रचनाकार परिचय:-


लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
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अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी हास्य-नाटक  [गाड़ी के मुसाफ़िर- बकरा मन्नत का] खंड 6 लेखक और अनुवादक -: दिनेश चन्द्र पुरोहित



[मंच रोशन होता है, मोती-चौक का मंज़र सामने दिखाई देता है ! अलग-अलग कौम के ताजिये चौक में रखे हैं ! उनके चारो ओर मुरीदों की भीड़ नज़र आ रही है ! यह भीड़ उच्च स्वर में, वहां खड़े कव्वालों के साथ ग़मज़दा गीत गा रही है ! सारे कव्वाल काले वस्त्र पहने खड़े हैं, और वे छाती पीटते हुए ग़मज़दा गीत एक सुर में गाते जा रहे हैं ! इन लोगों के ग़मज़दा गीत सुनकर, सारे मुरीद ग़मगीन होते जा रहे हैं !]

कव्वाल – [एक सुर मे, गाते हुए] – ‘शहीदे करबला बाबा, गरीबुल बेवतन बाबा ! हसन को जहर पिलाया, हुसैन को तेगो से छिदवाया ! मिटाया रफत: रफ़त: से निशाने पंजतन बाबा ! शहीदे करबला बाबा, गरीबुल बेवतन बाबा ! अगर हम राह में होती, तुम्हारी लाश पर रोती ! गदाई करके पहनाती, तुम्हें दो गज कफ़न बाबा ! शहीदे करबला, गरीबुल बेवतन बाबा ...!’

[गम में डूबे हुए इन मुरीदों की हालत बुरी होती जा रही है ! उनका दिल-ए-दर्द बढ़ता जा रहा है ! कव्वालों का साथ देते-देते उनके बुलंद सुर, आसमान में गूंजने लगे !]

मुरीद और कव्वाल – [एक सुर में गाते हुए] – कांपती है ज़मीन करबला की चीखकर, आसमां रो रहा है, फातमा तेरे बेटे के ग़म में आज़ सारा जहां रो रहा है ! सुबहा हंसता था झूले के अन्दर...कह रही है सकीना, ये रोकर ‘या ख़ुदा, मेरा नन्हा सा असगर ! आज़ जाने कहाँ रो रहा है ? पत्ते-पत्ते की है आंख, अब नम....हर कली अब रोकर करती है, मातम ! आज़ सबीर के ग़म में देखो, गुल तो क्या ? गुलिस्ता रो रहा है ! अपने दिल पर किसी का वश नहीं है, आज़ माहे मोहर्रम की दस है...बूढ़ा, बच्चा जवां सभी रो रहे हैं...!’

[अब शिन्नी का थाल लिए, रशीदा जान दिखाई देती है ! इस वक्त वह भी ग़मज़दा वस्त्र पहने है, वह नयनों से आंसू रूपी मोतियों को गिराती हुई आ जाती है ताजिये के निकट ! वहां खड़े मुज़ाविर को थाल थमा देती है ! यहां नज़दीक ही, छबील से भरे बड़े-बड़े पात्र रखे हैं ! अब चारों ओर पीटे जा रहे ढोल-नगाड़ों की आवाज़, बढ़ती जा रही है, मोहल्ले के युवा तुर्क मियां जबरुद्दीन भारी ढोल लिए ताजिये के चारो ओर ज़ोर से ढोल पीटते हुए चक्कर लगा रहे हैं ! ढोल बजाने के पहले वे मकानों की मुंडेर की तरफ़ देखते हुए दोनों हाथों को ऊपर ले जाते हैं ! फिर हाथों में थामी हुई डंडियों का क्रोस बनाते हैं ! क्रोस बनाते वक़्त वे एक बार मुंडेर की तरफ़ देख लेते हैं, और वहां खड़ी हसीन चुलबुली मोहतरमाओं के बीच शायद उनकी मंगेतर हुस्ना दिखाई दे जाय ? आज तो हुस्ना ने नीले रंग का दुपट्टा पहन रखा है, जो उसकी ख़ूबसूरती पर चार चाँद लगा रहा है ! उधर दूसरी तरफ़,जवान लौंडों ने अच्छा-ख़ासा मज़मा लगा रखा है ! अल्लानूर और जमाल मियां के बीच तलवारी बाज़ी चल रही है ! और दूसरी तरफ़ रस्सी पर चढ़े, असरफ और आरीफ़ मियां चाकू का कमाल दिखला रहे हैं ! अल्लारखा और रहीम मियां तो लाठियों का जंग दिखलाते ऐसे लग रहे हैं, मानो वे असल में जंगजू बन चुके हो ? अब रशीद भाई और उनके काणे मामू प्यारे माणक चौक में तशरीफ़ लाते नज़र आते हैं ! ये दोनों, हमउम्र के लौंडे ठहरे ! इस वक़्त, वे दोनों दिलचस्प बातें करते नज़र आ रहे हैं !]

रशीद भाई – मामू प्यारे, यहां किसने मज़मा लगा रखा है प्यारे ? मेरी तो यही तमन्ना है यार, इंशाअल्लाह...काश, इस चमन में कोई हसीन गुलाब खिल जाय ! तो प्यारे, मज़ा आ जाएगा !

मामूजान – फिर क्या ? तब भाणजे तेरा दिल बाग़-बाग़ हो जाएगा, और तू बैठकर गायेगा [बेसुर में गाते हैं] बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है..!’

रशीद भाई – मामू, मैं तो गा लूंगा ! मगर, तू ज़रूर नाच लेना नेरे नगमें पर ! बाद में जाकर चच्चाजान को भड़का मत देना, के ‘यह भाणजा नचंया लौंडा तो था ही, और अब यह महफिलों में गाने लग गया है...[ताजिये के निकट खड़ी रशीदा जान की तरफ़ अंगुली से इशारा करके, कहते हैं] वो भी रशीदा जान के पहलू में बैठकर !

मामूजान – वाह भाणजे, क्या नाम लिया है यार ? अरे यार, रशीदा जान हाय.. कमसीन गुलाब के फूल की पंखुड़ियों की तरह नाचती है...क्या गाती है, प्यारे ? मानो किसी ज़ंगल में, कोई कोयल मधुर आवाज़ में कुहूक रही हो ? वाह, क्या गला बख्शा है इसे, अल्लाह मियां ने ? यह कितनी ख़ूबसूरत है, यार ?

रशीद भाई – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – उसके चिपक मत जाना, प्यारे मामू ! तेरी बहुत बुरी आदत है, बोरटी के कांटे की तरह चिपकने की !

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – उज्र किस बात का, प्यारे ? गुलाब ख़ुद खिलता है कांटो के बीच ! मगर एक बात कह देता हूं तूझे, तू छिपकली की तरह हमारे बीच में टपक मत जाना ! कमबख्त, तू तो ठहरा बदशगुनी...! काम बिगाड़ देगा, बीच में आकर ?

रशीद भाई – वाह, मामूजान वाह ! किब्ला, मैं तो ठहरा आपका एहबाब..और अपुन दोनों रोज़ साथ करते हैं सैर-ओ-तफ़रीह ! फिर इस नाचीज़ को उगालदान बनाकर, काहे आप नसीबे दुश्मना ले रहे हैं मोल ?

मामूजान – वल्लाह क्या हाल है, हुजूरे आला के ? अब आपकी, तसन्नो करूं ? [आवाज़ में मधुरता लाते हुए] क्या, आपका सदका उतारूं ? आप में इतनी क़ाबिलियत है, हुज़ूर ? आली ज़नाब, तब आप इस तिहिदस्त इंसान को उस ग्रजालचश्म मेहरारू रशीदा जान के दीदार से ख़ुशअख्तर बना दीजिये ना ?

रशीद भाई – देख मामू, मैं तामात नहीं कर रहा हूं ! और न तेरे जैसे करता हूं, बेफिज़ूल की बकवास ! यार तू कहे तो, कुछ करके दिखला दूं क्या ? मुझे तू अपने जैसा अक्लेकुल समझने की ग़लती करना मत, जो कुछ कर नहीं पाता....बस, खाली ज़बानी घोड़े दौड़ाता रहता है !

मामूजान – [तल्ख़ आवाज़ में] – भाणजे, तू क्या दिखला सकता है ? इस रशीदा जान को तो छोड़ यार, तू तो यार इस ढोलकिये जबरुद्दीन से चारों ओर चक्कर कटवा ले तो बोल !

रशीद भाई – [हैरत से] – किसके आस-पास ? तू कहे तो...तेरे चारों ओर चक्कर लगवा दूं, प्यारे ?

मामूजान – [आश्चर्य से] – क्या कहा, तूने ? मेरे चारों तरफ़..? अरे प्यारे, मेरे चारों तरफ़ चक्कर लगाने के लिए उसे सौ दफ़े जन्म लेना होगा इस ख़िलक़त में ! मैं तो तूझे अब यह कहूंगा, देख उस महावतों के ताजिये को..[अंगुली के इशारे से दिखलाते हैं, वो महावतों का ताजिया कहाँ रखा है ?] उसके चारों ओर इस वज़नी ढोल को लिए ख़ाली पांच चक्कर कटवा ले, उस ढोलकिये से...तो मैं समझ लूंगा, के कितना पोदीना है तेरे अन्दर ?

रशीद भाई – [जोश में आकर, कहते हैं] – अभी लगवाता हूं उससे, चक्कर ! पांच-पांच क्या कहता है, उल्लू ? उससे सौ चक्कर लगवा दूंगा, फिर बोल प्यारे मामू...बाद में तू कौनसा काम करना चाहेगा मेरे लिए ? बोल फूटी झालर, लगाता है शर्त ? [झट, दायीं हथेली सामने लाते हैं...शर्त लगाने के लिए]

[रशीद भाई की हथेली पर, शर्त लगाने के लिए झट अपनी बाईं हथेली ज़ोर से रखते हैं ! फिर कहते हैं.. ]

मामूजान – यह लगायी शर्त..[उनकी हथेली के ऊपर, ज़ोर से अपनी हथेली रखते हुए कहते हैं] यह ले, यह लगायी शर्त ! अब तू जाकर कटवा दे उससे सौ चक्कर, तू जीत गया तो मार लेना सौ जूत्ते मेरे सर पर !

रशीद भाई – यह ले, अभी देख मेरा कमाल ! अब, यही खड़े रहना..चक्कर कटवाकर अभी वापस आता हूं !

[अब रशीद भाई जबरुद्दीन को आवाज़ देते हुए जाते हैं, उसके पास ! फिर वे पीछे से उसकी पीठ पर, लगाते हैं ज़ोर का घुद्दा ! फिर, कहते हैं...]

रशीद भाई – [घुद्दा मारकर कहते हैं] – क्यों रे, लंगूर की औलाद..क्या नाम है तेरा ? जबरू या कबरू ? या फिर तूझको कह दूं, काबरिया कुत्ता ? मुझे तो तू लगता है, तू गली का काबरिया कुत्ता है !

जबरुद्दीन – उस्ताद, अपनी ज़बान पर लगाम दीजिये ! आपकी बहुत इज़्ज़त करता हूं, इसका मफ़हूम यह नहीं के आप बेखौफ़ होकर बोलने का हक़ रखते हैं ? इस तरह आप, सरे आम मुझको ज़लील नहीं कर सकते !

रशीद भाई - यार जबरू, तू तो डोफ़ा ठहरा घास मंडी का ! यों कैसे नाराज़ हो जाता है, साले लंगूर की औलाद ! मैं तो प्यारे यह देखना चाहता था, तेरे अन्दर अब कुछ दम-ख़म बचा है या नहीं ? या फिर तूने खा-पीकर, इस बदन में वादी भर रखी है ? साले कहीं तूने अपनी आँखों पर, दस नंबर का ऐनक तो चढ़ा न रखा है ? या फिर तू, कोई ख़बर रखना नहीं चाहता ? [मुंडेर की तरफ़, अंगुली से इशारा करते हैं]

जबरुद्दीन – [मुंडेर की तरफ़ देखते हुए, कहते है] – देखिये भाईजान, मेहरबानी करके आप मुझे उलझन में मत डाला करें ! बात को सीधी-सीधी कहिये, तोड़-मरोड़कर बात को पेश मत कीजिये ! एक बात आपको समझा देता हूं, के हम जबरू उस्ताद हैं ! कोई कबरू-काबरिया नहीं हैं ! आप समझ गए, या नहीं
?

[कमीज़ की बाहें ऊंची करते हुए कहते हैं, फिरउचकाकर दिखलाते हैं...अपनी डोले ! फिर उस भारी वज़नी ढोल को दोनों हाथों से ऊपर उठाकर, कहते हैं]

जबरुद्दीन – देख लीजिये, भाईजान ! इस पच्चास किलो के वज़नी ढोल को इस तरह, आसानी से उठा लिया है मैंने ! उठा क्या लिया, इसे ? यहां तो इसको बजाता हुआ मैं, कई मर्तबा चक्कर भी काट लिया करता हूं ! [ढोल को, नीचे ज़मीन पर रखते हुए] अब कहए, मेरे अन्दर दम-ख़म है या नहीं ?

[मगर, रशीद भाई, पर कोई असर नहीं ! वे तो उसकी मज़ाक़ उड़ाते हुए, ज़ोर-ज़ोर से हंसते जा रहे हैं !]

जबरुद्दीन – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] – काहे दांत निपोर रहे हैं, आप ? ऐसा लग रहा है, आपके इस खुले मुंह से लार टपक रही है..उस ज़ंगल के सियार की तरह ! [वापस बाएं ऊंची करते हुए, उचकते डोले दिखलाते हैं] है कोई बहादुर, इस खिलकत में ? जो इस वज़नी ढोल को ऊँचाकर, जवान तुर्क होने का सबूत पेश करता हो ? अब कहिये, भाईजान !

रशीद भाई – [एक बार और मुंडेर की तरफ़ अंगुली का इशारा करते हुए, कहते हैं] – देख रे, जबरू ! तेरी मंगेतर हुस्ना, वही नीले दुपट्टे वाली तूझे बड़े प्रेम से देखती जा रही है ! और अभी कुछ समय पहले अपनी सहेलियों को कह रही थी, के...? तूझे पता है, लंगूर..वह क्या कह रही थी ?

[अब अपनी मंगेतर की बात, कौन सुनना नहीं चाहेगा ? आख़िर, उसने क्या कहा ? यह जानने के लिए, जबरू मियां झट मस्का मारने के लिए तैयार हो जाते हैं !]

जबरुद्दीन – [रशीद भाई की खुशामद करते हुए, कहते हैं] – भाईजान, आप तो मेरे उस्ताद ठहरे ! बताइये, बताइये ! वो हुस्ना, क्या कह रही थी ? और आप कहाँ खड़े रहकर, उसकी कही बात को सुना आपने ? प्लीज़ बता दीजिये ना, आपकी मेहरबानी होगी !

रशीद भाई – अरे यार, ढोलाकिये ! जिस मुंडेर पर अभी वह खड़ी है, उस मुंडेर के नीचे एक पाख़ाना है ! एक बार वह अपनी सहेलियों के साथ गुफ़्तगू करती हुई नीचे आयी, और उसी वक़्त मैं निपटकर उस पाख़ाने से बाहर आया ही था ! तब वह अपनी सहेलियों से कह रही थी, के ‘यह ढोलकिया जबरुद्दीन, अपने मोहल्ले की शान है !’ उसकी कही बात सुनकर उसकी सहेलियां हंसी के ठहाके लगाकर कहने लगी, के ...

जबरुद्दीन – आगे कहिये, भाईजान ! शायद उसकी सहेलियों ने, मेरी तारीफ़ ही की होगी ?

रशीद भाई – वे कहने लगी के ‘जबरुद्दीन..? वो बांका जवान नहीं है, जो इस मोहल्ले की शान रख सके ! यह ढोलकिया नहीं होकर, होगा कोई नगाड़ची ! इस बेचारे ने कब बजाये हैं, ताजिये के ढोल ? यह क्या मोहल्ले की शान बकरार रख सकता है ? आख़िर यह तो ठहरा, पोदीने की चटनी ! ऐसा अगता है, इससे तो अच्छा है, अपनी गली का काबरिया कुत्ता !

[इतना कहने के बाद, रशीद भाई उसके चेहरे पर आते-जाते भावों को पढ़ने की कोशिश करते हैं ! फिर क्या ? इनकी कही हुई बात जबरुद्दीन के लिए, नाक़ाबिले बर्दाश्त प्रतीत होने लगी ! जबरुद्दीन गुस्से से काफ़ूर होकर, कहने लगे..]

जबरुद्दीन – [गुस्से से] – मौत आयी है, उन शैतान की खालाओं की ! मेरी जूत्ती की बराबरी तो करती नहीं, और चली ताने देने ?

रशीद भाई – [झगड़ा बढ़ाने के लक्ष्य से, कह देते हैं] – उन छोरियों ने आगे यह भी कहा ‘अगर इस ढोलकिये में इतना दम-खम होगा, तो यह मर्दूद इस वज़नी ढोल को बजाते हुए लगा देगा सौ चक्कर...इस महावतों के मोहल्ले के ताजिये के चारों ओर ! अगर यह चक्कर काट नहीं पाया, तो हम यह समझ लेंगी के ‘यह ढोलकिया जवान मर्द न होकर, है केवल गली का काबरिया कुत्ता !’

[इतने सारे आलोचना के मोती पिरोकर, रशीद भाई अब ‘उनके चेहरे पर आ रहे, और जा रहे भावों को’ पढ़ने की कोशिश करते हैं ! फिर उनके कंधे पर हाथ रखकर, कहते हैं]

रशीद भाई – [कंधे पर हाथ रखकर, कहते हैं] – देख ले, जबरू ! अब तुझको हुस्ना की बात का मान रखना है, तो काट ले सौ चक्कर इस ताजिये के चारों ओर ! नहीं तो प्यारे कर दे एलान, के ‘जबरू अब जवान मर्द नहीं रहा, अब तो वह बन गया है नागाड़ची...इस बेचारे को कहाँ आता है, ताजिये के ढोल बजाने ? आख़िर यह जबरू ठहरा, गली का काबरिया कुत्ता !’

