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नव प्रभात [कविता] - अवनीश तिवारी

आ नव प्रभात आ,
आ नव प्रभात आ ||

नव कुसुम ला, नव गंध ला,
नव ऋचा के नव छंद ला ,

नव स्फूर्ति ला, नव उल्लास ला,
नव भोर संग नव प्रकाश ला,

आ नव प्रभात आ,
आ नव प्रभात आ ||

नव भक्त ला, नव पूजन ला,
नव भाव लिए नव अर्चन ला,

नव स्वास्थ्य ला, नव शुद्धि ला,
नव विवेक भरी नव बुद्धि ला,

आ नव प्रभात आ,
आ नव प्रभात आ ||

नव क्षितिज ला, नव सृष्टि ला,
नव चिंतन की नव दृष्टी ला,

नव समाज ला, नव देश ला,
नव वंश हेतु नव परिवेश ला,

आ नव प्रभात आ,
आ नव प्रभात आ||

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6 टिप्पणियाँ

  1. नव समाज ला, नव देश ला,
    नव वंश हेतु नव परिवेश ला,

    Good one.

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर रचना है। सधे हुए पद बंध है और सुलझे हुए उपमान हैं।

    जवाब देंहटाएं
  3. सुंदर भावों से भरी सुंदर रचना...

    आभार...अवनीश जी..
    .नव वर्ष की शुभ कामनाएँ ...

    जवाब देंहटाएं
  4. सुन्दर मनोभाव समेटे आशातीत रचना.

    जवाब देंहटाएं
  5. नव भक्त ला, नव पूजन ला,
    नव भाव लिए नव अर्चन ला,

    नव स्वास्थ्य ला, नव शुद्धि ला,
    नव विवेक भरी नव बुद्धि ला,
    ati sunder
    aap kaha sach ho
    badhai
    rachana

    जवाब देंहटाएं

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