रचनाकार परिचय:-


लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी हास्य-नाटक  [गाड़ी के मुसाफ़िर- पक्का चेला] खंड 2 लेखक और अनुवादक -: दिनेश चन्द्र पुरोहित



[मंच के ऊपर रोशनी फैल जाती है, एकाएक गोदाम से एक कुत्ता दौड़ता हुआ बाहर निकलता है ! उस बेचारे के पीछे-पीछे लकड़ी लिये रशीद भाई, बतूलिये की तरह दौड़ते हैं ! जैसे ही ये दोनों मेन गेट के पास खड़े साबीर मियां की निग़ाहों में आते हैं, वे इस खिलके को देखकर अचरच करते हैं ! वे अपने रशीद चच्चा की फ़िक्र करते हुए, उनको आवाज़ देते हैं कई बार ! मगर रशीद भाई उनको कोई जवाब न देकर, उस कुत्ते का पीछा करते जा रहे हैं ! इस तरह रशीद भाई का न तो वापस जवाब देना और न पीछे मुड़कर देखना, उनको तो बस एक ही धुन लगी है के ‘किसी तरह इस कुत्ते को गोदाम की हद से बाहर निकाल दें, कहीं वह लौटकर वापस न आ जाये ?’ उधर सबीर मियां फ़िक्र करते जा रहे हैं, कहीं यह कुत्ता पीछे मुड़कर उनको काट न जाये ? अगर काट खाया, तो चच्चा को अपने पेट में चौदह इंजेक्शन लगवाने होंगे ! फिर, क्या ? बार-बार उन्हें रुकने का कहते-कहते, वे भी इस दौड़ में शामिल हो जाते हैं ! इस तरह, वे भी उनके पीछे-पीछे, दौड़ते दिखाई देते हैं ! दौड़ते-दौड़ते वे सभी खुले मैदान में पहुँच जाते हैं, जहां चारदीवारी पर कई कुत्ते खड़े हैं ! अपने इस साथी को संकट में पाकर, वे रशीद भाई और साबीर मियां को भौंकते जाते हैं ! इन कुत्तों का साथ मिल जाने से, अब उस कुत्ते का ज़ोश भी बढ़ जाता है ! अब वह, और तेज़ गति से दौड़ता जा रहा है ! अब इन दोनों महानुभवों को छकाने के लिए, कभी वह इस गोदाम में दाख़िल होता है तो कभी किसी दूसरे गोदाम में ! इस तरह लगातार दौड़ते रहने से, इन दोनों के पांवों का दर्द ना-काबिले बर्दाश्त हो जाता है ! खुदा जाने, इन दोनों की दिल-ए-फ़रियाद अल्लाह मियां ने कैसे सुन ली ? उस कुत्ते को न जाने कैसी गंध का अहसास हो जाता है, जिसकी गंध पाकर वह दौड़ता हुआ उसी गोदाम में दाख़िल हो जाता है ! यह वही गोदाम ठहरा, जहां से यह रेस शुरू हुई थी ! यहां इस वक़्त सावंतजी धान की बोरियों के ऊपर पम्प से दवाई का छिड़काव कर रहे हैं, और उनके निकट खड़े हैं लंगड़िया साहब ! जिनके पिछवाड़े की तरफ़ बिल्कुल नज़दीक पड़ी है, घोल से भरी टंकी ! समस्या आती है, तो चारों ओर से आती है ! बदक़िस्मत से साहब को हो गया था, जुकाम ! इस कारण अभी, उनकी ध्राण शक्ति काम नहीं कर रही है ! न तो उन्हें दवाई की गंध का अहसास हो रहा है, और न किसी मरे चूहे की बदबू का अहसास हो रहा है ! ख़ुदा रहम..ख़ुदा रहम, दाख़िल हुए कुत्ते को अब लंगड़िया साहब के पिछवाड़े में पड़ी कोई काली चीज़ दिखायी दे जाती है, इसी काली चीज़ की गंध पाकर यह कुत्ता इस गोदाम में दाख़िल हुआ था ! बस, फिर क्या ? तेज़ी से वह लंगड़िया साहब की दोनों टांगों के बीच में से निकलकर, झट उस काली चीज़ के पास चला आता है ! और उस चीज़ को अपने मुंह में दबाकर, बन्नाट करता हुआ बाहर निकल जाता है ! उनकी टांगों के बीच से उस कुत्ते का अचानक निकल जाना कोई मामूली घटना नहीं है ! इससे, वे अपने शरीर का संतुलन खो देते हैं ! फिर, क्या ? धड़ाम से आकर गिरते हैं, उस घोल की टंकी में ! जैसे ही वे टंकी से बाहर आते हैं, और उसी वक़्त गोदाम में आगमन होता है रशीद भाई और साबीर मियां का ! ख़ुदा की पनाह, अचानक उन दोनों की निग़ाह में आ जाते हैं लंगड़िया साहब ! जो दवाई के घोल में गिरकर, वे सफ़ेद भूत बनकर बाहर आये हैं ! सफ़ेद भूत बने लंगड़िया साहब को देखकर वे दोनों डर जाते हैं ! डरकर, वे दोनों ज़ोरों से चिल्लाते हैं !]

साबीर मियां और रशीद मियां – [एकसाथ चिल्लाते हैं] – भूऽऽत..भूत !

[भूत बने लंगड़िया साहब उन दोनों को समझाने के लिए उनकी तरफ़ बढ़ते हैं, तभी उनके मुंह पर पड़ा घोल उतरकर लंगड़िया साहब का धुंधला सा चेहरा सामने लाता है ! उनका बदलता चेहरा देखते ही, रशीद भाई अपने हाथ ऊपर करके चिल्लाकर कह उठते हैं]

रशीद भाई – [डरकर हाथ ऊपर करते हुए चिल्लाते हैं] – बचो रे, बचो ! यह आसेब अब लंगड़िया साहब का रूप धारण कर रहा है, अरे रे...कहाँ गया रे, मेरा कारचोब वाला इमामजामीन ?

[इमामजामीन को ढूंढ़ते हुए वे अपनी जेबें संभालते हैं, उधर लंगड़िया साहब ने सोचा, चलो रशीद न सही तो इसके भतीजे को समझा देता हूं के मैं भूत नहीं हूं बल्कि तुम्हारा लंगड़िया साहब हूं ! ऐसा सोचते हुए वे साबिर मियां का हाथ पकड़ने की कोशिश करते हैं..मगर यहां तो डर के मारे, मियां की हालत बहुत बुरी हो चुकी है ! उनका बदन भय से कांपता जा रहा है ! इस डर के मारे, बेचारे मियाँ की गिग्गी बंध जाती है ! अब सामने से आ रहे इस भूत से बचने के लिये, अचानक मियाँ का पाँव चल जाता है ! और इस तरह ज़ोर से एक लात मार देते हैं, बेचारे लंगड़िया साहब के पेट में ! लात खाकर, साहब अब रुकते, कहाँ ? वे तो मियाँ का पुणचा पकड़कर उसे समझाना चाहते हैं, के ‘मैं भूत नहीं हूं, बल्कि मैं तुम्हारा साहब लंगड़िया हूं !’ मगर यहां, मियाँ उनकी बात सुनने वाले कहाँ ? उन्होंने तो झट धूजते होंठों से, वजीफा पढ़ना शुरू कर दिया !]

साबिर मियाँ – [धूजते होंठों से वजीफ़ा पढ़ते हुए] – जिन्न तू ज़लाल तू, आयी बला को टाल तू ! या अली, या हुसैन...

[अब रशीद भाई को ऐसा लगने लगा, के ‘किसी दुश्मन ने, साहब के ऊपर मैली क्रिया की है ! अब कोई इंसान उनके पास खड़ा रह गया तो, उस व्यक्ति पर मैली क्रिया का असर हो सकता है !’ यह विचार दीमाग़ में कौंधते ही उन्होंने झट साबिर मियाँ का हाथ पकड़ लेते हैं, और उनको खींचकर गोदाम के बाहर ले आते हैं ! उनको बाहर जाते देखकर, लंगड़िया साहब उनको रोकने के लिए...पीछे से, आवाज़ लगाते जा रहे हैं !]

लंगड़िया साहब – [आवाज़ देते हुए] – भागो मत, मैं भूत नहीं हूं ! मैं तो लंगड़िया हूं, आप लोगों का साहब !

[मगर यहां किसकी मां ने अजमा खाया है, जो भूत बने साहब से कुछ देर रुककर बात कर सके ? यहां तो साहब का यह रूप देखते ही, वे दोनों ऐसे धूजने लगे... मानो उन दोनों को, आ गया हो मलेरिया का बुखार ! बस ज़नाब ख़ुदा की पनाह, इन दोनों को पाखाने जाने की शंका न हुई ! जैसे ही साहब बाहर आने लगे, उनको देखते ही रशीद भाई ऐसे डरे, ज़नाब ! के, झट साबिर मियाँ का हाथ छोड़कर वे बतूलिये की तरह उसी तरफ़ दौड़ने लगे..जिधर कुत्ता दौड़ता जा रहा है ! अमावस के दिन इस भरी दोपहर में चाचा का किसी काले कुत्ते के पीछे बेहताशा दौड़ना, सबीर मियाँ की फ़िक्र की वजह बन जाती है ! अब उनको भी भरोसा हो गया है, के ‘चाचा ख़ुद अब, आसेबज़द हो गए हैं ! न तो ऐसा कौन मूर्ख होगा, जो भरी दोपहर में किसी काले कुत्ते का पीछा करता हो ? अब उनके पीछे जाना, खाली मुसीबत को मोल लेने के बराबर है !’ फिर, क्या ? अब वे उनके पीछे न जाकर, ख़ाली पीछे से उन्हें आवाज़ देने लगे !]

