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दूजा नया सफर है [ग़ज़ल] - श्यामल सुमन

निकला हूँ मैं अकेला अनजान सी डगर है,
कोई साथ आये, छूटे मंजिल पे बस नजर है|

महफिल में मुस्कुराना मुश्किल नहीं है यारो,
जो घर में मुस्कुराये समझो उसे जिगर है|

पी करके लड़खड़ाना और गिर के सम्भल जाना,
इक मौत जिन्दगी की दूजा नया सफर है|

जब सोचने की ताकत और हाथ भी सलामत,
फिर बन गए क्यों बेबस किस बात की कसर है|

हम जानवर से आदम कैसे बने ये सोचो,
क्यों चल पड़े उधर हम पशुता सुमन जहर है|

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