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ज़ाहिर अपना उपकार न करते अच्छा था [ग़ज़ल] - प्राण शर्मा


इसकी चर्चा हर बार न करते अच्छा था

ज़ाहिर अपना उपकार न करते अच्छा था


खुदगरजी की हद होती है कोई प्यारे

अपने से ही तुम प्यार न करते अच्छा था


चलने से पहले सोचना था कुछ तो साथी

रस्ते में हा हा कार न करते अच्छा था


गर चुप था वो तो चुप ही रहने देते तुम

पागल कुत्ते पर वार न करते अच्छा था


अपनों से ही सब रिश्ते नाते हैं प्यारे

अपनो से कारोबार न करते अच्छा था


खुद तो बीमार हुए तुम पर मुझको भी

अपनी ज़िद से बीमार न करते अच्छा था


ए "प्राण" भले ही मिलने तुम सबसे खुलकर

लेकिन सबका ऐतबार न करते अच्छा था

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5 टिप्पणियाँ

  1. Hamesha ki tarha Pran ji ki ghazal hum sab ko ek nayee raah dikhati hai.

    अपनों से ही सब रिश्ते नाते हैं प्यारे
    अपनो से कारोबार न करते अच्छा था

    Jeevan ka sootra vaakya!

    जवाब देंहटाएं
  2. अपनों से ही सब रिश्ते नाते हैं प्यारे
    अपनो से कारोबार न करते अच्छा था

    खुद तो बीमार हुए तुम पर मुझको भी
    अपनी ज़िद से बीमार न करते अच्छा था

    ए "प्राण" भले ही मिलने तुम सबसे खुलकर
    लेकिन सबका ऐतबार न करते अच्छा था

    बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
  3. प्रान जी की हर रचना मेरी प्रिय रचना होती है

    जवाब देंहटाएं

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