रचनाकार परिचय:-

पंकज “प्रखर ”
कोटा (राजस्थान)
pankajprakhar984@gmail.com
मानवीय तपस्या की साकार प्रतिमा है “नारी” (नवरात्रि विशेष लेख )
पंकज "प्रखर"
कोटा राज.




नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नभ पग तल में।
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में॥

प्राचीन समय से स्त्रियों के नाम के साथ देवी शब्द का प्रयोग होता चला आ रहा है जैसे लक्ष्मी देवी, सरस्वती देवी, दुर्गा देवी आदि नारी के साथ जुड़ने वाले इस शब्द का प्रयोग आकस्मिक रूप में नही हुआ है अपितु ये नारी की दीर्घकालीन तपस्या का ही फल है | वास्तव में पुरुष में ऊर्जा का संचार करने वाली पथप्रदर्शिका को देवी कहा जाता है| आज की नारी भी अपने अंदर वो अतीत के देवीय गुण संजोय हुए है जिन्होंने समाज के समग्र विकास में योगदान दिया है |

कहा जाता है पुरुष के जीवन में माँ के बाद नारी का दूसरा महत्वपूर्ण किरदार पत्नी का होता है| उसके इस रूप को सबसे विश्वास पात्र मित्र की संज्ञा दी जाती है| जीवन के कठिन क्षणों में जब सब नाते रिश्तेदार हमसे किनारा कर लेते है हमे अकेला छोड़ देते है धन संपत्ति का विनाश हो चूका होता है शरीर को रोगों ने जकड़ लिया होता है हम मानसिक अवसाद से ग्रस्त होते है, उपेक्षा जनित एक प्रकार की खीज और चिढ़चिढ़ापन हमारे अंदर आ गया होता है| उस स्थिति में केवल पत्नी ही होती है जो पुरुष को हिम्मत देती है| उससे कुछ और करते ना बन पढ़े तो भी वो कम से कम पुरुष के मनोबल को बढ़ाने उसे हिम्मत देकर उसमे आशा को जगाए रखने का काम तो करती ही है | वो पुरुष को पीयूष रुपी स्नेह से धैर्य बंधाती है उसके आत्मबल को जागृत कर उसके टूटे स्वाभिमान को समेटकर उसे इस लायक बना देती है की वो समाज की चुनौतियों को न केवल स्वीकार करता है अपितु सफल भी होता है|
यदि नारी न होती तो कहाँ से इस सृष्टि का सम्पादन होता और कहाँ से समाज तथा राष्ट्रों की रचना होती! यदि माँ दुर्गा न होती तो वो कौन सी शक्ति होती जो संसार में अनीति एवं अत्याचार मिटाने के लिये चंड-मुंड, शुम्भ-निशुम्भ का संहार करती । यदि नारी न होती तो बड़े-बड़े वैज्ञानिक, प्रचण्ड पंडित, अप्रतिम साहित्यकार, दार्शनिक, मनीषी तथा महात्मा एवं महापुरुष किस की गोद में खेल-खेलकर धरती पर पदार्पण करते।यहाँ तक की राम और कृष्ण धरती पर कैसे उतरते मानव मूल्यों और धर्म की स्थापना कैसे होती | नारी व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की जननी ही नहीं वह जगज्जननी हैं उसका समुचित सम्मान न करना, अपराध है तथा अमनुष्यता है।

प्राचीन काल से ही नारी में लेने का नही अपितु देने का ही भाव रहा है नारी में दया, क्षम, करुना, सहयोग, उदारता, ममता जैसे भाव भरे रहते है ये दैवीय गुण उसे जन्म से ईश्वर द्वारा प्रदत्त किये जाते है| नारी के ये गुण उसे पुरुष से श्रेष्ठ सिद्ध करते है यदि नारी को श्रद्धासिक्त सद्भावना से सींचा जाए तो ये नारी शक्ति सम्पूर्ण विश्व के कण-कण को स्वर्गीय परिस्थितियों से ओत-प्रोत कर सकती है | उस देवस्वरूप नारी शक्ति को शत शत नमन..........










0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget