समीरा को बचपन से ही शतरंज खेलने का शौक था| वह घंटों अपने दादाजी के साथ बैठी खेला करती| उम्र बढ़ने के साथ-साथ शौक भी उफनती नदी की तरह बढ़ता गया| एक दिन वह इसकी चैम्पियन बन गई|

उसके पड़ोस में टेनिस का खिलाड़ी विक्रम भी रहता था दोनों ही एक कालिज में पढ़ते थे| पटती भी आपस में खूब थी| बड़ी होने पर दोनों ने शादी करने का निश्चय किया|

विक्रम के पिता जी ने स्पष्ट शब्दों में समधी जी से कहा -हमें दहेज़ नहीं चाहिए ,केवल बेटी समीरा चाहिए |

शादी साधारण तरीके से हो गई|

एक संध्या विक्रम ने कुछ दोस्तों को घर पर चाय के लिए बुलाया| मित्रों को विश्वास ही नहीं होता था कि बिना दहेज के शादी भी हो सकती है|
एक का स्वर मुखर हो उठा -

-यार यह तो बता ,सौगातों में तुझे ससुराल से क्या -क्या मिला है ?

-हमने तो बहुत कहा --कुछ नहीं चाहिए - - - लेकिन हाथी -घोड़े तो साथ बांध ही दिये|
हाथी -घोड़े !पूछने वाला सकपका गया|

हिम्मत करके पुन : पूछा --जरा दिखाओ तो - - - |

-जरूर !जरूर !

-समीरा ,लेकर तो आओ और मेरे दोस्त की तमन्ना पूरी करो |

खुशी -खुशी वह गयी और शीघ्रता से हाथों में एक डिब्बा लेकर उपस्थित हो गयी |

बड़ी आत्मीयता से उस मित्र से बोली --क्या आप को भी शतरंज खेलने का शौक है| मैं अभी उसे मेज पर सजा देती हूं| देखें- - - किसके हाथी -घोड़े पिटते हैं|

दोस्त को देखकर विक्रम ने हँसी का एक ठहाका लगाया| वह तो बिना खेले ही शतरंजी चाल में फँस चुका था|
* * * * *
साहित्यिकी पत्रिका (कलकत्ता )में प्रकाशित

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