रचनाकार परिचय:-

पंकज “प्रखर ”
कोटा (राजस्थान)
pankajprakhar984@gmail.com
पैसा बहुत कुछ है लेकिन सब कुछ नही
पंकज "प्रखर"
कोटा राज.



वर्तमान मनुष्य पैसे के लिए पागल हुआ घूम रहा है| जिसे देखो अधिक से अधिक पैसा कमाकर अमीर बनने और अपने जीवन को अधिक सुविधायुक्त बनाने की धमाल चौकड़ी में लगा हुआ है | ये प्रवृत्ति आज के युवाओं की मानसिकता का एक हिस्सा है और हो भी क्यों न क्योंकि हम उन्हें बचपन से ही ये सिखाते है बेटा अच्छा पड़ेगा तो अच्छी नौकरी लगेगी ,अच्छी नौकरी लगेगी तो अच्छा पैसा मिलेगा, अच्छा पैसा मिलेगा तो जीवन में अच्छी सुविधाएं आएँगी, बस फिर तो लाइफ सेट है| ये पाठ आज के हर माता पिता अपने बच्चे को पढ़ाने में लगे है | माता-पिता वो सब काम अपने बच्चों से करवाना चाहते है जिन्हें करने में वे स्वयं असफल रहे है | महाभारत की एक घटना याद आती है |एक दिन धृतराष्ट बहुत दुखी बैठा था क्योंकि दुर्योधन ने भरी सभा में साफ़ कह दिया था की वो सुई की नोक के बराबर की भूमि भी पांडवों को नही देगा तब विदुर ने धृतराष्ट से पूछा भैया पांडव और कौरव एक ही वंश के है ,उनके गुरु भी एक ही है जिनसे उन्होंने शिक्षा पायी है और हम भरतवंशियों ने उनमे बिना भेदभाव किये दोनो को ही समान स्नेह और प्रेम दिया है फिर भी पांडव इतने विनम्र और सदाचारी जबकि दुर्योधन इतना अहंकारी और क्रोधी है| ऐसा क्यों है तब धृतराष्ट ने जो उत्तर दिया वास्तव में वो बहुत महत्वपूर्ण है |उसने कहा दुर्योधन मेरी महत्वाकांक्षाओं का प्रतिबिम्ब है जो मैं अपने जीवन में हांसिल नही कर पाया वो मै हमेशा दुर्योधन से प्राप्त करवाना चाहता था |मैंने उसे अपनी अपूर्ण महत्वाकांक्षाओं का विष पिला–पिला कर पाला है | आज के माता-पिता की स्थिति भी ये ही है |

मनुष्य धन संगृह के लिए रोज़ नई-नई तिकड़म लगाता रहता है| जिसमे उसके जीवन का एक बढ़ा भाग खो जाता है| पैसे के लिए वो अपने परिवार और रिश्तेदारों से कटता चला जाता है| उसे मालुम ही नही पढता की समय कैसे निकल गया जब उसे होश आता है तब तक उसके अपने उसके लिए अपनापन खो चुके होते है |
इसका मतलब ये बिलकुल भी नही है की पैसे का संगृह नही किया जाए| पैसे का संगृह किया जाना चाहिए लेकिन ज़रुरत से ज्यादा किसी भी वस्तु का संगृह दुखदायी ही होता है|
एक समय था जब एक कमाता था और दस खाते थे मोटा कपड़ा पहनते थे और सब बड़े ही प्रेमभाव से जीवन जीते थे| हाँ घर में सुविधाओं की वस्तुं का आभाव था | लेकिन मानसिक शांति थी छिनझपट जैसी मानसिकता के कुछ ही उदाहरण मिलते थे| पिता के बाद परिवार में बढ़े भाई को बाप के समान दर्जा दिया जाता था और भाभी मां की भूमिका अदा करती थी| मां भूखी सो जाती थी लेकिन अपने बच्चों को रोटी खिलाती थी| विपत्ति के समय में पिता बेटे के कंधे पर हाथ रखता और कहता की सब ठीक जो जायेगा लोग एक दुसरे से जुढ़े हुए थे| हाँ पैसा तो इतना नही होता था लेकिन जीवन आसानी से एवं शांति से बसर हो जाता था | पैसे से ही परिवार और व्यक्ति सुखी हो सकता है यह सत्य नही है | इस संसार में ऐसे अनेक मनुष्य थे जिनकी जेब में एक पैसा नहीं था या कहें जिनकी जेब ही नहीं थी, फिर भी वे धनवान थे और इतने बड़े धनवान कि उनकी समता दूसरा कोई नहीं कर सकता। वैसे भी जिसका शरीर स्वस्थ है, हृदय उदार है और मन पवित्र है, यथार्थ में वही बड़ा धनवान है। स्वस्थ शरीर चाँदी से कीमती है, उदार हृदय सोने से मूल्यवान है और पवित्र मन की कीमत रत्नों से अधिक है।

जिसके पास पैसा नहीं, वह गरीब कहा जायगा, परन्तु जिसके पास केवल पैसा है, वह उससे भी अधिक कंगाल है। क्या आप सद्बुद्धि और सद्गुण को धन नहीं मानते? अष्टावक्र आठ जगह से टेड़े थे और गरीब थे, पर जब जनक की सभा में जाकर अपने गुणों का परिचय दिया तो राजा उनका शिष्य हो गया। द्रोणाचार्य जब धृतराष्ट्र के राज दरबार में पहुँचे, तो उनके शरीर पर कपड़े भी न थे, पर उनके गुणों ने उन्हें राजकुमारों के गुरु का सम्मान पूर्ण पद दिलाया। हम कह सकते है कि यदि व्यक्ति पैसे कि हाय को छोड़कर अपने जीवन को सादगी एवं सरलता से जीये तो वो जीवन को मानसिक शांति के साथ ढंग से जी सकता है जिसका आज चहुंओर आभाव दिखाई देता है सारे मत पंथ, धर्म शास्त्र ये कहते नही थकते की जीवन में कितना भी धन, सम्पत्ति, पुत्र, परिवार इकट्ठा कर लो लेकिन एक दिन खाली हाथ ही जाना पढ़ता है तो क्यों न मैं धन संगृह की बेकार मजदूरी से दूर होकर ऐसा काम करूं जिसका फल और यश में अपने साथ ले जा सकूं | एक बार सोचियेगा ज़रूर............................







2 comments:

  1. बात सच है लेकिन हर किसी को स्वीकार्य नहीं।
    हर युग की अपनी कुछ खासियतें होती हैं। भारत में वह भी एक काल आया था जब जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति जीवन का असल उद्देश्य माना जाता था। किसी काल में धर्म अर्थात् समाज एवं अन्य प्राणियों के प्रति कर्तव्य माने रखते थे। लोग स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य की बातों में विश्वास करते थे। चरित्र एवं विद्वता सम्मान के आधार होते थे। इत्यादि। शनैः-शनैः दृष्टि में बदलाव होते-होते आज भौतिक सुख एवं उसके लिए अपार संपदा ही अहम हो चुके हैं। धर्म-कर्म की बातें सतही हो चुकी हैं, व्यक्तिगत जीवन के अंग नहीं रह गए हैं। यह सब हर कोई जानता है। किंतु जैसे नशे का आदी व्यक्ति नशा नहीं छोड़ सकता वैसे ही भौतिक धन-संपदा का आकर्षण कोई नहीं छोड़ पा रहा है।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’सादगी और त्याग की प्रतिमूर्ति राजमाता : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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