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बस इसलिए! [लघुकथा] - संजय भारद्वाज

"पकड़ो-पकड़ो, चोर....।' सभास्थल पर फूल मालायें टांगनेवाला जोर से चिल्लाया।

भीड़ आवाज की दिशा में मुड़ी।

.... फूलों का हार लेकर भागते दस-बारह वर्ष के मरियल से लड़के को धर लिया गया। अधिकांश ने उस पर हाथ साफ करना शुरू कर दिया था। अब तक भागता-हांफता फूलवाला भी आ पहुँचा था। आश्चर्य में था-पहली बार किसी ने फूलों का हार चुराया था।

उसने भीड़ को किनारे किया, फिर कराहते-सुबकते लड़के से पूछा- "पर तूनें फूलों का हार क्यों चुराया? इससे कौन से पैसे बना लेता था तू?"

"मुझे पता नहीं था कि हार फूलों का है। मैंने सुना था आजकल हार नोटों से बनने लगे हैं। कल से खाना नहीं खाया था,.... बस इसीलिये!" लड़का फफक-फफक कर रोने लगा।

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