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सूरज हर दिन निकलता है .... [कविता] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सूरज निकलता है
हर सुबह .....
सर्द पसरी रेत पर
टीलों के पीछे से
लेने अर्ध्य, आस्था..
सुनने.. जय जयकार..
हो सप्ताश्व रथ पर सवार
दौड़ाता है श्रमित अश्वों को
तप्त शरीर, लोकहित धीर

बालू पर घरौंदों में
घर नहीं बसते
लगता है बस मेला
और...
मेले की भीड़ में
परिवार नहीं बनते
मिलते हैं.... बस
अस्ताचल पर विछड़ने के लिये

ईश्वर और प्यार ...
दोनों ही अस्तित्वहीन
किन्तु चलते हैं,
किसी मुद्रा की भांति
ईश्वर ......
आस्था का व्यापार
प्यार......
रिश्तों के सांचों में...
स्वार्थ का आधार

गोधुलि में ......
मुंह फेर लेते हैं
घर वापस लौटते
पशु पक्षी... जन, गण....
अस्त होते सूरज से

वापस लौटता है
फिर भी वह,
हर शाम.... झोंपड़े में ...
चूल्हे की आग और
टिमटिमाती रोशनी के लिये..
हर घर में एक सूरज होता है
और सूरज हर दिन निकलता है

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