रचनाकार परिचय:-


डॉ. सूर्यकांत मिश्रा
जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
मो. नंबर 94255-59291
email- sk201642@gmail.com


जन्मशताब्दी वर्ष (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी छोटेलाल तिवारी) आजादी की अलख जगाकर अमर हो गये छोटे लाल तिवारी

 
 


स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में राजनांदगांव के परवानों का नाम भी वरीयता क्रम में प्राप्त हो रहा है। जिला मुख्यालय के सम्मानित तिवारी परिवार में जन्में ऐसे ही बिरले आजादी के दीवाने छोटेलाल तिवारी ने शिक्षा की ओर विशेष झुकाव को भी स्वतंत्रता आंदोलन में आहूति के रूप में झोक दिया। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित श्री तिवारी ने उच्च शिक्षा से पूर्व भारत मां के चरणों पर शीश झुकाते हुए उन्हें जंजीरों से मुक्त कराने के लिए किये जा रहे संघर्ष में योगदान करना ज्यादा जरूरी समझा। अंग्रेजों की यातनाएं और भारतवासियों का दर्द महसूस करते हुए ही श्री तिवारी जी ने उक्त अहम निर्णय लिया और स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी दिशा निर्देशकों के मार्गदर्शन में अपनी भूमिका के निर्वहन की मशाल प्रज्ज्वलित कर दिखाई। सन 1917 में जन्में श्री तिवारी ने महज 26 वर्ष की उम्र में इस दुनिया से विदा ले ली, किंतु अल्पायु में उन्होंने भारत माता की सेवा करते हुए तिवारी परिवार का नाम गौरवान्वित कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में अपना नाम स्वर्णांकित करा लिया।
देश को अंगे्रजों की गुलामी से आजाद कराने की जिद ठानने वाले छोटे लाल तिवारी का जन्म रामशंकर तिवारी के परिवार में हुआ था। उन्होंने इस दुनिया में पहली किलकारी के साथ जिला मुख्यालय राजनांदगांव से महज 13 किमी दूर दुर्ग रोड पर स्थित ग्राम सोमनी में खुशियां की सौगात तिवारी परिवार को दी। उस वक्त यह क्षेत्र दुर्ग जिला के अधीन था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सोमनी में ही पूर्ण की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें स्टेट हाई स्कूल आना पड़ा। जहां उन्होंने अपनी हाई स्कूल की शिक्षा पूरी की। अपनी प्रारंभिक चरण की हाई स्कूल शिक्षा पूरी करने के बाद इंटर मिडियेट और स्नातक स्तर की शिक्षा के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश के कानपुर जाना पड़ा। कानपुर के प्रतिष्ठित एवं नामी डीएवी कालेज में उनका दाखिला कराया गया। कहीं न कहीं बालपन से ही अंग्रेजों की रीति नीति से उद्वेलित श्री तिवारी ने स्नातक स्तर के अंतिम वर्ष की पढ़ाई पूरी करने से पूर्व ही स्वतंत्रता संग्राम का रास्ता अपना लिया और सतत प्रक्रिया में सक्रिय होकर भाग लेने लगे। परिणाम यह हुआ कि वे विधि की पढ़ाई कर वकालत के पेशे को अपनाने का अपना और परिवार का सपना पूरा न कर सके। उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर शिक्षा को ताक पर रख दिया और अपने मिशन में जुट गये।
