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दो साल [कविता] - अवनीश तिवारी

दो साल से वे (विधवाएं)रो रहीं हैं,
दो साल से उनकी (अनाथ) मुस्कान सो रही है,
और बढ़ रही उसकी (कसाब) उम्र दो साल से|

दो साल से उनका (न्यायालय) का निर्णय आ रहा,
दो साल से उनका (जनता) का विश्वास जा रहा,
और बढ़ रही उसकी (कसाब) उम्र दो साल से|

दो साल से वो सब (राजनीति) हो रही,
दो साल से उसकी (देश) अस्मिता खो रही ,
और बढ़ रही उसकी (कसाब) उम्र दो साल से|

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6 टिप्पणियाँ

  1. सही सबाल उठाये हैं अवनीश जी। हम आतंकवादियों को पालना कब बंद करेंगे पता नहीं।

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  2. नसीम, दानापुर27 नवंबर 2010 को 9:20 pm

    और बढ़ रही उसकी (कसाब) उम्र दो साल से

    और पता नहीं कितने साल चलेगी

    जवाब देंहटाएं
  3. यह एक सवाल है देश की जनता से | जनता जो स्वार्थ के लिए गुस्से में आ दंगा कर शहर फूंक सकती है , जो मस्जिद ढा सकती है , वो कसाब को नरक में भेजने के लिए इतनी शिथिल कैसे ?

    श्रद्धांजली और कायरता में अंतर स्पष्ट किया जाना चाहिए |

    अवनीश तिवारी

    जवाब देंहटाएं
  4. अवनीश भाई आपका गुस्सा जायज है लेकिन अफजलों कसाबों की उम्र बढती ही रहेगी। अफसोस है।

    जवाब देंहटाएं
  5. लेखनी ने ना कब झुकाए ताजो-तख़्त....

    लिखते रहें....समय कभी तो बदलेगा....


    आभार..
    गीता .

    जवाब देंहटाएं

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