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बहुमत [लघुकथा] - आलोक कुमार सातपुते

"चूँकि चित्त को एकाग्र करने के लिये एक प्रतीक चाहिए, सो मैं मूर्ति-पूजा का पक्षधर हूँ।" एक धर्म ने अन्य दो धर्मों से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के उद्देश्य से कहा।

"मैं मूर्तिपूजा के सख़्त खिलाफ़ हूँ, पर मैं मुर्दों की पूजा का पक्षधर हूँ, सो मैं श्रेष्ठ हूँ।" दूसरे धर्म ने कहा।

"मैं तो मूर्तिपूजा का कट्टर विरोधी हूँ, पर मैं एक स्थान-विशेष पर बैठकर एक चित्र विशेष की पूजा, उससे प्रार्थना व उसकी आराधना का पक्षधर हूँ, सो मैं तुम दोनों से श्रेष्ठ हूँ।" तीसरे धर्म ने कहा।

श्रेष्ठता सिद्ध करने की होड़ लिये वे तीनों एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के पास निर्णय के लिये पहुँचे, और उसके समक्ष अपना-अपना पक्ष रखा।

वह व्यक्ति यह सोचकर मुस्कुराया कि प्रतीक की पूजा तो तीनों ही में प्रचलित है, पर उसने बड़ी ही समझदारी से उत्तर दिया- जिस धर्म का पालन करने वाले जहाँ अधिक हैं, वहाँ पर वह धर्म श्रेष्ठ है। अर्थात् तुम लोगों की श्रेष्ठता तुम्हारे सिद्धांतों में नहीं, बल्कि बहुमत में है।

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