HeaderLarge

नवीनतम रचनाएं

6/recent/ticker-posts

कैक्टस का फूल - अजय यादव की पहली कहानी [आओ धूप स्तंभ, सम्पादन सूरजप्रकाश]

इस बार आओ धूप में प्रस्तुत है अजय यादव की कहानी कैक्टस का फूल। कहानी बेशक छोटी सी है और पहले से ही इस बात का संकेत देने लगती है कि कहानी का अंत किस तरफ जायेगा लेकिन एक बात बहुत अच्छी है कि कहानी जिस पाजिटिव सोच के साथ खत्म होती है, वह लेखक के आने वाले लेखन के प्रति आश्वनस्त करती है। भाषा सरल, सहज और बिना लाग लपेट के। बात कहनी थी, कह दी।

इस कहानी के साथ एक बात और जुड़ी हुई है। अगर किसी कहानी को पढ़ कर आपको किसी बड़े लेखक की बहुत बड़ी कहानी की याद आये तो मैं इसे अपने लेखक की बड़ी रेंज ही मानता हूं। लेखक की सोच वहां तक जाती है जहां तक बड़ा लेखक हमें ले कर गया था। ये बड़ी बात है। अजय को बधाई कि उसकी पहली कहानी पढ़ कर हमें ऑस्कर वाइल्ड की कहानी द जायंट की याद आती है। आप खुद उस कहानी को खोज कर पढ़ें।

आओ धूप में आपकी इसी तरह की पहली कहानी का हम इंतज़ार करेंगे

सूरज प्रकाश
kathaakar@gmail.com

-----------

कैक्टस का फूल अजय यादव की पहली कहानी

------------
वह कुछ महीने पहले ही उस कालोनी में रहने आया था। शायद किसी दफ़्तर में काम करता था और तबादला होने के चलते यहाँ आ गया था। सामान्य सा अनाकर्षक व्यक्तित्व, चेहरे पर हर समय गंभीरता का नकाब और किसी से विशेष संपर्क न रखने की आदतों ने उसे आस-पड़ोस में एक घमण्डी व्यक्ति के रूप में ही प्रस्तुत किया था। पूरी कालोनी में शायद ही कोई उसे अच्छी नज़र से देखता हो।

इसके ठीक विपरीत उसके बराबर वाले घर में रहने वाली हँसमुख और मृदुभाषी ज्योति सबकी चहेती थी। वह पिछले कई सालों से अपने माता-पिता के साथ यहाँ रहती थी और इस समय कालेज में पढ़ रही थी। कालोनी के बच्चे तो उसे बराबर घेरे रहते और वह भी कभी उन्हें तरह-तरह के खेल खिलाती तो कभी पढ़ाई में उनकी मदद करती।


इन चंद महीनों में ही ज्योति को उससे खासी चिढ़ हो गई थी और उसके घमण्डी स्वभाव के साथ-साथ इस चिढ़ की एक और खास वज़ह थी ’कैक्टस’ जो कम्बख्त ने अपने घर के छोटे से बगीचे में बीसियों की तादाद में लगा रखे थे। छुट्टी के दिन वह अक्सर या तो कोई किताब लेकर बैठा रहता या इन काँटेदार झाड़ियों से उलझा रहता। घरों के बीच की फैंसिंग अधिक ऊँची न होने से अक्सर ज्योति की नज़र इन पर पड़ जाती और वह अनायास बड़बड़ा उठती, ’हुँह! जैसा खुद है, वैसी ही झाड़ियाँ उगा रखी हैं।" वह अक्सर लोगों के साथ बातचीत में उसे ’कैक्टस’ कहने भी लगी थी।

आज शाम को बादल घिर आने से अँधेरा कुछ जल्दी हो गया था। अधिकतर लोग अपने-अपने घरों में थे। ज्योति भी बैठी कुछ पढ़ रही थी कि बाहर शोर सुनाई दिया। वह उठकर बाहर आई तो देखा कि सामने वाले ’शर्मा अंकल’ का बेटा ’बंटी’ बुरी तरह ज़ख्मी था और ’कैक्टस’ एक हाथ से उसे सँभालता हुआ एंबुलेंस के लिये फोन कर रहा था। पता लगा कि बंटी छत पर सूखने के लिये डाले गये कपड़े लेने गया था और किसी चीज से ठोकर खाकर बिना मुंडेर की छत से नीचे आ गिरा था। उसके सिर से बेहिसाब खून बह रहा था।

