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हर दिवस यहाँ हो विजय पर्व [कविता] - श्रीप्रकाश शुक्ल

हर मन में पैठी यही कामना ,
प्रति दिवस यहाँ हो विजय पर्व
आये खुशहाली,तिमिर छटे,
हर कृतित्व पर करें गर्व

सम्पूर्ण विश्व ही मित्र बने ,
देशों के परस्पर द्वेष मिटें
सद्भाव पूर्ण सोचें समझें ,
आपस में मिल अंतर निपटें

दंभ , दर्प, अभिमान भरे हैं
जो मानव के अंतर्मन में
क्रोध, क्रूरता, दया हीनता,
पनप रही हैं जो जन जन में

ये आसुरीय अभिरुचियाँ ,
उखाड़ फेंकें हम जड़ से
धू धू कर जल उठे बुराई,
पायें विजय अहम् अर्पण से

होंसले हमारे हों बुलंद,
विश्वास अडिग, अपनी क्षमता पर
हर दिवस यहाँ हो विजय पर्व,
जब जीत पा सकें हम कटुता पर

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