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सुप्त जागृति [कविता] - सुमन 'मीत'

जागने से गर सवेरा होता
इंसा का रूख कुछ और होता ;
सुप्त जागृति को मिलती लय
जीवन बन जाता संगीतमय ;

न रोता वो कल का रोना
सीख लेता आज में जीना ;
न सताती भविष्य की चिंता
दुख में पल पल न गिनता ;

यूं तो वो हर रोज ही जगता
अन्दर के चक्षु बन्द ही रखता ;
देखता सिर्फ भूत और भविष्य
वर्तमान का ना होता दृष्य ;

समझ को कर तालों में बन्द
इच्छाओं में हो जाता नज़रबन्द ;
ऐसे ही हर दिन होता सवेरा
भ्रम में होता खुशियों का डेरा ;

न जाना वो सूर्य का सन्देश
धूप और छाँव का समावेश !!
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सुमन मीत

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4 टिप्पणियाँ

  1. समझ को कर तालों में बन्द
    इच्छाओं में हो जाता नज़रबन्द ;
    ऐसे ही हर दिन होता सवेरा
    भ्रम में होता खुशियों का डेरा ;

    न जाना वो सूर्य का सन्देश
    धूप और छाँव का समावेश

    मोहक कविता है

    जवाब देंहटाएं

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