साबिर मियाँ – [आवाज़ देते हुए] – अरे चाचा, ओ चाचाजान ! ज़रा रुकिए, जनाब !

[रशीद भाई की ऐसी हालत देखकर, सावंतजी फिक्रमंद हो गए हैं ! वे झट गोदाम से बाहर आते हैं, और अब वे भी उनको आवाज़ देते हुए उनका पीछा करना चाहते हैं ! मगर, वहां मौज़ूद, साबीर मियां ! वे इनका ऐसा इरादा जानकर, इन्हें रोकते हैं और इनको कहते हैं]

साबिर मियाँ – [सावंतजी को रोकते हुए, कहते हैं] – अरे साहब, आप उनके पीछे मत जाना ! अभी इस वक़्त, चाचा आसेबज़द हैं ! आप देख लीजिये, जनाब ! इस तरह कोई समझदार व्यक्ति काली आमवस्या के रोज़, भरी दोपहर में काले कुत्ते के पीछे दौड़ता है क्या ? अरे हुज़ूर उनके रुकने का कोई सवाल नहीं, मगर दौड़ने का कारण भी बता नहीं पा रहे हैं !

सावंतजी – आसेब लगा या भूत, मुझे क्या करना ? मुझे तो उसे लंगड़िया साहब के कोप से बचाना है, और अब लंच का वक़्त हो गया है..उसको खाना भी खिलाना है ! अब तू अंधविश्वास भरी बातें करके, मेरा सर-दर्द मत बढ़ा !

[सावंतजी काहे सुनना पसंद करेंगे, साबिर मियाँ की बेफालतू की बकवास ? वे झट, मैदान की तरफ़ अपने क़दम बढ़ा देते हैं ! उधर रशीद भाई, मैदान में जाकर क्या देखते हैं ? वो कुत्ता खड्डा खोदकर किसी चीज़ को अन्दर डाल रहा है ! फिर अपने पंजे से धूल डालकर, उसे दफ़ना रहा है ! रशीद भाई को आते देखकर वो कुत्ता, झट नौ दो ग्यारह होकर चारदीवारी पर खड़े अपने साथियों के झुण्ड में मिल जाता है ! अब वे रशीद भाई को देखते हुए सभी कुत्ते, एक सुर में भौंकने लगते हैं ! इधर मानव-स्वाभाव से रशीद भाई के मानस में जिज्ञासा बढ़ जाती है, के ‘आख़िर, इस कुत्ते ने कौनसी चीज़ दफ़न की है ?’ अपनी ज्ञान-पिपासा को शांत करते हुए, वे अपने हाथ के पंजे से उस स्थान को खोदते हैं ! अब जैसे ही धूल हटती है, और भयंकर बदबू के साथ उनके हाथ में एक मरा हुआ चूहा आ जाता है ! फिर, क्या ? झट उस मरे चूहे एक ओर पटककर, वे चार क़दम दूर हटते हैं ! ख़ुदा रहम ! अब नाक दबाकर बरबस, वे अपने मुंह से ये शब्द बोल देते हैं]

रशीद भाई – [नाक दबाकर, कहते हैं] – ख़ुदा की पनाह, यह कुत्ता तो क़ब्र खोदने वालों की औलाद निकला ? अरे दोज़ख के कीड़े, तूझे दफ़न करने के लिए यही मरा हुआ चूहा ही मिला ? हाय मेरे मोला, इस कुत्ते ने दौड़ा-दौड़ाकर मेरी टांगों का क्या हाल बना डाला ? तू ज़रूर अब इस कुत्ते को, दोज़ख में डालना !

[पीछे से आ रहे सावंतजी के कानों में, इनके कहे शब्द सुनायी देते हैं ! अब वे इनके पास आकर, ताने देते हुए कहते हैं ]

सावंतजी – अबे ओ मोमिन की औलाद, अब तुझको दफ़न कर दिया जाय तो ज़्यादा अच्छा ! आख़िर, तू है क्या ? मुर्दा ? जो दफ़्तर का कोई काम करता नहीं, बस मुर्दे की तरह पड़ा रहता है इस अफ़ीमची के पास..! तूझमें और इस मुर्दे में आख़िर, फर्क है क्या ?

रशीद भाई – [खीजे हुए कहते हैं] – आप खुश हो जाओ, भाईजान मुझे दफ़न करके ! मगर पहले अपनी जेब से रुपये निकालकर, मेरे लिए दो गज कफ़न मंगवा दीजिये ना ! आप कफ़न लेकर आओगे, तब-तक मैं दो रोटी डाल दूंगा इस खाली पेट में ! क्या करूँ, यार ? अब इस पेट में, चूहे कूदने लगे हैं !

सावंतजी – [नज़दीक आकर कहते हैं] – मियाँ पहले इस मरे हुए चूहे को दफ़न कर दे, फिर पेट में कूद रहे चूहों का इलाज़ करना ! नहीं तो साले, तू फैला देगा प्लेग की बीमारी ! और, ध्यान रखना ! लंगड़िया साहब की निगाह में तू आ गया तो नालायक, तूझे बिना कफ़न ओढ़ाये दफ़न कर देंगे !

[आख़िर जेब से दस्ताने निकालकर रशीद भाई, उस मृत चूहे की पूंछ पकड़कर उसे उठाते हैं ! फिर उसे खड्डे में डालकर, उस पर धूल डाल देते हैं ! उसे दफ़न करके, अब वे सावंतजी से कहते हैं]

रशीद भाई – [हाथों में लगी धूल को झाड़ते हुए, कहते हैं] – लीजिये भाईजान, एक काम निपट गया ! अब लगे हाथ आपका भी सुपर्देखाक, कर डालूँ ? आइये, आइये..

[सावंतजी डरकर भागते हैं, और उनके पीछे-पीछे रशीद भाई धूल भरे हाथों को लिये दौड़ते दिखायी देते हैं ! ये दुबले-पतले, डेड पसली के सावंतजी उनके हाथ क्या लगते ? वे तो आगे-आगे दौड़ते ई जा रहे हैं और साथ में जुमला भी बोलते जा रहे हैं..]

सावंतजी – [दौड़ते हुए मुड़कर, कहते जाते हैं] – सुन ले, मियाँ ! अब तू चूहे का दफ़न कर चुका है, मय्यत के बाद की नमाज़ पढ़कर आ जाना छप्परे के नीचे ! हम वहां तेरा इंतज़ार कर रहे हैं, फिर तू लंच कर लेना वहां..नहीं तो, गोदाम में कई चूहे मरे पड़े हैं ! उनका सुपर्देखाक करते रहना, जैसी तेरी मर्जी !

[उनके रुख्सत होने की पद-चाप, रफतः रफत: सुनायी देनी बंद हो जाती है ! मंच पर, अब अँधेरा फ़ैल जाता है !]
[२]

[मंच पर रोशनी फैलती है ! मैदान में खड़े माना रामसा, चारो और देखते हुए निश्चय कर लेते हैं के ‘उन्हें कोई आदमी देख नहीं रहा है !’ फिर, क्या ? लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए, पहुँच जाते हैं….बबूल की झाड़ी के पास ! वहां निशान के लिए रखे पत्थर को दूर लेते है, और वहां खड्डा खोदकर एक पोलिथीन थैली बाहर निकालते हैं ! फिर उस थैली को, अपनी जेब में रख देते हैं ! इसके बाद एक बार और इधर-उधर निगाहें फेंककर कर सोच लेते हैं, के ‘कोई आदमी इधर-उधर खड़ा तो नहीं है, जो इन्हें देख रहा हो ?’ अब वे उस थैली को जेब से निकालते हैं, फिर उसमें से अफ़ीम की किरची निकालकर अपने मुंह में रखते हैं ! फिर भोलेनाथ को दिल में प्रणाम करके, कहते हैं]

माना रामसा – [भोलेनाथ को प्रणाम करके, कहते हैं] – हर हर महादेव ! जय शिव शंकर, आपकी कृपा बनी रहे ! आपकी कृपा से आपका प्रसाद...

[अब वे, आगे क्या बोलते ? गोदाम के पीछे किसी आदमी के उपस्थित होने की, उन्हें शंका हो जाती है ! कुछ पल बाद, किसी की पदचाप सुनायी देती है ! और साथ में, हंसी के ठहाके लगाने की आवाज़ सुनायी देती है ! ज़ोर से हंसी का ठहाका लगाते हुए, लूण करणजी सामने आते हैं ! किसी तरह वे अपनी हंसी को दबाते हुए कहते हैं]

लूण करणजी – [हंसी को दबाते हुए कहते हैं] – उस्ताद, क्या हो रहा है ?

माना रामसा – [आँखें तरेरकर कहते हैं] – क्यों रे लूण करण ? उस्ताद की जासूसी कर रहा है ?

लूण करणजी – [कान पकड़ते हुए, कहते हैं] – नहीं उस्ताद, ऐसा गुनाह मैं कैसे कर सकता हूँ ? मुझे क्या नर्क में जाना है, जो ऐसा गुनाह करूंगा ?

माना रामसा – साला नर्क में नहीं तो क्या, तू स्वर्ग में जाना चाहता है ! वाह रे, वाह मेरे चेले तू अब स्वर्ग में जाने के स्वप्न देख रहा था..? [गाली की पर्ची निकालते हैं] साला मां का...! [थैली से अफ़ीम की किरचियाँ निकालते हैं] ले, अब तू बैठ इसी पत्थर पर ! [अफ़ीम की किरची थमाते हुए कहते हैं] ले चख, भोलेनाथ की प्रसादी !

