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न मारो ठोकरें यूँ पसलियों पर [ग़ज़ल] - मंगल नसीम

जो बरसाते लिखीं थीं बदलियों पर
उतर आयीं छतों पर छजलियों पर

जलाया हमने ख़ुद अपना नशेमन
नहीं इल्ज़ाम कोई बिजलियों पर

भले इंसान अब गिनती के होंगे
जिन्हें चाहो तो गिन लो उंगलियों पर

बहुत भूखा है ये मजदूर देखो
न मारो ठोंकरें यूं पसलियों पर

'नसीम' इस दौर में मुमकिन नहीं है
ग़ज़ल कहना गुलों पर तितलियों पर

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2 टिप्पणियां

  1. bhut hi bekaar ghazal kahi hai. kafiyaa milaane ke chakkar me ghazal zabardasti banai gai lagti hai.koi bhi sher naya nahi hai.kahin na kahin se udaya gaya lagta hai.naam ke hisaab se bekar rachna.

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