जबरुद्दीन – मैं यह सोच रहा हूं, इन कमबख्त सहेलियों की इतनी मजाल, जो जबरू उस्ताद की शान में गुस्ताखी करे ?

रशीद भाई – इतना गुस्सा जाहिर न कीजिये, हम भी जानते हैं [कलाम पेश करते हैं] गुस्सा होने का हक्क सिर्फ उनको होता है, जो दिल के बहुत नजदीक हुआ करते है….!’ यार जबरू, थोड़ा गम खा, जानता है के [कलाम पेश करते हैं] ‘रिश्ते खराब होने की एक वजह ये भी है कि लोग अक्सर टूटना पसंद करते है, पर झुकना नहीं !’

जबरुद्दीन – तब क्या करूं, भाईजान ?

रशीद भाई - इसलिए कहता हूं जबरू, तू सुन ले मेरी बात ! उसकी सहेलियों का मुंह बंद करने के लिए तूझे इस महावतों के ताजिये के चारों ओर सौ चक्कर काटने ही होंगे, न तो तू उनके सामने जबरू नहीं गली का काबरिया कुत्ता माना जाएगा ! बोल जबरू, अब तू तैयार है ?

जबरुद्दीन – [तैश में आकर, कहते हैं] – ऐसी बात है तो भाईजान, यह लीजिये ! अब, सौ क्या ? मैं आराम से काट लूंगा, दो सौ चक्कर...इस ताजिये के, चारों ओर ! आख़िर मैं जानता हूं, मेरे सिवाय कौन है इस मोहल्ले का जवान मर्द ?

[फिर क्या ? तैश में आकर जबरुद्दीन अपना ख़िताब ‘जबरू उस्ताद’ को बचाने के लिए, झट उस वज़नी ढोल को डाल देते हैं अपने गले में ! फिर डंडियों से ढोल को बजाते हुए, उस ताजिये के चारों ओर चक्कर काटना शुरू करते हैं ! बार-बार मुंडेर की तरफ़ देखते जाते हैं, और अपनी मंगेतर हुस्ना से नयन मिलते ही वे झट डंडियों का क्रोस बनाकर ढोल पीटते हैं ! फिर वे साथ में हवाई किस भी, छोड़ देते हैं उसके प्यार में ! जैसे ही जबरू उस्ताद हवाई किस छोड़ते हैं, बस उनकी यह अदा देखकर उनकी मंगेतर हुस्ना, अपने लबों पर जानलेवा मुस्कराहट छोड़ देती है ! उसकी मुस्कराहट पाकर जबरू उस्ताद के बदन में जोश का संचार हो जाता है, और वे तेज़ी से रफ़्तार बढ़ाकर चक्कर काटने लगते हैं ! उधर ये माता के दीने बैंड वाले, मातमी धुन बजानी शुरू करते हैं ! उस धुन को सुनते ही, उनके घूमने की रफ़्तार स्वत: बढ़ जाती है ! फिर क्या ? भीड़ में खड़े मुरीद झट दूर हटकर, उनको चक्कर काटने के लिए काफ़ी जगह खाली कर देते हैं ! अब यह चक्कर काटने का घेरा, बढ़ता ही जाता है ! इस तरह वज़नी ढोल लिए चक्कर काटना कोई आसान काम नहीं रहता ! यहां तो जोश के मारे जबरू उस्ताद अपनी जान को हथेली पर रखकर, चक्कर काट रहे हैं ! हुस्ना की मोहब्बत ने उनके बदन में इतनी हिम्मत ला दी, के वे सामने आ रहे किसी भी खतरे से अनजान बन गए हैं ! उन्हें कुछ होश नहीं नहीं, वे किससे टकरा रहे हैं..या कौनसा ख़तरा, उनके सर पर मंडराता जा रहा है ? बस, वे तो हुस्ना के प्रेम की ताकत से हर मुसीबत का सामना करते जा रहे हैं ! कभी चाकू चला रहे अल्लानूर साहब से टक्कर खा बैठते हैं, तो कभी लाठी चला रहे अल्लारखा और रहीम मियां को घुद्दा मारकर वे आगे निकल जाते हैं ! अभी-तक तो ख़ुदा ने उनको बचाए रखा, मगर अब आगे क्या होने वाला है ? वो अब, परवरदीगार ही जाने ! अचानक वे अल्लानूर साहब के सामने आ जाते हैं, और क़िस्मत के मारे उनकी शमशीर उनको छूती हुई बिना वार किये आगे बढ़ जाती है ! तभी जमाल मियां का चाकू उनको छूता हुआ आगे निकल जाता है, उसी पल उनके सौ चक्कर पूरे हो जाते हैं और वे गश खाकर ज़मीन पर गिर पड़ते हैं ! इस मंज़र को अपनी एक आंख से देख रहे मामूजान, घबरा जाते हैं ! वे चीत्कार कर, ज़ोर से चिल्लाकर कह देते हैं !]

मामूजान – [ज़ोर से चिल्लाकर, कहते हैं] – या अली...या हुसैन ! जबरू मारा गया, जमालिये ने उसका खून कर डाला !

[फिर क्या ? वहां खड़े मुरीदों का ध्यान, जमाल मियां की तरफ़ चला जाता है ! अब कोई मुरीद यह देखता नहीं, के जबरू उस्ताद मर गए या जिंदा हैं ? बस वे सभी अपने हाथ साफ़ करने के लिए, बेचारे जमाल मियां पर टूट पड़ते हैं ! फ़िर क्या ? जो चीज़ इनके हाथ में आती है, उसी को लेकर वे बेरहमी से बदनसीब जमाल मियां को पीटते जा रहे हैं ! अब इस मची हुड़दंग में, अब पीछे कौन रहे ? किसी को पीटने के लिए, इन मुरीदों की हथेलियों पर खुजली आने लगी है ! अब यहां बेचारे जमाल मियां की स्थिति का जायज़ा, कौन लेवें ? यहां तो इन हुड़दंगियों ने बवाल मचा रखा है, इनके सामने आ रहे बेचारे लाचार बूढ़े, बच्चे और मासूम औरतें... बख्शी नहीं जा रही है ! बस वे नामाकूल इन लाचार और मासूम इंसानों को कुचलकर, आगे बढ़ते जा रहे हैं ! अब इन लाचार इंसानों के कुचले जाने से, वहां त्राहि-त्राहि मच जाती है ! उनकी दारुण चीखें ‘मर गया, बचाओ’ आसमान में गूंज़ती जा रही है ! कई ऐसे भी शैतान के चाचा निकले, जो गए थे जमाल मियां को पीटने..मगर वे हुड़दंगियों के पांवों के नीचे कुचल दिए जाते हैं ! इन हुदंगियों के ये हाल देखकर, मामूजान घबरा जाते हैं ! यहां रुककर, वे करें भी क्या ? उनका ख़ास मक़सद तो हो गया, पूरा ! जबरू को चक्कर कटवा दिए गए, अब उनका यहां क्या लेना-देना ? अपनी अक्ल और होश्यारी दिखलाते हुए, वे लोगों को घुद्दा मारते हुए उस मज़में से बाहर निकलने की जुगत लड़ाने लगे ! उनको नौ दो ग्यारहा होते देख, रशीद भाई उनको रोकने के लिए आवाज़ें लगाते जा रहे हैं ! मगर मामू, अब क्यों रुकना चाहेंगे ? उनको कहाँ, लगायी गयी शर्त के तहत जूत्ते का प्रसाद लेना है ? वे तो झट भीड़ से निकलकर, घर जाने के लिए एक पतली गली में घुस जाते हैं ! बेचारे रशीद भाई उनको पुकारते-पुकारते, ख़ुद हुड़दंगियों की भीड़ में फंस जाते हैं ! इस तरह वे उस शैतानों के चच्चा मामू प्यारे को पकड़ नहीं पाते ! तभी पुलिस की गाड़ी का साइरन बजता है, मज़में के हुड़दंगी सावधान हो जाते हैं ! कहीं, लाठी-चार्ज न हो जाय ? इस डर से, ये हुड़दंगी तितर-बितर हो जाते हैं ! धीरे-धीरे, मंच पर अंधेरा छा जाता है !]

[२]
[मंच रोशन होता है, माणक चौक का मंज़र सामने आता है ! चौक में, हुड़दंगी शोर मचाते जा रहे हैं ! चारों-तरफ़ ‘या हुसैन या अली’ के गगन-भेदी नारों से, ये लोग आसमान को गूंजा रहे हैं ! अचानक नीचे ज़मीन पर पड़े जबरू उस्ताद पर, रशीदा जान की निग़ाहें गिरती है ! उन्हें देखकर रशीदा जान को फ़िक्र सताने लगती है ‘कहीं यह भीड़ जबरू उस्ताद को कुचल न दें ?’ अब वह मानवता के नाते वह सोच लेती है, किसी तरह जबरू उस्ताद को इस भीड़ के चंगुल से बाहर निकालकर उनकी जान बचानी है ! उधर इन हुड़दंगियों के इधर आने से पहले, रशीदा जान शिन्नी का थाल मुजाविर को थमा चुकी है ! थाल थमाने के बाद ख़ुदा जाने कहाँ से हुड़दगियों का समूह इधर उमड़ पड़ता है, जहां रशीदा जान खड़ी है..वहां पड़े छबील से भरे पड़े पात्र में, दो हुड़दंगी आकर गिर पड़ते हैं ! और पात्र में पड़ा छबील उछलता है, जिससे रशीदा जान का दुपट्टा भीग जाता है ! अब वह उस दुपट्टे की कोई परवाह करती नहीं, और कव्वालों को टोहने भीड़ में घुस जाती है ! उसको आते देख, भीड़ में खड़े मुरीद रशीदा जान को निकलने का रास्ता देते हैं ! तभी रशीदा जान की नज़र, कव्वालों पर गिरती है ! वह उन्हें पुकारती हुई, उनके निकट चली जाती है ! अब वह उन कव्वालों से, जबरू उस्ताद को उठाकर भीड़ के बाहर ले जाने का निवेदन करती है ! सभी कव्वाल उसे बचाने के लिए, सहमत हो जाते हैं ! फिर वे रशीदा जान के चारों ओर घेरा डालकर, उसे जबरू उस्ताद के पास ले जाते हैं ! वहां जाकर, वह क्या देखती है ? जबरू उस्ताद गश खाकर, ज़मीन पर पड़े हैं ! वह झट अपने छबील से भींगे दुपट्टे को निचोड़कर छबील के छींटें उनके चेहरे पर गिराती है ! ठन्डे छबील के छींटों का अहसास पाकर, जबरू उस्ताद होश में आते हैं और वे अपनी आंखें खोलते हैं ! सामने जन्नत की हूर की सामान ख़ूबसूरत रशीदा जान को रिदके से पंखा झरते देख, उनके लबों पर मुस्कान छा जाती है ! उस हूर के दीदार पाना, उनकी खुशनसीबी है ! वे आंखें मसलकर, रशीदा जान को टकटकी लगाकर देखते हैं ! ऐसी ख़ूबसूरत हूर को अपनी ख़िदमत में पाकर, जबरू उस्ताद अपने बदन का पूरा दर्द भूल जाते हैं ! उनको होश में पाकर, रशीदा जान पंखा झरती हुई उनसे कहती है...]

रशीदा जान – हाय अल्लाह, मियां आप ख़ुशअख्तर निकले ! शिन्नी का थाल देते वक़्त हमने देख लिया था, आपको ! न तो [डरने का अभिनय करती हुई, कहती है] क़यामत आ जाती ! शहादत की रात को, आप ख़ुद शहीद हो जाते !

जबरुद्दीन - शुक्र है बीबी, आपके दीदार हो गए इस नाचीज़ को ! बस बीबी, अब तो एक ही तमन्ना बाकी है....के, मैं आपके दीदार करता हुआ शहीद हो जाऊं...ख़ुदा ज़रूर मुझको, जन्नत नसीब करेगा ! [कलाम पेश करते हैं] ‘वो शमा की महफ़िल ही क्या जिसमें परवाना जलकर ‘ख़ाक’ न हो, मज़ा तो तब आता है चाहत का मेरे यार जब दिल तो जले मगर ‘राख’ न हो...’

रशीदा जान – क्यों ढाये, क़यामत ? क्यों होते हो, शहीद ? क़यामत ढाये, आपके दुश्मनों पर ! ख़ुदा रहम, अभी कुछ वक़्त ही गुज़रा है...आपकी सगाई हुए....! आपको उसकी कसम, ऐसा न कहो...ख़ुदा के लिये !जबरुद्दीन – हुज़ूर उसका ही जिक्र कर रहा हूं, किसी ने कहा है ‘वो हमारा इमतिहान क्या लेगी मिलेगी नज़रों से नज़र तो नज़र झुका लेगी उसे मेरी कब्र पर दिया जलाने को मत कहना वो नादान है दोस्तो ना तो अपना हाथ जला लेगी !’

रशीदा जान - [मुस्कराती हुई, कव्वालों से कहती हुई] - देख क्या रिया हो, उस्ताद ? ज़रा ज़नाब को उठाइये, यहां पड़िया रह गिया तो भीड़ इनको कुचल देगी ! आप जानते नहीं, ये ज़नाब इश्क के शिकार है ! तभी कहते हैं, लोग के ‘इश्क़ सभी को जीना सिखा देता है, वफ़ा के नाम पर मरना सीखा देता है, इश्क़ नहीं किया तो करके देखो, ज़ालिम हर दर्द सहना सीखा देता है !’

[जबरू उस्ताद को उठाकर, कव्वाल उस मज़में से बाहर लाते हैं ! फिर हसन मियां रंगरेज़ की दुकान के, चबूतरे पर लिटा देते हैं ! उनके पीछे-पीछे रशीदा जान भी मन्नत चढ़ाकर, जल्द वहीँ आ जाती है ! तभी हुस्ना सीढ़ियां उतरकर, वहां आती हुई दिखाई देती हैं ! इस वक़्त हुस्ना ने, काला बुर्का पहन रखा है ! उसे आते देखकर, रशीदा जान मुस्कराकर उसका स्वागत करती है ! फिर कव्वालों के साथ रूख्सत होती नज़र आती हैं ! रुखसत होते, वह पीछे मुड़कर जबरू उस्ताद के पास खड़ी हुस्ना को देखती है ! फिर, हंसी का किल्लोर छोड़ देती है ! जैसे ही हुस्ना की नज़रें रशीदा जान से मिलती है, रशीदा जान झुककर सलाम करती है !]

रशीदा जान – [झुककर, सलाम करती है] – आदाब !

[फिर वह कव्वालों के साथ जाती हुई दिखाई देती है ! अब हुस्ना को सामने पाकर, जबरू उस्ताद झट खड़े हो जाते है, और ऐसा दिखलाते हैं के मानो उन्हें कुछ हुआ ही नहीं ! रशीदा जान के जाने के बाद हुस्ना बुर्के की जाली हटाकर, जबरू उस्ताद से कहती है !]

हुस्ना – [मुस्कराती हुई, कहती है] – मियां, क्या हाल है आपके ? सुना है ज़नाब, के ‘आप चक्कर खाकर, नीचे गिर गए !’

जबरुद्दीन – [घबराते हुए कहते हैं] – नहीं, नहीं ! जानती नहीं आप, हम हैं मोहल्ले के पहलवान ! पहलवान ऐसे कभी गिरता है, क्या ? ऐसा हो गया होगा, शायद ! ग़लती से मैंने अपना पांव गोबर पर रख दिया हो, और हम फिसल गए..?

हुस्ना – [मुस्कराती हुई, कहती है] – ख़ुशअख्तर हो, ज़नाब ! रूख्सत-बिला-इतला, हम तो सुनते ही इधर आ गए..आपकी खैरियत पूछने ! अब मैं ज़रा, आपकी पोशाक पर नज़र डाल दूं ? कहीं यह पोशाक, गोबर से गन्दी न हो गयी हो ? ऐसी गंदी पोशाक पहने किसी ने आपको देख लिया, तो सच्च कहती हूं आप भद्दे लगेंगे ! मुझे तो यह गोबर की बदबू, बर्दाश्त नहीं होती !

[जबरू उस्ताद के कपड़े देखने की कोशिश करती है, उसको नज़दीक आते देखकर जबरू उस्ताद अपना हाथ आगे बढ़ाकर उसे रोकने की कोशिश करते हैं !]
जबरुद्दीन – [हाथ से दूर हटाते हुए, कहते हैं] – नहीं, नहीं ! रहने दीजिये, मेरे कपड़े ख़राब नहीं हुए !

हुस्ना - रहने कैसे दें, जनाब ? गोबर से भरे इन कपड़ों से, नाक़ाबिले बर्दाश्त बदबू आ रही है ! बस आप इन कपड़ों को खोलकर दे देना, मैं आपके पहनने के लिए भाईजान की पोशाक ले आती हूं ! आप हाथों को दूर लीजिये, मुझे देखना है आपके कपड़ों को....

जबरुद्दीन – [घबराते हुए, कहते हैं] – रहने दीजिये, मेहरारू ! मेरे कपड़े गोबर से ख़राब नहीं हुए हैं, आप तनिक फ़िक्र मत कीजिये !