[लूण करणजी और माना रामसा, पत्थरों पर बैठ जाते हैं ! फिर अफ़ीम की किरचियाँ मुंह में डालते हैं, फिर वे दोनों ज़ोर से ‘हर हर महादेव’ व ‘जय भोले शंकर’ ज़ोर से बोलते हैं ! फिर, माना रामसा कहते हैं]

लूण करणजी और माना रामसा – [एक साथ] – हर हर महादेव ! जय भोले शंकर !

माना रामसा – [थैली को वापस जेब में रखते हुए, कहते हैं] – अब याद रख मैं तेरा उस्ताद हूँ, और तू है मेरा चेला ! मगर तू तो कमबख्त इस लंगड़िये के आस-पास घूमता रहता है, मुझे यह पसंद नहीं है मेरे चेले..के तू इस तरह पूंछ हिलाता हुआ, इस लंगड़िये के आस-पास मंडराता रहे ! समझ गया, बोल क्या कहा मैंने ?

लूण करणजी – हुज़ूर माफ़ कीजिये, मैं सब समझ गया ! उस्ताद एक बात गाँठ बाँध लो, मैं कहीं भी जाऊं या किसी के पास बैठूं मगर कहलाऊंगा केवल आपका ही चेला ! आपकी दी गयी ट्रेनिंग से बहुत फायदा हुआ, अब कोई माता का दीना मुझसे बेगार नहीं ले सकता ! काम कहने से हिचकते हैं, ये दफ़्तर के कर्मचारी !

[लूण करणजी की कही बात को सुनकर, माना रामसा खुश हो जाते हैं ! अब खुश होकर वे कहते हैं]

माना रामसा – [खुश होकर कहते हैं] – ले चल इस बात पर, तेरे लिए अभी अदरक वाली चाय मंगवाता हूँ !

लूण करणजी – नहीं उस्ताद ! अभी तो हम, क्लब की चाय पी लेंगे ! चलिए जनाब, छप्परे के नीचे ! अन्यथा फिर, हमें ठंडी चाय पीनी होगी !

[दोनों गुरु-चेले उठकर, छप्परे की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं ! थोड़ी देर बाद दोनों पहुँच जाते हैं, छप्परे के नीचे ! वहां पहले से ही बारदान पर रशीद भाई, सावंतजी और ठोक सिंगजी विराजमान है ! सामने से जोगा राम का छोरा चाय की केतली और प्याले लिए, आता है !]

जोगा राम का छोरा – [नज़दीक आकर, कहता है] – पंडितजी ! आप भले आये, मालिक आपके दर्शन करके मेरी आँखें ठंडी हुई ! लीजिये मालिक अब चाय पीकर आप तैयार हो जाइए, अरबी घोड़े की तरह !

[प्यालों में चाय डालकर, वह सबको प्याले थमा देता है ! इतनी बकवास करने के कारण, माना रामसा नाराज़ हो जाते हैं ! वे नाराज़ होकर, जोगा राम के छोरे से कहते हैं]

माना रामसा – [नाराज़गी से कहते हैं] – सुन रे जोगिए के छोरे, क्या तू मुफ़्त में चाय पिला रहा है, जो तू इतनी बकवास करता जा रहा है..कुचामादिये के ठीकरे ?

[जोगा राम का छोरा, जवाब क्यों देगा ? वह तो यहां की झकाल यहीं छोड़कर, चला जता है अपनी चाय की दुकान पे ! जहां बैठे ग्राहक, चाय पीने के लिए इसका इन्तजार कर रहे हैं ! उसके चले जाने के बाद, सभी साथी चाय की चुश्कियाँ लेते हुए गपें हांकनी शुरू करते हैं !]

रशीद भाई – [माना रामसा से कहते हैं] – अब आप यहां तशरीफ कैसे लाये, जनाब ? आप तो हम लोगों से दूर ही रहना चाहते थे, कहिये मालिक अब क्यों आये हमारे नज़दीक ?

माना रामसा – आप लोग हो छलिये, मेरा दिल चुराकर बैठ गए यहां ! फिर क्यों नहीं आता, आप लोगों के पास ? [लूण करणजी से पूछते हुए] क्यों भाई लूण करण, मैंने सही कहा या नहीं ? बोल लूण करण समझ गया, बोल क्या समझा ? [चाय की चुश्की लेते हैं]

लूण करणजी – उस्ताद किस मुंह से कहूं, आप तो उस्ताद छलिया हो..यह छल आपके नस-नस में बसा हुआ है ! आप तो अक़सर भूल जाते हैं, के ‘मैं आपका पक्का चेला हूँ !’ जनाब आप ऐसे होशियार हैं, मुझको भी नहीं छोड़ा आपने ? बोलिए, फिर आपको मैं क्या कहूं ?

[चाय पीते-पीते माना रामसा को अफ़ीम लेने की तलब होती है, फिर क्या ? झट जेब से बाहर निकालते हैं अफ़ीम की कोथली ! लूण करणजी को छोड़कर, सभी को अफ़ीम की किरचियाँ थमाते हैं ! अफ़ीम नहीं देते देख, लूण करणजी झट अपनी हथेली आगे करते हैं ! मगर ठोकिरा माना रामसा ठहरे छिणकमिल्ले, उनको तो बराबर याद रहता है के “अभी-अभी यह लूण करण क्या कह रहा था ?” झट उसकी हथेली दूर लेते हुए, दूसरे साथियों को अफ़ीम की किरचियाँ देने लगे ! अफ़ीम की किरची हाथ नहीं आने से लूण करणजी हो जाते हैं, खफ़ा ! फिर वे नाराज़गी से माना रामसा से कहते हैं !]

लूण करणजी – अरे उस्ताद, इस चेले को किरची देना भूल गए क्या ?

माना रामसा – अब तुझको, प्रसादी देने की क्या ज़रूरत ? तू तो बन गया है, मेरा पक्का चेला ! अब तो तुझको अफ़ीम ख़रीदकर लानी चाहिए, और मुझको चखानी चाहिए..और बचे तो तेरे इन साथियों को भी चखानी चाहिए ! समझ गया मेरे पक्के चेले, बोल क्या समझा ?

[इतना कहकर, माना रामसा दूसरे साथियों को, अफ़ीम की किरचियाँ थमानी शुरू करते हैं ! अफ़ीम की मनुआर करते हुए, वे लूण करणजी से कहते हैं]

माना रामसा – [अफ़ीम की मनुआर करते हुए, कहते हैं] – क्यों रे लूण करण, उस्ताद को छलिया कहता है नामाकूल ? तू तो, सारी तहजीब भूल गया रे ? उस्ताद के ऊपर ही लगा रहा है, आरोप ? के, उस्ताद छलिया है ? क्या देखा रे तूने, मेरे अन्दर ?

लूण करणजी – मैं झूठ नहीं बोलता हूँ, उस्ताद ! दिमाग़ पर ज़ोर दीजिये, याद आया आपको ? कुछ दिन पहले मैं लंगड़िया साहब की भैंस आपके घर लाया था, याद आया जनाब ?

माना रामसा – [सर पर हाथ रखकर, सोचने हुए कहते हैं] – हाँ यार लूण करण कुछ याद आया, पाला आयी हुई भैंस को तू लाया था तू..मेरे पास ! मगर एक बात सोच प्यारे, भैंसा किसका था ? बोल, मेरा था ! फिर मैं अपनी मज़दूरी नहीं लूंगा, यार ? समझ गया, क्या समझा..? बोल, प्यारे !

लूण करणजी – [खीजकर कहते हैं] – उस्ताद, यह छल है..यह कपट है, फिर देख लेना आप ! यह ठीक नहीं रहेगा !

माना रामसा – क्या देखूं रे, लूण करण ? तू भैंस लाया लंगड़िया की, फ़ायदा किसको होगा ? तुझको होगा, तू मारेगा एफ़.एल. ! फिर बोल, कुत्तिया के ताऊ..बोल बोल..

लूण करणजी – [मुंह बिगाड़कर, कहते हैं] – एफ.एल. एफ.एल. क्या बोलते हो, उस्ताद ? यह तो सोचिये, आपके घर से लंगड़िया साहब के घर के बीच की दूरी कितनी है ? करीब ७ या ८ किलोमीटर की दूरी तो होगी जनाब ! उस भैंस की रस्सी थामे हुए क्या आया था, आपके घर ? उसने तो मुझे मैराथन एथलीट समझकर, ख़ूब दौड़ा दिया जनाब !

रशीद भाई – [आश्चर्य करते हुए, कहते हैं] – क्या कह रहा है, लूण करण ? अरे कमबख्त, बाहर जाकर उस चाय वाले को ओर्डर देने जाता है तब जाता स्कूटर पर बैठकर..ऐसा आदमी, कैसे पैदल चल सकता है ?

लूण करणजी – अरे रशीद भाई, आपको कैसे समझाऊं ? कभी आपको पाला आयी हुई भैंस की रस्सी थामकर, उसके पीछे चलने का मौक़ा हाथ आया ?

रशीद भाई – क्या कहा तूने, पाला-पाला होता क्या है ? मैं तो केवल, कब्बड्डी खेल के पाले के बारे में जानता हूँ ! क्या तूझे खेलना है, मेरे साथ ? अरे कमबख्त, मैं मोहल्ले का कब्बड्डी चैंपियन हूं !

लूण करणजी – कब्बड्डी को, मारो गोली ! क्या आपको ख़ुदा ने [उनके कान पकड़कर, कहते हैं] सुनने के लिए, ये कान दिए या नहीं ? या आप इन कानों को भाभीजी के पास छोड़कर आ गए हैं ? [कान छोड़कर, ज़ोर से कहते हैं] कभी पाला आयी हुई भैंस के साथ, पाला पड़ा या नहीं ?

