सविता मिश्रारचनाकार परिचय:-



सविता मिश्रा o9411418621 w/o देवेन्द्र नाथ मिश्रा (पुलिस निरीक्षक ) फ़्लैट नंबर -३०२ ,हिल हॉउस खंदारी अपार्टमेंट , खंदारी आगरा २८२००२ पिता का नाम ..श्री शेषमणि तिवारी (रिटायर्ड डिप्टी एसपी ) माता का नाम ....स्वर्गीय श्रीमती हीरा देवी (गृहणी ) जन्म तिथि ...१/६/७३ शिक्षा ...बैचलर आफ आर्ट ...(हिंदी ,रजिनिती शास्त्र, इतिहास) अभिरुचि ....शब्दों का जाल बुनना, नयी चीजे सीखना, सपने देखना 'मेरी अनुभूति' परिलेख प्रकाशन से प्रकाशित पहला संयुक्त काव्यसंग्रह 'मुट्ठी भर अक्षर' पहला प्रकाशित साँझा लघुकथा संग्रह | 2012.savita.mishra@gmail.com






"अपने जीवित रहते नाती-पोतों को गोद में खिला लूँ, तो समझो मेरी सारी ख्वाहिशें पूरी हो गयीं| बहू पेट से है | चार महीनें बीतना, भारी पड़ रहा अब तो | बस जल्दी से पोते का मुख देख लूँ | कलेजे को ठंडक मिल जायेगी| है न जी ? " मुक्ता हर्षित होते हुए बोली |

“अरे, सुन रहे हो या मैं ऐसे ही हवा में बकबक किये जा रही हूँ |"
''मैं तो कब का मर चुका हूँ, मुक्ता !"
"यह कैसी बात करते हो जी ! मरे तुम्हारे दुश्मन |"
"सही कह रहा हूँ | जिस दिन मेरे जवान बेटे ने मुझे .........|" कहकर रोशन फफक कर रो पड़े| जैसे सालो का भरा हुआ गुबार आँसुओं के जरिये बहने को बेताब हो|

मुक्ता को भी याद आ गया, घर में आया बरसो पहले का तूफ़ान | जब नशे की आदत हो जाने की वज़ह से उन्होंने बेटे को टोका था |
"हम दोनों की, उसने उस समय रत्ती भर भी इज्ज़त नहीं रखी थी | मुहल्ले में तो चार छः महीने निकले ही न थे।"

" अपना सिक्का तो खोटा था। पर बहू ने उसकी जिन्दगी बना दी | सही कहते है लोग कि लक्ष्मी जैसी बहू आ जाये तो बिखरा घर बस जाता है |" पत्नी ने बहू की तारीफ़ करते हुए कहा।

"......"

"अब तो तुम्हारी भी इज्जत करने लगा है न वह | नौकरी भी ढंग से कर रहा है | देखना पोता या पोती के आते ही तुम भी भूल जाओगे सब। " आँखों के कोरों को पोंछते हुए मुक्ता बोली |
"शायद सही कह रही हो तुम | आदमी अपने जाये से ही तो हारता है, और जीतता भी है |"
"भई मैं तो फूल खिलने की खबर से ही पिछली सारी बदबू को सूंघना छोड़ चुकी हूँ | अब तो खुशबू ही खुशबू महसूस कर रही हूँ | और तुम भी उस गहरे ज़ख्म पर अब मिट्टी डालो।"

बेटा आफिस से आ चुका था, समोसे लेकर माता -पिता को देते हुए साथ ही बैठ गया। वहीं से आवाज़ लगाई- "रीना चाय ले आना।"
उसको इस तरह देखकर पिता के चेहरे से उदासी अब हवा हो चुकी थी।

1 comments:

  1. सविता मिश्रा जी आपकी लघु कथा बहुत वास्तविकता से भरी हैं.

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