‘आ यू गोइंग टू डैली?’ उसने सीट पर बैठते हुए मुझसे पूछा

वाकया मुझे इसलिये भी याद है कि वो मेरे जीवन की फर्स्ट ए.सी. की पहली और अभी तक की अंतिम यात्रा थी। यात्रा किन स्टेशनों के बीच थी मैं खुलासा नहीं करना चाहता क्योंकि हर स्टेशन किसी न किसी प्रदेश में पड़ता है और आगे आने वाली घटना के बाद यदि रूलिंग पार्टी बैड गवर्नेस के फैक्टर पर चुनाव हार जाय तो मेरे लिये मुश्किल हो सकती है। यूं फर्स्ट ए.सी. में चलना मेरे पिताजी भी अफोर्ड नहीं कर सकते थे, लेकिन ‘कुमार अभिलाष’ के दिलाये हुए कार्यक्रमों का भी अपना मजा होता है, अच्छे पैसे, कई बार आयोजक का फर्स्ट ए.सी. का टिकट। आयोजक ने आने जाने के टिकट खुद करा के रखे थे, हालाकि अंदर का मंचीय कवि इसे लेकर बहुत परेशान था, यदि न कराये होते तो चार हजार का फायदा और होता।
रचनाकार परिचय:-
30 जून, 1967 को रामपुर (उ०प्र०) में जन्मे और हाथरस में पले-बढ़े शक्ति प्रकाश वर्तमान में आगरा में रेलवे में अवर अभियंता के रूप में कार्यरत हैं। हास्य-व्यंग्य में आपकी विशेष रूचि है। दो व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित भी करा चुके हैं। इसके अतिरिक्त कहानियाँ, कवितायें और गज़लें भी लिखते हैं।

चार हजार के नुकसान को मंचीय कवि जाते हुए ही स्वीकार कर चुका था, अब तो लौटना हो रहा था बल्कि चौथाई रास्ता उसमें भी कट चुका था। सबसे ज्यादा खलने वाली बात यही थी कि मेरे कूपे में आने वाली सवारियाँ ब्रिटिश अंदाज में अंग्रेजी बोलती चढ़तीं और अमेरिकन अंदाज में बोलती हुई उतर जातीं, जितनी देर रहतीं अंग्रेजी पत्रिकाऐं देखतीं या उँघतीं। अंग्रेजी पढ़ने के नाम पर अपने पास सिर्फ एक रेलवे टाइम टेबल था जो कि मजबूरी में खरीदा था और अपनी सीट पर मैंने खोलकर रखा हुआ था। हालांकि अंदर का कस्बाई हिन्दी भाषी अकेलेपन में बहुत फडफड़ा रहा था लेकिन पहले से बोलना ए.सी. की गरिमा के विपरीत होता है या शायद ए.सी. के लिये स्वयं को अयोग्य समझने की हीन भावना ने किसी से बोलने नहीं दिया। इस स्टेशन पर मेरे कूपे की अंतिम दो सवारियाँ भी उतर चुकी थीं, मैं चाह रहा था कि कोई मेरे कूपे में आये, हिन्दी वाला हो तो बहुत अच्छा।

मेरा सहयात्री जब कूपे में घुसा तो उसके पहले एक लिट्टी वाले ने भी जोर जोर से ‘लिट्टी चटनी पानी साथ में’ का नारा देते हुए कोच में घुसने का प्रयास किया था, तब तक मैं अंग्रेजी सुनते सुनते हद तक पक चुका था, मुझे उसकी आवाज में अपनापन लगा,यकीन मानिये अगर वो मेरे सामने की सीट पर लिट्टी की दूकान भी खोल लेता तो शायद मुझे कोई ऐतराज न होता, लेकिन तभी पीछे से मेरा सहयात्री प्रकट हुआ और उसे धकियाकर लिट्टी का संबंध लिट्टे के साथ जोड़ते हुए उस प्रदेश, रेलवे, लिट्टी और लिट्टे को ब्लडी जैसे कुछ विशेषणों से नवाजा, अपना सामान जमाकर बैठते हुए मुझसे पूछा -

‘आ यू गोइंग टू डैली?’

हालाकि इतने आसान सवाल का जवाब मैं अंगेजी में भी दे सकता था लेकिन इसके बाद अगर वो मुझसे कीट्स या शैक्सपियर पर शोध कराता तब? मैंने पहली बार में ही मामला साफ कर दिया-

‘मुझे टून्डला तक जाना है और यदि आप हिन्दी में बात करेंगे तो मुझे खुशी होगी’

‘टुन्ड...ला’ उसने मुँह बिचकाकर हिन्दी को श्रद्धान्जलि दी या ए.सी. की किस्मत को कोसा पता नहीं पर मुझे बुरा लगा, मैंने रंग जमाने की कोशिश की

‘मैं हिन्दी का कवि हूँ, कवि सम्मेलन से लौट रहा हूँ’