रशीद भाई – अरे लूण करण, मैं इंसान हूँ..तेरा जैसा जानवर नहीं, जिसका जानवरों के साथ पाला पड़ता हो ! इंसान की कोई बात हो तो, बोल..

लूण करणजी – बच्चे अल्लाह की देन है, इस उसूल को मानते हुए जवानी में आपने हर साल कलेंडर छाप दिए ! अब आपको मेरी बात, समझ में आयी ? पाला आना, क्या होता है ? नहीं समझ में आये, तो जनाब आप घर जाओ तब भाभीजी से पूछ कर..कल, जवाब लेते आना !

[लूण करणजी ऐसे लहजे से बोलते हैं, सुनने वाले बिना हँसे नहीं रह पाते ! अपनी इस तरह मज़ाक उड़ती देखकर, रशीद भाई सोचते जा रहे हैं “अगर सबके खाने के टिफ़िन खोल दिए जाय, तो ये ख़ुदा के बन्दे इस मुद्दे को यहीं छोड़कर खाना खाने बैठ जायेंगे !” आखिर हुआ भी वही, टिफ़िन खोलते ही सब्जियों की सोरम फैलती है, और सभी खाने पर टूट पड़ते हैं ! मगर सावंतजी बिना बोले रह नहीं पाते, वे लूण करणजी से आखिर पूछ ही लेते हैं]

सावंतजी – [खाना अरोगते हुए, कहते हैं] - लूण करण यार, तू इतना दुबला-पतला कैसे होता जा रहा है ? मैं तो यही कहूंगा, तू इस पाले आयी हुई भैंस की रस्सी थामे उसके पीछे दौड़ नहीं सकता..फिर काहे झूठ बोलकर पाप बढ़ा रहा है, अपना ? हम सब जानते हैं, तू पैदल चल नहीं सकता ! कमबख्त तूझे गेट के बाहर जाना हो तो, तूझे चाहिए स्कूटर !

रशीद भाई – यह लूण करण है, भाई ! यह, क्या पैदल चलेगा ? गेट के बाहर है, चाय की दुकान ! वहां भी जाता है, यह स्कूटर पर बैठकर ! ऐसा तो है यह, लंगूर !

लूण करणजी – [गुस्से में कहते हैं] – लंगूर कहना घर जाकर, अपनी खातूने खान को ! क्या आपको, मेरी दुर्दशा दिखायी देती नहीं ? बिना देखे आपने, निकाल दी मुंह से बाहर अपनी यह लालकी [जीभ] ?

रशीद भाई – [हंसते हुए कहते हैं] – ले दिखा, तेरी दुर्दशा ! यह भी बता हमें, के ‘ये तेरे उस्ताद माना रामसा ने कैसे किया, तेरे साथ छल-कपट ?’

लूण करणजी – बात ऐसी हुई, के तड़के लंगड़िया साहब की मेम साहब ने बुलावा भेजकर कहलाया “साहब बुला रहे है ! कोई ज़रूरी काम है !” अब बताइये, जनाब ! मैं उनका हुक्म कैसे टाल सकता ?

रशीद भाई – फिर क्या हुआ, लूण करण ?

लूण करणजी – वहां उनकी भैंस, पाले आयी हुई लग रही थी ! अरे ज़नाब, वह तो ज़ोर के कूदड़के मार रही थी ! मैंने सोचा, इस भैंस को उस्ताद के तबेले में ले जा दूं..तब एक भी पैसा लगेगा नहीं, क्योंकि मैं इनका हूँ पक्का चेला ! और ये पण्डितसा है, मेरे उस्ताद ! फिर, क्या ?

रशीद भाई – आगे बोल यार, काहे बातों की गाड़ी रोकता है ?

लूण करणजी - पीछे से, हम साहब से ले लेंगे रुपये और ऊपर से मार लेंगे एफ़.एल. यानि मुफ़्त का अवकाश ! फिर तो भय्या, आनन्द ही आनन्द !

रशीद भाई – अरे नामुराद, तूने इस लोकोक्ति “आम के आम और गुठली के दाम” को चरितार्थ कर डाला ! वाह रेss, लूण करण ! क्या योजना बना डाली तूने, तेरी पांचों ही अंगुलियां घी में...!

लूण करणजी – मगर, मुझे क्या पता..इस काम के बारे में ? यह काम इतना आसान नहीं था, ले जाते वक़्त यह कमबख्त भैंस ज़ोश के मारे इतनी तेज़ दौड़ती गयी ज़नाब..? अरे रामा पीर उसकी रस्सी थामे मुझे, तेज़ गति से इसके पीछे-पीछे दौड़ना पड़ा ! अब क्या कहूं, जनाब ? बिना देखें, इतना तेज़ दौड़ा के यारों..मैं मुंह दिखलाने के, योग्य नहीं रहा !

सावंतजी – [हंसते हुए, कहते हैं] – यह लीजिये, यह कमबख्त माता का दीना काला मुंह करवाकर आ गया होगा..कहीं से ?

लूण करणजी – [रोनी आवाज़ में] – बड़े भाई साहब ! काला मुंह करने की बात क्यों कहते कहते जा रहे हैं, जनाब ? यहां तो मेरे बदन के सारे कपड़े गंदे हो गए, भैंस के गोबर से ! अरे जनाब, कैसे करूं बयान ? गोबर से भरे इन कपड़ो को पहने, जैसे ही मैंने माना रामसा के घर के दरवाज़े पर दस्तक दी..

रशीद भाई – क्या तू सच कह रहा है, लूण करण ?

लूण करणजी – [आंसू गिराते हुए, कहते हैं] – दरवाज़ा खोला भाभीजी ने, और मुझे मंगता-फ़क़ीर समझकर वे मुझे आटा डालने लगी..ऊपर से ये उस्ताद अफ़ीम की पिनक में अलग से चिल्लाकर कहने लगे के “भली आदमण, कुछ मत डाल इस मंगते को, दो जूत्त मारकर झट दरवाज़ा बंद कर दे !”

रशीद भाई – फिर बाद में क्या हुआ रे, लूण करण ?

लूण करणजी – [रुमाल से आंसू साफ़ करके, कहते हैं] – मैं चिल्लाया ज़ोर से, के ‘उस्ताद, मैं आपका ख़ास चेला लूण करण हूं..” मगर..

रशीद भाई – रोता क्यों जा रहा है, क्या तू हिज़ड़ा है..जो इस तरह, रोता जा रहा है ? थोड़ी हिम्मत रख, बोल आगे क्या हुआ ? मुझे लूण करण बहुत अचरच हो रहा है, इस तरह माना रामसा कैसे बोल गए..तूझे ?

लूण करणजी – अफ़ीम के नशे में उस्ताद कहने लगे, के “तू कौन है, भाई ? किसका चेला ? मैं यहां बैठा-बैठा, किस-किस चेला का ध्यान रखूं रे ? यहाँ तो आये दिन अफ़ीम मांगने आ जाते हैं मंगते..मुंह ऊंचा किये हुए ? पता है, अफ़ीम के क्या भाव चल रहे हैं ?..”

रशीद भाई – तेरे उस्ताद ने सही-सही भाव बताये होंगे, आख़िर यह बन्दा रोज़ सेवन करता है अफ़ीम !

लूण करणजी – हां हुज़ूर, उस्ताद ने यही कहा के हज़ार रुपये तोला..फिर आगे बोले हुज़ूर के ‘अरे रामा पीर, काम होता है तब आ जाते हैं नज़दीक और काम होने के बाद मुंह फेर लेते हैं ? ऐसे इंसानों से दूर ही रहना अच्छा है !’

सावंतजी – वाह रे लूण करण, वाह ! कितनी बढ़िया लोकोक्ति का उपयोग, किया तेरे उस्ताद ने ? क्या कहना है, तेरे उस्ताद का ?

[शाबासी देते हुए, उसका कंधा थपथपाते हैं ! पास बैठे माना रामसा को अच्छा नहीं लगता, कोई उसके चेले को झूठी शाबासी दे दे ? जनाब झट, बीच में बोल देते हैं..]

माना रामसा – इसको शाबासी क्यों दे रहे हो, यह झूठ का मगरमच्छ क्या जानता असली अफ़ीम की क़ीमत ? ‘दो हज़ार रुपये तोले की अफ़ीम को, यह कमबख्त क़ीमत बता रहा है एक हज़ार तोला ?’ अरे जनाब, मैं तो केवल असली दूध से तैयार की गयी अफ़ीम ही काम में लेता हूं ! कोई खांड मिली हुई अफ़ीम, काम नहीं लेता !

लूण करणजी – आपकी बात रखिये, उस्ताद ! दो हज़ार क्या, चार हज़ार रुपये तोला के भाव बोल देता हूं ! आप खुश रहिये, उस्ताद !

सावंतजी – तब यार लूण करण, तू चार के स्थान पर दस हज़ार रुपये तोले के भाव भी बोल दे..फिर भी यह तेरा उस्ताद, अफ़ीम छोड़ने वाला पूत नहीं !

रशीद भाई – हां रे, लूण करण ! सावंतजी, सत्य कह रहे हैं ! यह कमबख्त अफ़ीम ठोककर लेटा रहेगा, बबूल के नीचे ! साले ने जन्म लिया है, ख़ाली मस्ती मारने के लिए..

सावंतजी – यह मस्ती है ख़ाली चार दिन की, करणी दान हो जाएगा सेवानिवृत ! और अपुन चले जायेंगे अपनी बदली करवाकर जोधपुर ! फिर इस लंगूर की टांग खींचकर लंगड़िया साहब कहेंगे के “ले बेटे काम कर, नहीं तो...?”