इतनी देर में सारे पड़ोसी बाहर आ गये थे। ज्योति आंटी को संभाल रही थी जो शर्मा अंकल की अनुपस्थिति में हुई इस दुर्घटना से घबरा गईं थी। तभी एंबुलेंस आ गई और ’कैक्टस’ के साथ-साथ ज्योति और उसके पापा भी बंटी को लेकर अस्पताल चले गये। प्राथमिक उपचार व ज़रूरी परीक्षणों के बाद रात करीब बारह बजे डाक्टरों ने बंटी को खतरे से बाहर बताया। इस बीच कई लोग बंटी को देख कर जा चुके थे। अब तक इलाज़ संबंधी सारे काम ’कैक्टस’ ही देख रहा था। अब वह ज्योति के पापा के पास आया और बोला, ’अंकल! आप अब जाकर आराम करें। यहाँ आंटी के साथ मैं रुक जाता हूँ।"

"पर बेटा, आपने तो अब तक खाना भी नहीं खाया है। मैंने चलते समय देखा था कि आपका दरवाज़ा बंद था। आप शायद उसी वक़्त आये थे।"

"जी। पर कोई बात नहीं, मैं यहीं से कुछ लेकर खा लूँगा। आप परेशान न हों।"

और थोड़ी देर बाद ही ज्योति अपने बिस्तर पर लेटी थी। पर नींद उसकी आँखों से बहुत दूर थी। दिमाग में अब भी शाम की दुर्घटना और ’कैक्टस’ घूम रहे थे। वह उठकर कमरे से बाहर आ गई। बादल छँट चुके थे। चारों ओर फैली स्वच्छ चाँदनी में उसे कुछ राहत मिली। तभी उसकी नज़र फैंसिंग के दूसरी तरफ लगी कैक्टस की झाड़ियों पर पड़ी तो उसने देखा कि उन काँटेदार झाड़ियों में एक बेहद खूबसूरत फूल खिला हुआ था।

टिप्पणी पोस्ट करें

11 टिप्पणियां

  1. बहुत ही स्पर्श करती कहानी है साथ ही सूरज जी की टिप्पणी भी कहानी की सही विवेचना है। लेखक में अपार संभावनायें हैं।

    जवाब देंहटाएं
  2. कैक्टस के फूल बेहद खूबसूरत होते हैं और कटीले व्यक्तित्व जब खिलते हैं तो उनकी खूबसूरती का पता चलता है।

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर कहानी... जीवन में अकसर ऐसा होता है कि हम खुद को एक दायरे में कैद कर लेते हैं और फ़िर अपने या अपने आस पास की वस्तुओं का हमें सही सही भान नहीं हो पाता.. इस दायरे से निकल कर और संपर्क में आ कर ही हम किसी के बारे में असली राय कायम करें यही सर्वोतम रास्ता है.

    जवाब देंहटाएं
  4. आम जीवन का सच है। बहुत सुन्दर कहानी है अजय जी।

    जवाब देंहटाएं
  5. "तभी उसकी नज़र फैंसिंग के दूसरी तरफ लगी कैक्टस की झाड़ियों पर पड़ी तो उसने देखा कि उन काँटेदार झाड़ियों में एक बेहद खूबसूरत फूल खिला हुआ था।"

    लगता ही नहीं लेखक की पहली कहानी है।

    जवाब देंहटाएं
  6. अजय जी आपको इस विधा को समय देना चाहिये। आपकी पहली कहानी के लिये सूरज जी से टिप्पणी उधार ले रहा हूँ कि "इसे अपने लेखक की बड़ी रेंज ही मानता हूं" साथ ही इसे भी कि "कहानी जिस पाजिटिव सोच के साथ खत्म होती है, वह लेखक के आने वाले लेखन के प्रति आश्वनस्त करती है। भाषा सरल, सहज और बिना लाग लपेट के। बात कहनी थी, कह दी"

    जवाब देंहटाएं
  7. khan 2 atkaya mn ko
    khan 2 bhtkayahai
    jivn ki is sundrta ko
    tum ne khob dikhaya hai.
    dr. ved vyathit

    जवाब देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

आइये कारवां बनायें...

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...