रचनाकाररचनाकार परिचय:-

शबनम शर्मा
अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. – 173021 मोब. - 09816838909, 09638569237


पिछले माह मुझे मिसेज गुरुंग के घर जाने का मौका मिला। रात गहरा गई थी। मौसम भी बहुत अच्छा था। सर्दी के साथ-साथ अच्छा खाना, सूखे मेवे व गरमा-गरम चाय-काॅफी ने समय बांध दिया था। हम दोनों ड्राईंग रूम में बैठे बतिया ही रहे थे कि उनकी दोनों लड़कियाँ अपने बच्चों के साथ घर में आ गईं। आते ही पर्स इधर फेंका, शाल कुर्सी के कोने पर टंगा दी और जूते अस्त-व्यस्त रख दिये, बच्चों ने अपना पूरा धमाल शुरु कर दिया। घर का माहौल क्षण भर में ही बदल गया। बच्चे रसोई की तरफ दौड़े, बोलते हुए, ‘‘मामी जी भूख लगी है कुछ खाने को दो।’’ लड़कियाँ भी आवाजें लगाने लगी, ‘‘अरे, भाभी एक-एक कप चाय, पकौड़े हो जायें।’’ बेचारी भाभी ‘‘हां जी’’ बोलकर रसोई की तरफ भागी। आध घंटे में सबकी फरमाइशें पूरी करके दस व्यक्तियों के खाने की तैयारी करने लगी। पता चला उसे चैथा महीना चल रहा है, पर किसी को भी परवाह नहीं। मुझसे रहा न गया। पूछ ही बैठी, ‘‘मिसेज गुरुंग आपने लड़कियों की शादी लोकल की और ये जब-तब आएँ तो इससे काम नहीं बढ़ जाता, देखो दोनों जब से आई हैं, एक फोन पर, दूसरी टी.वी. के आगे और बच्चे धमाल किये हुए हैं, इससे बहू-बेटे के जीवन पर क्या असर पड़ेगा।’’ उन्हें मेरी बात ज़रा न भाई। तपाक से बोलीं, ‘‘मिसेज शर्मा, दोनों कमाती हैं, हर माह मेरे हाथ पर अच्छे पैसे रखती हैं। आखिर इन्हें पाला, पढ़ाया-लिखाया। शादी करके बेचा तो नहीं, इनका घर है जब चाहें आएँ-जाएँ, ससुराल में तो खटती ही है, यहाँ भी काम करें तो मायका क्या?’’ मैंने पूछा, ‘‘फिर इनके घर पर कौन देखभाल करता है?’’ वह नाक-भौं तरेरकर बोली, ‘‘इनकी माऐं यानि सासें और ननदें।’’ मैं हैरान थी ये सब देख-सुनकर कि मेरी नजर उनकी बहू पर पड़ी जो 1-1) किलो आटा गूंथ रही थी। मुझे उसकी तरफ देखते ही मिसेज गुरुंग बोली, ‘‘गरीब घर की है, बाप भी नहीं, माँ है भाई के साथ रहती है। जान-बूझकर लाये इसे, घर का काम तो करे और दो रोटी खाती रहे व पड़ी रहे।’’ मेरे लिये अब रुकना मुहाल हो गया इस फितरती माहौल में। मैं उठी और भारी कदमों से घर वापिस आ गई।






2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’गणेश चतुर्थी और ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  2. वास्तविकता से भरी लघु कथा, अपनी बेटी का दुःख देखा नहीं जाता लेकिन यह नहीं सोचते की कही हम अपनी बहु के साथ उसी तरह का व्यवहार तो नहीं कर रहे.

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