रशीद भाई – साफ़ ही कहिये, भाईजान ! वे कहेंगे, के “काम नहीं करता है, तो ले ले वोलंटरी रिटायरमेंट !”

लूण करणजी – आप सभी हो जाइए, चुप ! मैं तबेला वाली बात कर रहा था, बीच में आप ले आये दूसरी बात ? सुनो, जैसे ही मैंने लंगड़िया साहब का नाम लिया..नाम सुनते ही, इनका नशा हो गया उड़न-छू ! अब मुझे पहचानकर कहने लगे, के ‘मैं दो सौ रुपये लूंगा, भाई !’ यह सुनते ही, मुझे मेरी नानी याद आ गयी..

रशीद भाई – ऐसी क्या बात कह दी, तूझे..?

लूण करणजी – मेमसाहब से बात हुई, केवल सौ रुपये की ! अरे रामा पीर, बाकी के रुपये मैं कैसे करूंगा एडजस्ट ?

रशीद भाई – अब कमाने गए, चूल्हे में ! क्या रे लूण करण, तूझे घर से पैसे लाकर देने पड़े ? माना रामसा ठहरे पंडित आदमी, फिर क्या इनको रहम नहीं आया तेरी हालत पर ?

[लूण करणजी माना रामसा के सामने, देखते हैं ! मगर, यह क्या ? माना रामसा तो उस बेचारे का चेहरा देखकर, ठहाके लगाकर हंसते जा रहे हैं..उनका यह हाल देखकर, लूण करणजी का कलेज़ा जलने लगा ! फिर, वे खीजे हुए कहते हैं..]

लूण करणजी – [खीजे हुए कहते हैं] – जनाब माना रामसा पंडित नहीं, इन्हें आप कसाई कहो ! इनको देखो, अपने चेले को भी नहीं छोड़ा..और ऊपर से क्या कहते हैं ? ‘धंधा है, भाई ! घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खायेगा क्या ? तू भी भाईड़ा सौ रुपये कमा रहा था, सोच ले तूने नहीं कमाए और कमा लिए उस्ताद ने ! आख़िर..

सावंतजी – आगे कुछ और कहा होगा, लूण करण !

लूण करणजी – इन्होंने कहा ‘इस बढ़ती महंगाई में, अफ़ीम का खर्च भी निकालना पड़ता है !’

[इतना कहकर, लूण करणजी कुछ देर रुके ! दु;ख के मारे उनकी रोने जैसी स्थिति बन जाती है, आंखें लाल-सुर्ख हो जाती है..फिर, वे लम्बी सांस लेकर आगे कहते हैं..]

लूण करणजी – फिर क्या, भाई साहब ? जेब में इतने पैसे नहीं जो मैं इनको दूं ? आख़िर, उल्टे पांव गया लंगड़िया साहब के घर ! वहां मेमसाहब से दो सौ रुपये लेकर, हाज़िर हुआ पंडितजी के दरबार में ! पहले इन्होंने रुपये गिने, फिर सागड़ी को बुलाकर उसे कहा...

सावंतजी – क्या कहा होगा ? कहा होगा, जा रे सागड़ी ! गोबर इकठ्ठा करके ला..

लूण करणजी – भाई साहब, अभी-तक आप मेरे कपड़े गोबर से ख़राब कराते रहेंगे ? अब सुनिए, इन्होंने कहा ‘ले जा रे, इस लूण करण को भैंस के साथ !’ तब सागड़ी ने, सीधा सवाल किया ‘क्या बाबूजी, भैंस को बाटा देने के लिए लाये हैं ?’ तब मैं उचकर बोला “बाटा देने की बात, क्यों कर रहे हो ? क्रोस कराने के लिए, इसे लाया हूं !”

रशीद भाई – आगे क्या हुआ, लूण करण ?

लूण करणजी – फिर क्या ? वह माता का दीना बोला, ज़ोर से के “यहाँ कोई क्रोस-व्रोस नहीं है, क्रोस करना है तो जाइए रेलवे फाटक के पास..जहां आये दिन हमारी भैंसे कट जाती है इस क्रोस के कारण ! गाड़ी आते वक़्त, ये खोजबलिये गेट-मेन फाटक बंद रखते नहीं ! और इन लफंगों की ग़लती से, हमारी भैंसे बेमौत मारी जा रही है !

माना रामसा – [ख़िल-खिलाकर, हंसते हुए कहते हैं] – अब क्यों बकवास करता है ? आख़िर, तेरा काम तो हो गया ना ?

लूण करणजी – [मरी हुई आवाज़ में कहते हैं] – मैं पढ़ा-लिखा आदमी, इस गंवार के सामने बोला अंग्रेजी के शब्द..और करायी मैंने खुद की इनसल्ट ! तब मैंने उसे क्रोस का मफ़हूम समझाया, तब वह बोला ‘क्यों अंग्रेजी झाड़ते हो बाबू, हम जैसे गंवारों के सामने ?’

सावंतजी – आगे बोल, लूण करण ! आगे, क्या हुआ ?

लूण करणजी – फिर, क्या ? उस सागड़ी ने पकड़ी भैंस की रस्सी, और भद्दी गालियां बोलता हुआ ऐसे कहने लगा “ले चल अब तेरी...[गाली की पर्ची निकालते हुए] ! [लम्बी सांस लेते हुए, आगे कहते हैं] काम तो हो गया हुज़ूर, मगर तकलीफ़ दूर हुई नहीं ! काम होने के बाद, इस भैंस की सारी मस्ती ख़त्म हो जाती है !

सावंतजी – फिर क्या हुआ, लूण करण ?

लूण करणजी - अरे जनाब, वापस आते वक़्त, यह भैंस दो-दो क़दम चले..और, चलती-चलती रुक जाए और कमबख्त करती जाए पतला-पतला गोबर ! कैसे तो उस भैंस को घसीट-घसीटकर लाना और साथ में गोबर से कपड़े नाश करवाना ? वह भैंस पद्मनी दो क़दम चले, और वापस रुक जाए ? कमबख्त ने फिर, अपने गोबर से नहला दिया मुझे !

रशीद भाई – फिर ?

लूण करणजी – आख़िर सिंझ्या आरती की वेला, उस भैंस को लेकर आ गया लंगड़िया साहब के घर ! मेरे पांवों की क्या दुर्दशा हुई, या तो मैं जानता हूं या जाने मेरे रामा पीर !

माना रामसा – [हंसते हुए कहते हैं] – तो मांग लेता, अफ़ीम की किरची..क्यों की शर्म..? जो करता है शर्म, उसके फूटे करम !

लूण करणजी – आपसे मांगू ? अरे हुज़ूर आप तो बन गए, व्यापारी ! हर काम के पैसे लेते हैं, आप ! अब मेरी जेब, अलाऊ नहीं करती ! [हाथ जोड़कर, कहते हैं] हुज़ूर, आप इस चेले पर दया रखें ! आपने इस चेले के साथ छल-कपट किया, मांजीसा की कसम..आपने अच्छा नहीं किया !

माना रामसा – इसमें, मेरी क्या ग़लती ? मैंने कब कहा रे तूझे, के तू लेता रह लोगों के काम अपने सर ? तू लेता ही क्यों, फिर पाता है फोड़ा ?

लूण करणजी – हुज़ूर, मैं आपका पक्का चेला हूं ! मेरे साथ इस तरह बेरुख़ी रखनी, अच्छी बात नहीं है !

[मगर इनकी बात का कोई असर, माना रामसा पर होता दिखाई नहीं देता ! ऐसा लगता है, माना रामसा इस ख़िलक़त की मोह-माया से दूर हो चुके हैं ! इस वक़्त इनका न कोई चेला है, और न ये जनाब किसी चेले के उस्ताद हैं ? बस, इनको केवल दिखाई दे रहा है..बेफिक्र होकर, सोना ! अब वे झट सर के नीचे हाथ रखकर, लेट जाते हैं ! अब सभी ने खाना खा लिया है, अपना-अपना टिफ़िन बंद करके सभी उठते हैं ! इतने में वही कुत्ता, जिसे ठोक सिंहजी ने पत्थर फेंककर भगाया था..अब वह पूंछ हिलाता हुआ आता है, और रशीद भाई के निकट आकर खड़ा हो जाता है ! रशीद भाई झट टिफ़िन खोलकर, बची हुई रोटी उस कुत्ते के सामने फेंकते हैं ! फिर, वे उसे कहते हैं]

रशीद भाई – [रोटी डालते हुए कहते हैं] – अरे भंडारी, आज़ बहुत दौड़ा दिया मुझे ? अब कभी दौड़ाया, तो आना मत रोटी मांगने !

[रोटी मिलने के बाद, वह कुत्ता काहे का अहसान जताता ? वह तो मुंह में रोटी दबाये, निर्मोही की तरह बेरुख़ी जतलाता हुआ वहां से चला जाता है ! इंसान भले माना रामसा के गुण सीखे या ना सीखे, मगर ये अबोल जानवर ज़रूर इनके गुण सीखकर मनारामसा का नाम रोशन कर रहे हैं ! थोड़ी देर बाद माना रामसा को छोड़कर, सभी गोदाम की और अपने क़दम बढ़ाते हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

[३]

[मंच पर, रोशनी फैलती है ! एफ़.सी.आई. दफ़्तर की इमारत दिखाई देती है ! इस दफ़्तर में गुणवत्ता अधिकारी लंगड़िया साहब अपने कमरे में, कुर्सी पर बैठे हैं ! उनकी मेज़ पर कई वाउचर बिखरे पड़े हैं ! पहले यह कमरा काफ़ी बड़ा था, मगर जबसे इस कमरे में कम्प्युटर काम हेतु कांच का चेंबर बना है तब से कमरा पहले जैसा नहीं रहा ! कांच की सेपरेशन वाल के पीछे एक तख़्त [bench] है, जिसके फर्श पर जाजम बिछी हुई है ! इस वक़्त तख़्त पर करणी दानजी बैठे हैं, और जाजम पर लूण करणजी और सावंतजी बैठे शतरंज खेल रहे हैं ! उनके पहलू में बैठे, रशीद भाई ऊंघ ले रहे हैं !