उसने उपर से नीचे तक निगाहों से मेरा पोस्टमार्टम किया, जैसे उसने ये अजूबा पहली बार देखा हो फिर अपने दायें हाथ की कनिष्ठिका को बाँये कान में डालकर खुजाया और मुझे हिन्दी और मेरी औकात बताई। मुझे लगा कि मंच पर मुझे किसी ने अच्छी कविता सुनाने के बावजूद हूट कर दिया हो, मैंने उसे घूरा उसने निगाहें चुराई क्योंकि मैं आकार में उस पर भारी था और कूपे में बीच बिचाव कराने वाले तीसरे और चौथे इंसान टी.टी.ई. और अटैन्डेन्ट थे जो कि उस वक्त किसी भरे हुए सैकन्ड या थर्ड ए.सी. वाले हिस्से में रहे होंगे। माहौल दोनों ओर बोझिल था मेरे सहयात्री ने अधनंगी तस्वीरों वाली एक अंग्रेजी किताब निकाल ली और उसमें व्यस्त हो गया।

उसके निगाह चुराने ने मेरे अंदर के कस्बाई को आक्रामक बना दिया था, मैंने हिन्दी की पत्रिका निकाली, पढ़ते हुए बड़बड़ाया
‘स्साले अंग्रेज मर गये औलाद छोड़ गये’
उसने मेरी ओर देखा

‘लिखा है इसमें ....कहानी है, उसमें एक संवाद है, पढ़ेंगे?’ मैंने उपहास के अंदाज में कहा, वह कसमसाया और वापस तस्वीरों में खो गया।

मैंने कई बार अपनी ओर से बना बनाकर आधुनिकता, पश्चिमी सभ्यता और अंग्रेजियत के खिलाफ आपत्ति जनक वाक्य बोले, वह चुप रहा इसका बड़ा कारण तो मेरा आकार ही था, दूसरा यह भी कि उसकी मजबूरी थी कि वह आसान हिन्दी समझ सकता था मेरे बारे में उसे तय नहीं था कि मेरी अंग्रेजी समझने की हद क्या थी।

गाड़ी अगले स्टेशन पर रूकी, मेरा गुस्सा अभी भी शान्त नहीं था, मैंने बाहर निगाह डाली , प्लेटफार्म पर भीड़ कम थी इसलिये वहाँ खड़े लोगों पर निगाह टिका पाना संभव था । मेरी निगाह एक लड़की पर पहुँची जो लोगों को रोक रोककर हाथ जोड़कर, पाँव छूकर भीख माँग रही थी । लोगों की संवेदनाऐं जितनी वह भुना सकती थी भुना रही थी। उसके चेहरे की उम्र चौदह पंद्रह साल से ज्यादा नहीं थी, लेकिन उसका शरीर चेहरे से कहीं ज्यादा होने की चुगली कर रहा था, उसने घुटनों तक का हाफ पेन्ट और एक टी शर्ट पहन रखा था, मेरी निगाहें बार बार उसकी छातियों पर अटक जाती थी, जिसकी एक वजह था उनका अप्रत्याशित आकार जिसे देखकर किशोरावस्था का एक जुमला - ‘जिसका मजमा भारी होता है वो ...’ बार बार याद आता था, दूसरा और महत्वपूर्ण कारण था उसकी टी शर्ट पर अंग्रेजी में लिखा जुमला -
My Father went to Monte – Carlo
He gambled, he boosed
& Bring me this bloody T-Shirt

मैंने उस जुमले को दो बार पढ़ा, पूरा मतलब समझ नहीं आया ,‘बूज्ड’ का अर्थ मैंने तीन दिन बाद डिक्शनरी से पता किया था। लेकिन इस अंग्रेजी को देखकर मेरे दिमाग में अपने सहयात्री को अपमानित करने की योजना बन गई।
‘बताओ साली का बाप मान्टे कार्लो में जा के मर गया लौडिया को छोड़ गया भीख माँगने के लिये ’

मैंने सहयात्री और अंग्रेजी को चिढ़ाया, वह कुछ नहीं बोला लेकिन मेरे मुँह से मान्टे कार्लो सुनकर उसने इधर उधर देखा और खिड़की के बाहर का दृय देखकर समझ गया,उसने निगाह वापस अपनी पुस्तक पर कर ली, मैं उससे उलझने के मूड में था,इसलिये सिगरेट निकाल कर दरवाजे तक गया, लड़की बैंच पर बैठे एक जोड़े के पास पहुँच चुकी थी,जो दरवाजे के ठीक सामने थी।

‘भगवान आपका जोड़ा बनाये रखे बाबू जी,आपके बच्चे जीयें ’ वह बोली
‘अरी अभी तो बच्चे ही नहीं हैं ’ मर्द हँसकर बोला
‘भगवान नौ महीने में गोद भरेगा बाबूजी’ उसने महिला की ओर मुस्कराकर कहा
‘धत भाग यहाँ से’ महिला हास्य, शर्म और क्रोध को एक साथ मिलाकर बोली

