देवी नागरानी रचनाकार परिचय:-






देवी नागरानी

480 वेस्ट सर्फ स्ट्रीट, एल्महर्स्ट, IL-60126




बंद दरवाज़ों पर करारी दस्तक
"एक थके हुए सच की गुहार"
सच हमेशा कड़वे होते हैं पर थके हुए भी होते हैं यह पाकिस्तान की सिंधी लेखिका अतिया दाऊद की कविताओं को पढ़ कर ज्ञात हुआ। अपने वजूद का आधार वे सच को मानती हैं। जब लाख चीखने -चिल्लाने के बाद भी सत्य साबित नहीं हो पाता तो वह थक जाता है ,पर सच कितना भी थक जाये वह गुहार लगाना बंद नहीं करेगा। जब भी किसी के हक़ को कुचलने का प्रयत्न किया जाता है तब-तब एक ज्वालामुखी तैयार होता है और जो वक्त आने पर जरूर फटता है। अतिया की इन आवाजों को हम तक देवी नागरानी जी ने बड़े ही परिश्रम से अनुवाद के द्वारा पहुँचाया है। अनुवादक का काम लेखक से किसी भी स्तर में कम नहीं होता। स्त्री विमर्श के नये आयाम प्रस्तुत करने वाली यह पुस्तक साहित्यिक धरातल पर अपना विशेष स्थान रखती है।
पाकिस्तान की कुछ उर्दू लेखिकाओं के अफ़साने और नज्में पढ़ी हैं जिनमें सारा शगुफ्ता ,किश्वर नाहिद ,तहमिना दुर्रानी ,अख्तर जमाल ,जाहिदा हिना ,परवीन शाकिर जैसी कलमकार शामिल हैं। इन्होंने जब लिखा तो वर्षों से तहखानों में बंद औरत के लिये दरीचे खोल दिये, अब तो बाक़ायदा ऐसी राह बना दी गई है कि वह दरवाजे के बाहर निकलकर वह अपनी राह ढूंढ सके, खुद की पहचान बना सके। इसी कड़ी में कराची की सिंधी लेखिका अतिया दाऊद ने औरत को उसका वजूद पहचानने के लिये एक आईना इस किताब के रूप में दिया है। उनके जज़्बात जलते हुए अंगारे है, दहकते हुए शब्दों में वे औरत के हालात बयान करती हैं और इनसे कब तक समझौता किया जाये प्रश्न उठाती हैं। औरत भी इंसान है पर पुरुष ने अपनी मिल्कियत मान उन्हें क्या क्या नाम दे दिया -

तुम इंसान के रूप में मर्द
मैं इंसान के रूप में औरत
'इंसान' अक्षर तो एक है
पर अर्थ तुमने कितने दे डाले
मेरे जिस्म की अलग पहचान के जुर्म में
एक इंसान का नाम छीनकर
और कितने नाम दे डाले
मैं बीवी हूँ, वेश्या हूँ, महबूबा हूँ, रखैल हूँ
तुम्हारे लिये हर रूप में एक नया राज़ हूँ (-9)


जेल की सलाखों पर सर पटक-पटक कर थक जाने के बाद उसे पूरी ताकत से जब तोड़ने का प्रयत्न किया जाता है वही प्रयत्न हमें अतिया की कविताओं में दिखाई देता है। उनकी दृष्टि में प्यार बंधन या गुलामी नहीं बल्कि समानता का नाम है, वे अपने प्रियतम से यही कहते हुए दिखाई देती हैं कि --


मुझसे चाँद के बारे में बात न करो
मेरे महबूब मुझसे वो बातें करो
जो दोस्तों से करते हो !


