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विपरीत [कविता] - सतीष वर्मा

एक आदि प्रवत्ति प्रतिशोध को रोक देती है
मेरे सीने पर खून सने छोटे छोटे पदचिन्हों
को छिड़काते हुए, अपने आपको खोलता हूँ
और स्वयं को स्वीकार कर लेता हूँ

बेहद दर्द का गुन्ठित गुस्सा परिसर के लिये क्यों?
काली सिकुड़ी हुई टाँगों के द्वारा अतिक्र्रमणकारी
ज्ञान का उत्कृष्ठ निषेचन क्यों? एक हरी तरूणाई
जंजीरों में इन्तज़ार कर रही थी

विष के घूँट पीने के बाद रुँधा हुआ गला,
मृत्यु के गाल पर चढ़ता हुआ आरोही पक्षाघात
अब धूल आँसुओं के दरिया को अलविदा कहेगी

जंजीर के दन्तुरों पर मेरा अन्त नहीं होगा
एक कैमोमिल पुष्प मृत्यु-प्याले के दागों को धो देगा

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