स्वतंत्रता की जंग में कूद पडऩे वाले छोटेलाल तिवारी की देशभक्ति और इस क्षेत्र में लगन को देखते हुए उन्हें बड़ी जवाबदारी दी गई तथा दुर्ग जिला कांग्रेस कमेटी का महामंत्री बना दिया गया। अब उन्होंने कांग्रेस के बैनर तले स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों को अंजाम देना शुरू कर दिया था। दुर्ग के वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी वीवाय तामस्कर, अधिवक्ता रत्नाकर झा, अधिवक्ता मोहन लाल बाकलीवाल तथा श्री देशमुख के दिशा निर्देशों पर चलते हुए श्री तिवारी ने स्वतंत्रता आंदोलन में यादगार भूमिका का निर्वहन किया। उस समय के मजदूर नेता श्री रूईकर छोटे लाल तिवारी के कार्यों को काफी प्रभावित थे। श्री रूईकर जब भी इस क्षेत्र में आते तो श्री तिवारी से आंदोलन की रणनीति पर चर्चा जरूर करते थे। यूं तो स्वतंत्रता संग्राम में सैकड़ों लोगों ने अपनी भूमिका निभाई है, किंतु श्री तिवारी ने उस उम्र में अंग्रेज शासन की खिलाफत शुरू की जिस उम्र में बच्चे अपने माता पिता की ऊंगली थामकर भीड़ में चलने का अभ्यास करते है। महज 26 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस लेने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने न केवल अपना योगदान किया बल्कि अपनी समझ बुझ से और लोगों को भी देश प्रेम की भावना से जोडऩे का सार्थक प्रयास सफलता के आयाम तक पहुंचकर तिवारी परिवार का नाम रोशन कर दिखाया।
अंग्रेजों की प्रताडऩा के आगे सिर न झुकाने वाले छोटेलाल तिवारी ने विरोध की जिस मशाल को प्रज्ज्वलित किया, वह अनवरत अपना प्रकाश फैलाते हुए अंजाम तक पहुंचने प्रकाशित रही। क्षेत्र के किसानों को स्वतंत्रता के लिए जागृत करने वाले छोटेलाल तिवारी की सक्रियता से परेशान हो उठी अंग्रेजी हुकुमत ने 1936-37 में आखिरकर उन्हें न्यायालय में ला खड़ा किया। बालोद न्यायालय के अंग्रेज न्यायाधीश ने श्री तिवारी को उनकी विरोधी गतिविधि के एवज में न्यायालय उठने तक की सजा दी। इस समय छोटे लाल तिवारी की मात्र 18-19 थी। इस सजा के बाद 1942-43 में पुन: बालोद तहसील के अनेक गांवों में किसान आंदोलन को संचालित करने की जवाबदारी दुर्ग जिला कांग्रेस ने छोटेलाल तिवारी को सौंपी। उन्होंने अपनी इस जवाबदारी को भी बखुबी निभाया और किसानों को एक बड़ी ताकत के रूप में खड़ा कर दिखाया। 'राजनांदगांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानीÓ नामक पुस्तक, जिसे नगर के वरिष्ठ साहित्यकार रमेश याज्ञिक ने लिखा था, के पन्नों को पलटने से जानकारी मिलती है कि छोटेलाल तिवारी का नाम भर छोटे था, उनके काम करने के तरीकों ने उन्हें बड़ों से भी बड़ा बना दिया था।
गांधी जी ने की एकांत में चर्चा
राजनांदगांव शहर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी छोटेलाल तिवारी की अंग्रेजों की खिलाफत की मुहिम चर्चा कर विषय बन जाया करती थी। श्री तिवारी शुरू से ही महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे। देश के अलग अलग क्षेत्रों में भड़की स्वतंत्रता की आग और उसे अंग्रेजों के शरीर तक पहुंचाने वाले सेनानियों की क्रियाशीलता की जानकारी वरिष्ठों तक पहुंचा करती थी। श्री तिवारी के योगदान भी इससे अछुते नहीं रहे और इस बात की खबर महात्मा गांधी तक जा पहुंची। यही कारण था कि श्री गांधी छोटेलाल तिवारी को जानने लगे थे। इसी दौरान एक बार गांधी जी ट्रेन में सफर कर रहे थे। इस बात की खबर छोटेलाल तिवारी को हुई और वे राजनांदगांव स्टेशन जा पहुंचे। गांधी जी से मिलने के लिए स्टेशन में पहले से स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अमला पहुंचा हुआ था। ट्रेन जब राजनंादगांव पहुंची तो महात्मा गांधी ने सभी से औपचारिक मुलाकात की। स्टेशन में पहुंचे अनेक सेनानियों के बीच महात्मा गांधी ने छोटे लाल तिवारी को अलग से अपने पास बुलाया और एकांत में कुछ देर तक चर्चा की। श्री तिवारी को अलग से समय देना और गांधी जी से दिशा निर्देश प्राप्त करने की बात काफी दिनों तक लोगों की चर्चा में शामिल रहा।