वे चाहती हैं प्यार फूल और खुश्बू की तरह हो। इस प्यार के लिए औरत तरस जाती है पर उसे नहीं मिलता ,मिलता है तो प्यार के नाम पर बन्दर और मदारी का रिश्ता मिलता है। मर्द का मालिकाना हक़ औरत के लिए उन्हें पसंद नही , औरत कोई सामान नहीं, जीती -जागती इंसान है। सदियों से चली आ रही इस प्रथा के कारण औरत अपनी पहचान खो चुकी है। उसे बचपन से ही कुछ इस प्रकार से सिखाया -समझाया जाता है जिसमें उसका अस्तित्व नगण्य होता है। औरत समाज और मर्द के हाथ की कठपुतली मात्र बनकर रह जाती है -


दुनिया में आँख खोली तो मुझे बताया गया
समाज जंगल है ,घर एक पनाह है
मर्द उसका मालिक है और औरत उनकी किरायेदार
भाड़ा वह वफ़ा की सूरत में अदा करती है (-6)


बरसों से चली आ रही इन परम्पराओं को वे तोड़ना चाहती हैं। अपनी बेटी को वे जो बताती हैं उसके अनुसार वे अगली पीढ़ी से बदलाव की उम्मीद रखती हैं -


अगर तुम्हें 'कारी 'कह कर मार दें
मर जाना ,प्यार जरूर करना
शराफत के शोकेस में
नकाब ओढ़ मत बैठना
प्यार जरूर करना (-1)


इस विद्रोह के साथ उनके भीतर का वजूद जो सच की बुनियाद पर खड़ा है कभी नहीं मरता कितने भी टुकड़े करो, अमीबा की तरह हर टुकड़े में वह धड़कने लगता है। औरत की यही ताकत उसे हारने नहीं देती -


सच मेरी तख़लीक़ की बुनियाद है
उसके नाम पर मेरा वजूद
जितनी बार भी टुकड़े -टुकड़े किया गया है
'अमीबा 'की तरह कटे हुए वजूद का हर हिस्सा
खुद एक वजूद बन गया है (-6)


जिस कोठरी में सोई हुई औरत को बंद किया जाता है और दरवाजे की कुंडी लगा दी जाती है, जागने के बाद उसे अपनी ऊंचाई इतनी ज्यादा बढ़ानी पड़ती है कि वह कुंडी खोल कर बाहर जा सके खुली हवा में साँस ले सके ,देर से ही सही अपने लिए जिये ,ख्वाब बुने, नज्में लिखे, प्यार करे खुद से, जिंदगी से। 


अपने व्यक्तित्व को ऊँचा बनाना औरत के लिए आसान काम नहीं है। सम्पूर्ण शक्ति, साहस बटोरना पड़ता है, चारों तरफ से उस पर प्रहार किये जाते हैं कि वह बौनी ही रह जाये। इन सबका जो औरत सामना कर सकती है वही ऊंचाई पर पहुँच सकती है। औरत की स्वतंत्रता पर कोई खुश नहीं होता। उस पर लांछन लगाये जाते हैं, लोग उसे चरित्रहीन साबित करने पर तुल जाते हैं। 


अतिया दाऊद की यह किताब औरत के जीवन चरित्र की गठरी है जिसे खोलते ही घुटन ,दर्द ,आंसुओं के असबाब बिखर कर गिर जाते हैं इन्हें बटोरकर वे पूरी हिम्मत से वे औरत को एक नया चरित्र देना चाहती हैं क्योंकि इस गठरी के बोझ के साथ उसका जीना दिन ब दिन दूभर होता जा रहा है। 


देवीजी ने औरत के इस दर्द को खुद भी महसूस किया है इसलिये वे सटीक अनुवाद कर सकीं। उनके अनुसार अपने अधिकारों को प्राप्त करना औरत को सीखना पड़ेगा क्योंकि यह कोई भी हमें दे नहीं सकता बल्कि अपनी कोशिशों से प्राप्त करना होगा। आत्मविश्वास ही औरत को अपना मक़ाम दिला सकता है। 


अतिया दाऊद की ये कवितायेँ शांत जल में खलबली मचाने वाली हैं अतः जरुरी है इस संग्रह को अधिक से अधिक लोग पढ़ें। समीक्षक: ज्योति गजभिये 602, श्रीसाईंप्रसाद ,सर्विस रोड, WEH, खैरवाड़ी, बांद्रा(E), मुंबई-400051


पुस्तकः एक थका हुआ सच, लेखिका: अतिया दाऊद, अनुवाद:देवी नागरानी, वर्ष: 2016, मूल्यः 200, पन्नेः 117, प्रकाशकः शिलालेख प्रकाशन, 4/32 सुभाष गली, विश्वास नगर, शहादरा, दिल्ली, 110032







1 comments:

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