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अपना आदमी है [लघुकथा] - सूरज प्रकाश

दंगाइयों का दल सामने देखते ही वह घबरा गया है। भागने की कोशीश बेकार गई। दबोच लिया गया।

'बोल बे, कैन है तू?'

'हुज़ूर माई-बाप, छोड़ दे मुझे...मै गरीब आदमी...आप ही की जात का...'

'चोप्प साला! अभी तेरी गरीबी दूर करते हैं। खोलो इसका पाजामा। अभी पता चल जाएगा।'

'उस्ताद, अपना आदमी है।'

'चल फूट, इस तरह अकेले मत घूम। मारा जाएगा।'

'बहुत मेहरबानी जी। बस मै घर ही जा रहा हूँ।'

अभी थोड़ी दूर ही गया था कि दंगाइयों का दूसरा दल सामने। फिर भागा। पकड़ा गया।

'बोल बे, कैन है तू?'

'हुज़ूर माई-बा...प...छो...ड़ दें मु...झे...मै ग...री...ब आ...द...मी...आप... ही... की... जा...त का...'

'चोप्प साला! अभी तेरी गरीबी दूर करते हैं। खोलो इसका पाजामा। अभी पता चल जाएगा।'

'उस्ताद! झूठ बोलता है, यह अपना आदमी नहीं। इसका तो....'

'ऐसा! तो लो अभी बंद कर देते है साले की बोलती।'

और एक साथ कई चाकू उसकी पसलियों में...

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1 टिप्पणियां

  1. आपकी कहानी पढ़कर आदरणीय रघुनाथ प्रसाद जी की इन पंक्तियों की याद आयी सूरज प्रकाश जी -

    कसाई ने बकरे से पूछा क्या है तुम्हारी जातिगत पहचान
    बकरा बोला झटके से काटो तो हिन्दू हलाल करो तो मुसलमान
    सादर
    श्यामल सुमन
    www.manoramsuman.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं

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