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सती हो गया सच [कविता] दिव्या माथुर

तुम्हारे छोटे, मँझले /
और बड़े झूठ /
उबलते रहते थे मन में /
दूध पर मलाई सा /
मैं जीवन भर /
ढकती रही उन्हें /
पर आज उफन के /
गिरते तुम्हारे झूठ /
मेरे सच को /
दरकिनार कर गये /
तुम मेरी ओट लिये /
साधु बने खडे रहे /
झूठ की चिता पर /
सती हो गया सच /

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12 टिप्पणियाँ

  1. गहरे भाव लिए छोटी रचना |
    सुन्दर है|

    अवनीश तिवारी

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  2. मेरे सच को
    दरकिनार कर गये
    तुम मेरी ओट लिये
    साधु बने खडे रहे
    झूठ की चिता पर
    सती हो गया सच
    बहुत प्रभावित किया आपकी कविता नें।

    जवाब देंहटाएं
  3. स्वयं में सुबाने वाली कविता यह भी सच है कि सत्य सती ही होता है।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही अच्छी कविता...बधाई स्वीकारें

    जवाब देंहटाएं
  5. बड़ा अजीब है मन भी
    कितने दिन लग जाते हैं विश्वास करने में कि कोई अपना प्रिय झूठ भी कह सकता है

    झूठ को झूठ कहने में
    सच का सती होना
    शायद कभी बंद होगा

    जवाब देंहटाएं
  6. sach likha hai hamesha hi asa hota hai .kavita dil ko chhu gai
    rachana

    जवाब देंहटाएं
  7. 'सच' का सच तो यही है कि उसे सती होना पडता है.
    सुन्दर कविता

    जवाब देंहटाएं
  8. मर्मस्‍पर्शी कविता, जिसमें सच छिपा है ।

    जवाब देंहटाएं
  9. पर आज उफन के
    गिरते तुम्हारे झूठ
    मेरे सच को
    दरकिनार कर गये

    बहुत सुंदर बिम्ब .... हृदय स्पर्शी रचना

    जवाब देंहटाएं

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