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माँ और क्षणिकायें - अवनीश एस तिवारी

थकान

बीते जीवन की असफलताओं,
और घुटने के दर्द से थक ,
लेटे - लेटे अब सो जाती है ,
माँ |

वैराग्य

बीना साज - श्रृंगार के,
सूखे बालों का जूड़ा बना ,
अब दिन गुजराती है ,
माँ |

लालच

पिज्जा, बर्गर से बेखबर ,
फ्रंकी, डोसा से दूर ,
गोलगप्पे देख अब भी ललचती है,
माँ |

मौन

ऑफिस से लौटने पर ,
अपने मौन नेत्रों से देख ,
मेरी थकान दूर कर देती है ,
माँ |

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