हुस्ना – [नज़दीक आती हुई, कहती है] – हाय ख़ुदा ! आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, ज़नाब ? [पोशाक की तरफ़ बढ़ती हुई, कहती है] गोबर से भरे इन कपड़ों को, आपने पहने रखे...ख़ुदा कसम सच्च कहती हूं, आपको लोग पागल समझकर पत्थर मारेंगे या आपको मेंटल हॉस्पिटल में एडमिट करवा देंगे !

जबरुद्दीन – [परेशान होकर, कहते हैं] – मेरे ख़्वाबों की मलिका, ऐसी बात नहीं है ! अब आप इस बात को यही दफ़न कर दीजिएगा ! घाव को कुरेदना, अच्छी बात नहीं ! मैं बिकुल तंदुरस्त हूं, फिर फ़िक्र काहे की करनी...?

हुस्ना – फ़िक्र..? फ़िक्र, क्यों नहीं करूं..? आख़िर आप है, मेरे सरताज़ ! मैं आपकी मंगेतर हूं ! समझ गए आप, या नहीं समझे...आप ? कहिये, अब आप क्यों चुप हैं ?

जबरुद्दीन – [लबों पर मुस्कान छोड़ते हुए, कहते हैं] - हुस्न की मलिका ! [कलाम पेश करते हैं] ‘आप पास नहीं है तो क्या हुआ, मोहब्बत तो हम आपकी दूरियों से भी करते हैं !’ अब आप समझ गयी, या नहीं ? आप ही वह उल्लू-पाजी हैं, आपसे मोहब्बत करता हूं ! इस कारण आपकी बात का मान रखने के लिए, मुझे सौ चक्कर काटने पड़े इस महावतों के ताजिये के चारों ओर ! अब आप समझ गए वास्तविक करण, आख़िर मैं क्यों गश खाकर नीचे गिर पड़ा ?

हुस्ना – [आश्चर्य करती हुई, कहती है] – हाय अल्लाह ! यह आपने क्या कह डाला, मेरे हुज़ूर ? मेरे लिए आपने सौ चक्कर काटे...मेरी बात का, मान रखने के लिए ?

जबरुद्दीन – [हंसते हुए, कहते हैं] – इसका मफ़हूम यह है...[कोर्निश करने का अभिनय करते हुए, कहते हैं] हुजूरेआला, आपका हुक्म हमारे सर पर ! सौ चक्कर, हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं है ! बस आपके दीदार करते हुए हम, आप जितना कहेंगे उतने चक्कर काट सकते हैं ! शर्त यही है, आपके दीदार हमें होते रहे !

हुस्ना – [लबों पर मुस्कान बिखेरती हुई, कहती है] – वल्लाह, यह बात है ! तब, अब हमारे हुक्म की तामिल हमारे सामने होनी चाहिए ! तभी मैं मानूगी, के ‘आप, हमारे कौन हैं ?’ ना तो, हुजूरेआला....

जबरुद्दीन – जो हुक्म, मेरे आका !

हुस्ना – बदन की पोशाक उतारकर मुझे दे दीजिएगा, मेरे सरताज़ ! मुझे घिन्न आती है, गोबर से भरे कपड़ों से !

जबरुद्दीन – [हाथ जोड़कर, कहते हैं] – हुजूरेआला आप मेरी इज़्ज़त को सलामत रहने दीजिये ! [कान पकड़कर, कहते हैं] मैं मंजूर करता हूं, मैं खर्रास हूं...मैंने झूठ बोला है ! आप, कपड़ों पर गोबर लगने की बात क्यों कहते हैं ? गोबर को छोड़िये, मैं तो घोड़े की लीद से भी बहुत दूर रहा हूं ! गुस्ताख़ी के लिए माफ़ कीजिये, मेरे आका !

हुस्ना – [मुस्कराती हुई, कहती है] – अच्छा चलिए, आपको माफ़ किया ! अब आप जान लीजिये, इस वक़्त तो मैं आपसे केवल बातें ही करने आयी हूं...मगर बड़ी बी से कहकर आयी हूं के मैं, तले हुए पापड़-खिचिये लेने जा रही हूं ! समझ गए, आप ? आपसे मुलाक़ात करने के लिए, मुझे कितने पापड़...

जबरू – [मुस्काराते हुए, कहते हैं] – केवल इतनी सी बात है, चलिए अभी ला देता हूं आपके लिए खिचिया-पापड़...

हुस्ना – [बनावटी गुस्सा करती हुई, कहती है] – ख़ाक, लेकर आओगे ? समझ में आता नहीं, आपको ? आप तो ठहरे, एक नंबर के बुद्धू ! दिमाग़ का इस्तेमाल किया करें, मेरे महबूब ! बहाना गढ़कर, आपसे मिलने आयी हूं ! अब सुन लीजिये, कान खोलकर ! मोहल्ले के ताजिये को रूख्सत देने के बाद, सभी मोहतरमाएं अपने-अपने घर चली जायेगी ! जाते समय, मैं आपसे घंटा घर बाज़ार में मिलूंगी ! फिर..

जबरुद्दीन – फिर क्या ?

हुस्ना – फिर क्या ? क्या केवल, दीदार से ही पेट भर लिया जाएगा ? ज़नाब, तब आप खिलाएंगे छोले-भठूरे और फिर बाद में..दही-बड़े ! और, इसके बाद...
जबरूद्दीन – [हाथ जोड़कर, कहते हैं] – सब खिला दूंगा, मल्लिका जान ! बस, आप तशरीफ़ ज़रूर लाइयेगा ! मगर याद रहे, आप अपनी किसी सहेली को साथ नहीं लायें ! [धीरे से, कहते हैं] कबाब में हड्डी की तरह !

हुस्ना – ठीक है, ख़ुदा हाफ़िज़ ! अच्छा तो, अब हम चलते हैं..

जबरुद्दीन – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – फिर कहां मिलोगी..

हुस्ना – [मुस्कराती हुई कहती है] – जहां कोई आता-जाता नहीं !

जबरुद्दीन – अच्छा तो, अब चलते हैं...!

[जाती हुई हुस्ना अपनी दो अंगुलियां अपने लबों पर लाकर, हवाई किस छोड़ती है ! जबरू उस्ताद अपना हाथ हिलाकर, बाई-बाई, टा-टा कहते हुए अपनी मेहरारू को रूख्सत देते हैं ! हुस्ना के जाने की पदचाप सुनायी देती है ! थोड़ी देर बाद, यह पदचाप की आवाज़ सुनायी नहीं देती ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

[३]

[मंच रोशन होता है ! गिरदीकोट बाज़ार के पास ही, पान की गली है ! उसका मंज़र सामने आता है ! पनवाड़ी की दुकान पर पान की गिलोरी लेते हुए, मामूजान दिखाई देते हैं ! अब वे पान की गिलोरी को मुंह में ठूंसते हैं, और गली के नुक्कड़ की ओर अपनी नज़र दौड़ाते हैं ! गली के बाहर से उनको, जबरू उस्ताद गुज़रते नज़र आते हैं ! उनको देखते ही उनके दिल में शंका उत्पन्न होती है ‘कहीं यह जबरू, अपनी मंगेतर से मुलाक़ात करने तो नहीं जा रहा है ? अगर यह बात सही है, तो फिर दूल्हे भाई को विस्तार से बताना होगा के ‘आपके दामाद खुले-आम अपनी महबूबा से मुलाक़ात करने गए, और इन्होंने मुलाक़ात के दौरान क्या-क्या बातें की ?’ फिर क्या ? झट पान की पीक थूक देते हैं पास की दीवार पर ! फिर उनका पीछा करते हुए झट पहुंच जाते हैं घंटाघर बाज़ार में ! पीछे से आकर, वे बेचारे जबरू उस्ताद का कोलर पकड़ लेते हैं ! अचानक हुई इस हरक़त से, जबरू उस्ताद घबरा जाते हैं ! और ज़ोर का झटका देकर, अपना कोलर छुड़ा लेते हैं !]

जबरुद्दीन – [कोलर छुड़ाते हुए, कहते हैं] – कौन है रे, नामाकूल ?

[जबरू उस्ताद ठहरे पहलवान, उनका दिया गया झटका कोई हल्का नहीं हो सकता ! उनके एक ही झटके में मामूजान जाकर गिर पड़ते हैं, कीचड़ से भरी नाली में ! इस नाली के पास ही बेचारा एक फ़क़ीर बैठा है, जिसके कपड़े नाली से उछले कीचड़ से भर जाते हैं ! मामूजान जैसे ही नाली से उठने का प्रयास करते हैं, और यह फ़क़ीर उनकी बांह थामकर कहता है...]

फ़क़ीर – देता जा, अल्लाह के नाम !

मामूजान – [गुस्से से, कहते हैं] – और कितना दूं, बाबा ? इतना कीचड़ तो ले लिया आपने, क्या अब भी आपका दिल भरा नहीं ?

[आस-पास खड़े आदमी मामूजान की बात सुनकर, हंस पड़ते हैं ! अब उस फ़क़ीर को अपने कपड़ों का ख्याल आता है, अब वह देखता है अपने कीचड़ से भरे कपड़ों को ! सारा माज़रा समझ में आने क बाद, वह कहता है]

फ़क़ीर – [मामू की बांह छोड़ते हुए, कहता है] – जा, जा ! तू क्या देगा ? तेरे पास देने को है, क्या ? जो है, वो है यह कीचड़ ! [झोली में हाथ डालकर ५००/- के कई नोट निकालता है, फिर उन नोटों को मामू को थमाकर कहता है] ये ले ५००-५०० क कड़े-कड़े नोट, जाकर नए कपडे खरीदकर पहन लेना ! हमारा क्या ? हम तो फिर, इन पाकिस्तानी जायरीनों से और नोट ले लेंगे ! वे देंगे ढेर सारे नोट, और यह बन्दा लेता रहेगा उनसे ढेर सारे नोट !

[इतने में कुछ ही दूर, एक तांगा आता हुआ दिखाई देता है, जिसमें कई पाकिस्तानी जायरीन बैठे हैं ! उनके दीदार पाते ही वह नोट लेने के लिए झट दौड़ता है, उनके पास ! तभी पुलिस की गाड़ी का सायरन बजता है, और पुलिस आकर उस तांगे को चारों तरफ़ घेर लेती है ! यह वाकया देखते वहां आते-जाते राहीगीर रुक जाते हैं, इस तरह वहां तमाशबीनों का मज़मा लग जाता है ! अचानक एक तमाशाबीन, ज़ोर से बोल उठता है...]

एक तमाशबीन – [ज़ोर से चिल्लाकर, कहता है] – नक़ली नोट, नक़ली नोट जायरीनों के पास !

[उधर कीचड़ से भरे मामू पर जबरू उस्ताद की नज़र गिरती है, तब वे जाकर मामू को उठाकर ले आते हैं पास खड़े खोमचे वाले के पास ! वहां रखी पानी की टंकी से पानी लेकर, उनके हाथ-पाँव धुलाते हैं ! फिर उनका हाथ थामकर, उनको वहां रखे स्टूल पर बैठाते हैं ! हुस्ना का ख्याल आते ही, जबरू उस्ताद को इस वक़्त मामू का यहाँ आना अखरता है ! ज़नाब को, गुस्सा आएगा भी क्यों नहीं ? गुस्सा आना भी वाज़िब ठहरा ! कारण यह है, के ‘अब वक़्त हो गया है, उनकी मंगेतर के आने का !’ अब न जाने कहां से यह मामू आ गया, यहाँ दाल-भात में मूसलचंद बनकर ? न जाने इस लंगूर ने, यह जासूसी करने की बीमारी क्यों पाल रखी है ? अब वे झुंझलाते हुए, उस मामू से कहते हैं !]

जबरुद्दीन – [झुन्झलाते हुए, कहते हैं] – जा, जा मामू ! चला जा वहां, उन पाकिस्तानी जायरीनों के पास...नक़ली नोट लेने ! तूझे भी पुलिस बैठा देगी, हवालात के अन्दर ! जान छूटेगी, मेरी ! बड़ा आया, इमाम की औलाद ?

मामूजान – [अपना थामा हुआ हाथ, छुड़ाते हुए कहते हैं] – यों कैसे तेरी जान छूटेगी, भाणजे ? अब मैं सामने वाली दुकान पर बैठा हूं, बराबर तूझ पर नज़र रखने ! अरे ए कुत्तिया के ताऊ, कब से तूझ पर नज़र रखता आ रहा हूं ! न मालुम, कब तू कोई वाहियात हरक़त कर बैठे ?

[तभी जबरू उस्ताद की नज़र मिश्री लाल की होटल की तरफ गिरती है, वहां खम्बे के पीछे ख़ड़ी हुस्ना उनको दिखाई देती है ! मामू के यहां मौजूद होने के कारण, वह बेचारी जबरू उस्ताद के पास नहीं आ रही है ! अब जबरू उस्ताद को, फुटास की गोली देनी बहुत ज़रूरी हो गयी है ! यह सोचकर जबरू उस्ताद, अब मामू की खुशामद पर उतर आते हैं !]

जबरूद्दीन – [खुशामद करते हुए, कहते हैं] – मामू यार, अब मेरी जान छोड़ ! ले पहले खा ले, आलू की टिकिया ! [पास खड़े, खोमचे वाले से कहते हैं] अरे उस्ताद, ज़रा दो प्लेट आलू की टिकिया तैयार करके लाना ! आज देखते हैं, कैसी स्वादिष्ट टिकिया तैयार करते हैं आप ?

[अब जैसे ही खोमचे वाला दो प्लेट आलू की टिकिया तैयार करके लाता है, उसी वक़्त मामू उससे दोनों प्लेट अपने हाथ में ले लेते हैं ! फिर टिकिया का एक निवाला, अपने मुंह में डालते हुए कहते हैं]

मामूजान – [टिकिया का एक निवाला, मुंह में डालते हुए कहते हैं] – भूखा हूं, यार जबरू ! मैं अकेला ही, दोनों प्लेटें साफ कर लूंगा ! तू तो यार सीधे घर चले जाना, और भर-पेट भोजन कर लेना ! मज़बूरी है, यार ! आखिर, मुझे धंधे पर जाना है !

जबरुद्दीन – [चिढ़कर कहते हैं] – खा ले, मामू ! पेट-भर कर खा ले ! और खा लेना, मिर्ची बड़े ! जो भी इच्छा हो, खा लेना पेट भरकर ! मगर, तेरे पेट में दर्द होने मत देना !

मामूजान – [मुंह में आलू की टिकिया ठूंसते हुए, कहते हैं] – खा रहा हूं, तू टुकर-टुकर काहे देख रहा है ? खाते हुए को, क्यों नज़र लगा रहा है ?

[दो प्लेट आलू की टिकिया खाकर, जूठी प्लेटें टंकी के पास रख देते हैं, फिर उस खोमचे वाले से एक प्लेट मिर्ची बड़ा लेकर भी खा लेते हैं ! फिर जूठी प्लेट पानी की टंकी के पास रखकर, वहां टंकी के पानी से हाथ धो लेते हैं ! खोमचे वाले के कंधे पर रखे अंगोछे को उठाकर, उससे अपने हाथ पोंछ लेते हैं...मामू ! शैतानी कारनामा करके, वे वापस उस अंगोछे को उस खोमचे वाले को थमा देते हैं ! फिर, जबरू उस्ताद से कहते हैं..]

मामूजान – दिल तो करता है जबरू, के तेरे पास यहाँ खड़ा-खड़ा गपें लड़ाता रहूँ ! मगर करूं क्या, भाणजे...यह वीजा बनाने का काम, हाथ में जो ले लिया ! अब यार, कहां रही इतनी फुरसत ?

जबरुद्दीन - [आश्चर्य से देखते हुए] – तू...तू यार, क्या कहा तूने ? क्या, तू ट्रेवलिंग एजेंट बन गया है ? अरे, जा जा ! जाकर पहले, बाईजी तालाब में अपना मुंह धोकर आ...फिर लेना, दुबई का नाम ! कभी सुना है, दुबई का नाम ? अब लालबुझक्कड़ बना है, साला ट्रेवलिंग एजेंट !

मामूजान – तूने भला अच्छा याद दिलाया, इस दुबई के कई केस मेरे पास है ! मैंने कई लोगों का भला किया है, भाणजे !

जबरुद्दीन – [हंसते हुए, कहते हैं] – हां रे मामू, तू तो लोगों का भला करने वाला गफ्फ़ार है ! उन बेचारों को, दुबई की ठौड़ बम्बई के छोर मलाईलेंड पहुंचा देगा !
इस तरह, तू कई लोगों के साथ ठगी की होगी ? अब बोल, तूने इस तरह कई लोगों का भला किया या नहीं ?

मामूजान – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] - तू जानता क्या है, इस धंधे को ? तू ठहरा ज़ाहिल, गंवार ! [कुछ याद आने पर, सामान्य हो जाते हैं..फिर, कहते हैं] अरे यार भाणजे, तेरे इस मामू पर कभी-कभी भरोसा कर लिया कर ! ले सुन, एक व्यक्ति ऐसा मिला...

जबरूद्दीन – जानता हूं रे, कोई मिला होगा...कोई मंगता या फ़क़ीर ?

मामूजान – नहीं रे, तू भी जानता है उन्हें ! खाला जान के चचिया ससुर, ज़नाबे आली रहमत तुल्ला खां साहब को ! उनका काम निकाला मैंने, यार ले देख उन्होनें मुझे क्या तोहफ़ा दे डाला...? [बैग से केमेरा निकालकर, उनको दिखलाते हैं] यह है विदेशी केमेरा, क्या काम की चीज़ है यार ?

जबरुद्दीन – ला इधर, आख़िर देख ही लेते हैं..ऐसी कौनसी चीज़ तू लाया है ?