लंगड़िया साहब – [वाउचर्स को देखते हुए, बड़बड़ाते हैं] – यह वाउचर है, कागज़ की रिम का ! यह है झाड़ू का, और यह है फ़िनायल, मटकी वगैरा के ! इस तरह सभी वाउचर्स पर जुड़ा है, मेरा बीस परसेंट कमीशन ! रामा पीर तेरी मेहरबानी होगी तो आज सभी वाउचर्स भुगतान करवा देता हूं, तो पर-बारा भैंस के चारे का पक्का इंतज़ाम हो जाएगा !

[टेबल पर रखी बेल को बजाते हैं, घंटी सुनकर चपरासी अंगूरी लाल कमरे के भीतर दाख़िल होता हैं]

लंगड़िया साहब – [अंगूरी लाल से कहते हैं] – जा रे, लंगूरिया ! बाबू हजारी लाल को बुला ला ! [उसका चेहरा देखते हुए, कहते हैं] क्या बात है, ऐसा क्या मुंह बना रखा है..मानो कहीं, तू थाप खाकर आया है ?

अंगूरी लाल – हुज़ूर, मेरा नाम लंगूरिया नहीं है, मेरा नाम है अंगूरी लाल ! साहब, इस तरह आप मेरा नाम मत बिगाड़ने की कोशिश मत करें !

लंगड़िया साहब – आखिर, नाम में क्या धरा है रे ? मुझे क्या, तेरा नाम लंगूर हो या अंगूर की बोतल ? जा जल्दी जाकर, बुलाकर ला बाबू साहब को !

अंगूरी लाल – [सोचता हुआ, बड़बड़ाता है] – यह..यह अंगूर की बोतल नाम अच्छा है, नाम सुनते ही दिमाग़ में नशा छा जाता है !

[अंगूरी लाल जाता हुआ दिखाई देता है, थोड़ी देर बाद वह हज़ारी लालसा के साथ हाज़िर होता है]

हज़ारी लालसा – [फिक्रमंद बने हुए, कहते हैं] – क्यों बुलाया, जनाब ? ढेर सारा पेंडिंग काम छोड़कर आया हूं ! मुझे समझ में नहीं आ रहा है, इतना सारा काम मेरे सर पर..? अब इसे, कैसे निपटा पाऊंगा ?

लंगड़िया साहब – ओय गज़रा, अरे नहीं रे हज़रा..न न भाई हज़ारी लालसा ! ये वाउचर्स लीजिये, और इन सबका भुगतान शीघ्र कीजिये ! रोकड़ लेकर, झट मेरे पास आ जाइए ! टेबल पर पड़े, सभी वाउचर ले जाइये..पधारिये, पधारिये !

हज़ारी लालसा – [झुंझलाए हुए, कहते हैं] – साहब, अभी मेरे पास वक़्त नहीं है ! पेंडिंग काम में, उलझा हुआ हूं ! [धीरे-धीरे, कहते हैं] मुझे क्या करना, बेफालतू के वाउचर्स ले जाकर करूंगा क्या ? सारा कमीशन ठोकेंगे अकेले साहब, मुझे कुछ मिलने वाला नहीं ! फिर क्यों करूं, मगज़-पच्ची ?

लंगड़िया साहब – क्या बकता है ? जानता है चार-चार दुकानों पर घूम-घूमकर माल परखकर लाया हूं, इस कंटीजेंसी बज़ट का ? इतना घूमा वह भी स्कूटर पर, अब बोल पेट्रोल के पैसे देगा कौन ?

हजारी लालसा - पेट्रोल ज़रूर काम में आया है, मगर आपका नहीं ! बेचारे ग़रीब लूण करण के स्कूटर का पेट्रोल ख़त्म हुआ है ! इसमें आपके पैसे कहां खर्च हुए, जनाब ?

लंगड़िया साहब – यह तो तू मानता है, पैसे खर्च हुए हैं..चाहे किसी के भी हुए हैं ! नुक़सान की भरपायी तो होनी चाहिए !

हजारी लालसा – वज़ा फरमाया, हुज़ूर ! अब २० % राशि काटकर इस लूण करण को दे दूंगा, बेचारे ग़रीब को नुकसान की भरपायी हो जायेगी ! फिर बचे हुए पैसे आपको दे दूंगा, ताकि आप दुकानों पर घूम-घूमकर उधारी चुकाते रहेंगे !

लंगड़िया साहब – [ज़ोश में आकर, ज़ोर से कहते हैं] – ऐसे काहे बोल रहा है, हितंगिया ? तू है कौन, परबारा भुगतान करने वाला ? तूझे, क्या पता ? वह लूण करण, मुझसे रुपये उधार लिए बैठा है ? और, सुन ! बिलों के ऊपर, पेड बाई मी की चिड़ी मैंने लिखी है ! फिर किस हक़ से, तू भुगतान दूसरे को कर रहा है ?

हजारी लालसा – तब साहब आप यह समझ लीजिये, के ‘अभी मैं किसी काम में उलझा हुआ हूं..भुगतान इस वक़्त नहीं कर सकता !’ जानते नहीं आप, गोदाम के बाहर एक कुत्ता मरा पड़ा है..उसे उठाना है, ना तो बदबू चारों ओर फ़ैल जायेगी ! यह काम हो जाय, तब मैं कोई दूसरा काम हाथ में लूंगा !

लंगड़िया साहब – उठा दे, यार ! तूझे मना किसने किया है ?

हजारी लालसा – [नाराज़गी से] – वाह, जनाब वाह ! क्या बात कही आपने, मुझे ? कहीं आपने, नगर परिषद् का सफ़ाई मज़दूर समझ रखा है मुझे ? ऐसी मान-हानि करने वाली बात, आपने कैसे कह दी ? अब मैं ज़रूर उच्च अधिकारियों के पास आपकी शिकायत करूंगा, मेरी तौहीन कर डाली..आपने !

लंगड़िया साहब – [उसे खुश करते हुए, कहते हैं] - अरे भाई हजारी लाल, मैं तेरी तौहीन करूंगा ? चलो यह समझ लेते हैं, तूझे सफ़ाई-मज़दूर नहीं जमादार कहा है..अब तो बुलाकर ला दे, लूण करण को ! अभी इसी वक्त, तेरी समस्या का समाधान होता है !

हजारी लालसा – [होंठों में] – लंगड़िया साहब कहते सही है, जमादार का अर्थ है “जिम्मेदारी से काम करने वाला” तो फिर नगर-परिषद में जो जमादार होता है..वह क्या है ?

[नगर-परिषद के जमादार का काम समझ में आने के बाद, उनका मुंह गुस्से से लाल हो जाता है और वे प्रगट में कहते हैं]

हजारी लालसा – [गुस्से में] – नहीं जनाब, मैं जमादार नहीं हूं ! आपने मुझे मेहतरों का जमादार बना डाला, मेरी इन्सलेट कर डाली, अब रहने दीजिये ! आपको काम नहीं करवाना, समझ में आ गया ! चलता हूं !

लंगड़िया साहब – [हंसते हर कहते हैं] – तू नाराज़ क्यों हो रहा है, हज़रा ? किसने कहा तूझे जमादार ? कह भी दिया, तो क्या हो गया ? यह जमादार, इंसान नहीं होता ? तू मेरे मुंह से बाबू साहब कहलाना चाहता है, कमबख्त ? मेरी आंखों के आगे तू चपरासी से बाबू बना है..अब हेकड़ी मारता है ?

[उनके इतना कहने के बाद, हजारी लालसा का गुस्सा शांत होता है ! अब लंगड़िया साहब आगे कहते हैं..]

लंगड़िया साहब – कल तू मेरे आगे कचरा निकालता था, अब बन रहा है तीसमारखां ! अब जा बुलाकर ला, लूण करण को ! अभी वह, बाबूड़े सफ़ाई मज़दूर को घर से बुला लाएगा !

हजारी लालसा – [खुश होकर, कहते हैं] – अरे जनाब यह बाबूड़ा वही है, जिसका मकान चाय की दुकान के पीछे है ?

लंगाड़िया साहब – हां, वही ! वह तेरा पड़ोसी भी है, मगर यह बात कहने में तूझे हिचक किस बात की ? के, वह मेहतर है, तेरी जाति का है..और, तेरा पड़ोसी भी है !

हजारी लालसा – जो हुकूम, अभी इस लूण करण को भेजकर इस बाबूड़े को बुलवाता हूं जनाब !

[हजारी लालसा और अंगूरी लाल, जाते हुए दिखायी देते हैं ! थोड़ी देर बाद, लूण करणजी के साथ बाबूड़ा आता नज़र आता है ! बाबूड़े के हाथ में एक मोटी रस्सी है, वह लूण करणजी से कहता जा रहा है !]

बाबूड़ा – [नज़दीक आता हुआ] – लूण करणजी, मैं तो लूंगा रोकड़ा रुपये पच्चास ! एक अद्देला कम नहीं लूंगा, आपको काम करवाना है तो कहिये !

लूण करणजी – पहले तू काम तो कर, फिर..

