HeaderLarge

नवीनतम रचनाएं

6/recent/ticker-posts

चलो बरसो पहले हुई क़यामत को देखते है [ग़ज़ल] – दीपक बेदिल


चलो बरसो पहले हुई क़यामत को देखते है
खोफजदा रात की दोर-ए-शिकायत को देखते है

मुत्फरिक अशर तो यु है तकरीर हमारी यारो
परदेह में छिपी उसी नफरत को देखते है

वीरान-ओ-उजाड़ यहाँ आब-ओ-हवा हुई है ऐसी
लुटी हुई जिन्दगी में उस मुहब्बत को देखते है

यु तो ना जाएगे गंज-ए-शहीदान वतन से परे
गाहे - बा - गाहे दुश्मन की जराफत को देखते है

महफ़िल महबूब की होती आब-ए-रवां जैसी अल्हा
इसमें डूब कर "बेदिल" अपनी सूरत को देखते है

शब्द----
1-मुत्फरिक अशर = फूटकर दोहा
2-तकरीर = बात, भाषण
3-गंज-ए-शहीदान = शहीदों के दफन होने वाली जगह
4-जराफत = कला
5-आब-ए-रवां = बहता पानी

टिप्पणी पोस्ट करें

4 टिप्पणियां

  1. यु तो ना जाएगे गंज-ए-शहीदान वतन से परे
    गाहे - बा - गाहे दुश्मन की जराफत को देखते है.

    bahut sundar gazal..badhayi..

    जवाब देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. उर्दू शब्दों के अर्थ देना अच्छा रहा। इससे समझने में आसानी हुई।

    जवाब देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

आइये कारवां बनायें...

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...