[मामू से केमेरा हाथ में लेकर, उसे चारों तरफ़ टटोलकर देखते हैं]

मामूजान – तू इसको ऐसा-वैसा दो नंबर का माल मत समझना, प्यारे ! असली विदेशी माल है, यार ! ला दिखाता हूं, तूझे ! [जबरू उस्ताद से केमेरा हाथ में लेकर, बटन पर हाथ रखकर आगे कहते हैं] ले देख, यह है केमरे का बटन जिसे दबाकर एंगल से फोटो लिया जाता है ! फिर केमरे को खोलकर, उसमें से ग्लास-पेपर निकालते हैं ! फिर उसे, हवा में ऐसे घुमाते ही...फोटो तैयार, समझ गए ?

जबरुद्दीन – रख ले तेरे पास ही, ऐसे खिलौने से तू ही खेला कर ! बच्चा है, अभी-तक तेरी उम्र गयी नहीं खिलौने से खेलने की !

मामूजान – [केमरे को बैग में रखते हुए, कहते हैं] – देख जबरू, मैं सीरियस हूं..मेरी कही बात को पागलों की तरह उड़ा मत ! ना तो देख लेना, क्या खेल करता हूं तेरे साथ ? याद रखना, मैं तेरी सिट्टी-पिट्टी गुम कर दूंगा ! नहीं तो, मेरा नाम मामू प्यारे नहीं ! याद रखना, क्या कहा मैंने अभी ? भूलना मत !

[मामूजान पांव पटकते हुए वहां से चल देते हैं, और कुछ क़दम चलकर कबाड़ी की दुकान के बाहर रखे स्टूल पर बैठ जाते हैं ! अब वहां बैठे जनाब, पूरी निग़ाह जबरू उस्ताद पर डाले रखते हैं ! के, आली ज़नाब क्या गुल खिला रहे हैं ? थोड़ी देर बाद, जबरुद्दीन को अकेला पाकर हुस्ना खम्बे के पीछे से बाहर निकलकर उनके पास चली आती है ! हुस्ना के दीदार पाकर, जबरू उस्ताद की कली-कली खिल जाती है ! खोमचे वाले का स्टूल लाकर, हुस्ना के सामने रख देते हैं ! फिर प्रेम से उसे बैठा देते हैं, स्टूल पर ! अब हुस्ना अपने होंठों पर मुस्कान बिखेरती हुई, कहती है]

हुस्ना – अरे वाह, आज़कल साहबे आलम की फ़ितरत का क्या कहना ? मियां नैण सुख को यहां बैठाकर, क्या-क्या खिला रहे थे ? और आपकी यह महबूबा. खम्बे के पीछे खड़ी भेल-भठूरे के लिए तरस रही थी !

[कबाड़ी की दुकान पर बैठे मामूजान को, बस इसी वक़्त का इंतज़ार था ! वे झट केमेरा उठाते हैं, हुस्ना और जबरू उस्ताद को केमरे की हद में लाते हुए झट केमेरा का बटन दबा देते हैं ! बेचारे मामू प्यारे ठहरे, काणे..सही एंगल रख नहीं पाए, ख़ुदा जाने उन्होंने किसकी फोटो उतार ली ? फिर ग्लास-पेपर निकालकर उसे हवा में हिलाते हैं ! फिर बिना देखे, उसे लिफ़ाफ़े में डालकर झट उसे बैग में डाल देते हैं ! काम पूरा हो जाने के बाद, मामू को बीड़ी पीने की तलब पैदा होती है ! जेब से बीड़ी का बण्डल निकालकर, मामूजान उसमें से एक बीड़ी बाहर निकालते हैं ! जैसे ही उस बीड़ी को सिलागाकर, उसका लाज़वाब कश लेने के लिए लबों तक ले आते हैं...तभी न जाने कौन पीछे से, उनका कोलर खींचता है ज़ोर से ! तपाक से वो सुलगती बीड़ी, उनके हाथ से छूट जाती है ! और उछलकर गिरती है, पास लेटे एक काबरिये कुत्ते के ऊपर ! उधर मामूजान पीछे मुड़कर देखते हैं, उनके सामने यम राज के दूसरे रूप आंखें तरेर रहे मजीद मियां नज़र आते हैं ! अब उनके समझ में आ जाता है, इन मुअज्ज़म की हरक़त के कारण उनके हाथ में थामी हुई बीड़ी छूटकर काबरिये कुत्ते के ऊपर गिरी है ! सुलगती बीड़ी से बेचारे कुत्ते की खाल जलने लगती है, उस जलन को वह बर्दाश्त नहीं कर पाता ! बस वो कुत्ता किलियाता हुआ, सरपट भगता है ! मगर उस बीड़ी से वह छुटकारा नहीं पाता,क्योंकि वो बीड़ी उसके खाल पर चेंठती हुई चिपक जाती है ! तब सामने खड़े अपने ‘गंगाराम’ को घूमा रहे हवलदार साहब की दोनों टांगों के बीच से गुज़रता हुआ, अपनी खाल रगड़ता हुआ आगे निकल जाता है ! इस तरह बदन रगड़ने से बीड़ी से छुटकारा तो मिल जाता है, मगर बेचारे हवलदार साहब के ऊपर गाज गिर जाती है ! अक्समात इस कुत्ते की हरकत से, वे घबरा उठते हैं ! उनका कलेज़ा हलक में आ जाता है ! हवलदार साहब को क्या मालुम, अचानक यह आसमानी आफ़त उनके गले आ पड़ेगी ? तभी उन्हें वह दौड़ता हुआ कुत्ता नज़र आता है, बस वे झट अपने धूजते हाथ में थामा गंगा राम [डंडा] उस पर फेंकते हैं ! निशाना चूक जाता है, और वो गंगा राम सेबरजेट की तरह जाकर सेठ जुम्मन मियां की टाट को चमका देता है ! जो बेचारे अभी-अभी, मिश्री मल की होटल से मक्खनियां लस्सी पीकर आये हैं ! इस टाट पर हुए वार से, बेचारे जुम्मन मियां के पेट में गयी लस्सी का असर ख़त्म हो जाता है ! उनकी बढ़ती घबराहट के कारण, उनके पेट में मरोड़े चालू हो जाते हैं ! अच्छा यही हुआ, केवल पेट में मरोड़े ही पैदा हुए..बस, उनका पायजामा गंदा नहीं हुआ है ! अब वे सर घूमाकर देखने की कोशिश करते हैं, के ‘ऐसा कौन नामाकूल है...जिसने डंडा फेंककर, उनका सर फोड़ा है ?’ तभी उनको बतूलिये की तरह दौड़ते हुए हवलदार साहब नज़र आ जाते हैं, उनको डर है कहीं वो कुत्ता पागल हुआ तो वह उनके पीछे लगकर काट न ले ? काट गया तो ख़ुदा कसम, १८ इंजेक्शन पेट में लगेंगे ? बस बेचारे हवलदार साहब दौड़ते हुए, ना आगे देखते हैं और न पीछे ! बस बदनसीब हवलदार साहब, गायों के पीछा करते सांड से टकरा जाते हैं ! एक तो वे गायें रुक नहीं रही, और अब बीच में यह खोड़ीला- खाम्पा हवलदार आकर टकरा गया उससे...? उनका यह कुकृत्य माफ़ी लायक नहीं रहा, उस सांड के लिए ! अब वो क्रोधित होकर अपने सींगों को झुका लेता है ! और उन सींगों को, हवलदार साहब के पिछवाड़े लगा देता है ! फिर क्या ? वो बेरहम सांड, दोनों सींगों से हवलदार साहब को उठाकर दूर उछाल देता है ! जैसे कोई खिलाड़ी, गेंद को उछाल देता है ? इस तरह अपने रंग में भंग डालने वाले हवलदार साहब को, कड़ी सज़ा देकर वो सांड दूसरी गाय के पीछे लग जाता है ! इस मंज़र को देख रहे जुम्मन सेठ अपनी टाट का दर्द भूल जाते हैं, और अब इनके दिल को राहत पहुंचती है..चलो उनकी टाट को चमकाने वाले उस हवलदार को सज़ा मिल ही गयी ! फिर क्या ? वे ज़ोर से खिलखिलाकर, हंस पड़ते हैं ! मामूजान भी ठहाके लगाकर हंसना चाहते हैं, मगर सामने गुस्सेल मजीद मिया को खड़े पाकर उनकी ज़बान पर ताला जड़ जाता है ! धूजते बदन को नियंत्रण में लाते हुए, अदब से उनको सलाम कर बैठते हैं !]

मामूजान – [सलाम करते हुए, कहते हैं] – दुल्हे भाई, आदाब !

मजीद मियां – [गुस्से से उबलते हुए, कहते हैं] – आदाब गया, भाड़ में ! यह क्या ? [हाथ हिलाते हुए, कहते हैं] शरारते करते जा रहे हो, मियां ? कभी जुम्मन मियां की टाट चमका देते हो, कभी मेरे चेहरे पर चिलका डाल देते हो..फिर, यह क्या है ?

मामूजान – [घबराकर, कहते हैं] – अल्लाह कसम, मैंने कुछ नहीं किया ! अभी कार गुज़री होगी, आपके सामने से...तब शायद धूप टकरा गयी होगी उसके कांच से ! बस यही कारण रहा होगा, आपके चेहरे पर चिलका गिरने का ? मैं बेचारा ठहरा, बदनसीब ! उस जबरू की तहक़ीकात करने इधर आया था, मगर मेरी बिना ग़लती पीछे से आकर आपने मेरा कोलर खींच डाला ! घुद्दा देकर, मुझे नीचे गिरा डाला !

मजीद मियां – आखें खुली रखो, साहबज़ादे ! होश में रहकर बात किया करो, यह दुनिया बड़ी ज़ालिम है मियां ! कहिये, कहाँ है जबरू मियां ? आख़िर, तुमको हो गया, क्या ? मेरे हर दामाद के के पीछे हाथ धोकर लग जाते हो, जासूसी कुत्ते की तरह ? ख़ुदा रहम करे मुझ पर, आख़िर मेरे दामादों ने क्या बिगाड़ा है आपका ?

मामूजान – वल्लाह, मैं तो आपकी ख़िदमत करता-करता बन गया जासूसी कुत्ता ! लोग मेरे बारे में, कैसी-कैसी बातें बनाते हैं ? अरे दूल्हे भाई आपके ख़ातिर मुझे लोगों के ताने सुनने पड़ते हैं, मगर मैं हूं आपका साला..आधा घर वाला ! इसलिए मुझे कोई उज्र नहीं, मुझे कोई कुछ भी कहे ? आपके दोनों दामाद ग़लत रास्ते पर चले और मैं चुपचाप बैठा देखता रहूँ, यह हो नहीं सकता !

मजीद मियां – तब आप करते क्या हैं, इसके लिए ?

मामूजान – सिलसिलेवार उनकी हरक़तें मालुम करके आपके पास सारी खबरें पहुंचा देता हूं, नहीं पहुंचा पाता तो ख़ुदा मुझे दोज़ख़ नसीब करें ! समझ गए, दूल्हे भाई ?

मजीद मियां – क्या मफ़हूम है, तुम्हारा ? मियां झटपट बयान कीजिये, आसीयत का अंधेरा बढ़ता जा रहा है ! घर भी जल्दी पहुंचना है, तुम तो जानते हो बरखुदार....मुझे रात में, कम नज़र आता है !

मामूजान – तब सुनिए, दूल्हे भाई ! कान इधर लाइए, बात गोपनीय है !

[मामूजान मजीद मियां के कान में, फुसफुसाते हुए नज़र आते हैं ! आसीयत [रात] का अंधेरा बढ़ता जा रहा है, दोनों जीजा-साले अपने क़दम हवेली की तरफ़ बढ़ाते नज़र आते हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

[४]

[मंच रोशन होता है, जबरू उस्ताद के मकानका मंज़र सामने आता है ! कमरे के अन्दर, जबरू उस्ताद पलंग पर लेटे हैं ! उनके निकट उनकी अम्मीजान ‘मरियम बी’ उबटन का कटोरा लिए खड़ी है ! और वे, जबरू उस्ताद से कह रही है !]

मरियम बी – बेटे जबरू, मेरे लख्ते ज़िगर ! उठ जा, बेटे ! तेरे बदन पर उबटन मल दूं, तासीर उतर जायेगी और तूझे आराम मिल जाएगा ! हाय ख़ुदा, मुझे सौ फीसदी सुब्हा है..किसी नापाक लौंडिया की बुरी नज़र लग गयी है तूझे ! [होंठों में ही, कहती है] बेचारा आया था, अहमदाबाद से ! कह रहा था, ‘अम्मी, मैं मोहर्रम का मेला देख आऊं..?’ हाय अल्लाह, मैं इन फूटे करमों को लेकर क्या रोऊँ..? बेचारा बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा, इस महावतो के ताजिये के पास !
[अचानक, मामूजान जिलकन दूर हटाकर कमरे में दाखिल होते हैं ! अन्दर आकर, पलंग के सिरहाने बैठ जाते हैं ! फिर जबरू की बलेयां लेते हुए, वे कहते हैं..]
मामूजान – [बलेयां लेते हुए, कहते हैं] – अरे, मेरे प्यारे भाणजे ! मेरे लख्ते ज़िगर, तूझे क्या हो गया प्यारे ? [और निकट आकर जबरू उस्ताद के सर को सहलाते हैं, फिर मरियम की तरफ़ देखते हुए कहते हैं] देखो आपा, अच्छा रहा उस हादसे के वक़्त मैं वहां मोजूद था ! इसके नीचे गिरते ही मैं इसके पास जा पहुंचा और..[दोनों हाथ जबरू उस्ताद के ऊपर, फैलाने काअभिनय करते हैं] यों लेट गया, इस पर....ना तो आपा, इसे भीड़ कुचल डालती ! इसके ऊपर आ रहे सारे प्रहार, मैंने अपनी कमर पर लेकर इसको बचा दिया !

[उठकर, पास रखी कुर्सी पर बैठ जाते हैं ! फिर पास खड़ी मरियम बी को हाथो से धकेलते हुए, आगे कहते हैं !]

मामूजान – [हाथो से मरियम बी को आगे धकेलते हुए, कहते हैं] – फिर आपा मैं झट उठा, और लोगों को इन हाथों से ऐसे धकेल-धकेलकर उनको दूर किया !

मरियम बी – अरे नाशपीटे, मुझे क्यों धकेल रहा है ? अभी, उबटन की कटोरी नीचे गिर जाती तो..? कमबख्त...

मामूजान – माफ़ कीजिएगा, आपाजान ! मैं आपको धकेल नहीं रहा था, आपको दिखला रहा था.. किस तरह मैंने जबरू पर गिर रही भीड़ को दूर हटाया ? ख़ुदा रहम ! न तो, इस मेरे प्यारे भाणजे का क्या हाल होता ?

मरियम बी – [संभल जाती है, फिर नरमाई से कहती है] – भय्या, आप एक बहादुर इंसान ठहरे ! आख़िर बहादुर क्यों न हो ? हो तो मेरे ही छोटे भाई ! अब तुम भी लेट जाओ, इस बेंच पर..[पास रखी बेंच की तरफ़, अंगुली से इशारा करती हुई] ज़रा तुम्हारी कमर की चोटों पर, उबटन मल देती हूं ! अभी सारा दर्द दूर हो जायेगा, मेरे भाई !

[मामूजान की कही हुई झूठी बातें सुनकर, जबरू उस्ताद का दिल जल उठता है ! वे झट उठकर पलंग पर बैठ जाते हैं ! फिर जहरीली नज़रों से मामूजान को देखते हैं, और होंठों में ही कहते हैं]

जबरूद्दीन – [होंठों में ही कहते हैं] – आ गया मामू, रंग में भंग डालने...बांगी कहीं के ! कब आया रे तू मुझे बचाने ? कुरबान हो जाऊं उस रहमदिल हसीन रशीदा जान पर, जो वहां मौजूद थी ! जो बेधड़क अपने कव्वालों के साथ भीड़ में घुस गयी, और आकर मुझे बचाया उस हुड़दंगी भीड़ से ! हाय ख़ुदा, ना तो यह भीड़ मुझे कुचल डालती ? तू तो कमबख्त पतली गली से निकलकर चला गया था, अपने घर ! अब बेरहम आया यहां, मेरी अम्मी के हाथ से उबटन लगवाने ? ऐसा सच्च बोलता है, तो दिखला तेरी चोटें...

[मामूजान जबरू उस्ताद के चेहरे पर आ-जा रहे भावों को, पढ़ने की कोशिश करते हैं ! फिर, आकर वापस बैठ जाते है पलंग के सिरहाने ! फिर उसके सर को सहलाते हुए, उनके कान में फुसफुसाकर कहते हैं]

मामूजान – [कान में फुसफुसाते हुए, कहते हैं] – क्यों रे, भाणजे ? तू तो आज़कल बन गया है, बड़ा होशियार ? अब कह दूं, तेरी अम्मी को..के तू किस हसीन मोहतरमा से नैण मटका कर रहा था, जिसने नीला दुपट्टा पहन रखा था ! फिर मेला निपटने के बाद, उसको सुमेर मार्केट में बुलाकर क्यों खिला रहा था छोले-भठूरे ?
[यह सुनते ही, जबरू उस्ताद को काठ मार जाता है ! और वे सोचने लगे, के ‘यह मामू तो मेरा बाप निकला ? अब यह नामुराद, मुझसे ब्लैकमेलिंग करने के को उतारू हो गया है ? ख़ुदा रहम, अब तो किसी तरह इसका मुंह बंद रखना होगा !’ बस, फिर क्या ? बेचारे जबरू उस्ताद को, मज़बूरी से कहना पड़ता है..]

जबरू उस्ताद – हां मामू ! शुक्रगुज़ार हूं, तेरा ! तूने ही, मेरी जान बचाई है ! तेरा भला करे, पीर दूल्हे शाह !

