रचनाकार परिचय:-

रामजी मिश्र 'मित्र'
E mail- ramji3789@gmail.com

जरा सा रुकना बेटे यह कह कर माँ गोरोचन करने दौड़ पड़ी। बहू की नाक भौह सिकुड़ गई वह सासू जी के नाटक को जरा भी पसंद नहीं करती थी। माँ कहती ही रह गई लाओ अपने लाल को जी भर के देख तो लूँ कम से कम। बूढ़ा बाप पोते को गोदी मे लेकर अब तक दुलरा रहा था। थोड़ी ही देर मे बहू ओर बेटे पोते के साथ शहर को निकल गए। एक माँ के लिए उसकी बगिया सूनी सी लग रही थी। अब वह उन चेजों को देख रही थी जिनको उसका बेटा प्रयोग करता था। वह पूरे घर मे भाग भाग कर अपने दुख से जूझ रही थी। माँ और बाप को साथ न ले जाने के कई सारे ठोस कारण पहले से बहू ओर बेटे के पास मौजूद थे। समय गुजरता गया यदा कदा माँ का फोन आ जाता तो बेटा समयाभाव के कारण अधिक बात नहीं कर पाता बहू भी कह देती माँ के पास काम न धाम। समय गुजरता गया एक दिन बुढ़िया बूढ़े के साथ घर की सफाई मे जुटी थी तभी बेटे की रखी साइकिल पर उसकी निगाह गई वह बोली देखो जब अपना टुन्नो छोटा था तो इसे चलाता था। बूढ़ा बोला हम्म.... शायद तभी तुमने इसे देखकर रोने के लिए कबाड़ मे बेचने नहीं दिया। बुढ़िया सच मे रोने लगी थी। एक दिन बुढ़िया को सीने मे तकलीफ हो रही थी। रात के ग्यारह बज रहे थे, बुढ़िया बेटे को बुलाने की जिद कर रही थी। बूढ़ा बार बार फोन करता रहा लेकिन बेटे का फोन आखिर बिना बात सुने स्विच आफ हो चुका था। सुबह के चार बज रहे थे बुढ़िया ने कहा बूढ़े मेरे पास आ जाओ यह सुनकर बूढ़ा वहाँ जाकर उसके सर पर हांथ फेरने लगा। वह बोली मैंने बेटे को कभी गीले मे सोने नहीं दिया आज भी मुझे उसके सुख दुख की चिंता है। बूढ़े भले ही उसने मुझे रोटी न दी हो पर वह मुझे अग्नि देने वो आएगा न। यह कहकर वह अचानक चीखी बूढ़े....... । बूढ़ा उसके शांत शरीर पर हांथ फेर रहा था।



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