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माँ का पिण्ड दान [कविता] – दिव्यांशु शर्मा



दोस्त कुटुम्बी देते हैं ,

बारी बारी कान्धा तुझको,

और मैं कच्ची हांडी सा,

तेरा बच्चा, चलता हूँ आगे,

एक पकी हाँडी,

हाथ में ले कर ।


इस मिट्टी के बर्तन में,

लिये जाता हूँ माँ ,

थोडा इतिहास, एक युग, एक जीवन,

चुट्की भर जवानी, एक अंजुली बचपन,

अट्कन बट्कन , दही चट्कन,

घी दूध मख्खन,

अलमारियों की चाबी,

गंगाजली का ढक्कन,

और तू कुछ बोलती नहीं।

यों तेरी गृहस्थी,

मटकी में किये बंद,

चलता हूँ मैं माँ,

नंगे पैर, कि तू ,

कन्धों से आंगन में,

उतर कर आ जाये।

पहले झगडे, चिढे, गुस्साये,

बाद में फ़ुसलाये,

"लल्ला नंगे पांव ना घूमो"

पर तू कुछ बोलती नहीं।


अन्तिम यात्रा कहते हैं लोग इसे,

रोने भी नही देते जी भर,

देते हैं मुझे हवाले ,

वासांसि जीर्णानि से,

नैनम छिन्दन्ति तक,

गीता से गरुड तक,

ईश्वर से नश्वर तक,

लौकिक से शाश्वत तक,

मैं मुस्कुरा के तुझे,

देता हूँ मुखाग्नि,

करता हूँ तेरा पिन्ड दान,

कि माएं ना पैदा होती हैं,

ना मरती हैं।

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21 टिप्पणियाँ

  1. आँखें नम हैं!!! बहुत उम्दा और मार्मिक प्रस्तुति.

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  2. माएं ना पैदा होती हैं,
    ना मरती हैं।

    इसके बाद कहने को मेरे पास कुछ और नहीं बचता ! मार्मिक रचना!

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  3. बहुत ही मार्मिक रचना है.. दिल को छु जाती है...

    जवाब देंहटाएं
  4. दिव्यांशु,


    आपकी यह कविता मन में गहरे उतरती है। कोई भी संवेदित हुए बिना नहीं रह सकता।

    इस मिट्टी के बर्तन में,
    लिये जाता हूँ माँ ,
    थोडा इतिहास, एक युग, एक जीवन,
    चुट्की भर जवानी, एक अंजुली बचपन,
    अट्कन बट्कन , दही चट्कन,
    घी दूध मख्खन,
    अलमारियों की चाबी,
    गंगाजली का ढक्कन,
    और तू कुछ बोलती नहीं।

    एक आह!! सी उठती है और कविता उँचाईया चूने लगती है पाठक के अंत:करण में। जिस तरह इस रचना का आपने अंत किया है वह दर्शाता है कि आप कितनी संभावनाओं से भरे कवि हैं।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  5. दिल को छू लेने वाली रचना.... आभार
    किसी ने सच ही कहा है

    "मां ही गंगा, मां ही जमुना... मां ही तीर्थधाम"

    जवाब देंहटाएं
  6. मार्मिक वर्णन है अन्तिम यात्रा और बेटे की मां के प्रति भावनाओं का. सच मांयें कभी नहीं मरती... जिसे आंख खोलते ही देखा हो और जिसकी उंगली पकड कर चलना सीखा हो क्या उसे भूला जा सकता है.. कदापि नहीं

    मनोहर जोशी

    जवाब देंहटाएं
  7. ye ek kavita nahi hai.....ye ek prastuti hai jo usi hriday se nikal sakti hai jis hriday main maa ke prati wo sneh ho jo amar hai......is rachna jitni tark purn hai utni hi marmik hai dil ko chho lene waali

    जवाब देंहटाएं
  8. संवेदना से परिपूर्ण कविता के लिये बहुत बहुत बधाई

    जवाब देंहटाएं
  9. आपकी पंक्तियों ने तो रुला ही दिया.....सच कहा,माँ कभी नही नही मरती.वह तो दर्द कराहों में ,दुआओं में,हर हँसी मुस्कान में,इस देह और प्राण में ही बस्ती है........कैसे मर सकती है...

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  10. मां से दूर जाने की पीडा.... का ह्र्दयस्पर्शी वर्णन...
    बधाई... सुंदर रचना के लिये....

    जवाब देंहटाएं
  11. इस मिट्टी के बर्तन में,
    लिये जाता हूँ माँ ,



    बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति....

    मेरे पास कुछ नहीं कहने को ...

    नम आँखें ....

    जवाब देंहटाएं
  12. वाह ! बहुत संवेदन शील रचना है. दिल को छू गई. बधाई.

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  13. Sach kahun to kavita ka naam padhkar ek jhijhak si hoti hai.. kuch waqt pehle divyanshu ki dairy me hi padi thi...bhula pana mumkin nahi hua.

    जवाब देंहटाएं
  14. kavita padh kar tipanni karne k liye sabhi saahitya sudhiyo ko dhanyavad. aap ka sneha aur asheervad mere liye urja hai .
    is kavita k prerna strota k baare mein kahnaa chahunga. maine ye kavita apni mausi k nidhank baad unhein kandhaa dete hue sochi thee. mere aage un k bete chal rahe they. jaanta hu ki kavita karne k liye ajeeb samay thaa par sath hi aasha karta hu ki main is k saath nyaay kar paaya.. badhaai aur sneh k liye fir dhanyavad
    Divyanshu Sharma

    जवाब देंहटाएं
  15. बहुत ही भावप्रवण कविता है. एकदम ह्र्दय को छू गई.

    जवाब देंहटाएं
  16. दिल को छू जाने वाली रचना।

    ऐसे ही लिखते रहें।

    बहुत बहुत शुभकामनाएँ

    सुजीत

    जवाब देंहटाएं
  17. कविता मत कहो इसे....ये तो बेटे का दिल है..
    जो रो रहा है..
    ऐसे जैसे बचपन में रोता था खुद ।
    ये पढ़ कर आंसू आ रहे मेरे...

    जवाब देंहटाएं

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