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – शुक्रिया कहने से काम नहीं चलेगा, भाणजे ! अब तेरा सदका उतारना ज़रूरी हो गया है, भाणजे ! अब तो मियां, पीर दूल्हे शाह की मज़ार पर चादर चढ़ानी ज़रूरी है ! तभी उतरेगा, उस नापाक लौंडिया का काला जादू !

मरियम बी – हां बेटे जबरू, तूझे पीर बाबा ने ही बचाया है ! हादसे के वक़्त बाबा ने ही भेजा था, इस तेरे मामू को ! अब बेटे, तेरी सलामती के लिए बाबा से मन्नत कबूल करानी होगी ! अब देरी नहीं करनी चाहिए, जल्द से जल्द मन्नत कबूल हो जाए..तब हम सब, फायदे में ही रहेंगे !

मामूजान – हां आपाजान, आप सच्च कह रहे हैं ! काम किया, और वह निपट गया ! ना तो ख़ुदा रहम, न जाने काम में व्यस्त रह जाने से अक्सर भूल जाया करते हैं ! बस इसकी सलामती के लिए मन्नत कबूल हो जायेगी, और इसके बाद इसके निकाह की तारीख़ भी तय हो जायेगी ! अब किस बात की देर करना, झट निकालिए संदूक से रुपये..मैं अभी जाता हूं, बकरा मंडी ! वहां जाकर, दो मोटे बकरे ख़रीद लाता हूं !

जबरुद्दीन – [बड़बड़ाते हुए, कहते हैं] – मामू तू ठहरा ज़ालिम, तूझे मोमीनों की खून-पसीने की कमाई की कोई कद्र नहीं ! अब तो नाशपीटे तू मेरी क़ुर्बानी लेकर, करवा दे मन्नत कबूल !

मामूजान – [आंखें तरेरकर, कहते हैं] - भाणजे, तू कुछ बोला ? [कान में फुसफुसाते हुए, कहते हैं] कह दूं, आपाजान को...तू मुंडेर पर खड़ी किस ख़ूबसूरत मोहतरमा से, नैण मटका...

मरियम बी – क्या कह रहे हो, भय्या ? ज़ोर से कहना, सुना नहीं !

[भण्डार कक्ष से संदूक उठा लाती है ! फिर उसे खोलकर रुपये निकालकर गिनती है !]

जबरुद्दीन – [बेदिली से कहते हैं] – ऐसा कुछ नहीं कहा, अम्मी ! आप दे दीजिये, इस मामू को रुपये ! सफ़ारी सूट, बाद में सिलवा दूंगा !

[रुपये गिनकर, मामूजान को थमा देती है ! फिर कहती है, जबरू उस्ताद से !]

मरियम बी – काहे की चिंता करता है, बेटा ? निकाह के वक़्त एक छोड़कर दस सूट सिलवा दूंगी, बेटा ! तू फ़िक्र मत कर !

[मरियम बी से रुपये लेकर, मामूजान उन्हें गिनकर अपनी जेब में रखते हैं ! फिर, वे कहते हैं..]

मामूजान - [रुपये जेब में डालते हुए, कहते हैं] – आदाब, आपाजान ! अब आप, मुझे रूख्सत होने की इज़ाज़त दे दीजिये ! मैं अभी गया बकरा मंडी, और ले आता क़ुर्बानी के दो मोटे बकरे ! उन बकरों को देखते ही, लोगों को दिल में जलन होगी ! वे कहेंगे, अगर ये बकरे हमारे हाथ लग जाते तो हमारा भला हो जाता !
[तभी जिलकन हटाकर, रशीद भाई अन्दर दाख़िल होते हैं ! मामू को देखते ही, वे झल्लाते हुए उससे कहते हैं..]
रशीद भाई – मामू तू बाद में जाना, बकरा मंडी ! पहले हो जा तैयार...तेरे सर पर, अभी पड़ेंगे...

[रशीद भाई के होंठों पर, तपाक से अपना हाथ रखकर उनका मुंह बंद कर देते हैं ! फिर, उनसे धीरे-धीरे कहते हैं]

मामूजान – [धीरे से, कहते हैं] - जगह देखकर बोला कर, यार ! तू तो आते ही, तेरा भोंपू बजाना चालू कर देता है ?

मरियम बी – क्या कहा, रशीद मियां ने ?

मामूजान – [रशीद भाई को आंख़ का इशारा करके, फिर मरियम बी से कहते हैं] – कोई ख़ास बात नहीं, आपा ! रशीद कह रहा था, के ‘यह जबरू तो पड़ा है, बीमार...इसलिए वह तो चोटीला चल नहीं पायेगा, तब मैं इसके स्थान पर चला जाऊंगा बाबा की मज़ार पे ! [रशीद भाई के कान में फुसफुसाते हुए, कहते हैं] अब कह दूं आपा को ? तूने ही इस जबरू को, सौ चक्कर काटने के लिए मज़बूर किया था ! समझ गया, बोल कह दूं आपा को ?

रशीद भाई – [बड़बड़ाते हैं] – हाय अल्लाह ! इस खडूसिये मामू ने तो मुझे बना डाला, कुर्बानी का बकरा ! अब तो यहां से, खिसकना ही वाज़िब है !

मरियम बी – कुछ कहो, रशीद मियां ! चुप कैसे हो गए, तुम ?

रशीद भाई – अब क्या बोलूँ, खालाजान ? मुझे अभी जाना है, कहीं ! फिर बाद में, चला आऊंगा ! [धीरे से कहते हैं, मामूजान से] मामू प्यारे, मेरा भी वक़्त आयेगा ! अल्लाह देगा मौक़ा, तब पूरी कसर निकाल दूंगा प्यारे ! कभी न कभी, मौक़ा तो मिलेगा यार...तब, देख लूंगा !

[मामू के चेहरे पर छा जाती है, रौनक ! फिर वे रशीद भाई के कंधे का सहारा लेकर, उठते हैं ! फिर मुस्कराते हुए, कहते हैं...]

मामूजान – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – भाणजा बैठ जा, इस जबरू के पास ! और बैठकर, मल दे उबटन इसके बदन पर ! [मरियम बी से, कहते हैं] आपा इस कटोरी को थमा दीजिये, इस भाणजे को ! बूढ़ी खालाजान बैठकर लगाए उबटन, और यह शातिर जवान भाणजा बैठकर करता रहे आराम..यह हो नहीं सकता !

[मरियम बी से उबटन की कटोरी लेकर, उसे थमा देते हैं रशीद भाई को ! फिर, उससे कहते हैं..]

मामूजान – [उबटन से भरी कटोरी थमा देने के बाद, कहते हैं] – अब पलंग पर बैठकर, इस जबरू की कमर पर मल दे उबटन ! अब चलता हूं, मैं ! जल्दी जाना है मुझे, कहीं बकरों के भाव न बढ़ जाय ? ख़ुदा हाफ़िज़ !

[मामूजान रूख्सत होते नज़र आते हैं, रशीद भाई उबटन की कटोरी थामे बैठ जाते हैं पलंग पर ! और उस जबरू से कमीज़ खुलवाकर, उनकी कमर पर उबटन मलना शुरू करते हैं ! मरियम बी सदूक उठाकर भण्डार कक्ष की ओर कदम बढ़ाती है ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

[५]

[मंच रोशन होता है, पीर दूल्हे शाह हाल्ट जाने के लिए मोहल्ले की कई औरतें, बच्चे और जवान छोरे तैयार हो गए हैं ! औरतें और छोटे बच्चे आकर, मेटाडोर के अन्दर बैठ गए हैं ! मेटाडोर के अन्दर बैठी है ख़ूबसूरत मोहतारामाएं, उनके पास बैठने की चाहत कैसे पूरी हो ? क्योंकि यहाँ अड़चन है, बकरे का होना ? मामू प्यारे के साथ जबरू उस्ताद क़ुर्बानी वाला बकरा साथ है, इसलिए मनमसोस कर उन्हें अपने दोस्तों को साथ लेकर मेटाडोर की छत पर बैठना पड़ता है ! फिर मामू की चहेती यह बच्चों की चिल्लर पार्टी मामू से दूर क्यों बैठना चाहेगी ? अत: वे बच्चे भी छत पर आकर बैठ जाते हैं ! ओहदे में ये मामू प्यारे ठहरे रशीद भाई के मुअज्ज़म, इस कारण उन्होंने बकरे को संभाले रखने की जिम्मेदारी रशीद भाई को दे डाली ! अब रशीद भाई उस क़ुर्बानी के बकरे की रस्सी थामे, मामू के पास आकर बैठ जाते हैं ! मामू के ख़ास चेले जमाल मियां, अल्लानूर मियां, अल्लारखा मियां वगैरा सभी मामू के आस-पास बैठ जाते हैं ! इन चेलों को आस-पास पाकर, मामू शेखी बघारना शुरू करते हैं ! इसके लिए, वे पहले पांव पसारकर आराम से बैठ जाते हैं ! बाद में बीड़ी सिलगाकर, एक कश लेते हैं ! फिर धुंए के बादल छोड़ते हुए हफ्वात हांकनी शुरू करते हैं ! मेटाडोर में खिड़कियों के पास बैठी हसीन मोहतरमाएं, मामू के जुमले सुनकर ठहाके लगाकर हंसती जा रही है ! मेटाडोर में बैठी बड़ी-बूढ़ी औरतों को, उनकी यह चुहुलबाजी अच्छी नहीं लगती ! वे औरतें, अब इन छोरियों को बरझती नज़र आती है ! तभी गाड़ी का ड्राइवर आकर अपनी सीट पर बैठ जाता है, और गाड़ी को स्टार्ट करता है ! थोड़ी देर में, गाड़ी हवा से बातें करती नज़र आती है ! अब मामू बड़बड़ाते हुए, नज़र आते हैं ! वहां बैठे बच्चे और उनके दोस्त दिल लगाकर, उनकी बकवास सुनते हैं, मगर इनकी बकवास रशीद भाई को अच्छी लगती नहीं !]

मामूजान – [बड़बड़ाते हुए, कहते हैं] – इंशाअल्लाह ! ख़ुदा देता है, और यह बन्दा लेता है उनसे दोनों हाथ फैलाकर ! ए ख़ुदा तू ऐसे कोदन मुरीदों को पैदा करता जा, तभी यह बन्दा एश करता रहेगा ! फिर, यह बन्दा दो के चार, चार के आठ, आठ के चौबीस करता रहेगा....आपके, मेहर से !

रशीद भाई – [मामूजान से कहते हैं] – वल्लाह ! अरे मामू प्यारे, यह दो के चार, चार के आठ..करने की गिनती किस मदरसे से सीखी है ?

[मामू अपने बालों को देवानंद स्टाइल से सहलाते हैं, फिर बालों को एक ओर झटका देते हैं..फिर अपने बाल सहलाते हुए, आगे कहते हैं !]

मामूजान – [बाल सहलाते हुए, कहते हैं] – ये बाल ज़रूर तुम्हें लगते होंगे, काले ! मगर, इनमें भरा है, बड़े-बूढ़ों का तुजुर्बा ! बड़े-बूढ़े अपने बाल धूप में सफ़ेद नहीं करते, उनके बाल सफ़ेद होते हैं तुजुर्बे से ! समझ गया, क्या समझा ?

रशीद भाई – [हंसते हुए, कहते हैं] – अरे हाफ माइंड, तू अपने-आपको समझता क्या है ? तेरे बाल तो पूरे काले हैं, और तू इन बालों को सफ़ेद कैसे कहता जा रहा है ? मामू प्यारे, तू तो ठहरा, खर्रास !

मामूजान – [उनकी मज़ाक़ उड़ाते हुए, कहते हैं] – तू अपने आपको क्या समझता है, डफ़ोल ? तेरी खोपड़ी में दिमाग़ नाम की कोई चीज़ है, या नहीं ? बड़ा आया मर्दूद, यहां..बुई-बुई झकाल करने !

रशीद भाई – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] – ऐसा समझदार तू एक ही है, इस ख़िलक़त में ! अगर तू ऐसा समझदार अपने-आपको समझता है तो तू ही सका मफ़हूम बता दे ! फिर,काहे की करता है बेफालतू की बकवास ?

मामूजान – मफ़हूम ? ले सुन मैं हूं तेरा बुजुर्ग यानि तेरा मामूजान ! भले हम दोनों हैं हमउम्र के लौंडे ! मगर, मेरा पांव है बड़ा...अब तेरे समझ में आया, या नहीं ? तेरा मुअज्ज़म हूं, प्यारे ! अब आया, कुछ समझ में ?

रशीद भाई – छोड़ यार, तेरे इस पांव को ! मुझे क्या करना ? तेरा पांव भारी होगा या हल्का ? यह फ़िक्र होगी नानाजान को ! वे सोचेंगे, बिना निकाह किये तुझ जैसी कलमुंही का पांव कैसे हो गया भारी ? किसका पाप लिये, घूम रही है तू ?

मामूजान – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] – तू तो ठहरा, कोदन ! साले, तुझको समझ में कुछ आता नहीं !

रशीद भाई – [झल्लाते हुए, कहते हैं] – चिढ़ता क्यों है, काणे बन्दर ? साफ़-साफ़ ही क्यों नहीं कहता, के ‘दो के चार और चार के आठ का मफ़हूम यह है ?’ आख़िर, तू क्या चाहता हैं लंगूर ? क्यों, बात को घूमाता जा रहा है ?

मामूजान – कह रहा था भाणजा ‘तेरे जैसे कोदन इंसान मुझे रोज़ मिल जाय, तो मेरी पौ बारह ! समझा ? बस नफ़ा ही नफ़ा..मेरी पांचो अंगुलियां घी में तिरती रहेगी ! अब याद कर तू, पिछले चाँद के रोज़ अपुन आये थे चोटिला..कुछ याद आया, मेरे बाप ? रवाना होते वक़्त, गाड़ी में तेल भरवाने के लिए रुके थे हम पेट्रोल पम्प के पास ! ठीक, उसी वक़्त...

रशीद भाई – आगे कह, रुका क्यों ? मेरे कान है, बराबर सुन रहा हूं..तू आगे बोल !

मामूजान – बस उस वक़्त, एक राईका भेड़-बकरियों के रेवड़ को हांकता हुआ ले जा रहा था !

रशीद भाई – हां याद आया, मामू ! दो बकरे पीछे छूट गए थे, जो पेट्रोल पम्प के पास उगी हुई ताज़ी घास चर रहे थे ! तू ठहरा, होशियार..झट मौक़ा देखकर उन दोनों बकरों को, झट चढ़ा दिया मेटाडोर में ! मगर अब इस वाकये को काहे दोहरा रहा है, प्यारे ? वो तो, बीत गया !

मामूजान – [ज़ोर से ठहाके लगाकर, कहते हैं] – कोदन का कोदन ही बना रहेगा भाणजा, तू तो ? जिस बकरे की रस्सी तू थामे अभी बैठा है, यह उन्हीं में से एक बकरा है ! और दूसरा बकरा है, जबरू के घर पर ! फिर इन दोनों बकरों को क्या कहेंगे, बोल ? मुफ़्त का माल, जिन्हें जबरू को बेचकर मैंने कमाए हैं दो हज़ार रुपये ! उसके बाद में गया, बकरा मंडी ! और, वहां जाकर...

रशीद भाई – वहां जाकर, क्या ? अपना सर फुड़वाकर आ गया, क्या ?

मामूजान – सर फुड़वाकर आएगा, तू ! मैं तो वह इंसान हूं, जो लोगों के सर आपस में फुड़वा देता हूं ! अब सुन, उन रुपयों से खरीदे मैंने, चार बकरे ! फिर हर बकरे का भाव दो हज़ार रुपये लगाकर, इन बाबा के मुरीदों को बेच डाले ! अब बोल प्यारे, कितना नफ़ा हुआ या और कितना हुआ नुक़सान ?
रशीद भाई – मामू तूझे तो नफा ही हुआ होगा, तू ठहरा लोगों को चूना लगाने वाला ! अब क्या कहें, तूझे ? जैसे एक खरबूजे के पास पड़े दूसरे खरबूजे का रंग बदल जाया करता है, उसी तरह तेरी संगत पाकर इस जबरू में भी तेरे लखन आ गए हैं ! जानता है, रवानगी के वक़्त वह क्या बोला ? के, ‘यार बाबा तो भावना का भूखा है, उसे बकरों की संख्या से क्या लेना-देना ?

मामूजान – फिर ?

रशीद भाई – आगे कहा, अभी तुम एक बकरे को ही ले जाओ ! इस दूसरे बकरे को मैं बकरीद के रोज़ बेच दूंगा मुरीदों को, जिससे चार पैसे आ जाएंगे घर में ! यह व्यापार करने की नीयत, उसमें भी आ गयी..बिल्कुल तेरे जैसा, बनता जा रहा है !

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – वाह, अल्लाह मियां आपका शुक्रगुज़ार हूं ! आपने, मेरे इस एक भाणजे में व्यापार करने के गुण डाल दिए...अब, मैं बहुत ख़ुश हुआ ! जब भी यह जबरू मुझे मिलेगा, तब मैं ज़रूर उस पर दो रुपये वारकर किसी ग़रीब दे दूंगा ! अब तू आगे सुन, आज रवानगी के वक़्त तूने ध्यान रखा नहीं होगा ?

रशीद भाई – मैं कहाँ, ध्यान रखने वाला ? कमबख्त, मुझे लापरवाह कह दे..और तू, क्या कहेगा ?

मामूजान – जिस बकरे को तू लिए बैठा है, उसने अपनी मुंडी हिलाई थी ! मानो यह बकरा कह रहा था “ओ, बाबा के मुरीदों ! क़ुर्बानी के लिए आप लोग, मुझे अकेला नहीं ले जायें..नहीं तो मैं ला दूंगा क़यामत !”

