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वरना जग से उठ जायेंगे [गज़ल] - दीपक शर्मा

आँख बंद करके भला तमघन कैसे छट पायेंगे
उठने के लिये जगना होगा , वरना जग से उठ जायेंगे

सिर्फ बातों से, कलम से और बे - सिला तर्कों - बहस से
बात तो हो जायेगी पर हासिल न कुछ कर पायेंगे

नुक्ताचीनी , मगज़मारी , माथापच्ची , बहसबाज़ी
जिस दिन करना छोड़ देंगे नये रास्ते खुल जायेंगे

ऐसी कोई मुश्किल नहीं , जिसका बशर पे तोड़ न हो
जब तोडना ही चाहेंगे तो कैसे मन जुड़ पायेंगे

"दीपक" कैसे कह दिया सच अब तेरा हाफिज़ खुदा
तू अँगुलियों की बात न कर हाथ तक उठ जायेंगे

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2 टिप्पणियाँ

  1. सिर्फ बातों से, कलम से और बे - सिला तर्कों - बहस से
    बात तो हो जायेगी पर हासिल न कुछ कर पायेंगे

    बहुत अच्छी रचना दीपक जी

    जवाब देंहटाएं

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