बाबूड़ा – दूसरी एक बात और कह दूं, आपको ! मैं आपके स्कूटर पर कुत्ते की लोथ को बांधकर ले जाऊंगा, अपनी सहमति देते हैं तो आगे..

लूण करणजी – [घबराते हुए, कहते हैं] – यह क्या ? मेरी गाड़ी तूझे कोई मुर्दा गाड़ी नज़र आ रही है, ठोकिरे ? मैं नहीं देता, मेरी गाड़ी ! तू जाने, तेरा काम जाने..मुझे बीच में मत फंसा !

[दरी पर बैठे सावंतजी, उन दोनों की बातें सुन लेते हैं ! अब वे बिना बोले रह नहीं पाते, झट लापसी में धूल डालते जैसे शब्द बोल देते हैं !]

सावंतजी – लूण करण अब तू यों कर, तेरे उस्ताद माना रामसा से उनका स्कूटर मांगकर ले आ ! लाकर, इस बाबूड़े को दे देना ! आख़िर यह अफ़ीमची अफ़ीम लेकर पडा रहता है मुर्दे की तरह..

रशीद भाई – सच कहा, बड़े भाई ! इस तरह इस मुर्दे की गाड़ी, मुर्दे को ले जाने के काम आ जायेगी [बाबूड़े से कहते हैं] अरे यार बाबूड़ा बोल तो सही, तेरे काम आ जायेगी ना, इस मुर्दे की गाड़ी ?

बाबूड़ा – नहीं मालिक, पंडितजी का स्कूटर किसी हालत में, मैं लेने वाला नहीं ! जनाब आप तो जानते ही हैं, अगर मैं इनकी गाड़ी ले गया तो ये आली जनाब सरे आम मेरी पिटाई कर डालेंगे ! इनको कोई दोष देगा नहीं, खड़े तमाशबीन यही कहेंगे के “यह बेचारा नशेड़ी है, इसे होश है कहां ? सभी लोग, मुझे ही दोषी मानेंगे !”

[कमरे में बैठे लंगड़िया साहब इसकी बात सुनकर, झल्लाकर कहते हैं..]

लंगड़िया साहब – [झल्लाकर कहते हैं] – आख़िर, तू चाहता क्या है ? फिर ले जा उस गज़रे अरे नहीं हज़रे..हजारी लाल की बाईसिकल, आख़िर एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी के काम आना चाहिए ! अब जा पहले जा, कुत्ते की लोथ को देख आ ! वापस आते वक़्त, उस हज़ारी लाल से गाड़ी की चाबी लेते आना !

[लंगड़िया साहब ऐनक को ऊपर चढाते हुए, आगे कहते हैं..]

लंगड़िया साहब – [ऐनक ऊपर चढ़ाते हुए] – बाईसिकल की चाबी लेकर आये, तब तू एक बार मुझसे मिल लेना !

बाबूड़ा – क्यों नहीं, हुज़ूर ! हुज़ूर की मेहरबानी से, मुझे तगड़ी बख्शीश भी मिलेगी !

लंगड़िया साहब – [बनावटी गुस्सा दिखाते हुए] – अबे नालायक, तू तो मेरी लंगोटी उतार ले जाएगा ! अब जा, पहले काम कर !

[बाबूड़ा जाता हुआ दिखायी देता है, थोड़ी देर बाद मंच पर अंधेरा छा जाता है !
[४]
[थोड़ी देर बाद मंच पर रोशनी फ़ैल जाती है, दफ़्तर में हज़ारी लालसा बैठे हैं ! उनके पास बाबूड़ा खड़ा है ! वह हज़ारी लालसा से बाईसिकल की चाबी ले रहा है !]

हज़ारी लालसा – [चाबी सम्भलाकर देते हुए] – ले रे बाबूड़ा, बाईसिकल की चाबी ! झट-पट, कुत्ते की लोथ उठाकर ले जा ! नहीं तो, बदबू फ़ैल जायेगी ! [लम्बी सांस लेते हुए] ए मेरे रामसा पीर, अब कौनसा वाउचर निकालूं ? [सर थामते हुए] अधिकारियों को कमीशन खाना अच्छा लगता है, मगर कोई मक्खियों का गू बज़ट मंगवाने की कोशिश नहीं करता !

बाबूड़ा – [चाबी कब्ज़े में लेता हुआ कहता है] – साहब ने बुलाया है, पहले उनसे मिल आता हूं !
[बाबूड़ा जाता हुआ दिखायी देता है, हज़ारी लालसा कंटीजेंसीज की फ़ाईल खोलकर केलकुलेटर से वाउचर्स की जोड़ लगाते हैं और साथ में बड़बड़ाते जा रहे हैं]

हज़ारी लालसा – [बड़बड़ाते हुए] – ये सारे वाउचर्स निकाल लेता हूं, फिर बचेंगे एक सौ रुपये..बचे हुए रुपये और कहीं काम आ जायेंगे !

[थोड़ी देर बाद कमरे के बाहर शोर-गुल सुनायी देता है, अब बाबूड़ा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता हुआ दफ़्तर में दाख़िल होता है ! उसके पीछे-पीछे आते हैं, लंगड़िया साहब ! बाबूड़ा, बाबू हज़ारी लालसा से कहता है..]

बाबूड़ा – बाबू साहब, मैं तो पूरे रोकड़ा लूंगा रुपये दो सौ ! काम कराना हो तो कराइये, न तो मैं यह गया जनाब !

लंगड़िया साहब – [बाबूड़े से कहते हैं] – क्यों रे, अभी तो तूने पच्चास रुपये में कुत्ते की लोथ ले जाने का वादा किया..अब तू अपनी जबान से, बदल क्यों रहा है ?

बाबूड़ा – [हज़ारी लालसा से कहता है] - उस वक़्त मैंने कुत्ते की लोथ देखी नहीं, अब देखकर आया हूं ! अब दो सौ रुपये से कम लेने की बात, पैदा भी नहीं होती ? काम कराना है, तो लाइए दो सौ रुपये, अन्यथा रामजी राज़ी..यह लीजिये बाबूसाहब, अपनी बाईसिकल की चाबी ! मैं यह गया, अब आप किसी दूसरे आदमी से यह कुत्ता उठवा लेना !

[चाबी देने हेतु वह अपनी जेब में हाथ डालता है, और दूसरी तरफ़ हज़ारी लालसा की आँखों के आगे दो दिन बाद होने वाला मंज़र छा जाता है ! वह मंज़र ध्यान में आते ही हज़ारी लालसा बदबू का अहसास करते हैं, और उनका हाथ नाक पर चला जाता है ! नाक को दबाते ही, वह मंज़र लोप हो जाता है ! चेतन होते ही हज़ारी लालसा, हाथ जोड़कर लंगड़िया साहब से इतना ही कह पाते हैं..]

हज़ारी लालसा – [हाथ जोड़कर कहते हैं] - साहब, दो सौ रुपये में लोथ उठाने का हुक्म बाबूड़े को दीजिये ! हुज़ूर, आपकी बहुत मेहरबानी होगी !

लंगड़िया साहब – [बनावटी गुस्सा जतलाते हुए कहते हैं] – यह कैसे हो सकता है, पहले लोथ उठाने का सौदा हुआ केवल पच्चास रुपये में..अब कैसे दे सकते हैं, दो सौ रुपये ? यह ग़ैर-कानूनी होगा ! मैं कभी, ग़ैर-कानूनी काम नहीं करता ! तू तो बहुत समझदार है रे, हज़ारी लाल ?

हज़ारी लालसा – [विनम्रता से] – हुज़ूर मेहरबानी कीजिये, मैं हमेशा आपके गुण गाऊंगा..मेरे बच्चे आपको दुआ देंगे ! आप तो मालिक जानते ही हैं, दो दिन में यह बदबू बेक़ाबू हो जायेगी ! बाबूड़े के स्थान पर कोई दूसरा सफ़ाई मज़दूर लोथ उठाने आयेगा नहीं ! इन लोगों में बहुत एकता है, हुज़ूर ! आप फ़िक्र कीजिये मत, मैं आपके सभी कंटीजेंसीज के बकाया बिल निकाल दूंगा !

[हज़ारी लालसा की बात सुनकर, लंगड़िया साहब बहुत खुश होते हैं ! मगर वे अपनी खुशी को, ज़ाहिर होने नहीं देते ! फिर हज़ारी लालसा पर अहसान जतलाते हुए, लंगड़िया साहब कहते हैं]

लंगड़िया साहब – [अहसान जतलाते हुए, कहते हैं] – चलो ठीक है, आगे से तू भी याद रखेगा..के “कैसे दिलदार अफ़सरों के साथ तू रहा है ?” मगर आगे से याद रखना, तू कभी मुझसे ऐसे ग़ैर कानूनी काम करने का कहना मत..आख़िर मैं हूं क़ानून का कीड़ा ! अब दे दे इस बाबूड़े को, दो सौ रुपये !

[हज़ारी लालसा झट पेटी से दो सौ रुपये निकालकर, बाबूड़े को थमाते हैं ! उसके रुपये लेने के बाद, लंगड़िया साहब बाबूड़े से कहते हैं]

लंगड़िया साहब – बाबूड़ा चल अब मेरे कमरे में, तुझसे अर्जी लिखवा लेता हूं ! फिर उस पर भुगतान का आदेश लिखकर, तेरे अंगुठे का निशान ले लेता हूं !

[आभार मानते हुए, हज़ारी लालसा लंगड़िया साहब की तरफ़ देखते हैं ! और अपने दिल में सोचने लगे के “इस भले पुरुष ने वक़्त पर काम निकाला है, अन्यथा मुझे असहनीय बदबू का सामना करना पड़ता ?” अब लंगड़िया साहब और बाबूड़ा जाते हुए, दिखायी देते हैं ! थोड़ी देर बाद, बाबूड़ा अर्जी लिए हुए आता है ! अर्जी को देखकर, हज़ारी लालसा कहते हैं !]