टी.बी. ने नहीं देखने दिये आजादी के दिन
स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में देश को आजाद देखने की ललक के साथ अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले छोटे लाल तिवारी को आजादी की सुकून भरी हवा नसीब नहीं हो पायी। स्वास्थ्य सेवाओं के दूर्दिनों में उन्हें टीबी के रोग ने जकड़ दिया, उस वक्त टीबी का आलम वही था जो आज के समय में कैंसर का है। जब श्री तिवारी बालोद के गांवों में किसानों को आंदोलन से जोडऩे में लगे हुए थे, उसी बीच वहां मलेरिया ने पैर पसार रखे थे। वे भी मलेरिया की चपेट में आ गये। पहले तो रोग को बड़े हल्कें में लेते हुए गांव में ही इलाज कराते रहे। साथ ही साथ आराम न कर आंदोलन में भी सक्रियता बनायी रखी। बीमारी के ठीक न होने पर श्री तिवारी जी को इंदौर के अस्पताल तक दौड़ लगानी पड़ी। इंदौर के चिकित्सकों ने परीक्षण उपरांत टीबी होना बताया। इलाज के दौरान ही मात्र 26 वर्ष की अवस्था को छुते छुते तिवारी जी ने दुनिया को अलविदा कहा दिया। इस तरह 1943 में हम सबसे बहुत दूर जा चुके स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री तिवारी जी की आजाद हिंदुस्तान की हवा में सांस लेने की अच्छा पूरी न हो सकी, किंतु श्री तिवारी जी के अदम्य साहस की वजह से आंदोलन में कूद पड़े किसानों तथा अन्य लोगों की बदौलत हमने उस स्वाद को चखा है, जिसे श्री तिवारी ने एक वृक्ष के रूप में रोपा था।
पुत्र और पोतों ने वकालत की इच्छा को पूरा किया
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी छोटेलाल तिवारी ने इच्छा होते हुए भी वकालत से अपना नाता नहीं जोड़ पाया, किंतु उनके पुत्र तथा पोतों ने इस पेशे में एक मुकाम हासिल कर पिता एवं बाबा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है। छोटे लाल तिवारी के एकमात्र पुत्र प्रभात तिवारी वर्तमान में उच्च न्यायालय बिलासपुर में जाने माने वकील के रूप में प्रतिष्ठा बनायी हुई है। इतना ही नहीं उनके पोते प्रशांत तिवारी एवं सुशांत तिवारी ने संस्कारधानी नगरी राजनांदगांव में युवा अधिवक्ता के रूप में अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए खासी पहचान बना रखी है। दोनों भाई सिविल तथा क्रिमिनल के मामलों में बारीकियों की जानकारी रखते हुए पीडि़तों का काननू का लाभ दिला रहे है। श्री तिवारी के तीसरे पोते सीमांत तिवारी पेशे से इंजीनियर है। कुल मिलाकर संघर्ष के दिनों में स्वतंत्रता का सपना संजोने वाले छोटे लाल तिवारी ने अपने परिवार को उच्च शिक्षा के मार्ग में प्रशस्त करने का जो शंखनाद किया था, वह आज संपूर्णता लिये दिखाई पड़ रहा है।





प्रस्तुतकर्ता
(डा. सूर्यकांत मिश्रा)
जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
मो. नंबर 94255-59291
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