[इतना कहकर मामूजान खिलखिलाकर हंस पड़ते हैं, वे इतना हंसते हैं...के, उनके हाथ में थामी हुई सुलगती बीड़ी छूटकर जा गिरती है उस क़ुर्बानी के बकरे की खाल ऊपर ! बेचारे बेजुबान प्राणी के बालों को जलाती हुई, वह बीड़ी उसकी खाल को जलाने लगती है ! फिर क्या ? बकरा अपनी जान को बचाने के लिए, कूदने की कोशिश करता है ! अब न तो वो बीड़ी उसकी खाल से दूर होती है, और न इधर रशीद भाई उस बकरे को छूटने का मौक़ा देते हैं ! उस बकरे को वश में लाने के लिए, रशीद भाई झट उसके मुंह को दबोच लेते हैं ! फिर, जमाल मियां क्यों पीछे रहे ? वे झट उस बकरे की पिछली टांगों को, अपनी पूरी ताकत लगाकर पकड़ लेते हैं ! इधर जलन बढ़ जाती है, वो बकरा इस जलन को सहन नहीं कर पाता ! आख़िर, वह चीत्कारता हुआ ज़ोर-ज़ोर से बें बें की आवाज़ निकाल बैठता है ! मगर, यहां उसकी दारुण पुकार सुने कौन ? आख़िर परेशान होकर वह, अपने बदन की पूरी ताकत छूटने के लिए झौंक देता है ! फिर क्या ? उसके दोनों सींग आकर लगते हैं, रशीद भाई के थोबड़े पर ! और दर्द के मारे, रशीद भाई तिलमिला जाते हैं ! और उनके हाथ में थामा हुआ बकरे का मुंह छूट जाता है, और साथ में छूट जाते है उनके हाथ में थामी हुई रस्सी ! थोड़ी आज़ादी पाकर, वह पूरी ताकत लगाकर पिछली टांगो से दुलती मारता है जमाल मियां के थोबड़े पर ! बेचारे जमाल मियां जाकर गिरते हैं, एक छोटे बच्चे के ऊपर ! बेचारे बच्चे का, कचमूर निकल जाता है ! बच्चा बेचारा, क्या हाहाकार मचाता ? उससे पहले, हमारे जमाल मियां ज़ोर से चीत्कार उठते हैं “मर गया, मेरी अम्मी !” इस तरह, बकरे की पिछली दोनों टांगे आज़ाद हो जाती है ! फिर क्या ? मौक़ा पाकर वो बकरा लगाता है, ज़ोर से एक छलांग ! और सड़क के किनारे गुज़र रहे भेड़-बकरियों के झुण्ड में जाकर, वह मिल जाता है ! यह राईका वही था, जिसके दो बकरे पहले खो चुके थे ! एक बकरे के वापस लौट आने से, उस झुण्ड को हांकने वाले राईके की ख़ुशी का आर-पार नहीं रहता ! वह उस झुण्ड को हांकता हुआ, उसे दूर ले जाता है ! इस तरह बकरे के छूट जाने से, बच्चे शोर मचाते हैं !]

बच्चे – [एक साथ ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ करते हुए, शोर मचाते हैं] – रोको, रोको ! गाड़ी को रोको ! बकरा कूद गया !

चुलबुली लड़कियां – [शोर मचाती हुई] – क्या हुआ रे..जमालिया ? क्या हुआ रे, बच्चे शोर क्यों मचा रहे हैं ?

जमाल मियां – [छत से चिल्लाकर कहते हैं] – मेरा थोबड़ा बिगाड़ डाला रे, उस बकरे ने ! अरी छोरियों तुम काहे चिल्ला रही हो ? ज़रा, ड्राइवर को कहो के गाड़ी रोके ! अरे ओ शैतान की खालाओं, गाड़ी को रोकाओ !

[इधर इन चुलबुली छोरियों के कानों में “गाड़ी को रोको, गाड़ी को रोको !” की आवाज़ सुनायी देती है, फिर क्या ? वे ज़ोर-ज़ोर से शोर मचाती है, और ड्राइवर को आवाज़ देकर गाड़ी रोकने का कहती है ! फिर वे खिड़कियों पर लटूंग-लटूंग कर, खिड़कियों से बाहर झांकने लगती है ! इधर मेटाडोर के अन्दर बैठी बूढ़ी औरतें अलग से, कांव-कांव करती दिखाई दे रही है ! एक-दूसरे से, पूछती जा रही है ‘क्या हुआ..क्या हुआ ?’ इस शोर को सुनकर, मेटाडोर में अपनी मां की गोद में बैठे नन्हे बच्चे रोने लगे ! इस तरह मचे कोलाहल के कारण, बेचारा ड्राइवर सकपका जाता है ! अब, उससे ये कर्ण भेदी आवाज़ें बर्दाश्त नहीं होती ! बस, वह अपने कानों में अंगुली डाल देता है ! अचानक उसे, सामने से तेज़ी से आ रही ट्रक दिखाई देती है ! बस वह हो जाता है, डाफ़ाचूक ! वह अपने ऊपर, नियंत्रण खो देता है ! समझ में नहीं आता, क्या करें ? किस तरह इस मेटाडोर को, वह नियन्त्रित करें ? बेचारा बगने की तरह देखता रह जाता है, इधर धूज़ते हाथ-पांव से गियर और ब्रेक छूट जाते हैं ! नियंत्रण खो देने से, मेटाडोर सड़क छोड़कर ढालान में उतर जाती है ! फिर क्या ? वो गाड़ी खाई की तरफ़ बढ़ जाती है ! आगे जाकर वह सामने आ रहे नीम के पेड़ से टकरा जाती है, फिर गुलाचिया खाती हुई हो जाती है उल्टी ! और जाकर फंस जाती है, बोरटी की कंटीली झाड़ियों में ! बस गनीमत है, गाड़ी उल्टी होने के पहले ड्राइवर का पांव अचानक लग जाता है, गाड़ी के ब्रेक पर ! बस, बाबा पीर दूल्हे शाह की मेहरबानी से गाड़ी में आग नहीं लगी है ! अब बांकी-टेडी पड़ी गाड़ी का दारुण मंज़र, कैसा दिखायी दे रहा है ? वो तो परवरदीगार ही, जाने ! इस मंज़र में एक इंसान दूसरे इंसान के ऊपर ऐसे पड़े हैं मानो कहीं धान की बोरियों के ढेर लगे हो ? कई बेचारे मोमीन दुर्घटना होते वक़्त सावधान रहे, वे गाड़ी के नीचे रपटने के दौरान बाहर कूद गए थे ! मगर वे बेचारे बने रहे, बदक़िस्मत के शिकार ! कई जाकर अटक गये बोर और केर की झाड़ियों में, और कई बेचारे अटक गए नीम की डालियां पकड़कर ! अब वे ऐसे लग रहे हैं, मानो किसी आम के पेड़ की डालियों पर पके आम लटके हैं ? कहावत है, आसमान से गिरे और खजूर में अटके ! मगर यहां खजूर तो है नहीं, मगर नीम, कीकर और बोर के पेड़ ज़रूर है ! यहां तो इन लोगों को बचानी है अपनी जान, इस कारण कौन रखे अपने कपड़ों का ख्याल ? किसी बेचारे मोमीन का पतलून या पायजामा खुलकर, जाकर अटक गया पेड़ की डाल पर ! इस हादसे में किसी बेचारे भोले आदमी की लुंगी खुलकर किसी हसीन मोहतरमा के ऊपर गिर गयी, और उसके ख़ूबसूरत चेहरे को ढक दिया है ! कई तो बेचारे ऐसे बदनसीब ठहरे, जो ज़मीन पर गिरे और बाद में फिसलते हुए ऐसे रगड़के खाए हैं, बस पूछो ई मत ! इस हादसे में उनका बदन राह में आये कंकर, पत्थर, कोपरिये और कांटो से पूरी तरह छिल गया हैं, मानो किसी लौकी को चाकू से छिल दिया गया है ? अब ये लोग इन कंटीली झाड़ियों में ऐसे अटके पड़े हैं, जैसे बाढ़ आने के बाद स्थान-स्थान पर जानवरों के मृत शरीर झाड़ियों मे अटके पड़े हो ? अब चारों तरफ़ मच जाता है, कोलाहल ! कहीं जमाल मियां कूक रहे हैं, हाय अल्लाह मार डाला इस खोजबलिये मामू ने !’ कहीं रमजान मियां अलग से कूकते जा रहे हैं ‘कहाँ मर गया रे, मामू ? तेरे खोपड़े पर मारूं, जूत्ते दस !’ जमाल मियां के पांव की हड्डी टूट गयी है, और उधर अल्लानूर मियां हाथ की हड्डी टूटने कराह रहे हैं ! कई मोहतरमाओं के जबड़े टूट गए हैं, इस हादसे से ! कभी इन ख़ूबसूरत हसीन मोहतरमाओं के होंठ पान की गिलोरी चबाते रहने से लाल-सुर्ख रहते थे, और आज ये होंठ रिसते खून से पूरे लाल हो गए हैं ! ऐसा लगता है, कई डायने इंसानों का रक्त पीकर वहां पड़ी है ? ख़ुदा रहम, उनकी ख़ूबसूरती अब बदसूरती में बदलती जा रही है ! उनकी मधुर आवाज़ अब चीखों में बदल गयी है ! इन चीखों के बीच, जमाल मियां की बेगम की चीत्कार अलग से सुनायी दे रही है ! वह चीख-चीखकर, कहती जा रही है...]

जमाल मियां की बेगम – [छाती पीटती हुई, चिल्ला रही है] – हाय अल्लाह ! मेरे बच्चे को क्या हो गया ? बेचारा दो साल का असगर...हाय, इसके सर से ढेर सारा खून निकल गया ! [नीम के पेड़ की तरफ़ निग़ाह डालती हुई, कहती है] अरे, ओ रशीद भाई ! ज़रा उठाना, इसको ! बेचारा, भाटे के नीचे दबा पड़ा है !
[मगर रशीद भाई कैसे सुनते, उसकी कातर पुकार ? वे तो ख़ुद, नीम के पेड़ के नीचे पड़े हैं ! और साथ में, फटी पेंट को बार-बार ढकने की निर्थक कोशिश करते जा रहे हैं ! ख़ुदा जाने, आज़ उतावली के कारण बेचारे अन्दर कच्छा पहनना क्यों भूल गए ? अब नंगे दिखाई न दें, इसलिए उस फटी पेंट को ढकने की बेकार की कोशिश करते जा रहे हैं ! नीम के पेड़ की डाल पर बन्दर की तरह उचककर बैठे मामूजान, इस मंज़र को देखते जा रहे हैं ! आख़िर मश्वरा दिए बिना उनसे रहा नहीं जाता, झट रशीद भाई को मश्वरा दे डालते हैं !]

मामूजान – [ज़ोर से चिल्लाते हुए, कहते हैं] – ओ, मेरे लवली भाणजे ! ढक ले यार, ढक ले ! नहीं तो, नंगा दिख जाएगा ? चारों तरफ़ से, ये छोरियां तूझे देख रही है ! शर्म कर, साले !

[मामू की सलाह सुनकर, जमाल मियां की अम्मीजान गुस्से से लाल-पीली हो जाती है ! फिर क्या ? वह गुस्सेल मोहतरमा लंगडाती हुई पास आती है, और फिर सौ नंबर की फटकार पिला देती है मामूजान को !]

जमाल मियां की अम्मी – [क्रोधित होकर, कड़े लफ्ज़ सुना देती है] – जमाले का टूट गया पाँव, और उसकी दुल्हन का टूट गया हाथ ! और मरदूद तू रुखड़े पर चढ़ा क्या कर रिया है ? [रशीद भाई को देखती हुई] अरे ए अब्दुल अजीज के लौंडे, तू यहाँ पाँव पसारे क्यों पड़ा है ? अब उठ, जाकर घायलों की मदद कर..यहाँ पेंट पकड़कर क्यों पड़ा है ?

रशीद भाई – [जमाल मियां की अम्मी से, कहते हुए] – ज़रा मुंह उधर करियो, चाची ! आज सुबह पेंट के नीचे कच्छा पहनना भूल गया, चाची ! [फिर मामूजान की तरफ देखते हुए, कहते हैं] ओ मामू के बच्चे, तेरे कंधे पर रखे अंगोछे को इधर फेंक ! फिर तू नीचे आये तो ठीक, नहीं तो मुझको तो ले जाना होगा इन घायलों को अस्पताल !

[इतने में दर्द से कराहते हुए, जमाल मियां की आवाज़ सुनायी देती है !]

जमाल मियां – मामू यार ! रुखड़े के नज़दीक रखी थैली को, लाकर देना तो..नहीं ला सकता है तो तू उसमें से निकाल दारु की बोतल...और पिला दे मुझे दो घूँट ! थोड़ी दारु हलक में जायेगी, तब यार यह दर्द कम होगा प्यारे ! दो घूँट दारु पिला दे, मुझे !

[अब मामूजान अंगोछा नीचे फेंककर, नीचे उतरते हैं ! फिर पेड़ के नीचे रखी थैली उठाते हैं, और उसमें से दारु की बोतल निकालकर जमाल मियां को थमा देते हैं ! मौत को सामने देखकर भी जमाल मियां को अल्लाह मियां का कोई खौफ़ नहीं, और अब वे बोतल का ढक्कन खोलकर झट उसे मुंह लगाकर खाली कर देते हैं ! जमाल मियां के ऐसे लक्खन देखकर, मामूजान उनको ताने सुना बैठते हैं !]

मामूजान – [ताने देते हुए, कहते हैं] – साले जा रहा है, दोज़ख में, और भूलता नहीं इस कमबख्त दारु को पीना ?

जमाल मियां - [दर्द से कराहते हुए, कहते हैं] – तब तू ही बता दे, मेरे दोस्त ! दारु को, कहां बैठ कर पीता रहूँ ?’ [हिचकी खाते हुए, कहते हैं] ले सुन, अर्ज़ किया है - ‘ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर,या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो !’

[रशीद भाई के अंगोछा हाथ लगते ही, वे उसे झट पेंट के ऊपर लपेटकर खिदमत करने के वास्ते तैयार हो जाते हैं ! अब वे लंगड़ाते हुए, झट पहुँच जाते हैं सड़क पर ! वहां पहुँचकर, जोधपुर जा रही खाली ट्रक को वे रुकवा देते हैं ! फिर वे घायलों के हाथ थामकर, उन्हें ट्रक में चढ़ा देते हैं ! सभी मोमीनों के ट्रक में बैठ जाने के बाद ट्रक रवाना होती है ! थोड़ी देर में ही, वह ट्रक हवा से बातें करने लगती है ! मंच पर, अंधेरा फैल जाता है ! थोड़ी देर बाद मंच पर वापस रोशनी फैलती है ! अस्पताल की चारदीवारी के अन्दर स्थित, चाय की दुकान नज़र आती है ! इस दुकान क बाहर रखे स्टूलों पर, रशीद भाई और मामूजान बैठे हैं ! रशीद भाई फ़िक्रमंद दिखाई दे रहे हैं ! वे बार-बार हाथ में लगी घड़ी को देखते जा रहे हैं ! फिर फ़िक्र के मारे, वे उसी सीमेंट के आँगन पर टहलते हैं ! फिर कभी आकर, वापस स्टूल पर बैठ जाते हैं ! इस तरह इनका यह उचक-लट्टू व्यवहार देखकर, मामूजान चुप रह नहीं पाते ! वे झट मुस्कराते हुए जेब से बीड़ी का बण्डल निकालते हैं, एक बीड़ी निकालकर उसे नाचिस से सिलगाते हैं ! फिर मुंह से धुए के बादल निकालते हुए, रशीद भाई से कहते हैं !]

मामूजान – क्यों ज़मीन को, रौंदता चल रहा है ? अरे नामाकूल, कहीं तेरे वज़न से यह सीमेंट का आँगन टूट न जाय ? आ जा, और आकर बैठ जा स्टूल पर ! बीड़ी पीकर थोड़ा आराम कर ले, सारी थकावट दूर हट जायेगी तेरी !

रशीद भाई – [क्रोधित होकर, कहते हैं ज़ोर से] – मामू यह वक़्त मज़ाक करने का नहीं है ! पूरी रात इन आंखों में निकाली है ! अब तू दिन में तो, चैन लेने दे ! किसको, क्या हुआ ? तेरे क्या फर्क पड़ता है, मामू ?

मामूजान – मुंह से अंगारे मत उगल, चुपचाप बैठ जा....समझदार आदमी की तरह !

रशीद भाई – [झल्लाते हुए, कहते हैं] – वाह रे, मामू ! क्या कहा, चुपचाप बैठ जाऊं ? अरे मामू तू इंसान है, या खाबीस ? तेरे दिल में, रहम नाम की कोई चीज़ नहीं ? इतना नहीं जानता तू, कल रात को जमालिये को पुलिस पकड़कर ले गई ! उस वक़्त पूरे वार्ड में हल्ला मचा, सभी मरीज़ जग गए ! बस तू अकेला ही, सो रहा था खर्राटे लेता हुआ !

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – ले गयी होगी, उस दारुखोरे को ! [मुंह से धुआ छोड़ते हुए, आगे कहते हैं] दारु पीकर किया होगा रे, हुड़दंग..और क्या ? अब तू अपना दिल छोटा मत कर, अब आ जा प्यारे और लबों पर बीड़ी रखकर धुआं निकाल दे ! नहीं तो यह पकड़ी हुई बीड़ी, अभी ख़त्म हो जायेगी ! और मैं दूसरी बीड़ी, बण्डल से निकालने वाला नहीं ! अब तू काहे की फ़िक्र करता है, दारु का नशा ख़त्म होते ही वह दारुखोरा आ जाएगा वापस !

