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वैधव्य [लघुकथा] - अवनीश तिवारी

बिना मुहूर्त, बिना ताम - झाम और बिना किसी गाजे - बाजे के, देर शाम एक विवाह सम्पन्न हो रहा है | शम्भुनाथ तिवारी एक मध्यमवर्गीय शिक्षक हैं | अपने सदाचार से लोकप्रिय हैं पर इस विवाह ने उन्हें सबसे दूर कर दिया है | इतना की घर के सगे भाई, बहन और अन्य करीबी रिश्तेदारों ने तक उनसे मुंह मोड़ लिया है | सारे गाँव में इस विवाह की आलोचना की जा रही है और शम्भुनाथ किसी अपराधी की तरह इसे चुपके से अपने सभी रीति - रिवाजों के विरूद्व हो, किसी यज्ञ की भाँती संपन्न किये जा रहे हैं |

दुल्हन उनकी बहु है जो शादी के १ बरस बाद विधवा हो गयी थी और पिछले ३ बरसों से वैधव्य का भार वहन करे आ रही है | उसे शम्भुनाथ अपने ही पढाये एक योग्य नौजवान के साथ ब्याह रहें हैं |

दरवाजे पर अकेले खड़े शम्भुनाथ ने सजल नेत्रों से हाथ उठा दुल्हन को बिदाई दी और टैक्सी चल दी | पास के कमरे से झाँक रही है उनकी बेटी जो पिछले ५ बरसों से वैधव्य का अभिशाप लिए अपने पिता के घर जी (?) रही है |

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