आदि काल में मानव का निवास स्थल वृक्षों की शाखाओं पर हुआ करता था | कालांतर में उसमें जैसे-जैसे बुद्धि का विकास होता गया वैसे-वैसे उसने परिस्थिति के अनुसार उपलब्ध सामग्री यथा बांस, खर पतवार, फूस, व मिट्टी आदि का उपयोग करके कुटियानुमा संरचना का अविष्कार किया तथा उसे निवास योग्य बनाकर उसमें निवास करने लगा, यह भवन का मात्र प्रारंभिक स्वरुप था वैदिक काल में भवन बनाने का विज्ञान चरम सीमा तक जा पहुंचा, हमारे धर्मग्रंथों में भी देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख आता है जिन्होंनें रामायण काल से पूर्व लंका नगरी तथा महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण के आदेश से दैत्य शिल्पी मय दानव के साथ मिलकर इन्द्रप्रस्थ नगरी का निर्माण किया था जहाँ पर जल के स्थान पर स्थल तथा स्थल के स्थान पर जल के होने का आभास होता था महाभारत ग्रन्थ के अनुसार इसी कौतुक के कारण दुर्योधन को अपमानित होना पड़ा जो कि बाद में महाभारत जैसे महासंग्राम का एक कारण भी बना | उस समय के भवन निर्माण के दुर्लभ व उन्नत ज्ञान को धर्मग्रंथों में संग्रहीत कर लिया गया जिसे आज सम्पूर्ण विश्व में वास्तु विज्ञान या वास्तु शास्त्र नाम से जाना जाता है | विश्वकर्माप्रकाशः भी एक ऐसा ही ग्रन्थ है जो कि वास्तु सम्बन्धी ज्ञान को अपने अन्दर समाहित किये हुए है |
साहित्य शिल्पी
रचनाकार परिचय:-
उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर में १९६५ को जन्मे अम्बरीष श्रीवास्तव ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर से शिक्षा प्राप्त की है।
आप राष्ट्रवादी विचारधारा के कवि हैं। कई प्रतिष्ठित स्थानीय व राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं व इन्टरनेट की स्थापित पत्रिकाओं में उनकी अनेक रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। वे देश-विदेश की अनेक प्रतिष्ठित तकनीकी व्यवसायिक संस्थानों व तथा साहित्य संस्थाओं जैसे "हिंदी सभा", "हिंदी साहित्य परिषद्" आदि के सदस्य हैं। वर्तमान में वे सीतापुर में वास्तुशिल्प अभियंता के रूप में स्वतंत्र रूप से कार्यरत हैं तथा कई राष्ट्रीयकृत बैंकों व कंपनियों में मूल्यांकक के रूप में सूचीबद्ध होकर कार्य कर रहे हैं।
प्राप्त सम्मान व अवार्ड: "इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी अवार्ड २००७", "अभियंत्रणश्री" सम्मान २००७ तथा "सरस्वती रत्न" सम्मान २००९ आदि|

प्रायः हमनें देखा है कि पुराने भवनों की दीवारें काफी मोटी-मोटी हुआ करती थी जो कि आज के परिवेश में घटकर ९ इंच से लेकर ४.५ इंच तक की रह गयीं हैं | आज हममें से काफी व्यक्ति यह समझते हैं कि मोटी दीवारें बनाने से भूखंड में जगह की बर्बादी होती है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि मोटी दीवारों की दृढ़ता अधिक होने से भूकंप के समय उनका व्यवहार काफी अच्छा पाया गया है अतः भारवाही दीवार की मोटाई ९ इंच से कम तो कतई होनी ही नहीं चाहिए |

एक भवन को डिजाइन कराते समय एक अच्छे वास्तुविद, अभियंता या आर्कीटेक्ट के चयन के साथ साथ अच्छे ठेकेदार, राजमिस्त्री, प्लंबर ,बढई , इलेक्ट्रीशियन व लोहार आदि का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इनका भवन निर्माण में रोल ठीक उसी तरह से होता है जैसे कि एक अच्छे भोज में हलवाई का, क्योंकि इन सभी कार्यों में कच्ची सामग्री लगभग एक जैसी ही लगती है बस फर्क पड़ता है तो केवल कारीगरी का ही, इसलिये सस्ते के चक्कर में आना ठीक नहीं होता क्योंकि किसी ने कहा है कि सस्ता रोवे बार बार ............

इस स्तम्भ में वास्तु ज्ञान सहित आधुनिक भवन निर्माण तकनीक व भूकम्परोधी भवन निर्माण तकनीक के बारे में हम प्रतिमाह सिलसिलेवार व्याख्या करते रहेंगें जो कि जन-सामान्य को भवन निर्माण सम्बन्धी आवश्यक ज्ञान देने के उद्देश्य से प्रारंभ किया जा रहा है | इसका प्रयोजन जन साधारण को वास्तुविद, अभियंता या आर्कीटेक्ट बनाना नहीं अपितु सभी में भवन निर्माण सम्बन्धी जागरूकता उत्पन्न करना है ताकि समाज में वास्तु सम्मत निर्माण कराने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो तथा आपदाओं यथा भूकंप आदि के समय होने वाली क्षति की मात्रा को न्यूनतम किया जा सके.................

2 comments:

  1. अम्ब्ररीष जी,
    वास्तु पद्धति के प्रति जानने की सदैव ही उत्सुकता रही है मुझे। इस विषय में लेखमाला प्रकाशित करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद। आगामी लेखों की प्रतीक्षा रहेगी। साहित्यशिल्पी का आभार।
    शशि पाधा

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