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नये साल का गीत [नव वर्ष पर विशेष] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"

कुछ ऐसा हो साल नया,
जैसा अब तक नहीं हुआ.
अमराई में मैना संग
झूमे-गाये फाग सुआ...
*
बम्बुलिया की छेड़े तान.
रात-रातभर जाग किसान.
कोई खेत न उजड़ा हो-
सूना मिले न कोई मचान.

प्यासा खुसरो रहे नहीं
गैल-गैल में मिले कुआ...
*
पनघट पर पैंजनी बजे,
बीर दिखे, भौजाई लजे.
चौपालों पर झाँझ बजा-
दास कबीरा राम भजे.

तजें सियासत राम-रहीम
देख न देखें कोई खुआ...

स्वर्ग करे भू का गुणगान.
मनुज देव से अधिक महान.
रसनिधि पा रसलीन 'सलिल'
हो अपना यह हिंदुस्तान.
हर दिल हो रसखान रहे
हरेक हाथ में मालपुआ...
*****

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6 टिप्पणियां

  1. सुन्दर रचना। आपको सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें।

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  2. सरस भावनाओं से परिपूर्ण
    आपका गीत बहुत मनमोहक है...

    आपको सपरिवार नव वर्ष की शुभ कामनाएँ..आपकी लेखनी नव वर्ष में औ भी सुंदर नए रूपों में विकसित होकर आये...

    .नमन मेरा..
    गीता पंडित..

    जवाब देंहटाएं
  3. bahut bhavpurn geet
    vaele aap ka likha sada hi uttam hota hai
    van varsh mangalmy ho
    saader
    rachana

    जवाब देंहटाएं
  4. अद्वितीय सलिल जी .... नव-वर्ष की शुभकामनाएं ... सच में काफी अच्छा लगा पढ़ कर

    जवाब देंहटाएं

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