रशीद भाई – ऐसे छोड़ेगा, कौन ? छोड़ना होता तो, उसे पकड़कर ले जाते ही क्यों ?

मामूजान – [हंसी का ठहाका लगाते हुए, कहते हैं] – अरे यार, भाणजे ! ये जोधपुर की पुलिस है, प्यारे ! मुफ्त में, रोटियाँ खिलाने वाली नहीं ! आये दिन, ऐसे रोज़ दारुखोरे पकड़े जाते हैं ! अगर इन दारूखोरों को अन्दर बैठाकर मुफ्त की रोटियाँ कोई खिलाते रहे, तो इस सरकार का भट्ठा बैठ जाएगा ! अब समझ गया, यह पुलिस उसे मुफ्त की रोटियाँ खिलाने वाली नहीं है ! नशा उतरते ही, इसे छोड़ देगी !

रशीद भाई – [गुस्सा करते हुए, कहते हैं] – जल रहा था रोम, नीरो बजा रहा था बंशी ! अब तू उस नीरो से, कहां कम पड़ता है ? कुछ जानता है, तू ? पाँव के प्लास्टर चढ़ा हुआ यह जमालिया, बैसाखी लिए हुए आया था बच्चों के वार्ड में ! वह बेचारा कर रहा था फ़िक्र, अपने नन्हें बच्चे की ! मगर उस मरदूद चौकीदार ने इसको अन्दर आने नहीं दिया...

मामूजान – फिर, आगे क्या हुआ ?

रशीद भाई - बेचारा कितना रोया..कितना गिड़गिड़ाया ? न जाने कितने लोगों के पाँव पकड़कर, उसने मिन्नत की होगी ? मगर किसी के दिल में दया न उपजी के इस बेचारे को बच्चे की सेवा-टहल करने दें ?

[इतना कहने के बाद, रशीद भाई हो जाते हैं ग़मगीन ! दुःख के मारे उनकी आंखों से आंसू निकल आते हैं ! मगर, मामू को क्या ? वे तो बेशर्मों की तरह हंसते जा रह हैं ! किसी तरह, अपने हंसी रोकते हुए कहते हैं...]

मामूजान – [हंसी को दबाकर, कहते हैं] – अर गधे, छोरियों की तरह क्या आंसू बहा रहा है ? कमबख्त, आगे बोल, क्या हुआ ? मगर, मैं यह जानता हूं के जिस वार्ड में उसका बच्चा एडमिट है, वहां कई ख़ूबसूरत नर्से और डॉक्टर उसकी सेवा में हाज़िर है ! फिर, काहे की फ़िक्र करता है, यार ?

रशीद भाई – [ताने देते हुए, कहते हैं] – खोजबलिये, तूझे तो ख़ूबसूरत नर्से ही दिखाई देगी..तेरे दिल में रहम है कहां ? इस जमाले की हालत पर तरस खा, यार ! यह बेचारा अपने बच्चे को देख नहीं पाया, तब इसने दुखी होकर दीवार पर सर दे मारा ! उसी समय, इसके सर से ढेर सारा खून निकला ! इस मंज़र को देखने कई लोग वहां आ गए, और डॉक्टर और नर्से भी वहां आ गयी ! फिर...

मामूजान – रुक मत, आगे बयान कर ! इस तरह बार-बार बातों की गाड़ी को रोका मत कर...सुनने का, सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है ! बोल, अब आगे क्या हुआ ?

राशि भाई – अब, आगे क्या बोलूँ ? ये कमबख्त डॉक्टर और ये तेरी ख़ूबसूरत नर्से बने रहे ज़ालिम ! उन लोगों ने उस बेचारे के सर की मरहम-पट्टी तो की नहीं, ऊपर से पुलिस को बुला डाला ! हाय अल्लाह, इस बेरहम पुलिस ने बिना जांच किये...उस बेचारे को ले गयी, और हवालात में उसको बंद कर डाला ! खुदा रहम, अब इस बेकसूर आदमी के ऊपर यह पुलिस जुल्म न ढाह दे ?

मामूजान – आगे बोल भाणजा, क्या हुआ ?

रशीद भाई – [झल्लाते हुए, कहते हैं] – होगा क्या ? होगा, तेरी मां का सर इतना भी भला तू जानता नहीं, यह कमबख्त पुलिस ठहरी बेरहम..उसने इस बेचारे पर ‘दारु पीकर हंगामा मचाने का आरोप’ लगाकर ले गयी थाने ! अब, इस बेचारे की जमानत कैसे होगी ?

[थोड़ी देर तक शान्ति बनी रही, आखिर इस चुप्पी को तोड़कर मामूजान कहने लगे...]

मामूजान – [थोड़ा सीरियस होकर, कहते हैं] – यह सारा माज़रा कैसे हो गया, भाणजे ? मेरी राय तो यही है, मन्नत कबूल हुई नहीं..और बाबा ने, कहर बरफा दिया ! याद कर, मन्नत दो बकरों की बोली गयी, मगर क़ुर्बानी के लिए ले गए केवल एक बकरा ? और वो कमबख्त रस्सी छुड़ाकर भग गया, फिर मन्नत तो पूरी हुई नहीं..बाबा का नाराज़ होना वाज़िब है ! जब-तक मन्नत कबूल न होगी, भाणजे तब-तक यह आफ़त मिटने वाली नहीं !

रशीद भाई – मन्नत पूरी करें, कैसे ? जिन बकरों पर मन्नत बोली गयी, उनमें से एक बकरा तो छूटकर भाग गया, अब उसको वाप लायें कैसे ? अब तूझे कैसे बताऊँ, यार ? इस वाकये के बाद, कई छोरों को बकरा ढूंढ़ने के लिए चोटिला के खेत-खलिहानों में भेजा गया ! मगर, उनके हाथ कुछ नहीं आया ! मगर, आफ़त ज़रूर आ गयी ! बकरे को ढूंढ़ते–ढूंढ़ते, हम लोग पहुंच गए रावले ! वहां बंधे एक बकरे के, हाथ क्या लगाया हमने ? अल्लाह कसम, वो मूंछा वाला ठाकुर वहां आ गया अपने लठैतों को लिए !

मामूजान – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – होगा क्या ? पिछवाड़े पर पड़े होंगे, डंडे ! यह मार खानी तो आप लोगों के नसीब में पहले से लिखी है, और क्या ? [ठहाके लगाकर, ज़ोर से हंसते हैं]

रशीद भाई – [क्रोधित होकर, कहते हैं] – दांत निपोरना बंद कर, मामू ! उस ठाकुर और उसके लठैतों ने हमला बोल दिया हम पर, हम जान बचाकर भागे..हम आगे-आगे और वे लोग हमारे पीछे-पीछे ! दौड़ते-दौड़ते किसी के पांवों में चुभ गए कांटे, तो कई नीचे गिर गए और कंकर-पत्थरों से उनका बदन छिल गया ! कई मार खा रहे छोरे चिल्लाये ‘बाबजी मारो, मत !’ इधर काँटों में उलझकर, मेरी पेंट फट गयी !’ फटी पेंट पहने, कैसे घर जाऊंगा ? हाय अल्लाह, वो कैसा मंज़र था..? उसे मैं, कभी भूल नहीं सकता !

मामूजान – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – अच्छा होता, तुझे इस हालत में कोई हसीन छोरी देख लेती ! तब तू पिछवाड़े पर पड़े डंडों का दर्द भूल जाता ! बाद में क्या हुआ, मेरे लख्ते ज़िगर ? आख़िर, तू आ तो गया जोधपुर ? या फिर...

रशीद भाई – [ग़मगीन होकर, कहते हैं] – रोते-फिरते भूख से त्रस्त होकर बेचारे छोरे आये आख़िर अस्पताल ! उन बेचारों ने सोचा ‘बकरा नहीं मिला, तो क्या ? अब अस्पताल चलकर, घायलों की तीमारदारी कर ली जाय ! मगर उनके द्वारा ख़िदमत करनी तो दूर, उन बेचारों को वार्ड के अन्दर भी आने नहीं दिया बाहर खड़ी पुलिस ने ! फिर क्या ? जवान खून था, उबाल आ गया और त्रस्त होकर मचा डाला हुड़दंग !

मामूजान – पुलिस की मौजूदगी में कमबख्तों ने मचाया है, हुड़दंग..सालों की बुद्धि मारी गयी ? ले चल, अब आगे बता...क्या हुआ ?

रशीद भाई – [रोनी आवाज़ में, कहते हैं] – फिर क्या, मेरे बाप ? डंडों से पीटते हुए इन बेचारों को पुलिस ले गयी हवालात, और बैठा दिया अन्दर ! अब मजीद चच्चा गए हैं, थाने...उन छोरों को छुड़ाने ! मेरा विचार है, वे शायद उन लोगों की जमानत करवा लाये !

मामूजान – देख भाणजा, मैं तूझे एक मश्वरा दे रहा हूं...वो भी, मुफ़्त में ! मानना या न मानना, तेरी मर्ज़ी ! सुन ले अब, बाबा के कहर से क़यामत आने वाली है...अब कोई नहीं बचेगा ! उस मन्नत के बकरे के कारण, सबकी जान अब खतरे में है ! तू ख़ुद देख ले...

रशीद भाई – अब, क्या देखूं रे ?

मामूजान – इस हादसे से फ़ज़लू चच्चा की जान चली गयी, रफ़ीक, ज़ाहिरा और ज़ुबैदा अस्पताल मेंआख़िरी सांसें ले रही है ! मैं तो अब एलान करता हुआ यही कहूंगा, के “ढूंढ़ लीजिये उस मन्नत के बकरे को, और कर लीजिये मन्नत पूरी ! तब ही आप इन तकलीफों से निज़ात पा जायेंगे ! नहीं तो फिर....

रशीद भाई – [फ़िक्र करते हुए, कहे हैं] – मगर कहाँ ढूंढे, उस मन्नत के बकरे को ? अब कौनसा, वह हाथ लगने वाला ? या तो वह किसी रेवड़ में मिल गया होगा, या फिर किसी नापाक इंसान के हाथ लग गया होगा...और उसने, उसका कीमा बनाकर खा गया होगा ? अब तो बेटी के बाप, उस बकरे का मिलना मुश्किल है !

मामूजान – मन्नत पूरी हो सकती है, पहले आप बाबा से माफ़ी मांग लीजिये ! अब उस बकरे की ठौड़, दूसरा बकरा मुझसे ख़रीदना होगा ! इस तरह कर सभी कर लो, अपनी मन्नत पूरी ! इस तरह तूझे भी इस जबरु को समझाना होगा, के ‘इस बार उसे दो बकरों की ठौड़, चार बकरे मुझसे ख़रीदकर अपनी मन्नत कबूल करानी होगी !’ तब ही बाबा उसकी खता माफ़ करेगा, और तू...

रशीद भाई – [घबराते हुए, कहते हैं] – मैं क्यों ? तू कहना क्या चाहता है ?

मामूजान – यह कहना चाहता हूं, भाणजे ! तू यों समझ ले,के चार हज़ार के भाव से सभी मुरीद मुझसे खरीदेंगे बकरे ! बकरा मंडी में, यही भाव चल रहे हैं ! समझ गए, क्या समझा भाणजे ?

रशीद भाई – क्या समझूं, मामू ? माशाल्लाह तेरी ज़बान पर लग जाए लगाम, तो ख़ुदा कसम लोगों का भला होगा ! थोड़ा समझा कर, मामू ! इन मुरीदों की कड़ी मेहनत से की गयी कमाई को, तेरे जैसा कंत्री अपने स्वार्थ के ख़ातिर उन नादानों को बहकाकर लूट लेता है ! यह तेरा स्वार्थ से भरा कार्य, शरियत के ख़िलाफ़ है ! अब तू यार, यह लूटने-खसोटने का काम बंद कर दे !

मामूजान – अबे, ए क़ाज़ी की औलाद ! अब, तू मुझे क्या समझा रहा है ? मत करना अपनी मन्नत पूरी, अब तेरे कान की ठेटी निकालकर सुन ले मेरी बात...अरे कायरे, तेरे ऊपर भी क़यामत आयेगी ! तुझसे भी ख़ता हुई है, अब तो बाबा क्या ? अल्लाह पाक भी, तूझे माफ़ नहीं करेगा ! ख़ुदा को मालुम है, के तू मज़हब के पाक काम में अड़चन पैदा करता जा रहा है !

रशीद भाई – [दूर हटते हुए, कहते हैं] – मैंने क्या किया, नालायक..तू मुझे काहे को फंसाता जा रहा है ?

मामूजान – पहले तू तसल्ली से बैठ जा, इस स्टूल पर ! ऐसे उचकलट्टू बनने से मेरी बात, तेरे समझ में न आयेगी ! [शान्ति से समझाते हुए, कहते हैं] एक बार, बैठ जा..तो फिर तूझे बताऊं, के तुझसे ख़ता हुई कहाँ ?

[बेमन से, रशीद भाई स्टूल पर बैठ जाते हैं !

मामूजान – अब तू ऐसे कर, पहले इस चाय वाले छोरे को आर्डर मार ! और कह दे इसे, के दो कप कड़क चाय, बिस्किट्स का एक पुड़ा और केवेंडर सिगरेट का एक पैकेट लाकर रख यहां ! और साथ में माचिस की डिबिया लाना भूलना मत !

रशीद भाई – मामू तू ठीक नहीं कर रहा है, यार !

मामूजान – मत मंगवा यार, मुझे क्या ? तू जाने और तेरा काम जाने, मैं तो अभी हो जाता हूं चुप ! [धीरे-धीरे कहते हैं] यहां कोई मुफ़्त का भेजा है, जो तूझे खाने दूंगा ?

रशीद भाई – तू कुछ भी बोल, यार मामू ! मगर तुझको बताना ही होगा, के मुझसे आख़िर ख़ता हुई कब ? [चाय वाले छोरे को आवाज़ देते हुए, कहते हैं] ‘अरे, ओ जुम्मन मियां ! ज़रा दो कप कड़क चाय, बिस्किट्स का एक पुड़ा और केवेंडर सिगरेट का एक पैकेट लाकर रख यहां ! और साथ में, माचिस की डिबिया लाना भूलना मत !’ ले, यह मार दिया आर्डर ! अब बोल !

मामूजान – [बीड़ी का अंतिम कश लेकर, कहते हैं] – पहले चाय तो आने दे, यार ! [बीड़ी के शेष टुकडे को फेंकते हुए, आगे कहते हैं] कुछ नशा-वशा हो जाय यार पहले, तब यब ज़बान चलती है आराम से !

[छोरा जुम्मन मियां आर्डर के मुताबिक़, तश्तरी में सभी सामान रखकर लाते हैं ! फिर उस तश्तरी को रख देते हैं, पास रखे स्टूल के ऊपर ! फिर, हाथ जोड़कर कहते हैं]

जुम्मन मियां – [हाथ जोड़कर, कहते हैं] – ज़रूर ज़नाब ! यह ज़बान ज़रूर चलनी चाहिए, और वो भी चलनी चाहिए आर्डर मारने के लिए ! और इधर मैं अल्लाह के मेहर से, आर्डर के मुताबिक़ सामग्री आपकी ख़िदमत में पेश करता रहूं..यही है, इल्तजा मेरी !

रशीद भाई – [झल्लाते हुए, कहते हैं] – भाग, लंगूर की औलाद ! खोड़िले, कमबख्त आया तू मेरी जेब खाली कराने ?

जुम्मन मियां – [हंसते हुए, कहते हैं] – हुज़ूर, यह आपका ख़िदमतगार बहादुरशाह जफ़र का नेक दख्तर है ! वो लंगूर की औलाद नहीं हो सकता, ज़नाब ! अब समझ गए, जनाब ?

रशीद भाई – [गुस्से से अपनी जूत्ती निकालकर, कहते हैं] – मर इधर, कमबख्त ! अभी मेरी रेशमी जूत्ती, तेरे सर पर सवार होती है ! नहीं तो चुपचाप उस टंकी के पास बैठ जा, और जूठे कप-प्लेट साफ़ कर ले जाकर !

जुम्मन मियां – [हंसते हुए, कहते हैं] – ज़नाब, कहाँ है आपकी रेशमी जूत्ती ? इस वक़्त आली ज़नाब ने पहन रखी है, फटी बाड़मेरी जूत्ती ! कहीं ऐसा तो न हुआ, आपके साथ ? आपको बिना जूत्ते पहने देखकर, चोटिला ठाकुर साहब को रहम आ गया होगा ? और उन्होंने आपको, तौहफ़े में दे दी होगी.. अपने फटी जूत्तियां ?
रशीद भाई – [क्रोधित होकर, कहते हैं] – अरे ओ, खैराती अस्पताल के पाख़ाने के कीड़े ! ज़बान ज्यादा चल गयी है, तेरी ! बैठ जा चुपचाप, जाकर कप-प्लेट धोने ! नहीं तो...

