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द्रोणवाद [लघुकथा] - आलोक कुमार सातपुते

द्रोणवाद से उबकर एकलव्य अपनी जाति के ही लोगों के बीच में उठना-बैठना प्रांरभ कर दिया।

वैसे भी उसे अब ये महसूस होने लगा था, कि अब द्रोण को गुरू बनाये रखने का कोई औचित्य नहीं रह गया है...अर्जुन तो वह बनने से रहा।

ख़ैर, वह अपनी ही जाति का नेता चुन लिया गया।

कुछ दिनों बाद उसने सजातीय विवाह करने का निश्चय किया, और इस सम्बन्ध में वह जहाँ-जहाँ भी लड़की देखने गया, उससे उसकी उपजाति और गोत्र पूछा गया, तब उसे पता चला कि वह तो अपनी ही जाति में अछूत है।

...द्रोणवाद की जड़ें उसकी जाति में भी पैर पसारी हुई थीं।

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5 टिप्पणियां

  1. यही एकलव्यों की वास्तविक कहानी है। विचार करने योग्य कथानक।

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  2. द्रोणवाद की जडे बहुत गहरी हैं सातपुले जी।

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  3. Waah! kyaa baat hai! Badhaaii aalok jii is Bahut hii sundar, satiik aur damdaar laghukathaa ke liye, aur badhaaii saahity-shilpii ise prastut karane ke liye.

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  4. जाने कब ये जाति और गोत्र आदमी की सोच के बाहर होंगे

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