लड़की हटने का नाम नहीं ले रही थी, इधर प्रतिशोध भावना उबाल पर थी, मैंने आवाज लगाई-
‘ऐ लड़की’
लड़की ने देखा
‘इधर आ’ मैंने कहा
वह अहसान सा करती हुई मेरे नजदीक आई, मुझे आश्चर्य था कि उसकी सारी दयनीयता समाप्त हो चुकी थी, उसने मुझसे कोई याचना नहीं की

‘क्या है?’ उसने कमर पर दोनों हाथ रखते हुए बेफिक्री से कहा
‘अंदर आ’ मैंने कहा

वह अंदर आ गई, मैंने उसे कूपे में पहुँचने का इशारा किया, वह कूपे में पहुँची तो मैंने उसे अपने सहयात्री के बाजू में बैठने का इशारा किया, मैं चाहता था कि सहयात्री आपत्ति करे और मैं उससे उलझू,लेकिन वह समझ चुका था चुप रहा, अब मैंने उसे चिढ़ाते हुए लड़की से पूछा
‘तेरा बाप कहाँ है?’
‘मर गया’
‘वो अंग्रेज था?’
‘नहीं कोयला बीनता था ’
‘स्साले अंग्रेज क्या कोयला नहीं बीनते ’
‘बीनते होंगे बाबू जी पर वो काला था, अंग्रेज तो गोरे होते हैं’
‘कोयला बीन के हो गया होगा,यहाँ साले काली कमाई कर कर के काले अंग्रेज पैदा हो रहे हैं ’ मैंने हँसते हुए, सहयात्री को चिढ़ाया, लड़की कुछ नहीं बोली।

‘पर तेरी टी शर्ट् पर लिखा है कि वो मान्टे कार्लो गया, वहाँ उसने जुआ खेला’
‘वो किसी अंग्रेज का बाप होगा, मुझे तो भीख में मिली थी’
‘अंग्रेज क्या साले भिखारी नहीं होते...’
‘होंगे पर मुझे किसलिये बुलाया इधर’
‘किसलिये...? ये ले’ कहते हुए मैंने एक सौ का नोट निकाला और सहयात्री के सामने लहराया, निगाहों में उसे हिन्दी वालों की हिम्मत बताई, कवि सम्मेलन में अच्छे पैसे मिले थे, प्रतिरोध के लिये सौ पचास खर्च् किये जा सकते थे।
‘ये आपके साथी हैं?’ लड़की ने सहयात्री की ओर इशारा किया
‘हाँ हैं तो लेकिन समझते नहीं हैं, तू तो दोनों का ही समझ ले’ मैंने सहयात्री पर अहसान किया
‘ठीक है’ लड़की ने नोट झपटा और गायब हो गई'
गाड़ी चल दी,बड़ी हद पाँच मिनट बीते होंगे, कूपे का दरवाजा खुला वह लड़की तेजी से अंदर घुसी और आते ही दरवाजा बंद कर लिया, मैं और सहयात्री अचंभित थे।
‘तू वापस आ गई?’ मैंने आश्चर्य से पूछा
‘हम गरीब जरूर हैं पर बेईमान नहीं’ वह बोली

जब तक मैं और मेरा सहयात्री गरीबी और ईमानदारी का संदर्भ समझ पाते, वह लड़की हाफ पेन्ट उतार कर जमीन पर लेट चुकी थी, मैं अवाक सा सहयात्री की ओर देख रहा था,मेरे सहयात्री ने अधनंगी तस्वीरों वाली किताब बाजू में रख दी थी, वह मेरी ओर देख मुस्करा रहा था और आँखें बंद किये फर्श पर पड़ी ईमानदार लड़की की ओर देखकर गर्म गोश्त का मजा ले रहा था।
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9 comments:

  1. भीतर तक चुभ गयी आपकी कहानी।

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  2. अंत हिला देने वाला रहा .. एक दम अप्रत्याशित ... पूरी कहाँ में हिंदी अंग्रेजी वालों की जद्दोजहद में कहीं ऐसे अंत का ख्याल ही नहीं आया ... वैसे अंत का भूमिका से खासा कोई सम्बन्ध है भी नहीं यहाँ ....
    कहानी का अंत सादत हसन मंटो की "खोल दो " की याद दिला गया ...

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  3. कहानी अच्छी थी और ठीक-ठाक चल रही थी मगर मुझे लगता है की कहानी का अंत आपने ठीक से नहीं संभाला, अन्यथा कहानी बहुत प्रभावी और मौलिक बन सकती थी !

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  4. इस लघुकथा में कथा तो है पर लघुता...?

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  5. yar aisa ant to maine pachchees sal pahale likha tha. tum kuchh to badalate

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