह रिकार्ड रूम है और वहां आग लगी नहीं है.....”
गौतम आधी बात सुनकर बिल्डिंग की ओर लपका। सौम्या ने भी वही रास्ता लिया।
दोनों दौड़ते-भागते ऑफिस पहुँचे।“
ऑफिस में धुआँ भरता जा रहा था। वे रेकॉर्ड रूम की तरफ भागे। मगर एकदम ठिठक गए। सामने धुएँ में से श्रीकांत निकाल कर आ रहा था। धुएँ से निकलता हुआ किसी दैत्य के समान लग रहा था। काला गँठा हुआ शरीर जो धुएँ में ही विलीन सा लगता था और अगर कुछ प्रकट था तो केवल उसके चमकीले दाँत। हाथ में माचिस और केरोसिन का कैन लिए हुए उनकी ओर बढ़ रहा था।
गौतम ने फटी आँखों से श्रीकांत को देखा और सवाल दाग दिया “यह क्या हो रहा है श्रीकांत?”
सौम्या ने उसके उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की क्योंकि अब तक वह समझ गई थी कि आखिर हो क्या रहा है। वो बस बेतहाशा रेकॉर्ड रूम की तरफ दौड़ पड़ी। वहाँ पहुंची जहां लोन की फाइलें रखीं थीं और जैसे दीवारों से कह रही हो “सब जला दी कमीनों ने.....सब स्वाहा हो गईं”। कुछ देर जलती फाइलों को देखती रही फिर मुड़कर वापस ऐसे गौतम के पास आई जैसे उस अग्नि में उसकी सारी ताकत जल गई हो और उसे अब चलने में भी दिक्कत महसूस हो रही हो। गौतम ने भरपूर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा “सुन रही हो सौम्या....इसने सारी लोन की फाइलें जला दीं।“ जवाब में सौम्या भरपूर निराशा से बोली “जानती हूँ......देख कर आ रहीं हूँ।“ आगे जैसे कहना चाहती हो कि तुम्हें कुछ बताने की ज़रूरत नहीं।
गौतम ने श्रीकांत को लाल नेत्रों से देखते हुए कहा “तुम पागल हो श्रीकांत....सोमवार की इंस्पेक्शन के लिए वो फाइलें ज़रूरी थीं।“
“उसको क्यों डांट रहे हो गौतम। उसने यह सब खुद थोड़े न किया है।“
“डाँटूँ नहीं तो और क्या करूँ सौम्या? उसने.......”
“उसे बड़े साहेब ने कहा होगा। क्यों श्रीकांत?”
श्रीकांत ने रिरियाते हुए कहा “और क्या मेमसाहेब....मैं क्या जानता फाइल के बारे में.... मेरे को तो जो जैसा बोलता मैं वैसा करता......जो बोलता फाइल लाके दे तो लाके देता....ले जाके रख बोले तो रखता .......कल बड़ा साहब मेरे को बुलाकर अच्छा से समझा कर बोला ....कपाट नंबर सात का सब फाइल जलाने का है..... तो मैं जलाया।“
“चलो गौतम। घर चलते हैं। कम से कम तुम अपना विकेंड मत बर्बाद करना।“
“क्यों तुम क्या करनेवाली हो इस विकेंड पर जो तुम्हारा बर्बाद हो गया।“
“कुछ नहीं। बस मुझे नींद नहीं आएगी इस विकेंड पर।“ -
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1 comments:

  1. इस कहानी में भारतीय समाज की वास्तविकता झलकती है जहां भ्रष्टाचार जन्मसिद्ध अधिकार बन चुका है।

    और आज के युवाओं के लेखन में सर्वाधिक खलने वाली चीज है अंग्रेजी शब्दोंं का अमर्यादित प्रयोग। लगता है कि उन्हें साफ-सुथरी हिन्दी लिखना ही नहीं आती। अंग्रेजी शब्दों के बिना वे अपने मन्तव्य की अभिव्यक्ति कर ही नहीं सकते। भाषा का दुर्भग्य है यह; अंग्रेजी को लेकर हीन भावना का द्योतक। यही युवा अंग्रेजी लिखते समय एक भी हिन्दी शब्द को अपने लेखन में घुसने नहीं देंगे। तब बे भाषाई शुद्धतावादी बन जायेंगे। क्या विडबना है।

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