देवी नागरानी रचनाकार परिचय:-






देवी नागरानी

480 वेस्ट सर्फ स्ट्रीट, एल्महर्स्ट, IL-60126




मानव मन की दशा और दिशा (संस्मरण)

 
ख़त आया, कुछ लिख भेजिये, अपने आस पास के अनुभव, उन सरोकारों से जुड़े हुए संघर्ष या मनोभावों से गूँथी हुई कोई गाथा -संपादक !

सोच में पड़ गई कि क्या लिखूँ, अपने तजुर्बों की पोटली खोलूँ या जो मेरे सामने परोसा जा रहा है, उसे ही कथा-व्यथा की नाम कुछ लिखूँ दूँ । पर जो मन के तहलके ने बवंडर मचा रहता है उसे शब्दों में लिख पाना मुश्किल है। शब्द भी भावनाओं को ज़ुबान देते हुए कहाँ इन्साफ करते है....
 

आंसुओं की कहकशां पर नाचती मुस्कान है 
दीदनी है ये नज़ारा, क्या खुदा की शान है। 

काँच का मेरा भी घर है पत्थरों के शहर में 

उस पे आंच आए न कोई, उसका अब भगवान है! 

 दिल की गहराइयों से निकली ध्वनि प्रतिधविनित होकर मानवता के दरवाज़े पर दस्तक देती रही, चीखती-चिल्लाती है, कि आओ शब्दों का शोध करें, उनके नए अर्थ ढूंढें जो अनर्थों को राह दिखा सकें। पर कौन कहे, कौन सुने, गूँगों की नगरी में सुनने को बहरे बचे है! 

 चश्मदीद गवाह बनकर 2008 में मुंबई महानगरी में ‘ताज’ की शान में जो गुस्ताखियाँ देखीं, वे आज तक कहाँ भूल पाए हैं? मानवता की धज्जियां उड़ाई गईं, आदमी-आदमी को छलता रहा, और इन्सानियत को नारों में खूब उछाल उछाल कर प्रदर्शित किया गया। बीता हुआ वह कल, वर्तमान के दौर में जैसे अतीत बन गया है। शायद उनकी स्थान पर नए हादसों की सुर्खियां स्थान पा जाती हैं। उस ज़िलज़िलों को, उन धमाकेदार विस्फोटों की आवाज़ें को एक अनसुनी दास्तान के अध्याय में दर्ज कर दिया जाता है। क़यामत की बुलंदियों अभी और बाक़ी हैं....! पर कौन सुनता है दर्द की चीखें? बहरी सियासत के ठेकेदार अपने ज़मीरों के सिरहाने उन चीख़ों को दबाकर सोते हैं! 

गुल फ़रोशों के हवाले है वतन 

लुट न जाए उनके हाथों ये वतन। 

 बुज़दिली की चरम सीमा भी कैसी? आदमी-आदमी से छल करता है, वार करता है। वहशियत का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है? मैं, मेरा, तू, तेरा, इस दृष्टिकोण की परीधियों से बाहर झाँकते हुए लगता है-यहाँ तो किसी का कुछ भी नहीं है ! धर्म के नाम पर अधर्म का आश्रय लेना बहदुरी तो नहीं ? अपने स्वार्थी हित के लिए जन का अहित करना, पुरुषार्थ तो नहीं? एक तरह से हम खुद अपना घात होते हुए देखते जा रहे हैं, अपने अंदर की मानवता को ज़ख़्मी, लहूलुहान व अपंग बनाए रखने के जिम्मेदार कहीं न कहीं हम खुद ही हैं। सभी राहतों के मुंतज़िर हैं, पर जाने अनजाने में अपना नुक़सान अपनी ही क़ीमत पर किए जा रहे हैं। एक ने दूजे से पूछा- “कहाँ तक पढ़े हो भाई?” जवाब मिला “बी ए”। पहले ने कहा –“अरे भाई दो अक्षर सीख आए वो भी उल्टे! ए॰ बी के बजाय बी॰ ए..... वाह! हमारे ज्ञान को प्रमाणित करने के लिए कौन सी कसौटी की दरकार है? विपरीत दिशा की सोच लेकर एक तोड़ने के लिए साधन तैयार करता है, और जिस ताक़त को, जिस शक्ती को जोड़ने के प्रयास में इस्तेमाल करना चाहिए वह विपरीत दिशा में हुई जाती है। इस अज्ञान के अंधेरे से रोशनी की किरण कैसे हासिल हो? जो सोया है उसे जगाया जा सकता है, पर जो जागते में भी बेहोशी के आलम में हो, उसका क्या किया जा सकता है? 

 इस धुंध के उस पार जाने की सुरंग कौन खोदेगा? जहां बिना किसी मानसिक तनाव के, यातना के, आज का इंसान हवाओं से ताज़गी फेफड़ों में ले सके, बिना किसी भय के, बिना किसी बेबसी के पुरसुकून ज़िंदगी गुज़र बसर कर पाये! 

 इस सुंदर संसार में हम गुलशन की सैर करके सुमन की रंगो-बू को साँसों में लेने की बजाय बारूद के धमाकों से उगला हुआ धुआँ ग्रहण कर रहे हैं। अहित किसका? हमारा, और हमारी आने वाली पीढ़ी का ! नव पीढ़ी के निर्माण के लिए इस नींव को रखने का जवाबदार कौन? ज्ञान-अज्ञान का द्वंद्व है, कमज़ोर बलवान की मुठभेड़ है, सोचों का तकरार-अहिंसा भरे वायुमंडल को हिंसा की घातक स्थिति में परिवर्तित कर देता है, यही मानवता की जड़ों को झकझोरने के लिए बहुत है। 

 बस यही आभास दिल को, आँख को नम कर जाता है कि जहां बचपन खिलौनों में बीत जाया करता था, वहाँ अब मासूमियत कैसे खिलौने हथियाए हुए हैं। 

ये कैसा काफ़िला है कि बढ़ते गए हैं ग़म 
 माज़ी की याद आई तो आँखें हुई हैं नाम.... जयहिंद






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