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संभावनाओं का शहर [कविता] - सुशील कुमार

शहर की रगों में
खून की तरह
सायरन बजाते हुए
सरपट दौड़ने लगी हैं
कंट्रोल रूम की गाड़ियाँ
जिन पर लिखा है
आपके साथ, आपके लिए - सदैव।

वासिंदे जानने लगे हैं कि
इंटेलिजेंस इनपुट
क्या चीज है।

बिडला हाउस से
बाटला हाउस तक
हवाओं में
गोलियों कि गूँज के बावजूद।

एतिहासिक व पुरातात्विक महत्व की
इमारतों के दुबक कर
संगीनों का कम्बल
ओढ़ लेने के बावजूद।

हज़रत की मज़ार पर
ये कव्वाल बेख़ौफ़ सुना रहे हैं
सूफियाना कलाम..

और
कॉफी हाउस में जमीं है
इंटेलेक्चुअल्स और कवियों की मंडली
एक-एक चुस्की में
एक-एक पहर सुडकते हुए।

फेसिअल करके चमकने लगा है
दिलवालों का शहर
कॉमनवेल्थ खेलों की मेज़बानी के लिए।

संभावनाओं का शहर
दिख रहा है
चौकस भी, बेख़ौफ़ भी।

याद आ रहे हैं "ज़ौक"
यह कहते हुए
"कौन जाए ज़ौक
पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर" !

----------
सुशील कुमार
A-26/A, पहली मंजिल
पांडव नगर
मदर डेयरी के सामने
दिल्ली - 110092

टिप्पणी पोस्ट करें

10 टिप्पणियां

  1. दिल्ली को ले कर अनुपन अभिव्यक्ति, कवि को बधाई

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  2. वाह !!!बहुत खूB है सुशील Ji का (चौकस बेख़ौफ़ "संभावनाओं का शहर")

    जवाब देंहटाएं
  3. sushil kumar ki kavita sambhavnaon ka shahar padhate hue aisa lagta hai jaise ki film shuru hone se pahle agar kisi mahanagar ke syah pakksh ko dikhana ho ya vhan ke crime ki duniya ko dikhana ho to hum lagatar kai shots chalate hain aur tab film ki kahani shuru hoti hai.
    yah kavit fast reel ki tarah chalati hai aur jo bimb hamari aankhon ke samane banate hain unase shahar ka ek khauphanak chehara hamare samane aata hai.

    जवाब देंहटाएं
  4. भाइ दिल्ली को आपना मान कर दिल से लिखा है आपने

    जवाब देंहटाएं

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