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बाँझ [लघुकथा] - सुशील कुमार

बलात्कार के एक महीने बाद ही महुआ के पेट से होने की खबर पूरी बस्ती में फ़ैल गई | गोबर्धन शाम को रोज की तरह थका-हारा नशे में धुत घर लौटा तो सब उसे घूरने लगे | बुझे हुए चेहरों पर तीर सी तीखी आंखे देख उसने सबसे पूछा कि आखिर क्या बात है, पर कोई कुछ न बोला | जामुनी भाभी से रहा न गया और वह चीख कर बोली "जा कमरे में अपनी नामर्दी का साबुत देख ले |" गोबर्घन को समझते देर न लगी कि पिछले पाँच साल की शादी-शुदा ज़िन्दगी में महुआ के पाँव जो भारी न हो पाए वो पिछले महीने इज्जत लुटने के बाद हो गए |

गोबर्धन उस कोठरी में दाखिल हुआ जहाँ महुआ सुबह अस्पताल से आने के बाद से ही रो रही थी | छोटी सी कोठरी महुआ की सिसकियों से भरी जा रही थी | गोबर्धन के मुंह पर ताला लगा था और शरीर जैसे काठ हो गया था | कोशिश भी की तो कंठ ने साथ न दिया | एक भी शब्द मुंह से निकल न पाया | सोचता रहा कि आखिर क्या बोलूं ? बहुत मुश्किल घडी थी मानो पूरा बदन पत्थर हो गया हो | वह आत्मग्लानी से मारा जा रहा था | झट से वह महुआ के पैर पर जा गिरा | बड़ी मुश्किल से बोल पाया " हमको माफ़ कर दो महुआ " | महुआ रोती रही, कुछ न बोली | बहुत देर तक दोनों के बीच संवादहीनता रही | गोबर्धन फिर बोला "हमको माफ़ कर दो महुआ, हम तुमको बहुत दुःख दिए हैं | कमी मुझमे थी और माँ, दीदी, मौसी सब तुमको जिंदगी भर गरियाती रहीं- कुलाक्षाणी, बाँझ है बाँझ | बस एक बार हमको माफ़ कर दो "

महुआ ने झट पाँव खिंच लिया जैसे कोई पाप हो गया हो | भला पति-परमेश्वर पत्नी के पाँव छू सकता है कभी | वह फूट-फूट कर रोने लगी पर कुछ बोल न पायी |

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सुशील कुमार
ए-26/ए, पहली मंजिल,
पांडव नगर
दिल्ली-110092

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