हज़ारी लालसा – रुपये गिनने में तो उस्ताद है, ठोकिरा ? मगर अर्जी पर भुगतान के आदेश लिखवाने में पीछे कैसे ? अब जा वापस, उस मुर्दे के पास..अरे नहीं रे..

बाबूड़ा – अरे नहीं जनाब, अब मुर्दे के पास नहीं..अब सीधा जाऊंगा साहब के पास ! [अर्जी लेता है] अभी इस पर आदेश लिखवाता हूं, फिर आपको अर्जी लाकर दूंगा ..इसके बाद ही मैं जाऊंगा मुर्दे के पास !

[फिर क्या ? थोड़ी देर बाद आकर बाबूड़ा, हज़ारी लालसा को अर्जी थमा देता है ! कोने में रखी रस्सी उठाकर, वह चला जाता है गोदाम की तरफ़ ! उसके जाने के बाद, हज़ारी लालसा के कानों में लंगड़िया साहब के ठहाके सुनायी देते हैं ! अब मंज़र आता है, लंगड़िया साहब के कमरे का ! जहां, लंगड़िया साहब बड़बड़ाते जा रहे हैं..]

लंगड़िया साहब – [बड़बड़ाते हुए] – मज़ा आ गया, आज तो देवी लक्ष्मी मुझ पर तुष्ठमान हुई है ! और हो गयी, नोटों की बरसात ! यह गधा हज़ारी लाल, समझता क्या है ? कमबख्त हज़ारी नहीं, गज़रा है ! आख़िर है, क्या ? साला है तो चपरासी से बना हुआ..यह क्या समझे, अफ़सर की चालें ? हम तो वह अफ़सर हैं, जो लहरों को गिनकर पैसे कमा लेते हैं ! रोज़ रुपये आते रहे, जेब में..चाहे कम आये या ज्यादा ? बस पेटिये की कमी, नहीं आनी चाहिए !

[इतना कहकर, लंगड़िया साहब उठकर खिड़की के पास चले आते हैं और खिड़की से मुंह बाहर निकालकर ज़र्दे की पीक थूकते हैं ! पीक थूकते दौरान उन्हें दरी पर बैठे रशीद भाई की आवाज़ सुनायी देती हैं, वे सावंतजी से कह रहे हैं..]

रशीद भाई – बड़े भाई, खाने वाले आदमी तीन तरह के होते हैं ! पहला वह है जो खाता है हाथी की लीद, दूसरा वह है जो खाता है घोड़े की लीद ! इसके बाद सबसे निकृष्टतम वह है, जो खाता है गधे की लीद ! ये छोटे-छोटे कंटीजेंसीज़ वाउचर्स पर लगी कमीशन की राशि, आख़िर है क्या ? गधे की लीद, और क्या ?

[रशीद भाई की बात सुनकर, लंगड़िया साहब को बहुत गुस्सा आता है ! उन्हें ऐसा लगता है, मानो रशीद भाई ने उनको सरे बाज़ार में सारे कपड़े उतारकर..नंगा कर डाला है ?
आख़िर, क्रोधित होकर वे रशीद भाई को आवाज़ देकर अपने पास बुलाते हैं ! हड़बड़ाते हुए रशीद भाई उठते हैं, और लंगड़िया साहब के पास चले आते हैं ! उनके आने पर, वे रशीद भाई से कहते हैं..]

लंगड़िया साहब – रशीद झट-पट चला जा, गोदाम में ! अभी आगे-आगे ही बाबूड़ा गया है गोदाम में..कुत्ते की लोथ को उठाने ! अब तू वहां जाकर, उसकी मदद कर !

रशीद भाई – [ताज्जुब करते हुए कहते हैं] – साहब, क्या मैं क़ब्र खोदने वाला हूं या मेरा धंधा गोरखान का है ? हुज़ूर मैं एफ़.सी.आई. का डस्ट-ऑपरेटर हूं, मेरा काम लोथ को ले जाने या ज़मीन में दफ़न करने का नहीं है ! फिर मैं, इस बाबूड़े की मदद कैसे करूं ?

लंगड़िया साहब – [गुस्से में] – रशीद, तेरे मिज़ाजे शरीफ को ठंडा रख ! मैं जानता हूं के ‘उस कुत्ते को, किसने मारा ?’ या तो तूने उस कुत्ते को जहरीली रोटी खिलाकर मारा है, या फिर उसे मरे चूहे खिलाकर उसे मारा है ? अब बता तू, गोदाम में मरने वाले चूहों को ज़मीन में दफ़न किया जाता है, या फिर उन चूहों को कुत्तों को खिलाया जाता है ?
रशीद भाई – [घबराते हुए कहते हैं] – हुज़ूर, क्या कह रहे हैं..आप ? मेरे समझ में, कुछ नहीं आ रहा है ?

लंगड़िया साहब – [ज़ोर से कहते हैं] – सच कह रहा हूं, और क्या ? तू इस कुत्ते का हत्यारा है ! गनीमत है, अभी-तक तेरे खिलाफ़ पशु क्रूरता अधिनियम के तहत कोई केस नहीं बनाया है..मैंने !

रशीद भाई – ग़लती हो गयी, हुज़ूर ! माफ़ कीजिये !

लंगड़िया साहब – अब तू चुप-चाप चला जा गोदाम में, और जाकर उस बाबूड़े की मदद कर ! आगे से तेरे दिमाग़ में यह बात बैठा लेना, के ‘मैं कमजोर अफ़सर नहीं हूं, जो तेरी बदतमीज़ी बर्दाश्त करता रहूंगा !’ यह समझ लेना, तेरे खिलाफ़ कभी भी कार्यवाही प्रस्तावित की जा सकती है !

[इतना सुनकर रशीद भाई की हालत हो जाती है, पतली ! डर के मारे उनके हाथ-पांव कांपने लगते हैं ! इधर इनके रोम-रोम से, पसीना टपकने लगा ! लंगड़िया साहब की धमकी असरदार होती जा रही है, अब उनको सामने आ रहा रिटायरमेंट दिखायी देने लगा ! कहीं इतनी लम्बी उज़ली नौकरी पर, दाग न लग जाए ? फिर क्या ? बेचारे रशीद भाई उल्टे पांव, जाने लगे गोदाम की ओर ! अब गोदाम और दफ़्तर के बीच का रास्ता, उनके लिए पार करना मुश्किल हो जाता है ? उनके दिल में, टीस पैदा होने लगी ! वे आकाश की तरफ़ देखते हुए, बड़बड़ाने लगे..]

रशीद भाई – [बड़बड़ाते हुए] – छल, कपट..हाय अल्लाह, अब क्या जीना ? आज इंसान इंसान पर भरोसा कैसे करें ? ए मेरे परवरदीगार किस नामाकूल ने कह दिया इस लंगड़िये को, के “इस कुत्ते को, रोटी डालने वाला मैं ही हूं ! अब ख़िलकत वालों से, क्यों प्रीत रखें ? आज से इन लोगों से रखनी है, बेरुख़ी..बेरुख़ी ! गोदाम की तरफ़ क़दम बढाते ग़मगीन रशीद भाई के ग़म-भरे लफ़्ज़, लबों पर आकर चारों ओर आसमान में गूंज़ने लगते हैं..]

रशीद भाई – छल, कपट और बेरुख़ीಽಽ..!

[रशीद भाई का हाथ आकर, सीधा उनकी छाती पर गिरता है ! उनके दर्द भरे लफ़्ज़ों को सुनने वाला, उन्हें दूर-दूर तक कोई इंसान नज़र नहीं आता ! बस उन्हें ऐसा लगता है, ‘आभा में उड़ने वाले पक्षी अपने पंखों को फड़फड़ाकर, रशीद भाई की अरदास ख़ुदा के पास पहुंचा रहे हैं ?’ थोड़ी देर बाद, मंच पर अंधेरा फ़ैल जाता है !















लेखक का परिचय
लेखक का नाम दिनेश चन्द्र पुरोहित
जन्म की तारीख ११ अक्टूम्बर १९५४
जन्म स्थान पाली मारवाड़ +
Educational qualification of writer -: B.Sc, L.L.B, Diploma course in Criminology, & P.G. Diploma course in Journalism.
राजस्थांनी भाषा में लिखी किताबें – [१] कठै जावै रै, कडी खायोड़ा [२] गाडी रा मुसाफ़िर [ये दोनों किताबें, रेल गाडी से “जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन” के बीच रोज़ आना-जाना करने वाले एम्.एस.टी. होल्डर्स की हास्य-गतिविधियों पर लिखी गयी है!] [३] याद तुम्हारी हो.. [मानवीय सम्वेदना पर लिखी गयी कहानियां].
हिंदी भाषा में लिखी किताब – डोलर हिंडौ [व्यंगात्मक नयी शैली “संसमरण स्टाइल” लिखे गए वाकये! राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा विभाग का उदय, और उत्पन्न हुई हास्य-व्यंग की हलचलों का वर्णन]
उर्दु भाषा में लिखी किताबें – [१] हास्य-नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” – मज़दूर बस्ती में आयी हुई लड़कियों की सैकेंडरी स्कूल में, संस्था प्रधान के परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हास्य-गतिविधियां इस पुस्तक में दर्शायी गयी है! [२] कहानियां “बिल्ली के गले में घंटी.
शौक – व्यंग-चित्र बनाना!
निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].
ई मेल - dineshchandrapurohit2@gmail.com


 










0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget