मुझे शिकायत है वक्त से [कविता] - बृजेश शर्मा
रचनाकार परिचय:-क्योंकि, ये गुजर जाता है
नही करता इन्तेजार मेरे बढ़ने का
नही थामता हाथ साथ ले कर चलने के लिए!
नही विचारता शुभ अशुभ के बारे मैं-
नही देखता वक्त-बेवक्त!
बस चलता है निरंतर
निरंतरता- शायद यही इसकी पहचान है!
मुझे शिकायत है वक्त से
क्योंकि यह भुला देता है अतीत को
धूमिल कर देता है यादो को
और चढा देता है परत पुराने हरे जख्मो पर
जखम जो मैंने दिए थे स्वयं को
रखे थे हरे ख़ुद कुरेद कुरेद कर!
पर वक्त भरता जा रहा है इनको
मेरे ना चाहते हुए भी!
मुझे शिकायत है वक्त से!









8 comments:
बहुत अच्छी कविता... बधाई
Aapki shikaayat jaayaz hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
वक़्त की इस जोर ज़बरदस्ती पर हमारा ध्यान वाकई कभी नहीं जाता ... वक़्त ही नहीं मिलता .. :-) ध्यान इस और खींचने का शुक्रिया भाई .. खुबसूरत कविता ...
.....
जखम जो मैंने दिए थे स्वयं को
रखे थे हरे ख़ुद कुरेद कुरेद कर!
पर वक्त भरता जा रहा है इनको
मेरे ना चाहते हुए भी!...
बहुत ही सकारात्मक भाव ..... बढ़िया रचना शुभकामना बृजेश जी
वक्त सुनता कहाँ है....भाई मेरे....
जखम जो मैंने दिए थे स्वयं को
रखे थे हरे ख़ुद कुरेद कुरेद कर!
पर वक्त भरता जा रहा है इनको
मेरे ना चाहते हुए भी!
मुझे शिकायत है वक्त से!
अच्छी रचना।
अच्छी प्रस्तुति
bahut acchi kavita hai.dil ko choo gayi
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