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सरहद पर जैसे ही किसी के आने की सुगबुगाहट हुई। अँधाधुंध गोलियां चल पड़ीं। घुसपैठ करती मानव आकृति कुछ क्षण के लिए तड्पी और वहीँ गिर पड़ी।




 महावीर उत्तरांचली रचनाकार परिचय:-



१. पूरा नाम : महावीर उत्तरांचली
२. उपनाम : "उत्तरांचली"
३. २४ जुलाई १९७१
४. जन्मस्थान : दिल्ली
५. (1.) आग का दरिया (ग़ज़ल संग्रह, २००९) अमृत प्रकाशन से। (2.) तीन पीढ़ियां : तीन कथाकार (कथा संग्रह में प्रेमचंद, मोहन राकेश और महावीर उत्तरांचली की ४ — ४ कहानियां; संपादक : सुरंजन, २००७) मगध प्रकाशन से। (3.) आग यह बदलाव की (ग़ज़ल संग्रह, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से। (4.) मन में नाचे मोर है (जनक छंद, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से।

"वो मार गिराया साले को ..." वातावरण में हर्षो-उल्लास के साथ स्वर उभरा। दोनों सिपाहियों ने अपनी-अपनी स्टेनगन का मुहाना चूमा।

"ज़रा पास चलकर देखें तो घुसपैठिये के पास क्या-क्या था?" एक सिपाही बोला।

"अरे कोई ग्रामीण जान पड़ता है बेचारा! शायद भूले-भटके से सरहद पर आ गया।" तलाशी लेते वक़्त मृतक के पास से सिवाय एक ख़त के कुछ न निकला तो दूसरा सिपाही अनायास ही बोला।

"ख़त मुझे दो, मै उर्दू पढना जानता हूँ।" पहले सिपाही ने ख़त हाथ में लिया और ऊँचे सुर में पढने लगा--

"प्यारे अब्बू,

बी० ए०/ एम० ए० करने के बाद भी जब कहीं ढंग की नौकरी नहीं मिली और जिम्मेदारियां उठाते-उठत मेरे कंधे टूट गए, लेकिन दुनिया जहान के ताने कम नहीं हुए तो आसान मौत मरने के लिए सरहद पर चला आया हूँ। मै इतना बुजदिल हूँ चाहकर भी खुदकुशी न कर सका ... पर घुसपैठ करते वक़्त यक़ीनन हिन्दोस्तानी सिपाही मुझे ज़रूर जिंदगी की कैद से आज़ाद कर देंगे। ऊपर जाकर खुद से पूछूँगा तूने हमें इंसान बनाया था तो ढंग की जिंदगी भी तो देता। मुझे माफ़ करना अब्बू तुम्हारे बूढ़े कन्धों पर अपने परिवार का बोझ भी डाले जा रहा हूँ।

तुम्हारा अभागा / निकम्मा बेटा
रहमत अली

तभी दोनों सिपाहियों ने देखा परिंदों का एक समूह पकिस्तान से उड़ता हुआ आसानी से हिन्दोस्तान की सरहद में दाखिल हो गया और उन्हें किसी ने भी नहीं रोका।

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