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कुछ क्षणिकायें - अवनीश तिवारी

बचपन

१.
सिर मेरा गोद में ले ,
देर तक जुयें निकालती रही ,
माँ |

२.
हर शाम ,
टाइम टेबल देख,
मेरा बस्ता लगाती,
माँ |

बदलाव

३.
शोपिंग माल से झिझक ,
उसी पुराने बाजार में,
टहलती - खरीदती,
माँ |

४.
मोबाइल के जटिल बटनों में फंसी,
गलत नंबर मिलाती ,
माँ |

समर्पण

५ .
एक बार कहा आज ठण्ड है,
रात भर स्वेटर बुनती रही,
माँ |

अनुरोध

६.
बदले प्रकृति और रुत,
बदले समय और युग,
सदा शाश्वत और अचल रहना,
माँ |

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11 टिप्पणियाँ

  1. मोबाइल के जटिल बटनों में फंसी,
    गलत नंबर मिलाती ,
    माँ |

    ये लाइनें पढ़कर मुस्कुराए बिना नहीं रहा जा सकता | अच्छे आब्जर्वेशन के साथ लिखी हुई पंक्तियाँ | गहरे तक छूती हैं |

    जवाब देंहटाएं
  2. sach kaha maa kabhi nhi badalti beshak bachche badal jayein.

    जवाब देंहटाएं
  3. बडी ही मर्मस्पर्शी क्षणिकायें है।

    जवाब देंहटाएं
  4. शाश्वत सत्य, शाश्वत भाव, जग की हर ममता मयी को नमन.

    शशि पाधा

    जवाब देंहटाएं
  5. सघन-गहन अनुभूतियाँ। मार्मिक अभिव्यक्‍तियाँ।
    *महेंद्रभटनागर,
    ग्वालियर

    जवाब देंहटाएं
  6. सघन-गहन अनुभूतियाँ। मार्मिक अभिव्यक्‍तियाँ।
    *महेंद्रभटनागर,
    ग्वालियर

    जवाब देंहटाएं
  7. ma pr kitna sajiv chitran hai .padh ke achchha laga
    badhai
    rachana

    जवाब देंहटाएं
  8. bahut khood...
    maa har dard ko pahchanati hai...
    peshani dekh samajh jaati hai..

    जवाब देंहटाएं
  9. १.
    सिर मेरा गोद में ले ,
    देर तक जुयें निकालती रही ,
    माँ |

    Aneenash ji
    Maan ka itna sunder bimb shabdon se prakat hua hai ki aaj maan ki yaad mein ankhein anm si hui. bahit hi dhriday sparsi evan marmik abhivyakti

    जवाब देंहटाएं

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