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मुझ से मुकद्दर इस तरह रूठा [नवगीत] - डॉ. वेद व्यथित


जहाँ में ऐसी सूरत है,जिन्हें देखा, नशा टूटा
खीज खुद पर हुई ,मुझ से मुकद्दर इस तरह रूठा।

मेरा बस एक सपना था मुझे जो खुद से प्यारा था
नजर ऐसी लगी उस को आईने की तरह टूटा।

अकेला एक दिल था जिन्दगी की वही दौलत था
उन्होंने चुप रह रह कर उसे पूरी तरह लूटा।

कहाँ जाता सफर को छोड़ मंजिल दूर थी मेरी
रुका थोडा सुकूँ पाया मगर मद की तरह झूठा।

रहा है उन का मेरा साथ वर्षों दूध शक्कर सा
शिकायत दिल में क्यों आई सब्र क्यों इस तरह टूटा।

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7 टिप्पणियाँ

  1. व्यथित जी बहुत अच्छी गीतिका है, बधाई स्वीकारे।

    जवाब देंहटाएं
  2. रहा है उन का मेरा साथ वर्षों दूध शक्कर सा
    शिकायत दिल में क्यों आई सब्र क्यों इस तरह टूटा।

    बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर रचना |

    नवगीत के विषय में ज्यादा नहीं खबर है |


    क्या इसे नवगीत कहा जाए|

    गेतीका कहा जाए तो दुरुस्त हो |


    अवनीश तिवेअरी

    जवाब देंहटाएं
  4. सुन्दर मनोभावों से सजी रचना...

    जवाब देंहटाएं

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