रचनाकार परिचय:-

नाम : डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना
शिक्षा : एम.ए. (त्रय), पीएच -डी (हिंदी)
निवास : "कव्यांगन", पुरानी गुदरी, महाबीर चौक
बेतिया, पश्चिमी चंपारण, बिहार - 845438
जन्म तिथि : 01 फ़रवरी, 1954
सम्प्रति : सेवानिवृत प्राध्यापक( हिंदी) राज इंटर कॉलेज , बेतिया
ई मेल- mastanagorakh@gmail.com

एक आग का दरिया
प्रचंड ज्वाला / विकराल व्याल
मैं जान कर, अनजान हूँ
उतार नहीं पाया इस चादर को
असित / भयानक
अमावस की रात में लिपटा
किसी जल्लाद के वस्त्र की भांति
यह लबादा
जिसके तार बने हैं शोषण के
किनारे बाने हैं प्रताड़ना के
और झालर बानी हैं अनय की
वो तनी है अत्याचारी बादलों की तरह
जिसे यह ढकेगी
वह पनपेगा कहाँ ?
साँस भी नहीं ले पाएगा
छटपटाएगा / हकलायेगा
और पैर पैर पटक पटक कर
मर जाएगा
कुरथ को चला रहा हैं
इसकी परम्परा ही रही है
कंसीय/ रावणवंशी
और कलयुगी परिधान में
यह और दर्पित है
यह बटवृक्ष नहीं विष वृक्ष है
पर इसे काटे कौन
सब हैं मौन
तब तो पनपेगा ही
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