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झलख [ग़ज़ल] - श्यामल 'सुमन'

बेबस है जिन्दगी और मदहोश है ज़माना

इक ओर बहते आंसू इक ओर है तराना


लौ थरथरा रही है बस तेल की कमी से

उसपर हवा के झोंके है दीप को बचाना


मन्दिर को जोड़ते जो मस्जिद वही बनाते

मालिक है एक फिर भी जारी लहू बहाना


मजहब का नाम लेकर चलती यहाँ सियासत

रोटी बड़ी या मजहब हमको ज़रा बताना


मरने से पहले मरते सौ बार हम जहाँ में

चाहत बिना भी सच का पड़ता गला दबाना


अबतक नहीं सुने तो आगे भी न सुनोगे

मेरी कब्र पर पढ़ोगे वही मरसिया पुराना


होते हैं रंग कितने उपवन के हर सुमन के

है काम बागवां का हर पल उसे सजाना

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