[अब जैसे ही रशीद मियां उन पर जूत्ती फेंकने को उतारू होते हैं, तभी जुम्मन मियां अपने लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए चल देते हैं टंकी की तरफ़ ! फिर, वहां रखे जूठे कप-प्लेट धोने बैठ जाते हैं ! रशीद भाई पांव में जूत्ती पहनकर चाय का कप उठा लेते हैं, और इधर कप-प्लेट धोते रहे जुम्मन मियां इनको कनखियों से देखते हुए हंसते जा रहे हैं ! मामूजान को, जुम्मन मियां से क्या लेना-देना ? यह सर-दर्द ठहरा, रशीद भाई का ! वे तो तपाक से भूखे शेर की तरह, बिस्किट्स खाने के लिए टूट पड़ते हैं ! रशीद भाई चाय की चुश्कियां लेते हुए, सामने से आ रहे आगंतुकों को देखते हैं ! उन्हें मजीद मियां, जमाल मियां, मरियम बी और जमाल मियां की अम्मी आते हुए नज़र आते हैं ! जमाल मियां के पांव में प्लास्टर चढ़ा हुआ है, वे बैसाखी के सहारे धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं ! उनके साथ मजीद मियां भी बैसाखी का सहारा लिये, धीमे-धीमे आ रहे हैं ! मरियम बी और जमाल मियां की अम्मीजान ने, काला बुर्का ओढ़ रखा है ! वे बुर्के की जाली को हटाकर, बातें करती हुई इधर ही आ रही है ! अपने बुजुर्गों को आते देख, ये दोनों मामू-भाणजा उठकर सलाम करते हैं ! मंच पर, अंधेरा फ़ैल जाता है !]

[६]

[मंच रोशन होता है, चाय की दुकान का मंज़र वापस नज़र आता है ! इस वक़्त सभी दुकान के बाहर रखी बेंच और स्टूलों पर बैठें हैं ! मजीद मियां की मौजूदगी, से मामूजान चहकते जा रहे हैं ! आख़िर, वे ख़ुश भी क्यों नहीं होंगे ? ये आली ज़नाब ठहरे, उनके मुख़्तसर ! जो उन पर, आंखें मूंद कर वसूक कर लिया करते हैं ! अब, मामूजान चहकते हुए कह रहे हैं...]

मामूजान – [चहकते हुए, कह रहे हैं] – मान गया, दूल्हे भाई ! वास्तव में आपके रसूखात बड़े-बड़े ओहदेदारों से है ! तभी आप, इस दारुखोरे को छुड़ा लाये !

मजीद मियां – आपके इस दोरुखोरे दोस्त जमाल को छोड़ो, मैं तो सभी शैतान छोरों को भी छुड़ा लाया ! अब बोलो बरखुदार, उनकी जगह किसी को अन्दर बैठाना है तो आप कह दीजिये ! वैसे भी थानेदार साहब कह रहे थे, अभी-तक जोधपुर के सटोरिये पकड़े नहीं गए...कहो तो आपको ले जाकर, बैठा दें अन्दर ?

[अब मामूजान झेंप जाते हैं, और अब वे समझ जाते हैं ‘ये मजीद मियां अब बदल गए हैं, ये पहले वाले मजीद मियां नहीं रहे ? अब तो आली ज़नाब नहला पर दहला मारने वाले एक होशियार आदमी बन गए हैं ! ये मुज्ज़म, पहले जैसे भोले भी न रहे !’ बात यह है, मामूजान का बोला गया कथन “वास्तव में आपके रसूखात, बड़े-बड़े ओहदेदारों से रहते हैं ! तभी आप, इस दारुखोरे को छुड़ा लाये !” इसका मफ़हूम यही हुआ, के ‘मजीद मियां का काम ही, दारुखोरों को कैद से मुक्त करवाना है ! यानि क़ानून को तोड़ने वाले इंसानों का, सहयोग करना है !’ मगर मजीद मिया ने ऐसा जवाब दिया, जिससे बेचारे मामूजान अपनी बगलें झांकने को मज़बूर हो जाते हैं ! अब वे मुंह बंद करके बैठ जाते हैं, चुपचाप !]

मजीद मियां – इसलिए बरखुदार आपको कहा था, मैंने...के बार-बार धंधे बदला मत करो ! धंधे बदलते रहने से, आदमी की साख ख़त्म हो जाती है ! मुझे तुम्हारा इस तरह ठौड़-ठौड़ भटकना, अच्छा नहीं लगता !अब किसी सरकारी महकमे में कोई नौकरी पकड़ लो, साहबज़ादे !’ देख लीजिये मुझे, मैं रेलवे का सरकारी मुलाज़िम हूं ! इस कारण, बड़े-बड़े ओहदेदारों से मेरे अच्छे रसूखात हैं ! जानते हैं, आप ? जब मैं पुलिस थाना पहुंचा, तब वहां मुझे सभी मुलाज़िम अपने जान-पहचान के ही दिखायी दिए !

रशीद भाई – चच्चा छोड़ो इन बातों को, ये पुलिस वाले किसी के सगे नहीं होते ! इन लोगों ने जुर्माना ज़रूर भरवाया होगा, आपसे ! ना तो हुज़ूर, ये कब छोड़ने वाले..? तभी बुजुर्ग कहते हैं, ‘इन लोगों से न दोस्ती काम की, और न काम की है दुश्मनी !’ इनसे दूर ही रहो, चच्चा !

मजीद मियां – [चौंकते हुए, कहते हैं] – अरे साहबज़ादे, अगर अपने रिश्तेदार पुलिस महकमें में काम करते हैं..तब हम उनसे दूर कैसे रह सकते हैं ? जानते हो, इस थाने के थानेदार कौन है ?

रशीद भाई – मैं क्या जानू, चच्चाजान ? मैं कहाँ फिटोल की तरह, बाहर घूमता हूं ? पूरे दिन पान की दुकान पर, बैठा रहता हूं ! फिर, मुझे क्या पता..?

मजीद मियां – अब जान लीजिये, ये आली ज़नाब है आपके फूफा रहमत तुल्ला खां साहब ! जो मेरे ख़ास दोस्त हैं, वे इसी पुलिस स्टेशन के इंचार्ज है ! [थोड़ी हिंगलिश झाड़ते हुए, कहते हैं] विथ इन फाइव मिनट, उन्होंने सजा डाला दस्तरख्वान ! वाह भाई वाह, क्या लजीज़ मिठाइयां, बामज नमकीन परोसी ? क्या कहना, रहमत मियां का ? अभी आते समय, उन्होंने फरमाया...

मामूजान – थानेदार साब ने यही कहा होगा, ज़नाबे आली अब आगे से आप यहां आना मत, नहीं तो यह घोड़ा घास से यारी रखेगा नहीं ! फ़टाफ़ट, घास चर जाएगा !
मजीद मियां – क्या कहा, साहबज़ादे ? सुन लीजिये, मैं बहरा नहीं हूं ! आपका बोला गया एक-एक शब्द, सुनता जा रहा हूं !

रशीद भाई – चच्चा, आप नाराज़ क्यों होते हैं ? यह मामू ठहरा नशेडी, इसे कहाँ है बोलने का होश ? इस पागल की बात को जाने दीजिये, आप आगे कहिये...फिर, क्या हुआ ?

मजीद मियां – [मामूजान को देखते हुए, कहते हैं] - वहां थाने में मजीद मियां का आना हुआ, तुम्हारे जैसे धानिये-भगवानिये किसी सटोरिये का आना नहीं हुआ..समझ गए, प्यारे मियां ? मुझको देखते ही, उन्होंने कहा ‘चलिए, इस बहाने ज़नाब के दीदार तो हुए ! और हम लोगों को, आपकी ख़िदमत करने का मौक़ा मिला !’ [उदास हो जाते हैं] मगर, क्या करें ? इसानों के बीच हमारी चवन्नी चल जाती है, मगर उस ऊपर वाले ख़ुदा के पास नहीं ! उसके नाराज़ हो जाने से, हम सब बरबाद होते जा रहे हैं ! अभी मरियम भाभी कह रही थी, के...

जमाल मियां की अम्मीजान – [बुर्के की जाली को थोड़ा दूर हटाती हुई, कहती है] – अब कुछ नहीं हो सकता, मियां ! अब, सबको बरबाद होना है ! देख लीजिये, हम सभी, तबाह होते जा रहे हैं ! याद कीजिये, इस हादसे में फ़ज़लू चाचा चल बसे ! इधर रफ़ीक, सुलेमान, ज़ाहिरा और जुबैदा ये सभी बच्चे अस्पताल में, अंतिम सांसें ले रहे हैं ! [दोनों हाथ ऊपर करके, कहती है] ए पीर बाबा, यह क्या कर डाला तूने ? इन मासूम बच्चों पर रहम रख, मेरे मोला !

मरियम बी – [जमाल मियां की अम्मीजान से, कहती है] – मैं यह कह रही हूं, खाला ! यह मामू का बच्चा, सच्च ही कह रहा होगा ? के, बाबा मांग रहा है मन्नत कबूल ! अब एक को नहीं, सबको मन्नत कबूल करानी होगी ! हम सभी ख़ता करने वाले आदमी के साथ गए थे, चोटिला ! ख़ता होती देखी है हम सब ने, मगर उसको रोकने का किसी ने प्रयास किया नहीं ! इस कारण, हम सभी दोषी हैं ! अब इस मतले में कंजूसी बरतनी अच्छी नहीं, जान है तो जहान है !

मामूजान – [ख़ुश होकर, कहते है] – वज़ा फ़रमाया, आपाजान ! अब लाइए दो हज़ार रुपये, अरे नहीं नहीं..लाइए छ: हज़ार रुपये ! आपको मन्नत बोलनी है कुल मिलाकर चार बकरों की, एक तो पहले से आपके पास है ही ! बाकी रहे तीन, इन तीन बकरों के दो हज़ार के भाव से कुल रुपये हो गए छ: हज़ार रुपये ! क्यों के, अब सज़ा के तौर पर दूगने बकरों की मन्नत ही कबूल होगी !

[मरियम बी पर्स से छ: हज़ार रुपये निकालकर मामू को थमा देती है, फिर वह जमाल मियां की अम्मीजान से कहती है..]

मरियम बी – कंजूसी मत कीजिये जमाल की अम्मी ! देख लीजिये, जबरू ने की कंजूसी....उसका परिणाम, तुमने देख ही लिया..अब दूगने बकरों की मन्नत, कबूल करानी होगी ! अब जल्दी निकालिए रुपये, खालाजान..काम किया, और निपटा !

[जमाल की अम्मीजान थैली से रुपये निकालर, मामूजान को थमा देती है ! फिर, वह उनसे कहती है]

जमाल मियां की अम्मीजान – ले बेटे, ध्यान रखकर गिन ले रुपये ! प्रति बकरा दो हज़ार के हिसाब से रुपये दे रही हूं ! इस तरह इसमें, हमारे अलावा रफ़ीक की अम्मी और जाहिरा की अम्मी के दिए रुपये भी शामिल है ! अब समझ गए, बेटा ? कुल मिलाकर आठ हज़ार रुपये दे रही हूं, तुम्हें ! अब देख, बाकी रहे मुरीद जो तूझे रुपये देना चाहेंगे...वे शाम तक, तूझे लाकर दे देंगे ! समझ गया, या नहीं ?

[मामूजान रुपये लेकर, अपनी जेब में डाल देते हैं ! अब जमाल मियां, जमाल मियां की अम्मीजान, और मरियम बी रूख्सत होते दिखाई देते हैं ! मजीद मियां उठकर अपनी बैसाखी संभालते हैं ! मगर उनको रोकते हुए, मामूजान कहते हैं..]

मामूजान – कहाँ जा रहे हो, दूल्हे भाई ? क्या कहा था, मैंने आपको ? भूल गए, क्या ? क्या आप, अपने दामाद की सलामती नहीं चाहते हैं ?

रशीद भाई – [घबराते हुए, कहते हैं] – मामू यार, तू यह क्या कह रहा है ?

मजीद मियां – [उठते हुए, रशीद भाई से कहते हैं] – सच्च कह रहे हैं, आपके मामूजान ! मन्नत के बकरे की रस्सी, किसने थाम रखी थी ? आपकी लापरवाही के कारण ही, यह बकरा रस्सी छुडाकर भग गया था ! इस कारण ही, यह हादसा हुआ ! अब कहिये, इस हादसे का जिम्मेदार कौन है ?

[बेचारे रशीद भाई, मजीद मियां को क्या जवाब देते ? बस लाचारगी से, मजीद मियां का मुंह ताकते रह जाते हैं ! इसके अलावा बेचारे रशीद भाई, करते भी क्या ?

मजीद मियां – मेरा मुंह क्यों ताक रहे हो, साहबज़ादे ? जेब से निकालिए, दो हज़ार रुपये ! फिर दे दीजिये, प्यारे मियां को ! अब आप बेरोज़गागार नहीं हैं, चित्रा सिनेमा के अन्दर पान की दुकान खोल रखी है आपने...और रोज़ चांदी कूटते हो ? बस मुझे तो अब, आपकी सलामती चाहिए ! समझ गए, या नहीं ?

[मनमसोस कर रशीद भाई अपनी जेब में हाथ डालते हैं, फिर दो हज़ार रुपये निकालकर मामूजान को थमा देते हैं ! फिर, चिढ़े हुए कहते हैं..]

रशीद भाई – [चिढ़े हुए, कहते हैं] – मामू प्यारे...बांगी कहीं के आ गया यहां दो हज़ार का चूना लगाने ! अब क्या कहूं, तूझे ? कहाँ तो मैं कह रहा था, के शर्त हारने से ‘अब मेरा जूत्ता और तेरा सर !’ मगर यहां तो ठोकिरा, तूने मुझे लगा दिया दो हज़ार का जूत्त..इस मन्नत के बकरे का नाम लेकर !

[मजीद मियां बैसाखी लिए, रशीद भाई पर कंधे पर हाथ रखे रूख्सत होते दिखाई देते हैं ! उनके चले जाने के बाद अब वहा कोई बैठा नज़र नहीं आता, तब मामूजान झट जेब से सारे रुपये बाहर निकालकर उन्हें गिनना शुरू करते हैं ! रुपये गिनते-गिनते, वे बोलते जा रहे हैं..]

मामूजान – [रुपये गिनते हुए, कहते जा रहे हैं] – दो हज़ार...चार हज़ार ! अरे ख़ुदा, यह क्या ? चौबीस हज़ार की रकम इकट्ठी हो गयी ! वाह रे वाह, मेरे मन्नत के बकरे ! कमाल का निकला रे तू ! मुरीदों की भीड़ लग गयी, और हो गयी बरसात रुपयों की ! अल्लाह देता है, छप्पर फाड़कर देता है और यह बन्दा लेता है झोली भरकर ! ए मेरे ख़ुदा, बस तू तो ऐसे कोदन इंसानों को पैदा करता जा ! फिर, मेरी तो चान्दी ही चांदी ! पांचों अंगुलियां, घी में तिरती रहेगी !

[इतने में सामने से सकीना बी आती हुई दिखाई देती है, उनको देखते ही वे ख़ुश हो जाते हैं के चलो एक नयी मुर्गी फंसी ! बस ज़नाब, ज़ोर से आवाज़ लगा बैठते हैं]
मामूजान – [ज़ोर से आवाज़ देते हुए, कहते हैं] – ओ सकीना चाची ! मन्नत के बकरे हो गए, ज्यादा ! अब आप भी बोल दीजिये, मन्नत ! आधे रूपये अभी दे देना, आधे बाद में..और साथ में फ़ायदा भी ले लेना बराबर २० प्रतिशत छूट का ! वह भी मेरी तरफ़ से, केवल आपको ही ! न तो बाद में यह मत कहना, के बकरे अब रहे नहीं और अब कहाँ से खरीदूं बकरा मन्नत का ?

[हवालात से छूटकर आये छोरे, अस्पताल के गेट में दाख़िल होते हैं ! ये लोग मामूजान के मुख से कहा गया जुमला सुन लेते हैं, फिर सभी छोरे ज़ोर-ज़ोर से हंसते हैं ! और मामूजान के ऐसे लखन देखकर, वे लोग उनको चिढ़ाते हुए नारा लगाने की स्टाइल में ज़ोर-ज़ोर से बोलते हैं !]

छोरा पार्टी का बड़ा लड़का – [ज़ोर से, बोलता है] – बोलो रे साथियों, मामू को चाहिए..क्या क्या चाहिए ?

सभी छोरे – [एक सुर में ज़ोर से बोलते हैं] – बकरा मन्नत का, बकरा मन्नत का !

[इन लोगों की हंसी के ठहाके, आसमान में गूंज़ने लगते हैं ! मामूजान को अपनी पोल खुलने का संदेह हो जाता है, अब वे शर्म के मारे अपना मुंह नीचे झुका लेते हैं ! फिर क्या ? सारे रूपये जेब में डालकर, वे वहां से नौ दो ग्यारह हो जाते हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]












लेखक का परिचय
लेखक का नाम दिनेश चन्द्र पुरोहित
जन्म की तारीख ११ अक्टूम्बर १९५४
जन्म स्थान पाली मारवाड़ +
Educational qualification of writer -: B.Sc, L.L.B, Diploma course in Criminology, & P.G. Diploma course in Journalism.
राजस्थांनी भाषा में लिखी किताबें – [१] कठै जावै रै, कडी खायोड़ा [२] गाडी रा मुसाफ़िर [ये दोनों किताबें, रेल गाडी से “जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन” के बीच रोज़ आना-जाना करने वाले एम्.एस.टी. होल्डर्स की हास्य-गतिविधियों पर लिखी गयी है!] [३] याद तुम्हारी हो.. [मानवीय सम्वेदना पर लिखी गयी कहानियां].
हिंदी भाषा में लिखी किताब – डोलर हिंडौ [व्यंगात्मक नयी शैली “संसमरण स्टाइल” लिखे गए वाकये! राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा विभाग का उदय, और उत्पन्न हुई हास्य-व्यंग की हलचलों का वर्णन]
उर्दु भाषा में लिखी किताबें – [१] हास्य-नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” – मज़दूर बस्ती में आयी हुई लड़कियों की सैकेंडरी स्कूल में, संस्था प्रधान के परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हास्य-गतिविधियां इस पुस्तक में दर्शायी गयी है! [२] कहानियां “बिल्ली के गले में घंटी.
शौक – व्यंग-चित्र बनाना!
निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].
ई मेल - dineshchandrapurohit2@gmail.com


 










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