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सहेलियों संग नुक्कड़ पर जब दिखती है [ग़ज़ल] - अवनीश तिवारी


सहेलियों संग नुक्कड़ पर जब दिखती है,
मेले की कोई अनूठी दूकान सजती है,

चलती बस की खिड़की पर बैठी वह,
नयी कलि कोई दुनिया से मिलती है,

चाट की दूकान देख ठहरे कभी,
मुनिया कोई खिल्लौने को तरसती है,

सुस्ताये बैढ़ राह देखे किसी का,
मुरझाई कुसुम कोई डाली पर झुकती है,

लपकने चाँद कूदे छत पर,
तितली कोई आकाश छूने उड़ती है,

कितना सराहे उनको 'अवि',
हर अदा अपनी ओर खींचती है|

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7 टिप्पणियां

  1. खूबसूरत ग़ज़ल ........ आस पास बिखरे लम्हों से सजी ..........

    जवाब देंहटाएं
  2. सहेलियों संग नुक्कड़ पर जब दिखती है,
    मेले की कोई अनूठी दूकान सजती है,

    सुस्ताये बैढ़ राह देखे किसी का,
    मुरझाई कुसुम कोई डाली पर झुकती है,

    कहने में नयापन है।

    जवाब देंहटाएं
  3. पंकज सक्सेना21 अक्तूबर 2009 को 5:36 pm

    बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं

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