रचनाकाररचनाकार परिचय:-

लेखक का नाम---धर्मेन्द्र राजमंगल
जन्मतिथि—28 जून 1993 -जिला हाथरस (उप्र)
भाषा—हिंदी
विधाएँ—कहानी, उपन्यास, कविता
मुख्य कृतियाँ—
प्रकाशित उपन्यास— मंगल बाज़ार (जुलाई 2016) ब्लू रोज पब्लिशर्स-दिल्ली|
कहानी संग्रह—कितनी हैं, मेरी बीस कहानियां, चिल्ड्रन बाबा|
कविता—पापा मुझे पूंछा तो होता, माँ मुझे माफ़ कर दोगी, में आत्महत्या न करता तो क्या करता, हाल चाल, पापा में इतनी भी बुरी नही हूँ, मुझे अकेले छोड़कर, मेरे साथ चल, फटाफट चल पड़, बच्चों बारिश आएगी|
ईमेल—authordharmendrakumar@gmail.com

ये तब की बात है जब में छोटा था| कोई चौदह पंद्रह साल का| हमारे गाँव में एक आदमी रहता था, नाम था विरजपाल| वह बहरा था तो जोर से बोलने पर सुनता था, लोग इसका फायदा उठा उससे मजाक किया करते थे| उसकी पत्नी भी थी, सुन्दरी| नाम बेशक सुन्दरी था लेकिन दिखने में आम महिला थी, शरीर पतला और छोटा कद| लोग उसे पागल समझते थे, कारण था उसकी हरकतें|

थोडा सा भी कोई चिड़ा दे तो गालियाँ देती थी, कुछ भी फेंक कर मार देती| कोई उसके दरवाजे पर पैर फटफटा कर जाता तो अन्दर से कुछ न कुछ आ कर उसके ऊपर पड़ता, चिमटा फूंकनी या चकरा बेलन| जो हाथ में होता वही फेंक कर मार देती थी सुंदरी| इसी कारण लोग उसके दरवाजे पर पैरों की आवाज जरूर करके जाते थे, इस काम में कई लोग चोट भी खा चुके थे|

जब लोग शिकायत करते तो विरजपाल उसको मारता था और वो गालियाँ देती हुई रोती थी| सुन्दरी के कोई बच्चा नही हुआ था| विरजपाल मजदूरी करता था| जब वह मजदूरी को जाता तो सुंदरी हमारे घर आ जाती थी और माँ के पास घंटो बैठी रहती थी, उनके सर में तेल डालती, चावल से कंकड़ निकलवाती|

कभी कभी उसकी बात मुझे बहुत समझदारी भरी लगती थीं| सच बात तो यह थी कि उससे प्यार से बोलने पर वह बहुत खुश रहती थी| जब कोई उसे चिढाता तो गुस्सा करती| उसको एक ही साडी में हमेशा देखा था मैने| सोचता था कैसे रहती होगी एक ही साडी में? उसी को धो लेती फिर उसी को सुखाकर पहन लेती|

मोहल्ले में उसे कोई साडी दे देता तो रख लेती पर पहनती न थी, कहती अपने गाँव जाऊंगी तब पहनूंगी|में उसे चाची कहकर बुलाता था| एक बात और थी कि उसकी उम्र न मालूम पडती थी| मैंने जब से देखा तब से एक ही जैसी लगती थी|

एक दिन की बात थी, में घर के दरवाजे पर बैठा था| मेरे साथ चार पांच लडके और थे, तभी सुंदरी ने मुझे बुलाया| मैं उसके घर गया तो उसने मुझे बताया कि उसके कमरे में भूत है| में भी थोडा डर गया, कमरा अँधेरे में डूबा था जबकि दिन छिपे का समय था| टार्च जलाकर डरते डरते देखा तो कमरे में कुछ नही था|

फिर वह चूल्हे में बनी चिमनी में भूत बताने लगी| मैंने सोचा सुंदरी पागल हो चुकी है, मुझे एक शरारत सूझी| मैंने सुन्दरी से कहा कि चिमनी और चूल्हे को तोड़ डालो भूत अपने आप भाग जायेगा| सुन्दरी ने ऐसा ही किया|

मैं और सारे बच्चे नांच नांच कर चूल्हे को फोडवाते रहे| उसके बाद हम घर चले आये| रात के समय विरजपाल मजदूरी कर लौटा तो उसने देखा कि चूल्हा और चिमनी टूटा पड़ा है| उसका माथा ठनक गया| क्योकि विरजपाल ने दो दिन की दिहाड़ी छोड़ कर चूल्हा और चिमनी को बनाया था, उसने सुन्दरी को बुलाकर पूछा, “ये सब किसने किया सुन्दरी|” सुन्दरी अपने ही अंदाज़ में बोली, “मैंने तोडा, इसमें भूत था तो तोड़ दिया|”

विरजपाल को काफी गुस्सा आया| उसने सुन्दरी को बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया| मोहल्ले की औरतों ने आकर सुन्दरी को बचाया| इसके बाद पंचायत बैठी| पंचायत ने विरजपाल से सख्त हो कहा, “अगर तुम इसे ठीक से नही रख सकते तो इसके घर छोड़ आओ, इस पर आत्याचार क्यों करते हो, कब तक यूं ही पीटते रहोगे बात बात पर|”

विरजपाल सुन्दरी को गाँव छोड़ने के लिए तैयार हो गया| उसने पंचायत से सुबह को सुंदरी उसके गाँव पहुचाने का वादा कर दिया| दरअसल सुन्दरी का गाँव बिहार में था, जिसे विरजपाल उसके घरवालों को पैसा दे कर खरीद लाया था| घर वाले गरीब थे, खाने को घर में था नही तो लडकी की शादी कैसे करते|

उन्होंने विरजपाल से पैसे लेकर सुंदरी को दे दिया| सुंदरी तब काफी छोटी थी और विरजपाल पूरा आदमी| बचपन में माँ बाप का घर छोड़ना और विरजपाल की मार उसे पागल बना गयी| आज सुंदरी को घर जाने की ख़ुशी थी लेकिन वह ये न समझ पा रही थी कि घर जाकर क्या होगा| कहीं दोबारा बेच दी गयी तो! इस बात की उसको चिंता न थी|

विरजपाल दूसरे दिन उसे गाँव छोड़ने चल दिया, सारा गाँव उदास था क्योंकि आज सुन्दरी जा रही थी| पूरे मोहल्ले की रौनक सुंदरी समेट कर ले जा रही थी| आज न तो गाँव का कोई आदमी उसे चिढाता था न सुंदरी गालियाँ दे रही थी| वह तो खुश थी, सब औरतों के पैर छूती हुई चल दी|

हर एक आदमी औरत की आँखे भीगी हुई थी, मझे भी रोना आ रहा था| सोचता था कि न में कल उसका चूल्हा तुडवाता और न सुंदरी गाँव से जाती| फिर सोचा बड़ा होकर सुंदरी के गाँव जाऊँगा तब मिलूंगा उससे, बहुत खुश होगी सुंदरी मुझे मिलकर| अगर कहीं बेचीं न गयी, पैसे लेकर| इतने में सुंदरी आँखों से ओझल हो गयी|
[समाप्त]





3 comments:

  1. सुन्दरी की दास्तां ऑंखें नम कर गई

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी यह रचना http://halchalwith5links.blogspot.com में लिंक की गई है। 8-06-2017 को प्रकाशित होने वाले अंक में आप चर्चा के लिए सादर आमंत्रित हैं ।

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget