कांकेर (व धमतरी) के निकट सिहावा के सुदूर दक्षिण में मेचका (गंधमर्दन) पर्वत को मुचकुन्द ऋषि की तपस्या भूमि माना गया है। मुचकुन्द एक प्रतापी राजा माने गये हैं व उल्लेख मिलता है कि देव-असुर संग्राम में उन्होंने देवताओं की सहायता की। उन्हें समाधि निद्रा का वरदान प्राप्त हो गया अर्थात जो भी समाधि में बाधा पहुँचायेगा वह उनके नेत्रों की अग्नि से भस्म हो जायेगा। मुचकुन्द मेचका पर्वत पर एक गुफा में समाधि निन्द्रा में थे इसी दौरान का काल यवन और कृष्ण का युद्ध चर्चित है। कृष्ण कालयवन को पीठ दिखा कर भाग खड़े होते हैं जो कि उनकी योजना थी। कालयवन से बचने का स्वांग करते हुए वे उसी गुफा में प्रविष्ठ होते हैं तथा मुचकुन्द के उपर अपना पीताम्बर डाल कर छुप जाते हैं। कालयवन पीताम्बर से भ्रमित हो कर तथा कृष्ण समझ कर मुचकुन्द ऋषि के साथ धृष्टता कर बैठता है जिससे उनकी निद्राभंग हो जाती है। कालयवन भस्म हो जाता है। यही नहीं, कृष्ण के साथ बस्तर अंचल से जुड़ी एक अन्य प्रमुख कथा है जिसमें वे स्यमंतक मणि की तलाश में यहाँ आते हैं। ऋक्षराज से युद्ध कर वे न केवल मणि प्राप्त करते हैं अपितु उनकी पुत्री जाम्बवती से विवाह भी करते हैं।

कृष्ण से जुड़ी हुई कहानियों के दृष्टिगत सकलनारायण की गुफायें बहुत महत्व की हो जाती है। प्रकृति की निर्मित यह संरचना अब भगवान कृष्ण का मंदिर सदृश्य है। भोपालपट्टनम से लगभग 12 किलोमीटर दूर पोषणपल्ली की पहाड़ियों में सकलनारायण की गुफा स्थित है। गुफा के अंदर कुछ प्रतिमायें रखी हैं जिनमे विष्णु प्रतिमा के खण्डित अंग तथा उपासक प्रतिमा फलक मौजूद है। मुख्यद्वार से बीस फुट ऊँचाई में लगभग 82 सीढ़ियाँ चढ़ कर उस स्थल तक पहुँचा जा सकता है जहाँ वह प्रतिमा है जिसमें अपनी तर्जनी पर गोवर्धन गिरि उठाये हुए कृष्ण उकेरे गये हैं। इसके सामने ही स्थित चार फुट आयताकार खोह में झुक कर खड़े होना पड़ता है। खोह में गोप गोपियों की अनेक सुन्दर प्रतिमायें हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर सुरंगनुमा खोह का द्वार मिलता है जिसके भीतर कृष्ण रासलीला की अनेक प्रतिमायें हैं। गुफा के अन्दर पानी के प्राकृतिक स्त्रोत हैं। स्थान स्थान पर पानी रिस कर इकठ्ठा होता रहता है। अनेक किंवदंतियाँ हैं जिनमे से एक के अनुसार भगवान कृष्ण के द्वारा यमुना के जिस कालिया नाग को पराजित किया गया था वह पलायन करने के बाद इस गुफा में अवस्थित एक कुण्ड में आ कर रहने लगा। 

- राजीव रंजन प्रसाद
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