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अलंकार स्मरण 'सलिल', इससे उसकी याद [काव्य का रचना शास्त्र: ३२] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" .

जब किसी सदृश वस्तु / व्यक्ति को देखकर किसी पूर्व परिचित वस्तु / व्यक्ति की याद आती है तो वहाँ स्मरण अलंकार होता है.

करें किसी की याद जब, देख किसी को आप.
अलंकार स्मरण 'सलिल', रहे काव्य में व्याप..


रचनाकार परिचय:-

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है।
आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है।
आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि।

वर्तमान में आप अनुविभागीय अधिकारी मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग के रूप में कार्यरत हैं

उदाहरण:

१.
ज्यों-ज्यों इत देखियत मूरख विमुख लोग
त्यों-त्यों ब्रजवासी सुखरासी मन भावै है.
सारे जल छीलर दुखारे अंध कूप देखि,
कालिंदी के कूल काज मन ललचावै है.
जैसी अब बीतत सो कहतै ना बैन
नागर ना चैन परै प्राण अकुलावै है.
थूहर पलास देखि देखि कै बबूर बुरे,
हाय हरे हरे तमाल सुधि आवै है.

२.
सघन कुञ्ज छाया सुखद, सीतल मंद समीर.
मन व्है जात अजौं वहै, वा जमुना के तीर..

३.
देखता हूँ जब पतला इन्द्र धनुषी हल्का,
रेशमी घूँघट बादल का खोलती है कुमुद कला.
तुम्हारे मुख का ही तो ध्यान
मुझे तब करता अंतर्ध्यान.

४.
श्याम मेघ सँग पीत रश्मियाँ देख तुम्हारी
याद आ रही मुझको बरबस कृष्ण मुरारी.
पीताम्बर ओढे हो जैसे श्याम मनोहर.
दिव्य छटा अनुपम छवि बांकी प्यारी-प्यारी.

५.
सजी सबकी कलाई
पर मेरा ही हाथ सूना है.
बहिन तू दूर है मुझसे
हुआ यह दर्द दूना है.

६.
धेनु वत्स को जब दुलारती
माँ! मम आँख तरल हो जाती.
जब-जब ठोकर लगती मग पर
तब-तब याद पिता की आती.

७.
जब जब बहार आयी और फूल मुस्कुराए
मुझे तुम याद आये..


स्मरण अलंकार से कविता अपनत्व, मर्मस्पर्शिता तथा भावनात्मक संवगों से युक्त हो जाती है.

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6 टिप्पणियां

  1. स्मरण स्वत: प्रयुक्त होने वाला अलंकार है कविता में जाने अनजाने इसका कवित प्रयोग कर ही लेता है।

    जवाब देंहटाएं
  2. स्मरण मेरे लिये अनसिना अलंकार है। बहुत कुछ सीखा है आचार्य जी की कक्षा में

    जवाब देंहटाएं
  3. करें किसी की याद जब, देख किसी को आप.
    अलंकार स्मरण 'सलिल', रहे काव्य में व्याप..
    धन्यवाद सलिल जी।

    जवाब देंहटाएं
  4. एक उपयोगी जानकारी |

    धन्यवाद |

    अवनीश तिवारी

    जवाब देंहटाएं

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